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Tuesday, July 14, 2009

इस जवानी की कोई उम्र है क्या?

संसद में इस बात पर चर्चा सरगर्म है कि किसने सबसे ज्यादा युवाओं को सियासत में भागीदारी दी। कांग्रेस कह रही है कि राहुल बाबा ताजा हवा के झोंके की तरह हैं... जिन्हें कलावती की मुफ़लिसी का बखूबी अहसास है। सो, जिम से लेकर तमाम जगहों पर वर्जिश करने का अभिनय करते- करते भी बुजुर्ग आडवाणी नकार दिये गए। युवा भागीदारी के नाम पर बीजेपी के पास वरुण गांधी हैं। लेकिन युवाओं को भागीदारी के मसले पर बीजेपी की अपनी राय है। उसका दावा है कि उसने सबसे ज्यादा संख्या में युवाओं को टिकट थमाए और सबसे ज्यादा संख्या में युवा उसके पाले में हैं। सुषमा स्वराज मीडिया से आहत हैं कि ख़्वामखाह युवा नेतृत्व के नाम पर कांग्रेस को हवा दी जा रही है... जबकि इसका श्रेय तो बीजेपी को जाना चाहिये था। लालू यादव जैसे नेता भी मानने को राजी नहीं हैं कि वे बूढ़े हो गए। संसद में बजट पर बहस के दौरान एक सांसद ने उनकी उम्र को लेकर टीका- टिप्पणी की तो लालू अपने अंदाज में बोल बैठे कि वे यादव हैं... और यादवों में कहा जाता है कि साठा तो पाठा। यानी लालू बूढ़े नहीं हैं... चाहे साठ पार के हों मगर खुद को पट्ठा बता रहे हैं।
उसी तरह क्रिकेट में। क्रिकेट हिंदुस्तान की रगों में धड़कता है। सो, इस खेल के खिलाड़ी भी बुढ़ाने से घबराते हैं। बूढ़े होने के बाद भी मानते नहीं। कहते हैं कि फिटनेस से क्या होता है... तजुर्बा चाहिये। आंकड़े गिनाते हैं कि फलां- फलां पिचों पर विपरीत परिस्थितयों में इतने रन बटोरे। अपना रन औसत बताते नहीं अघाते हैं। और तब भी सिलेक्शन कमेटी उन्हें बूढ़ा मानते हुए चयन करने से मना कर दे तो अंत में सौरव दादा की तरह युवा कप्तान के कंधों पर सवार होकर मैदान से तक़रीबन फेंके जाते हैं। अभी तो शुरुआत है... दादा की तरह ही कई और भी इसी तरह क्रिकेट गति को प्राप्त होंगे।
ठीक उसी तरह फिल्मों में भी। देवानंद से लेकर सैफ़ अली ख़ान तक देख लीजिये। देव साहब तो सदाबहार हो गए। अमिताभ ने सफेद दाढ़ी के साथ अपने उम्र को तो स्वीकार कर लिया लेकिन फिल्मों को लेकर अपनी दावेदारी नहीं छोड़ी... सैफ़ और सलमान का तो फिर भी क्या कहना। इन्हें बुढ़ाती उम्र का सितारा भले कौन और कैसे कहे भाई... एक-से- एक बिजलियां भला जिस पर गिर रही हों तो बुढ़ापा कैसा।
इतनी भूमिका का आशय यह था कि जवान हिंदुस्तान में युवाओं की बातें इतनी ज्यादा हो रही हैं कि ऐसा लगता है कि तमाम उम्रदराजों ...बूढ़ों को तो अरब सागर में डूबकर जान दे देनी चाहिये। नौकरियों में उम्र एक बड़ा फैक्टर हो रहा है। दुनिया के तमाम सौंदर्य प्रसाधन आपको जवान दिखाने का दावा कर रहे हैं। घरों में उम्र पहले से ही अहम तथ्य है जिसने सास- बहू में झगड़े की पटकथा लिख दी। जिसने बाप और बेटे में फर्क पैदा कर दिया। जिसने वृद्धाश्रम जैसी बेहूदा परिकल्पना को जन्म दिया। सवाल इतना भर है कि क्या हिंदुस्तान हमेशा के लिए ऐसा ही जवान बना रहेगा या फिर इसकी जवानी की भी कोई उम्र है। अभी एक आकलन था कि आने वाले तीस वर्षों में मौजूदा पीढ़ी वृद्धावस्था की ओर बढ़ेगी और जनसंख्या नियंत्रण के उपाय कारगर होंगे तो साठ फीसदी आबादी बूढ़ी होगी। इसलिये हर उम्र की अपनी जरूरत होती है और दुनिया को भी हर उम्र के लोगों की जरूरत होती है।

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अच्छी पोस्ट रही,
सभी को धो डाला।
बधाई!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

जहां तक चल जाए...जवानी की उम्र वहां तक...

Dipti said...

बहुत ही बेहतरीन कटाक्ष...