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Sunday, May 31, 2009

एक मरीज़...दस घंटे और हलकान भीड़

शनिवार को अपने रिश्तेदार को फिर दिल्ली के एम्स में लेकर गया था। सुबह चार बजे जागे और पौने पांच बजे घर से निकलकर साढ़े छह बजे एम्स पहुंच गए। लाइन इसबार भी लंबी थी। लाइन की शुरुआत में मेरठ के एक सज्जन खड़े थे जिनके हाथ में एक्सरे रिपोर्ट वाला बैग था। बैग पर लिखा था- मेरठ स्कैन सेंटर, इव्ज चौराहा, पूर्वी कचहरी रोड, मेरठ। उनके पीछे पीठ खुजा रहा बिहार से था। उसकी बोली से लगा। एक उत्तरांचल साइड की महिला थी। एक पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक बुजुर्ग। हरियाणा के लोग भी लाइन में थे तो पंजाब के भी इक्का- दुक्का लोग शामिल थे। मतलब, हर सूबे से कोई न कोई यहां था... एम्स का मारा। तो साहब साढ़े आठ बजे खिड़की खुली तो मैने अपने रिश्तेदार का नंबर जानने के लिए मुंडी गिनना शुरू कर दिया...एक..दो...तीस..चालीस...लगभग पैंसठवां नंबर था। लाइन में लगभग ढाई सौ लोग खड़े थे। थोड़ी देर बाद एक पर्ची लगी.. जिसपर लिखा था कि रूम नंबर 34 के डॉक्टर छुट्टी पर हैं। छुट्टी मारने वाले उस डॉक्टर के मरीजों में गुस्सा... नाराजगी और मायूसी साफ थी। सुबह से लाइन लगे थे। लाइन से हट गए। मजबूर और बेबसी में वापस घर की तरफ जाने लगे। लगभग डेढ़ घंटे बाद हमारा भी नंबर आया। पर्ची कटी तो डॉक्टर वाले चैंबर की तरफ गए। बड़े से हॉल में चार- पांच सौ लोग बैठे थे। कुछ घंटे इंतजार के बाद डॉक्टर के चैंबर में मरीजों को भेजे जाने का सिलसिला शुरू हुआ तो कंपाउंडर ज्यादा सक्रिय हो गए। एम्स के कर्मचारी,,, और उनके नाते-रिश्तेदार कानाफूसी कर अपना नंबर पहले लगवाने में सफल रहे। सबसे पहले जिस महिला ने सुबह साढ़े चार बजे एम्स आकर नंबर लगाकर पर्ची कटवाई थी... लगभग ढाई घंटे बाद उसका नंबर आया। इस ढाई घंटे में विशुद्ध रूप से एम्स के कर्मचारियों के रिश्तेदारों को ही डॉ.रणदीप गुलेरिया के पास भेजा गया। बेहद सुनियोजित तरीके और संगठित तरीके से एम्स के कर्मचारी इसे अंजाम देते हैं। आपने जरा भी चूं-चपड़ की तो उन्हें गिरेबां पकड़ते देर नहीं लगती। मेरे सामने भी ऐसा नजारा कई दफे आया। एक ने कहा कि सारे रिश्तेदारों कू आज ही दिखवा लेगा क्या... अपने रिश्तेदारों के लिए अलग से एम्स क्यों न खुलवा लेता... किसी ने कहा कि तेरे रिश्तेदारों को तो एम्स की दवा भी असर नहीं करेगी। इतना सुनना था कि एक कर्मचारी ने टिप्पणी करने वाले पर ठुकाई शुरू कर वहां से भगा दिया।...एक मरीज जान –बूझकर मारने वाले उस कर्मचारी की चिरौरी करने लगा। सो, ये सब देखते –सुनते साढ़े तीन बजे गए। तब हमारा नंबर आया। मैं तो सोच रहा था कि आज यहां ताला लगाने की जिम्मेदारी भी हमारी ही होगी। ...चलिये छोड़िये भाई.. एक गुड न्यूज़। हमारे रिश्तेदार को डॉ. गुलेरिया ने अब स्वस्थ बताया। दवा भी कम कर दी। यानी, घंटो की मेहनत सफल रही ...और हम भूखे- प्यासे शाम लगभग साढ़े चार बजे घर पहुंच गए।

8 comments:

Dipti said...

इस अव्यवस्था का मैं भी हाल ही में शिकार हो चुकी हूँ फिर भी ये सरकारी अस्पताल है तो गरीबों को कुछ उम्मीद हैं वरना तो निजी अस्पतालों की फ़ीस देने से बेहतर गरीब का मरना...

रंजन said...

चलो आखिर आपका नंबर आया तो.. वैसे मुझे तो उस तरफ जाते भी डर लगता है.. स्वस्थ आदमी भी बीमार हो जाये ऐसे में

Udan Tashtari said...

यही हाल है अच्छे अस्पतालों का. शुक्र है कि आपके रिश्तेदार की तबीयत बेहतर हुई. वरना तो लूट खसोट के इस बीहड़ बीयावन में इसकी उमीद भी कम ही होती है कि सही इलाज मिल जये.

ajay kumar jha said...

desh kaa chikitsaa jagat khud beemaar chal raha hai.....aur ye ghatnaayein is baar kaa pramaan hain...

ramanuj said...

ye loktantra hai bhaiya ........yahan sab kuchh aise hi chalta hai......

महामंत्री - तस्लीम said...

अस्पताल चल रहे हैं यही क्या कम है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

राजन अग्रवाल said...

एक बार मैं भी गया था अपने चाचा को लेकर भारत के सबसे बड़े अस्पताल में, लेकिन जब तक नंबर आता तब तक पर्ची काटना ही बंद हो गया था, लौट आया, फिर कभी जाने की हिम्मत ही नहीं पड़ी, रोहतक में दोस्त डॉक्टर है, उसी के पास चला जता हूँ.

Jayant chaddha said...

कहाँ हैं सर आज कल...??? बहोत परेशां चल रहे लगते हैं एम्स के चक्कर में .... खैर उस सबसे बड़े या सबसे घटिया अस्पताल के चक्करों से जल्दी मुक्ति मिल जाए हमारी तो यही दुआ है... मैंने भी भड़ास निकलने के लिए एक अड्डा बना लिया है... टाइम निकाल कर नज़र मार लीजियेगा... दो पोस्ट डाले हैं पहले पार्ट १ देख लीजिये... एड्रेस है www.nayikalam.blogspot.com