Pages

Monday, May 18, 2009

मजबूत सरकार, बिखरा विपक्ष

लोकसभा चुनाव नतीजे निश्चित तौर पर अप्रत्याशित रहे। चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जो दुर्गति हुई है वो सबके सामने है। चुनावी जीत के लिए बीजेपी ने तमाम आजमाए हुए हथकंडे अपनाए लेकिन विफल रहे। इस फेहरिस्त में वरुण गांधी प्रकरण से लेकर मोदी और खुद आडवाणी के उन बयानों को लिया जा सकता है जिसमें उन्होंने डॉ.मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री बताया। जाहिर है कि बीजेपी कमजोर हुई है। लालू, मुलायम सिंह, डीएमके, चंद्रबाबू नायडू जैसे क्षेत्रीय दिग्गज भी कमजोर हुए हैं। वाम दलों की हालत और भी खास्ता हो गई। हालांकि ममता बनर्जी, नवीन पटनायक जैसे क्षेत्रीय सूरमा भी हैं जिन्होंने असाधारण प्रदर्शन कर सबको चौंकाया।... एक ज़माने तक बेलग़ाम राजनीति की सूत्रधार रही कांग्रेस मजबूत हुई है। अकेले भी और यूपीए गठबंधन के रूप में भी। कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ी है। मध्यम वर्ग को कांग्रेस का ये चेहरा भा गया है। नतीजे उसके सुबूत हैं। ये तब है जबकि डॉ.मनमोहन सिंह की सरकार भी आम मतदाताओं को खास राहत देने में विफल रही थी। वैश्विक आर्थिक मंदी और आतंकवाद की बढ़ती घटनाओं के लिये मनमोहन सिंह की पिछली सरकार को जिम्मेदार ठहराना बहुत ठीक नहीं होगा... क्योंकि ये किसी भी सरकार के कार्यकाल में हो सकता था। महंगाई के सवाल पर मनमोहन सिंह कितना कर पाए, ये आम घरों की महिलाएं बेहतर बता सकती हैं। लेकिन आसमान छूती महंगाई इस चुनाव में मुद्दा नहीं बनी। क्या इसके गहरे निहितार्थ है? आप अगर पूरे चुनाव प्रचार पर ग़ौर करें तो फूहड़ संवादों के बीच लोगों के मुद्दे ग़ायब रहे। मसलन, लालू अपने विरोधियों को उसका साला और उसका साढ़ू कहते- कहते अपनी मिट्टी ख़राब करवा ली। मोदी कांग्रेस को पहले बुढ़िया कहा और बाद में उसे गुड़िया कहने लगे। वरुण गांधी के मसले पर मेनका गांधी और मायावती आपस में मां के सवाल पर भिड़ गईं। वामदलों की आवाज इतनी धीमी रही कि शायद ही किसी ने उनकी आवाज सुनी हो। ...ये लोगों को भटकाने की एक साजिश थी। मतदाताओं का ध्यान बांटने की सियासी साजिश। लेकिन जनता ने नेताओं को माक़ूल जवाब दिया। लालू –पासवान सहित तमाम ऐसे नेताओं को सबक सिखाया जो अपने कुछ सांसदों के बूते पर केंद्र की सरकार को घुटने पर लाने के लिये जाने जाते हैं। अपने सांसदों को जेब में डालकर दिल्ली के निजाम में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते रहे हैं। उन बाहुबलियों या फिर उनकी पत्नियों का भी चुनावों में सफाया कर दिया... जो अबतक मीडिया से ये कहते हुए संसद पहुंचते थे कि हमें जनता ने जिताया है तो आप कौन हैं पूछने वाले? उसी जनता ने उन्हें आईना दिखा दिया है।
सत्ता पक्ष की तस्वीर तो साफ है। लालू, मुलायम से लेकर तमाम दल सत्ता पर डोरे डाल रहे हैं। जेडीयू जैसे दूसरे क्षेत्रीय दलों का भी कोई भरोसा नहीं है। कांग्रेस के लिये काफी सुविधानजक स्थिति है। लेकिन विपक्ष का क्या होगा? विपक्ष की सूरत कैसी होगी। देखिये कि सत्ता में एक ऐसा गठबंधन है जिसके पास बेशुमार ताकत है। लेकिन विपक्ष में बैठने वाले एनडीए का कोई वजूद बचता नहीं दिखता है। बीजेपी अंदरूनी तौर पर बिखरी हुई दिख रही है। वामदल सदन के अंदर किसी ख़ास हैसियत में नहीं रह गए हैं। क्षेत्रीय सूरमाओं का सत्ता के साथ याराना रहा है या फिर उनसे दोस्ती की चाहत है। विपक्ष की बिखरी हुई ताक़त के सामने क्या एकबार फिर कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के बेलगाम होने का ख़तरा नहीं है?

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

जो कमजोर वजीरे-आजम की,
स्वर लहरी बोल रहे थे।
शासन स्वयं चलाने को,
मुँह में रसगुल्ले घोल रहे थे।।
उनको भारत की जनता ने,
सब औकात बता डाली है।
कितनों की संसद में जाने की,
अभिलाष मिटा डाली है।।

मनसूबे सब धरे रह गये,
सपने चकनाचूर हो गये।
आशा के विपरीत, मतों को
पाने को मजबूर हो गये।।

फील-गुड्ड के नारे को तो,
पहले ही ठुकरा डाला था।
अब भी नही निवाला खाया,
जो चिकना-चुपड़ा डाला था।।

माया का लालच भी जन,गण,मन को,
कोई रास न आया।
लालू-पासवान के जादू ने,
कुछ भी नही असर दिखाया।।

जिसने जूता खाया, उसको हार,
हार का हार मिला है।
पाँच साल तक घर रहने का,
बदले में उपहार मिला है।।

लोकतन्त्र के महासमर में,
असरदार सरदार हुआ है।
ई.वी.एम. के भवसागर में,
फिर से बेड़ा पार हुआ है।।

जनता की उम्मीदों पर,
अब इनको खरा उतरना होगा।
शिक्षित-बेकारों का दामन,
रोजगार से भरना होगा।।

pratibha said...

जाने क्यों लोगों को लग रहा है खासकर मीडिया वालों को कि रिजल्ट अप्रत्याशित रहा. जनता की नब्$ज पकडऩे में नेता ही नहीं मीडिया भी फेल रहा. यह तो होना ही था. जहां तक सवाल यूपीए सरकार के बेलगाम होने के खतरों को लेकर है तो जनाब एक खतरा टला न तोल-मोल का, जोड़-तोड़ का. पब्लिक अब सारे पैंतरे समझ गई है. ज्यादा मनमानी तो किसी की नहीं चलने वाली. यूपीए सरकार भी यह बात समझ ले तो बेहतर होगा. अच्छा ब्लॉग है आपका.