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Wednesday, May 20, 2009

...मुझे मेरी बीवी से बचाओ


शादीशुदा मर्दों के लिये सुप्रीम कोर्ट ने दिलचस्प मशविरा दिया है। कोर्ट ने एक पारिवारिक विवाद के मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि शादीशुदा मर्द अपनी पत्नियों की हर सलाह मान लें... अन्यथा आप परेशानी में फंस सकते हैं। पत्नी जो भी कहे उसपर तर्क-वितर्क किये बिना उसे मंजूर कर लें तो सुखी रहेंगे। यानी सुखी जीवन का मंत्र यही है कि पत्नी खुश तो पूरा जमाना आपके लिये खुशगवार हो जाएगा। कोर्ट की इस सलाह की रौशनी में ख़ुद को भी देखने की कोशिश कर रहा हूं। कहते हैं न कि शादी का लड्डू जो खाए वो पछताए और जो न खाए वो भी पछताए। अजीब संयोग है कि ज्यादातर लोग लड्डू खाकर ही पछताना बेहतर समझते हैं।..तो जनाब, मैं भी शादी का लड्डू खाकर पछताने वालों में शामिल हूं। जाने दीजिये... सुप्रीम कोर्ट की इस सलाह पर टीवी में आधे घंटे का प्रोग्राम तैयार करते हुए कुछ दिलचस्प बाते हुई। दिमाग में कुछ ऐसे फिल्मी गाने घूमने लगे जिसमें पति गाता है कि जबसे हुई है शादी, आंसू बहा रहा हूं। या फिर जमाना तो है नौकर बीबी का। या मुझे मेरी बीबी से बचाओ...और भी ऐसे ही हंसी- ठिठोली वाले गाने। तब साथियों से बातचीत के दौरान ये हुआ कि इसके लिए शॉट्स क्या लिये जाएं। तय पाया गया कि नाट्य रूपांतरण से भी काम चलाया जा सकता है। उसके लिये एक महिला की जरूरत थी और एक ऐसे चेहरे की जो पत्नी पीड़ित हो। महिला किरदार के लिये कई सहयोगी तैयार हो गई लेकिन पति बनने के लिये कोई तैयार नहीं। खोज शुरू हुई तो सबपर बारी- बारी से निगाह दौड़ाई गई। इसके लिये बेहद दुबला- पतला हलकान दिखने वाले व्यक्ति की जरूरत थी।...किरदार की मांग थी कि उजड़े चमन सरीखा कोई व्यक्ति ही हो। जो ऐसे थे भी... वे पत्नी पीड़ित पति का किरदार निभाने को तैयार नहीं थे। वे लोग भी नकार गए जो अक्सर अपनी पत्नी के जुर्मों के किस्से सुनाते फिरते हैं। मुश्किल ये कि प्रोग्राम का समय होता जा रहा था...और नाट्य रुपांतरण का काम अधर में लटका हुआ था। आख़िरकार फिल्मी शॉट्स के जरिये प्रोग्राम पूरा करना पड़ा। लेकिन कोई ऐसा मर्द नहीं मिला जो पत्नी पीड़ित बनने को राजी हो। यहां तक कि कुंवारे भी इसके लिये तैयार नहीं हुए...इस अंदेशे में कि उनकी गर्लफ्रैंड की नज़र न पड़ जाए। मेरे लिये ये किसी हैरानी से कम नहीं था। ये अपनी मूछों को हमेशा ऊंची रखने की आदत थी या हिंदुस्तानी मर्दों का बीवी प्रेम का ही रूप था? जो घर में लाख फ़साद करे... या पत्नी उसपर चाहे जितना जुल्म करे.. लेकिन ये फ़साना जमाने के सामने लाने में हिचकिचाता है। भले ही पत्नी पीड़ित हो लेकिन दिखना कोई नहीं चाहता। यहां तो कई ऐसे लोग आपको मिल जाएंगे जिन्हें जोरू का गुलाम कहा जाए तो इस गुलामी को भी ज़िंदगी का हिस्सा मानते हैं।

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