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Sunday, June 21, 2009

तुम्हारी ही मुट्ठी में आकाश- तारा

दोस्तों, बहुत दिनों बाद आपसे बात हो रही है। एक सूचना के साथ बात शुरू करता हूं कि मेरे बड़े बेटे स्वप्निल और भतीजे अमर्त्य का एडमीशन उस स्कूल की पहली क्लास में हो गया जहां मेरा भाई चाहता था। उस स्कूल में हुआ जहां दोनों बच्चों के साथ दोनों की मम्मियों ने दो- दो दफे इंटरव्यू और लिखिति परीक्षा दी थी। उस स्कूल में बच्चों का दाखिला हो गया जहां मेरे पिता जी यानि बच्चों के दादाजी का सपना था। वे तो अभी से ही छठवीं क्लास के बाद दोनों बच्चों को दून स्कूल में एडमीशन के लिए हम सबको मानसिक रूप से तैयार करने में लगे हुए हैं। ख़ैर... अभी उस स्कूल में ये एडमीशन हुआ जहां एक बच्चे का सत्तर हजार रुपये सिर्फ दाखिले के लिए वसूला गया और हर माह का ख़र्च मेरी हैसियसत से ज्यादा है। आप पूछेंगे कि क्या मैं नहीं चाहता था। कौन नहीं चाहता है अपने बच्चों का भला। लेकिन मुझे उन बच्चों का ध्यान आ जाता है जो सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। मुझे उन बच्चियों की याद आ जाती है जो कई किलोमीटर पैदल गांव की पगडंडियों पर चलकर स्कूल पहुंचती हैं। कॉलेज इसलिये नहीं जा पाती क्योंकि आसपास सुविधा नहीं होती... आसपास कॉलेज हो भी तो किसान पिता की बेबसी आड़े आ जाती है। मुझे गांधी जी याद आते हैं जो एक असफल पिता साबित हुए- ऐसा सोचा-समझा जाता है। दौलतमंद नेहरू परिवार और बाद में बिरला घराने गांधी जी के बेहद क़रीब थे... लेकिन गांधी जी फ़क़त संत। जिन्होंने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल की शिक्षा दिलाई। गांधी जी की आंखों में पूरे हिंदुस्तान के बच्चे थे। मुझे गांधी जी की याद इसलिए आ रही है क्योंकि दोनों बच्चों के दाखिले के बाद जब अपने घर आया तो मेरे साढ़ू की बेटी भी थी... और उसके मम्मी –पापा भी। बच्चों के दाख़िले की सूचना पर उस बच्ची को ख़्वामखाह ही मन लगाकर पढ़ने की सलाह दी जाने लगी। सिर झुकाए बच्ची सुनती रही। उसके पास विकल्प ही क्या था। बच्चों के एडमीशन का मेरा थोड़ा बहुत उत्साह भी जाता रहा। मुझे अपने दिन भी याद आने लगे जब घर में कोई बच्चा अच्छा करता तो हमारे खाते में नसीहतों की फेहरिस्त होती। ख़ैर इन सबको दरकिनार करते हुए मैं अपने साढ़ू की इस प्यारी सी बच्ची के कान में कहना चाहता हूं- बेटे... तुम सफलता की उन- उन ऊंचाइयों को छूओगी ... जिसकी रौशनी में हम सब चौंधिया जाएंगे... बच्चे खूब पढ़ो....।