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Friday, July 31, 2009

...तुम्हीं चल दिये दास्तां कहते- कहते

31 जुलाई 1981... आपके लिए थोड़ा अजीब होगा, लेकिन मुझे याद है। वो उमस भरी दोपहर... बिहार के छपरा शहर के विश्वेश्वर सेमिनरी हाईस्कूल के परिसर का सन्नाटा... मेरे नानाजी रिटायर हो रहे थे। उनका विदाई समारोह था। ये स्कूल उनके नाम पर नहीं था लेकिन संयोग था कि उनका भी नाम यही था... ये न भी हो तो भी इस स्कूल के जर्रे- जर्रे में उनके व्यक्तित्व का असर साफ था.. इसी स्कूल में तक़रीबन अट्ठारह वर्षों की सेवा के बाद यहां के प्रिंसिपल साब यानी, आचार्य विश्वेश्वर रिटायर हो गए थे। मेरे नानाजी और इस स्कूल के प्रिंसिपल साब की हनक का आख़िरी दिन। वही प्रिंसिपल साहब जो कभी भी किसी भी क्लास में अचानक घुस जाते और छात्रों के साथ शिक्षकों से भी सवाल पूछ बैठते। मेरे जेहन में वह तस्वीर ज़िंदा है... जब अपने यहां से छपरा जाकर मेरा नाम नानाजी के स्कूल में लिखवाया गया था। पांचवीं कक्षा में... मैं अपने मम्मी- पापा की याद में जार- जार आंसू बहाया करता था। स्कूल में खोया- खोया रहता था। धीरे- धीरे खुला... तो क्लास में अपने नानाजी के प्रिंसिपल होने की धौंस ग़ालिब करता क्लास को हलकान रखता। न होमवर्क करता न क्लास में किसी सवाल का जवाब देता। एकदिन क्लास मॉनीटर ...उसका उपनाम हमने भुआल ( एक ऐसा कीड़ा जो शरीर के किसी भी हिस्से को छू जाए तो दिन भर खुजली होती है)... रखा था, उसे ही नाक पर दे मारा और पेश्तर उसकी नाक के खून निकल आया... थोड़ा डरा और ख़ामोश बैठ गया। मॉनीटर ने मेरा नाम तत्कालीन प्रथा के मुताबिक ब्लैक बोर्ड पर लिख दिया... संजीव कुमार। क्लास मॉनीटर का काम ही यही था, कि शिक्षक की ग़ैर मौजूदगी में शैतानी करने वाले बच्चों का नाम ब्लैक बोर्ड पर लिख दे... और जो भी शिक्षक आए, वो शैतानों की फेहरिस्त पर निगाह डालकर यथासंभव दंडित करे। ख़ैर क्लास में शिक्षक आए..सबसे पहले मेरा नाम, उसके बाद पांच और नाम भी थे। उन्होंने डांट –फटकार करके बिठा दिया...औरों को छड़ी लगी। इतने में प्रिंसिपल साब आए तो उन्होंने नए सिरे से ब्लैक बोर्ड पर निगाह डाली... मैं शेखी भरी नज़रों से क्लास रूम को देख रहा था कि मेरे नाम के बाद के नामों पर प्रिंसिपल साब निगहबान होंगे और उनपर रहमतों की बारिश करेंगे। मगर मुझे तब काठ मार गया जब प्रिंसिपल साब ने जोर से चिल्लाकर मेरा नाम पुकारा.. मैं थोड़ी सकपकाई मुद्रा में खड़ा हो गया... उन्होंने चपरासी से बेंत लेकर मुझपर जमकर बरसाया... हालांकि दो बेंत में ही पैंट में ही शू- शू हो गया... मुझे कूटने के बाद प्रिंसिपल साब फ़ौरन कक्षा से चले गए, ये मेरे लिये दोहरी मार थी।
प्रिंसिपल साब से मैने इतनी मार खाई... लेकिन आदमी कभी नहीं बन पाया। वे मुझे राम गोज़ और आई गो का अंतर नहीं समझा पाए... मैं राम को भी गो ही कहता और खुद को भी गो... मुझे लगता कि भला राम ने क्या ग़लती कर दी कि उसके नाम के आगे इतना भारी- भरकम शब्दों का बोझ डालूं.. जबकि गो भर कह देने से सब समझ लेते हैं। तो परिणाम निकलता कि प्रिंसिपल साहब बेसाख्ता बिफर पड़ते। ख़ैर, प्रिसिंपल साब की सत्ता उर्फ अपने ननिहाल में मैं कंचे नहीं खेल सकता था... क्योंकि ये लफंगों का खेल है। मैं गोलगप्पे नहीं खा सकता था क्योंकि गोलगप्पे वाले का नाखून बड़ा होता है और उसमें बेशुमार गंदगी भरी होती थी। मैं पतंग नहीं उड़ा सकता था क्योंकि लोफड़ों का शग़ल है और इसमें छत के गिरने की आशंका होती है। नानाजी के लिए खेल बस फुटबॉल था... जो स्कूल के मैदान में खेलने वाले बड़ी उम्र के लड़के मुझे खिलाने को कतई तैयार नहीं होते।
प्रिंसिपल साहब के लिए उनके स्कूल के बच्चे ही उनके लिये सबकुछ थे... हम तो बेकार हैं... किसी काम के लायक नहीं (जैसा यदा-कदा कहते भी थे, और हम खुद को वैसा ही समझते भी थे... न भी समझें तो बाद में चलकर इसकी पुष्टि भी हो गई)। बोर्ड का इम्तिहान देने वाले छात्रों के घर लगभग हर शाम छह- सात बजे खुद पहुंच जाते... सबके घर का पता उनके पास होता था। छात्र को पढ़ते नहीं देखते तो उसके साथ- साथ मां- बाप की भी दुर्गति अलग होती। रिजल्ट आता और उनके स्कूल के बच्चे जिले भर में धूम मचाते तो जैसे कई दिनों तक प्रिंसिपल साहब खुशी से सो नहीं पाते। वाद- विवाद प्रतियोगिता के लिए अपने स्कूल के छात्रों का खुद चयन करते और उसे मंच पर बोलवाने की प्रैक्टिस कराते। एक दीपक था जिसे नानाजी कुलदीपक कहते... एक जगजीत सिंह था... सरदार... दोनों ने वाद-विवाद प्रतियोगिता में जिले स्तर पर कामयाब होने के बाद राज्य स्तर पर इनाम हासिल किया था। दोनों नानाजी के लिए बेहद प्रिय थे।... उनके स्कूल का अनुशासन ऐसा कि किसी भी छात्र की हिम्मत नहीं कि साइकिल पर बैठकर परिसर के भीतर आ जाए... किसी छात्र की हिम्मत नहीं कि परिसर के बाहर बिकने वाले गोलगप्पे खा ले। सिनेमा देखना तो दूर... किसी के बारे में जानकारी भी मिल जाए तो जैसे पिल पड़ते।
प्रिंसिपल साब फिल्मों के सख़्त ख़िलाफ़ थे। मैं अपनी बड़ी बहन के साथ नानाजी के यहां रहता था और हम दोनों भाई बहन फिल्में देखने के लिए नानीजी से चिरौरी करते। कभी- कभी नानाजी पटना जाते काम से तो हमारी बांछें खिल उठतीं... दोपहर में नानीजी हमें रिक्शे में लेकर फिल्म दिखाने ले जातीं... बैजू बावरा... भक्त प्रह्लाद, कोहिनूर जैसी कुछ फिल्में मुझे याद हैं... नानीजी नई फिल्में दिखाने में परहेज करतीं। घर लौटकर रिक्शे पर भगवान से प्रार्थना करता कि नानाजी अबतक घर न पहुंचे हों... देर रात जब नानाजी घर पहुंचते तो मुझे बड़ी मायूसी होती।
लेकिन 1996 आते- आते परिदृश्य बदल गया। मैं अगर किसी के बहुत क़रीब था तो नानाजी। तब वे प्रिंसिपल साब नहीं थे। मैं मुजफ्फरपुर में नौकरी करता था.. और विश्वकर्मा पूजा के दिन केवल इसलिये नानाजी के यहां पटना आ गया क्योंकि अख़बार में विश्वकर्मा पूजा की छुट्टी थी। दोपहर में एक ही समय में दोनों नाना- नाती ने भोजन किया... इधर- उधर की बातें हुई। दोपहर में सो गया... शाम पांच बजे नानाजी ने मेरे घुटने को हिलाकर बताता कि घूमने जा रहे हैं... मैं सोकर उठा तो नानाजी के इंतजार में कुछ देर बैठा रहा। नानाजी नहीं आए... देर शाम खबर आई कि किसी स्कूटर सवाल ने नशे की हालत में नानाजी को टक्कर मार दी। नानाजी कॉमा में चले गए। ...सात दिनों तक उसी स्थिति में रहने के बाद उनके प्राण छूट गए। सितंबर का महीना था। उनके कमरे में अक्सर एक प्रशस्ति पत्र टंगा मिलता था, जो उन्हें विश्वेश्वर सेमिनरी से रिटायरमेंट के समय किसी शिक्षक ने दिया था- बड़े शौक़ से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं चल दिये दास्तां कहते- कहते।

Monday, July 20, 2009

भोर के बेरौशन जुग़नू

मित्रों, जैसा कि मैंने आपसे वायदा किया था... एक कहानी की शुरुआत कर रहा हूं। एकबार फिर से आग्रह करूंगा कि इसे किसी की आत्मकथा न समझी जाए तो मुझे अच्छा लगेगा। कहानी लिखने की एक ईमानदार कोशिश भर है- संजीव
रात तक़रीबन साढ़े दस बज चुके थे। अभी- अभी मेरठ से लौटकर दिल्ली आया हूं। जहां मैं खड़ा हूं या यूं कहिये दारू पी रहा हूं... ये दिल्ली और ग़ाजियाबाद का बॉर्डर है। सामने आनंद विहार बस अड्डा है। यहां एक सरकारी ठेका है...सब खुले मैदान में जाम टकरा रहे हैं। अंग्रेजी- देसी... अमीर –ग़रीब सब। मेरे पास से एक अधेड़ उम्र का शराबी लड़खड़ाता हुआ आया... न हाथ में गिलास न पानी की बोतल ...बस एक देसी का पौव्वा... आसपास दूसरे लोगों के फेंके गए गिलास ढूंढ़ता रहा.. जब जल्दी से नहीं मिला तो अंजुली लगाकर बिना पानी के ही गटगटा गया.. मेरा जी मितला गया।...मैं मेरठ गया था...बस से अभी दस मिनट पहले ही लौटा हूं। मेरठ में दिनभर वहां रेडलाइट एरिया कबाड़ी बाज़ार में रहा। लोकेशन देखे और रेडलाइट में रहने वाली महिलाओं से भी बातचीत की। यहां के रेडलाइट एरिया पर मैं एक डॉक्युमेंट्री बनाने की कोशिश में हूं... महिलाओं तो न कहें, यहां के अभागे बच्चों को लेकर ये डॉक्युमेंट्री होगी।
असल में डॉक्युमेंट्री बनाने का आइडिया मेरा नहीं था। एक मेरे मित्र थे, श्रीकांत। तक़रीबन साल भर पहले सड़क हादसे में गुजर गए। अपने पीछे दो छोटे- छोटे बच्चों को छोड़ गए हैं। न्यूज़ चैनल में काम करते थे... और चैनल की गाड़ी से वापस घर लौटते समय हादसा हुआ। मौके पर ही मौत हो गई। श्रीकांत से मेरा काफ़ी पुराना ताल्लुक है। हम मेरठ में ही एक अख़बार के लिए काम करते थे। चौबीस घंटे में हमारा तक़रबन सोलह घंटे का साथ होता था। उस वक़्त उसकी शादी नहीं हुई थी... और हम देर रात गए उसके घर पर ही बैठकी लगाते थे। तब वो तो पीता नहीं था... और मुझे कोई ऐसा ठीया चाहिये होता था जहां बैठकर पी जा सके और घंटों बकैती की जा सके। शुरू में वो किसी उजबक़ की नाईं मुझे स्टील के गिलास में ओल्ड मॉंक रम ढालते हुए देखता। मैं उससे कहता कि कांच के गिलास मंगवा लो... लेकिन मेरी बात उसने कभी नहीं मानी। उसे गिलास का फ़र्क नहीं पता था। उसके यहां कोई नमकीन भी नहीं होती थी..... श्रीकांत ढाबे में चार तंदूरी रोटियां और दाल लेकर आता था... मैं उसी में अपनी शराब भी पी लेता था। मेरे पी लेने के बाद श्रीकांत अच्छे श्रोता की भूमिका में आ जाता। उसके लिए ये थोड़ा असहज होता था लेकिन पीने के बाद मेरी बदतमीजियों से वो वाक़िफ़ था। सो, मेरी हवाई बातों... चुगली... दूसरे साथियों को दी गई गालियां, सबकुछ जब्त कर लेता। उसके साथ सुविधा ये थी कि इसका ज़िक्र वो दूसरे दिन किसी से न करता, खुद मुझसे भी नहीं। पीने वाले के लिए श्रीकांत किसी आदर्श मित्र की तरह था। मैं देर रात गए उसे गले से लगाकर भाई- भौजाई करता हुआ... अपना स्कूटर स्टार्ट कर अपने शास्त्रीगनर वाले घर की तरफ़ निकल लेता। मुझे तो अपने घर पहुंचने का पूरा भरोसा होता लेकिन श्रीकांत अक्सर इसे लेकर सशंकित होता। ख़ैर, लगभग सात- आठ वर्षों तक अनवरत ये चलता रहा। जाड़ा-गर्मी बरसात... मौसम का इस मुलाकात पर कोई असर नहीं पड़ता। कई बार वो पीछा छुड़ाने की मुद्रा में आता तो दिनभर उसे खुला छोड़ने के बाद रात निकलने वक़्त मैं उसे धर लेता। अपने स्कूटर पर उसे पीछे बिठाकर दिल्ली चुंगी पर फ़ौरन पहुंचता... जब ठेका बंद होने को आता। फौरन से पेश्तर मैं अपना कोटा लेकर आता... इसी दौरान श्रीकांत बगल के ढाबे से अपनी रोटी। कई बार होता कि काम करते-करते उसे देर होती तो मैं बीच में ही स्कूटर से अपना कोटा लेकर दोबारा दफ़्तर में जाकर उसका इंतजार करता। पीता उसके यहां ही था...और कहीं भी नहीं।
मेरठ में रहते हम दोनों की कई बाईलाइन स्टोरीज धड़ल्ले से छपी। श्रीकांत का मिज़ाज कुछ अलग था... सोशल इश्यूज़ उसके पसंद के क्षेत्र थे। वहां कई बार रेडलाइट एरिया के बारे में उसने रिपोर्ताज लिखे थे... कई बार उसने मुझे इसके बारे में बताया भी था... कि कैसे तंग कमरों में ज़िंदगियां धधकती हैं। ...कि कैसे एक ही बिस्तर पर वेश्या और ग्राहक होते हैं और वेश्या के दूध पीते बच्चे की नींद कैसे टूट जाती है... ग्राहक बच्चे को एक हाथ धकेल देता है। उसकी मां चुप। खामोशी उसकी नियति होती है। बच्चे का फेंका जाना उसकी नियति। रेडलाइट एरिया के एक बच्चे के बारे में श्रीकांत ने बताया था कि अक्सर ग्राहक अपने साथ दारू की बोतल लेकर आता है। सौदा तय होने के बाद ग्राहक खुद और उस वेश्या को दारू पिलाता है। ये तय फॉर्मूला है... किसी भी रेडलाइट एरिया का। ग्राहकों का ये ट्रेंडनुमा शौक़ है। लेकिन कबाड़ी बाजार की एक वेश्या का बच्चा महज आठ साल की उम्र में ही शराबी बन गया...उसकी जब भी आंखें खुलती तो वो दारू की मांग करता था...। एकबार श्रीकांत ने इस बच्चे से बातचीत की उसके बारे में पूछा तो वो खुद तो कुछ नहीं बता पाया लेकिन उसकी मां ने श्रीकांत से बताया कि ग्राहक जब आते थे तो बच्चा बहुत तंग करता था... एक-दो बार ग्राहक ने शराब की एकाध ढक्कन बच्चे के मुंह में डाल दिया तो वो फ़ौरन परेशान करना छोड़ गाढ़ी नींद में सो गया। बच्चा अपनी मां के बेहद क़रीब था... ग्राहक जब भी आता तो बच्चा परेशान करता। इसलिये ग्राहकों ने बच्चे की नींद के लिए यही तरीक़ा आजमाया। आगे चलकर शराब बच्चे की जरूरत बन गई। बच्चे की मां की शिकायत थी कि दूसरे कोठे के बच्चों को ग्राहक चाट-पकौरी के लिए पैसे देकर बाहर भेज देते हैं तो बच्चे मान जाते हैं...मगर ये कलमुहां बग़ैर दारू के बिल्कुल ही न माने...अब तो उसके सब ग्राहक जानते हैं... आते ही बच्चे को थोड़ी –सी शराब दे देते हैं तो बौराता हुआ कोठे के सीढ़ी से नीचे चला जाता है।... बच्चे की मां पूरा मुंह खोलकर हंसती है तो उसके दांतों के बीच जमी काली परतें साफ दिखती हैं। ...तो श्रीकांत इन बच्चों पर ही डॉक्युमेंट्री बनाना चाहता था। उसे लगता था कि रंडियों पर फिल्में तो बहुत बनीं... लेकिन इन स्याह गलियारों के जुगुनूओं पर भी फिल्म बननी चाहिये। वो ख़ुद इसके लिए पूरी तैयारी कर रहा था। चूंकि मैं इसमें दिलचस्पी ले रहा था इसलिये उसने मुझे भी इसके बारे में बताया और चाहता था कि मैं भी इसमें उसकी मदद करूं। वो फिल्म बनाकर शोहरत चाहता था... पैसा चाहता था और सबसे ज्यादा एक पत्रकार के तौर पर एक इत्मीनान। वो दिल्ली भी गया तो ये डॉक्युमेंट्री उसके दिल में रही, किसी माशूक की तरह। न्यूज़ चैनल में गया तो प्रोडक्शन का काम उसने बखूबी समझा।...उसके दिल में इस डॉक्युमेंट्री को ज़िंदा करने की उम्मीद बनी रही। वो सड़क चलते उन ग़रीब बच्चों को ग़ौर से देखता –सुनता था जो भीख़ मांगने के लिए गीत गुनगुनाते...वो ऐसे ही किसी गीत से अपनी डॉक्युमेंट्री की शुरुआत करना चाहता था। उसने वॉयस ओवर करना सीखा, सिर्फ डॉक्युमेंट्री के वास्ते। उसने कई बार बताया था कि कैसे वो बोलेगा... स्क्रिप्ट क्या होगी। वो अपनी पत्नी मयूरी को भी इसके बारे में बहुत कुछ बताता था... बाक़ायदा पका देता था हमसबको। मैं दारू के नशे में होता तो श्रीकांत मुझे जाने क्या- क्या लगता। समाज सुधारक... एक जुनूनी और एक चिरकुट पत्रकार... जो कभी जीवन में पैसा नहीं बना पाया..चुतियापे की बात पर ज़िंदगी निकाल दी...उसके किताबों के ढेर मुझे बकवास लगते। उसका शायराना मिजाज़ और फक्कड़ तबियत से तब घिन होती जब मैं उससे दारू के लिए कुछ रुपये मांगता और वो शर्तिया कहता कि नहीं हैं..न तो अपनी गाड़ी ख़रीद पाया और न ही जीवन बीमा करा पाया। बीमा को लेकर उसका तर्क अलहदा था... उसे ये सब बकवास लगता था।..इसी चुतियापे को जीता हुआ आख़िरकार बीच सफ़र में ही दुनिया को अलविदा कह दिया... एक साल पहले भेजा गया उसका मैसेज मेरे मोबाइल के मैसेज बॉक्स में अब भी पड़ा है। मैने संभालकर रखा है... क्योंकि जवाब देने का भी वक़्त उसने नहीं दिया... मैं कई दिनों से न उससे बात कर पाया था और न ही मुलाकात हो पाई थी। मैं भी अपने चैनल के काम में मशरूफ़ था और वो उससे भी कहीं ज्यादा। सो, एकदिन उसका मैसेज आया- सांसों का पिंजरा किसी दिन टूट जाएगा, फिर मुसाफ़िर किसी राह में छूट जाएगा, अभी साथ हो तो बात कर लिया करो, क्या पता कब ये दोस्त तुम्हारी ख़ामोशी से रूठ जाएगा।
(जारी)

Wednesday, July 15, 2009

...फिर से कुछ किस्से

मित्रों, मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि कहानियों और उपन्यासों का दौर चला गया। मैं इस बात को मान नहीं सकता कि किस्सागोई थम गई है और लोगों की इसमें दिलचस्पी नहीं रह गई है। मैं असहमत हूं कि कहानियां मर रही हैं।... यह अलग बात है कि कहानियां सुनने या पढ़ने की बजाय कहानियां देखने में लोगों की दिलचस्पी अधिक है। टीवी सीरियल्स से लेकर न्यूज चैनल्स तक को देख लें... सब जगह कहानियां ही कहानियां हैं। उन्हें कहानियों की तरह की दिखाया जाता है और लोग कहानियों की तरह ही देखते हैं। ख़ासतौर पर न्यूज़ चैनल्स में शिगूफ़ेबाजी की तरह ( वह चाहे फिल्मी हो या सियासी या फिर सामाजिक मसले के तौर पर फिज़ा, मटुकनाथ, पांडा...आदि अनादि) परोसे जाने वाली ख़बरें। इसमें न्यूज़ वेल्यू ढूंढ़ें तो कहां हैं लेकिन इसे लोग इसलिये देखते हैं क्योंकि उसमें कथा है... कहानी का फ्लेवर है... किस्से का तत्व है। लोग देखते हैं इसलिये उसमें टीआरपी भी है।... यह भी न हो तो आप सड़क चलते देखें... एक लड़का- लड़की आपस में गर्मजोशी से मिलते हुए दिख जाएं तो भीड़ थम जाती है... सरेराह चलते आपस में झगड़ने लगें तो तमाशबीनों की भीड़ दुगुनी हो जाती है।... कोई पियक्कड़ नशे के आलम में बेजा हरकतें करता है तो तमाशबीनों को मजा आ जाता है। सास- बहु का झगड़ा हो तो पड़ोसियों के कान खड़े हो जाते हैं। ...ये सब क्या है?... ज़िदगी की बिखरी हुई कहानियां ही तो हैं जिसमें लोगों की दिलचस्पी है। तो कहानियां न तो ख़त्म हुई है और न ही इसके श्रोता, पाठक और दर्शक कम हुए।
मैं अख़बारों में तो छपता रहा हूं लेकिन कभी कहानियां छपवाने जैसा सामर्थ्य नहीं रहा। ...एक बेहतर पाठक जरूर रहा हूं। सब पढ़ लेता हूं... अच्छा- बुरा। लेकिन ब्लॉग जैसा जरिया मिला है तो मुझे भी वर्षों पुरानी इच्छा बलवती हुई है। कहानियां लिखने का साहस जुटा पाया हूं। मैं ऑन लाइन ही यह प्रयोग करना चाहता हूं... पता नहीं पूरा कर भी पाऊंगा या नहीं लेकिन शुरू करने का इरादा जरूर है। तीन- चार दिनों में एक-एक पन्ने आपको पढ़वाना चाहूंगा। कहानी बहुत लंबी हो सकती है और छोटी भी... कोई गारंटी नहीं दूंगा क्योंकि कहानी को बेहद स्वभाविक ढंग से अंत करना चाहूंगा... कहानी पर कुछ थोपूंगा नहीं। हां, इसके किरदारों को समझते हुए उसे मेरी आत्मकथा नहीं मानने की गुजारिश भी करूंगा... क्योंकि कहानी हमारे- आपके जैसों की होगी।... वैसे, इसे मेरी आत्मकथा मानकर ही पढ़ने में आपको ज्यादा दिलचस्प लगे तो भला मैं आपको रोक भी कैसे सकता हूं। ...तो दो- तीन दिनों के भीतर इसकी शुरुआत कर दूंगा। इतनी लंतरानियों के लिए आपने वक़्त दिया, शुक्रगुजार हूं।

Tuesday, July 14, 2009

इस जवानी की कोई उम्र है क्या?

संसद में इस बात पर चर्चा सरगर्म है कि किसने सबसे ज्यादा युवाओं को सियासत में भागीदारी दी। कांग्रेस कह रही है कि राहुल बाबा ताजा हवा के झोंके की तरह हैं... जिन्हें कलावती की मुफ़लिसी का बखूबी अहसास है। सो, जिम से लेकर तमाम जगहों पर वर्जिश करने का अभिनय करते- करते भी बुजुर्ग आडवाणी नकार दिये गए। युवा भागीदारी के नाम पर बीजेपी के पास वरुण गांधी हैं। लेकिन युवाओं को भागीदारी के मसले पर बीजेपी की अपनी राय है। उसका दावा है कि उसने सबसे ज्यादा संख्या में युवाओं को टिकट थमाए और सबसे ज्यादा संख्या में युवा उसके पाले में हैं। सुषमा स्वराज मीडिया से आहत हैं कि ख़्वामखाह युवा नेतृत्व के नाम पर कांग्रेस को हवा दी जा रही है... जबकि इसका श्रेय तो बीजेपी को जाना चाहिये था। लालू यादव जैसे नेता भी मानने को राजी नहीं हैं कि वे बूढ़े हो गए। संसद में बजट पर बहस के दौरान एक सांसद ने उनकी उम्र को लेकर टीका- टिप्पणी की तो लालू अपने अंदाज में बोल बैठे कि वे यादव हैं... और यादवों में कहा जाता है कि साठा तो पाठा। यानी लालू बूढ़े नहीं हैं... चाहे साठ पार के हों मगर खुद को पट्ठा बता रहे हैं।
उसी तरह क्रिकेट में। क्रिकेट हिंदुस्तान की रगों में धड़कता है। सो, इस खेल के खिलाड़ी भी बुढ़ाने से घबराते हैं। बूढ़े होने के बाद भी मानते नहीं। कहते हैं कि फिटनेस से क्या होता है... तजुर्बा चाहिये। आंकड़े गिनाते हैं कि फलां- फलां पिचों पर विपरीत परिस्थितयों में इतने रन बटोरे। अपना रन औसत बताते नहीं अघाते हैं। और तब भी सिलेक्शन कमेटी उन्हें बूढ़ा मानते हुए चयन करने से मना कर दे तो अंत में सौरव दादा की तरह युवा कप्तान के कंधों पर सवार होकर मैदान से तक़रीबन फेंके जाते हैं। अभी तो शुरुआत है... दादा की तरह ही कई और भी इसी तरह क्रिकेट गति को प्राप्त होंगे।
ठीक उसी तरह फिल्मों में भी। देवानंद से लेकर सैफ़ अली ख़ान तक देख लीजिये। देव साहब तो सदाबहार हो गए। अमिताभ ने सफेद दाढ़ी के साथ अपने उम्र को तो स्वीकार कर लिया लेकिन फिल्मों को लेकर अपनी दावेदारी नहीं छोड़ी... सैफ़ और सलमान का तो फिर भी क्या कहना। इन्हें बुढ़ाती उम्र का सितारा भले कौन और कैसे कहे भाई... एक-से- एक बिजलियां भला जिस पर गिर रही हों तो बुढ़ापा कैसा।
इतनी भूमिका का आशय यह था कि जवान हिंदुस्तान में युवाओं की बातें इतनी ज्यादा हो रही हैं कि ऐसा लगता है कि तमाम उम्रदराजों ...बूढ़ों को तो अरब सागर में डूबकर जान दे देनी चाहिये। नौकरियों में उम्र एक बड़ा फैक्टर हो रहा है। दुनिया के तमाम सौंदर्य प्रसाधन आपको जवान दिखाने का दावा कर रहे हैं। घरों में उम्र पहले से ही अहम तथ्य है जिसने सास- बहू में झगड़े की पटकथा लिख दी। जिसने बाप और बेटे में फर्क पैदा कर दिया। जिसने वृद्धाश्रम जैसी बेहूदा परिकल्पना को जन्म दिया। सवाल इतना भर है कि क्या हिंदुस्तान हमेशा के लिए ऐसा ही जवान बना रहेगा या फिर इसकी जवानी की भी कोई उम्र है। अभी एक आकलन था कि आने वाले तीस वर्षों में मौजूदा पीढ़ी वृद्धावस्था की ओर बढ़ेगी और जनसंख्या नियंत्रण के उपाय कारगर होंगे तो साठ फीसदी आबादी बूढ़ी होगी। इसलिये हर उम्र की अपनी जरूरत होती है और दुनिया को भी हर उम्र के लोगों की जरूरत होती है।

Sunday, July 12, 2009

...ई नीतीशे बदलेगा बिहार!

दोस्तों, ऑफिस से लौटते वक़्त शाम में अक्सर नोयडा के सेक्टर सोलह में इंडिया टीवी के कोने पर खड़ा होने वाले भुट्टा वाले के यहां रुककर एकाध भुट्टा जरूर खाता हूं। उसके ठेले पर एक टीन का बड़ा ड्रम है जिसपर लिखा है छिल्ला... यानी मक्के के उबले हुए दाने। पांच रुपये में एक भुना हुआ भुट्टा देता है... नमक और नींबू निचोड़कर। तबीयत खुश हो जाएगी। और उसकी बातें जरा सुन लें तो ग़जब का बोध होता है। पहले मैं अपने काम से काम रखता था... एकदिन खुद उसने टोका तो बातचीत शुरू हुई। पूछा कहां काम करते हैं... तो बताया। उसने कहा कि उस चैनल में उसका कोई रिश्तेदार इलेक्ट्रीशियन है ...कोई महतो जी। बिहार का रहने वाला है। जब बताया कि मैं भी बिहार का हूं तो पूछा कितना कमा लेते हैं?... मैने कहा कि बस परिवार चल रहा है... पूछा कि दस हजार तो मिल ही जाता होगा?... मैने कहा कि हां पंद्रह साल से नौकरी कर रहा हूं तो इतना तो मिल ही जाएगा। फिर बात निकली बिहार पर। उसने कहा कि नीतीश सरकार ठीक काम कर रही है... मैने हामी भरी। ...मगर नितीश सरकार से उसे भी शिकायत है कि ...मध्यमा पास लोगों को टीचर की नौकरी दे दी। क्या करेगा ऐसा टीचर?... जब खुदै नहीं पढ़ा है तो बच्चों को तो चौपट ही कर देगा न ? उसने कहा कि अगर कुछ साल और रह गया नितीश तो हम सबको यहां परदेस में बात- बोली सुनने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी... मगर कहीं फिर लालू आ गए तो मुश्किल हो जाएगी। उसकी माने तो पिछले पंद्रह साल से इसी इलाके में भुट्टा बेचता रह गया... कभी मेन रोड पर ठेला लगाता था... पुलिस वाले को रोजाना सौ रुपये देता था मगर अब पैसा लेकर भी मेन रोड पर ठेला लगाने नहीं देता है और मारकर भगाता भी है... कईबार उसके ठेले को पलट भी दिया गया। सामान का नुकसान हुआ और उसका मान आहत हुआ। नितीश के बिहार को लेकर वह उम्मीदों से भरा हुआ है। उसे नहीं मालूम की बिहार में विकास दर कैसा है लेकिन उसे अहसास है कि बिहार बदल रहा है। मैने कहा कि तुम्हारे हिसाब से कितने साल बाद बिहार पूरी तरह से बदल जाएगा... उसने कहा कि नितीश को अगर दूसरी बार भी शासन मिल गया तो जरूर बदलेगा... हम भी यहीं हैं और आप भी यहीं हैं... देख लेना।... क्या वाक़ई ऐसा है?

Sunday, July 5, 2009

बस में हो तो खुशी से पीछे हट जाऊं, पर ये नामुमकिन है

बिनायक सेन का इंटरव्यू तहलका के ताजा अंक में छपा है। इसे पढ़ाना एक अनुभव से भी गुजरना भी हैः संजीव

जेल के अनुभव और अपने सरोकारों पर हाल ही में रिहा हुए मानवाधिकारकर्ता बिनायक सेन की शोमा चौधरी से बातचीत
अपनी आजादी खो देने के अनुभव ने आपको किस तरह से प्रभावित किया?
(एक लंबी चुप्पी) मानवाधिकारों के लिए लड़ते हुए अगर आप कभी जेल नहीं गए तो आपका बायोडेटा अच्छा नहीं लगता. (हंसते हैं). मगर मुझे लगा कि ये बस 10-15 दिन की बात होगी. यदि मुझे ये पता होता कि वहां दो साल बिताने हैं तो मैं कुछ कम खुश होता. जेल में आपको दूसरों से अलग कोई सहूलियत नहीं मिलती और इस मायने में यहां रहने वाले सभी लोग बाहरी दुनिया के उलट आपस में बराबर होते हैं. जेल का अनुभव अक्सर खराब ही होता है मगर मेरे लिए ये दिलचस्प था. वहां की स्थितियां खुशनुमा तो बिल्कुल नहीं थीं और मुझे गर्मी, मच्छरों और गंदे खाने से जूझना पड़ा. मगर सिर्फ मैं ही नहीं बल्कि सभी इनसे जूझ रहे थे इसलिए मुङो इससे कोई समस्या नहीं थी. जेलतंत्र भ्रष्टाचार पर चलता है. लेकिन कुछ मायनों में यह भ्रष्टाचार सकारात्मक है क्योंकि इससे वह मानवीय भावना दिखती है जिसका व्यवस्था ने पूरी तरह से दमन कर दिया है. जेल में स्टोव रखना अवैध है लेकिन यहां लगभग हर कैदी के पास अपना स्टोव था और सुबह छह बजे आपको हर कोई दाल बनाता हुआ मिलता था.
आप लंबे समय के लिए भीतर रहे. इस दौरान क्या आपने कभी खुद को भावनात्मक रूप से टूटा हुआ महसूस नहीं किया?
इन हालात में आपकी मानसिक स्थिति पर बुरा असर पड़ता है. जेल में कुछ समय रहने के बाद मैं लोगों के नाम, शब्द आदि भूलने लगा. इससे मैं घबरा जाता था. यहां तक कि मैं अपने कुत्तों के नाम भी भूल गया था. रोजमर्रा की बातचीत न हो पाए तो ऐसा ही होता है. मैं अक्सर अवसादग्रस्त हो जाता था. मेरे दिमाग में तरह-तरह के नए विचार थे लेकिन मैं उन्हें लिख नहीं पाता था. जेल में आपको मानवीय प्रकृति के कई रूप और परिस्थितियां देखने को मिलती हैं. इस सब ने मुझे कानून के बारे बहुत गहराई से सोचने पर मजबूर किया. जैसे कि दफा 302 हत्या के मामले में लगाई जाती है. लेकिन इसे मनगढंत मुकदमों से लेकर आत्मरक्षा की कार्रवाई, गैंग-वार और सुपारी लेकर काम करने के मामले में भी लगाया जा सकता है. जेल में 25 साल का एक लड़का मेरा काफी अच्छा दोस्त बन गया था. जब ये लड़का 19 साल का था तब उसने अपने पिता की चाकू मारकर हत्या कर दी थी क्योंकि वो शराब के नशे में उसकी मां को बुरी तरह से पीट रहा था. अपनी मां को मरने से बचाने के लिए उसके पास यही आखिरी विकल्प था. इस लड़के को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. लेकिन सबसे भयावह बात थी.
अधिकारियों के दिल में ऐसे कैदियों के लिए कोई इज्जत न होना. उन्हें वह बुनियादी गरिमा भी नहीं मिलती थी जिसका हर इंसान हकदार होता है. हर शाम को जेल के लंबरदार कैदियों को लाठियों और चप्पलों से पीटते थे. एक आदमी पर 10 लोग झपटते थे. इसके अलावा और भी कई बुरी चीजें थीं. यदि मैं इसकी शिकायत करता तो अधिकारी मुझे ऐसे देखते जैसे मुझमें अक्ल नाम की कोई चीज न हो. वहां कई लोग हैं जो निर्दोष हैं. मगर व्यवस्था की बर्बरता को झेलते रहने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं. इसलिए मैं यहां खुद को असहाय महसूस करता था. अपने शुभचिंतकों को दूर से देखना, आधे घंटे की मुलाकात के लिए मेरी पत्नी (इलीना) का हर सप्ताह ट्रेन से यहां आना और जाना बेहद भयभीत कर देने वाला अनुभव था.
सरकार आपको खामोश करना चाहती थी. इन दो सालों में क्या कभी आपको लगा कि अब इस विरोध को खत्म किया जाए?
मैं बुनियादी रूप से महत्वाकांक्षी व्यक्ति नहीं हूं. यदि मैं इन हालात से मुंह मोड़ सकता तो खुशी-खुशी ऐसा कर लेता. मेरी बेटियां इस समय अपनी उम्र के सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर हैं. अपनी पत्नी इलीना का मैं बेहद सम्मान करता हूं. मगर मध्य भारत के इस इलाके में हालात बेहद खराब हैं. यहां युद्ध के हालात हैं. इस पर ध्यान देने और स्थितियों को सुधारने की दिशा में काम करने की जरूरत है. मुझे लगता है कि मैं ऐसा करने की स्थिति में हूं. हालांकि मैं इस समय कुछ दुविधा में हूं कि इस मसले पर किस तरह से आगे बढ़ा जाए. मेरा हमेशा से मानना रहा है कि हिंसा कभी आखिरी विकल्प नहीं हो सकती. बल्कि हिंसा का चक्र तो कभी खत्म नहीं होता और एक बार इसमें घुसने के बाद आप इससे बाहर नहीं निकल पाते. माओवादी और सरकार दोनों ही इस चक्र में शामिल हो चुके हैं और इस वजह से लाखों लोगों की जिंदगियों पर इसका बुरा असर पड़ रहा है. डॉक्टर और खासकर बाल चिकित्सक होने के नाते हर कुपोषित बच्चे को देखकर मेरे मन में रोष पैदा होता है. ये चीजें आपको परेशान करती हैं. ये असमानताएं और समस्याएं अपने आप पैदा नहीं हुईं बल्कि किसी ने इन्हें बना कर रखा है. किसी न किसी को तो माओवादियों और सरकार के बीच जारी सैन्य संघर्ष को खत्म कराने और दोनों पक्षों को राजनीतिक विरोध या राजनीतिक समाधान के लिए तैयार कराना होगा. इसके अलावा राज्य में जारी उस संगठनात्मक हिंसा पर सवाल उठाने की जरूरत है जिसकी वजह से गरीबी दूर नहीं हो पा रही. यदि बस में हो तो खुशी से पीछे हट जाऊं, पर अब ये और भी नामुमकिन लगता है.
अपने समर्थन में चले व्यापक अभियान से क्या आप हैरान हुए?
मेरा मानना था कि हम छोटे-मोटे लोग हैं. लेकिन अब लगता है कि ऐसा नहीं है. ये अभिभूत कर देने वाला अनुभव था. इससे सच्चाई के पक्ष में आवाज उठाने की हमारी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है. अभी तक हमने जो काम किया है वह न के बराबर है. दुविधा यह है कि जिन रास्तों पर चलकर इन मुद्दों को बेहतर ढंग से हल किया जा सकता है उन पर चलने का मतलब है सरकार की नाराजगी मोल लेना. लेकिन हम अपने काम में कमी नहीं कर सकते.
क्या आपको जेल में नारायण सान्याल से मुलाकातों का कोई अफसोस है?नहीं, मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि इसका ये नतीजा होगा. मैंने सान्याल के लिए जो भी किया उस सब के लिए पुलिस और सरकार से पूर्व अनुमति ली गई थी. इसके अलावा मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते आप उस व्यक्ति की मदद करते हैं जिसे कानूनी और चिकित्सा सहायता की जरूरत है, इसमें आप सीमारेखा आखिर कहां खीचेंगे?