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Wednesday, May 27, 2009

एम्स में आप आदमी नहीं फ़क़त मरीज़ हैं

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स में स्वास्थ्य की नियमित जांच के लिए गए थे। एम्स के डॉक्टर रणदीप गुलेरिया ने उनकी जांच की। सुबह ख़बरों में इसका ज़िक्र था। डॉ।गुलेरिया का नाम सुनकर थोड़ा हैरान हुआ। ये वही डॉ।गुलेरिया हैं जो मेरे एक रिश्तेदार का भी इलाज़ कर रहे हैं। बिहार से तक़रीबन हर चार- पांच महीने बाद मेरे रिश्तेदार आते हैं और डॉ।गुलेरिया को अपनी रिपोर्ट दिखाने तड़के चार बजे जागकर एम्स के लिये रवाना हो जाते हैं। मौसम से कोई फर्क नहीं पड़ता... जाड़ा, गर्मी...बरसात। हर मौसम में वे एम्स जा चुके हैं। हाड़ कंपाती सर्दी हो या चमड़ी झुलसाने वाली गर्मी... बेचारे अपने भाई को लेकर आते हैं और दो- तीन सप्ताह की जद्दोजहद के बाद बिहार के लिए रवाना हो जाते हैं। इलाज का फायदा साफ दिखता है। हालांकि उनके दिल्ली आने से मेरे घर में बड़ी मौज आ जाती है। बढ़िया- बढ़िया चीजें खाने को मिलती हैं...और हंसी- ठठा भी खूब होता है। ससुराल के रिश्तेदार हैं। लेकिन उनकी एम्स जाने की तक़लीफ़ देखी नहीं जाती। और बार आते थे तो उनके बड़े भाई साथ होते थे और दोनों भाई एम्स जाते थे... अपने राम को ख़बर नहीं रहती थी। इसबार अकेले आए तो मै ही उनके साथ एम्स चला गया। पहली बार लगा कि बेचारे ने बीमारी के साथ- साथ कितना कष्ट अबतक उठाया है। कितनी जलालत झेली है। कितना अपमान सहा है। हम सुबह पांच बजे मोहननगर से ऑटो से एम्स के लिए चले। हमारे रिश्तेदार...उनकी पत्नी और मैं। एम्स पहुंचे तो बाहर से ही लंबी लाइन दिखी... हमारे रिश्तेदार की पत्नी ने कहा कि लेट हो गए। ख़ैर। अंदर गए तो लगभग सौ लोगों की लाइन लगी थी...सुबह पौने छह बजे। हम दोनों मर्द खड़े- खड़े आपस में बात करने लगे और मेरे रिश्तेदार की पत्नी लाइन में लग गईं.... । बैठने की कोई जगह नहीं थी सो मरीजों को भी खड़े रहने की अनिवार्यता थी। मेरे रिश्तेदार ...औरों के भी मरीज रिश्तेदार ऐसे ही खड़े थे... कुछ तो मरीज ही लाइन में लगे हुए थे। अजब नजारा था। सुबह साढ़े सात बजने तक लाइन में खड़े रहने के बाद पैरों पर खड़े रह पाना थोड़ा मुश्किल हो रहा था। लेकिन अचानक एक महिला लाइन में खड़े होने को लेकर पड़ोस की एक महिला से झगड़ पड़ी। झगड़ने और ताने मारने की उसकी अदा से भीड़ का खूब मनोरंजन हुआ। भीड़ बढ़ चुकी थी। लाइन में अब डेढ़ से पौने दो सौ लोग लगे थे। हालांकि रोजाना सौ पर्चियां ही काटे जा ने की व्यवस्था है लेकिन लेकिन सिर्फ भरोसे की पूंजी के साथ लोग लाइनों में खड़े थे। साढ़े आठ बजा तो पर्ची वाली खिड़की खुल गई। यहां से पर्ची लेकर डॉक्टरों के चैंबर के आगे नंबर लगाने की व्यवस्था है। खिड़की पर केवल सौ टिकट ही जारी किये जाते हैं रोजाना... लेकिन भीड़ दो सौ को भी पार कर चुकी थी। एकाध पर्ची कटने के बाद खिड़की के ऊपर एक कागज चस्पा था जिसपर लिखा था रूम नंबर ३२ के डॉक्टर साहब आज नहीं आएंगे... यही तो डॉक्टर गुलेरिया का चैंबर है। उन्हीं से तो मेरे रिश्तेदार को दिखलाना था जिसके लिए तीन घंटे से लाइन में खड़े थे। तीन घंटे बाद पता चला कि डॉक्टर साहब शनिवार को आएंगे। मेरे रिश्तेदार परेशान तो थे लेकिन हैरान नहीं... क्योंकि डेढ़ साल में उनके साथ दसियों दफ़े ऐसा हो चुका है। आखिरी कोशिश के रूप में उन्होंने वहां बने एक काउंटर पर जाकर कुछ पूछना चाहा तो वार्ड ब्वॉय जैसी वर्दी में खड़े व्यक्ति ने उन्हें झिड़क दिया। मेरे रिश्तेदार बिहार के एक बड़े कॉलेज में अच्छे पद पर हैं। लेकिन ये कॉलेज नहीं था... अस्पताल में वे फ़क़त एक मरीज थे... जिन्हें कुछ पूछने की इजाजत नहीं थी। आपने अगर ऐसी कोशिश की तो डॉक्टर भले आपको बख़्श दें... वार्ड ब्वॉय जैसा ओहदेदार आपको नहीं बख्शेगा... मैं थोड़ा नाराज होने लगा तो मेरे रिश्तेदार ने अपने चेहरे की बेचारगी को थोड़ा दबाते हुए मुझे बाहर की ओर ले जाने लगे कि शनिवार को फिर आ जाएंगे।

8 comments:

manish said...

achha laga.logo ke vivashta par rona bhi aa raha hai.khair marij hai kya kare.......

"लोकेन्द्र" said...

भाई साहब क्षमा चाहूँगा.......
लेकिन अभी आपने वहां का बहुत ही आंशिक रूप से समस्याओ का दर्शन कराया है....... कभी आपका कोई परिचित अगर वहां भर्ती हुआ तो आप और भी बहुत कुछ लिखोगे........लेकिन भगवान ऐसा न करें........
मै भी आज इसी विषय पर लिखना चाहता था..... लेकिन थकावट की वजह से नही लिख प् रहा हूँ....... आज ही मैंने वह अपने चाचा जी का ब्रेन ट्यूमर का यहाँ ओपरेशन कराया हूँ..... तो बहुत सी समस्याओ से जूझना पड़ा...... सबसे ज्यादा तब जब कोई परिचित मिलने आया और उसे कुछ खिलाने ले जाना पड़ा तब शायद वहां का वो खाना या नाश्ता शायद वहां के अधिकारी अपने कुत्तो को भी नही देते होंगे...... और आम आदमी के लिए ये भारत का सबसे अच्छा अस्पताल है........ भारत सरकार जागो........

Raviratlami said...

प्रबंधन की दृष्टि से यह भारत के सबसे रद्दी हस्पतालों में से एक है. मैं स्वयं भुक्तभोगी हूं. एन्जियोग्राफी के लिए दो बार जाना पड़ा और दो महीने पहले से तारीख लेने के बावजूद पूरे आठ दिन चक्कर लगाने के बाद एन्जियोग्राफी हुई और उसकी रपट प्राप्त करने में और आठ दिन!

यहाँ सिर्फ बड़े नेताओं (और रसूख और पहुंच वालों - जैसे कि पप्पू यादव सरीखों) का सही इलाज होता है.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आप बहुत सज्जन व्यक्ति हैं जो कह रहे हैं कि एम्स में आप आदमी नहीं मरीज़ हैं.
भाई सच तो यह है कि आप एम्स में इंसान ही नहीं है.
यहाँ के कर्मचारियों और अधिकारियों को, दुत्कारने की ही पगार मिलती है.
और डॉक्टर लोग तो यह मान कर चलते हैं कि मरीज से बात करने की ज़रुरत नहीं और, मरीज़ के रिश्तेदार तो मूर्ख ही होते हैं सो, उनकी बातों का क्या जवाब देना.
और हाँ, हर मरीज़ को अपनी देखभाल के लिए एक रिश्तेदार रखना ज़रूरी है क्योंकि यहाँ नर्सें सिर्फ खीं-खीं और बद्तमीजी करने के लिए ही भर्ती की जातीं हैं.

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

मैंने इससे ज्यादा बदइन्तेजामी भरा अस्पताल नहीं देखा. भारत के कोने-कोने से आये लोग वक़्त से ६ घंटे पहले से लाइन में लगते हैं लेकिन फिर भी उन्हें खली हाथ वापस जाना पड़ता है.
हिंदी में प्रेरक कथाओ, प्रसंगों, और रोचक संस्मरणों का एकमात्र ब्लौग http://hindizen.com अवश्य देखें.

रंजन said...

बहुत बुरा हाल है जी.. मैं भी भुगतभोगी हूँ..... व्यवस्थाओं की दृष्टी से..

पर डॉ वाकई बहुत अच्छे है.. परेशानी होती है.. वक्त लगता है... पर इलाज सटिक... क्यों न सरकार व्यवस्था outsource कर दे..

लोकेश Lokesh said...

गनीमत है आपको मरीज माना गया :-)

ashish said...

aaims mein maan ko lekar main bhi gaya tha, aapko yaad hoga. tab laga tha ki mere hi saath aisa hua hai, ab pata chala aap bhi aiims ke sikar hain.