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Thursday, May 21, 2009

सर्दभरी रात, लालू और लोगों का हुजूम


लालू यादव का बदला हुआ अंदाज आजकल आप भी देख रहे होंगे। ..बुझे- बुझे से। अनमनाए। कुछ- कुछ बौखलाए। कभी आवेग में तो कभी अफसोस जताने की मुद्रा में। लालू यादव इन दिनों खुद भी नहीं हंसते हैं। उनकी बातचीत में कोई शिगूफ़ा भी नहीं होता है जो लोगों हंसाए। एक तो...मीडिया से मिलते ही बहुत कम हैं। भले ही बोल रहे हों कि मंत्रीपद की कोई चाहत नहीं है। लेकिन ये भी कहते हुए दिल्ली दरबार में घूम रहे हैं कि बहुतों को बनते- बिगड़ते देखा है। ये भी कहते हैं कि मेरा अपमान हो रहा है... फिर कहते हैं कि गांधी परिवार के बारे में मुंह नहीं खोलेंगे। साथ में ये भी जोड़ते हैं कि खुद पीएम ने उन्हें फोन कर छुटभैये कांग्रेसी नेताओं के बयानों के लिए अफसोस जताया। लालू अब समझ गए हैं। नेता बड़ा नहीं होता... उसके पीछे खड़े लोगों की संख्या उसे ताक़तवर बनाती है। लालू जी अबतक खुद को ताकतवर माने बैठे थे। तभी तो अपने एक रसोइये के खाने पर रीझ गए तो उसे भी टिकट देकर जितवा दिया। लालूजी को पता नहीं याद भी हो या न हो... कभी बिहार में उनका ऐसा जलवा था कि जिधर निकल जाते दस-बीस हजार लोग ऐसे ही इकट्ठा हो जाते। पटना के पीरमुहानी इलाके में सर्द भरी रात में लालूजी एकबार निकल गए तो गरीब- गुरबों का मानो सैलाब सड़कों पर निकल आया। उतनी भीड़ ...कि रैली में जिस तरह से बसों का इंतजाम करके राजनीतिक दल भीड़ जुटाते हैं। यहां लालू को देखने के लिए सैलाब उमड़ा पड़ा था। मुख्यमंत्री रहते हुए लालूजी ने एक अभियान चलाया था- साफ-सफाई और नहाने –धोने का। खुद कुर्सी लगाकर बैठ जाते और नाई से बच्चों के बाल बनवाते। कई बस्तियों में साड़ी बंटवाते...और अपने खास अंदाज में साड़ी के लिए मारा-मारी करती महिलाओं को जोर से कहते कि शंतिया तू फिर आ गईली रे... भीड़ में कोई न कोई शांति होती ही या लालूजी जो भी नाम लेते उस नाम की महिला चौंककर दांत निपोर देती। खुश हो जाती कि लालूजी उन्हें जानते हैं। अपने उड़नखटोला पर जाते-जाते अचानक कहीं भी उसे उतारकर किसानों से बतियाने लगते। छठ पूजा में जब गंगाघाट पर जाते तो जैसे मजमा लग जाता। फिर अपनी कोठी में ही छठ का इंतजाम हुआ। लाइट- कैमरा और दुनिया भर की मीडिया के सामने लाइव पूजा- पाठ की नफासत लालूजी में आ गई। लालूजी और आगे गए। चारा घोटाले के बाद भी लालू का करिश्मा जैसे लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा था। केंद्र की राजनीति में ऐसे लटपटाए कि बिहार भूल गए। यहां शाहरुख ख़ान के शो में आए... या फिर किसी और मीडिया हाउस के शो में...जबर्दस्त टीआरपी मिली। पाकिस्तान तक में उनकी शोहरत का डंका बजा। उनके साथ पाक़िस्तान यात्रा पर गए रामविलास पासवान पूरी यात्रा में कुनमुनाए ही रहे। फिर सत्ता में आए तो क्या कहने। बेतरतीब खिचड़ी बाल शेप में आ गए। मीडिया ने उन्हें प्रबंधन गुरू का नाम दे दिया। मंतर मारकर रेल को घाटे से उबारकर फायदे में बदल दिया।...सब तरफ लालू का ही जलवा रहा। सो, उनकी जुबान बदल गई। पटना में कैमरे के सामने मटर की पत्तियां चबाने वाले लालूजी मीडिया वालों को दुत्त- दुत्त कर भगाने लगे। पब्लिक को बुड़बक कहकर भगाने लगे।...उन्हें भ्रम था कि जीत का समीकरण उनके पास है तो पब्लिक की जरूरत नहीं। तभी तो चुनाव के समय भी कहते फिरे कि विकास- उकास कुछ नहीं होता है... जातीय समीकरण से फायदा होता है तो क्यों न फायदा उठाएं। नतीजा देख लिया। लालू की लोकप्रियता वाले गुब्बारे से पब्लिक नाम की हवा निकल चुकी है। सो, लालूजी की शोहरत का गुब्बारा भी फ़क़त कहने का गुब्बारा रह गया है। लेकिन लालूजी ने कोई सबक नहीं सीखी। एकदिन पहले ही एक चैनल से बातचीत करते हुए एंकर ने जब पूछा कि बिहार से तो इसबार किसी के मंत्री बनने की उम्मीद नहीं है तो उनका लहजा कुछ ऐसा था जैसे बिहार की जनता ने उन्हें हराकर कोई बड़ी भारी ग़लती की है। उन्हें अबतक अपने चुनावी जीत के फार्मूले के पिट जाने का विश्वास नहीं हुआ है। लालूजी इसी इंटरव्यू में कहते मिले कि विकास- उकास कोई मुद्दा नहीं रहा ...सब जाति का समीकरण है। पता नहीं लालूजी जिस जनादेश के बल पर फूले नहीं समाते थे... आज उसी जनादेश का सम्मान करना क्या वाक़ई भूल चुके हैं?

1 comment:

RAJNISH PARIHAR said...

अब जा के लालू जी को पता चला की नौटंकी के साथ साथ काम भी करने होते है...मसखरी करके भीड़ जुट सकती है वोट नहीं....!आखिर में रेपर कितना ही आकर्षक हो, जनता अन्दर का माल देखना जानती है...