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Wednesday, July 15, 2009

...फिर से कुछ किस्से

मित्रों, मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि कहानियों और उपन्यासों का दौर चला गया। मैं इस बात को मान नहीं सकता कि किस्सागोई थम गई है और लोगों की इसमें दिलचस्पी नहीं रह गई है। मैं असहमत हूं कि कहानियां मर रही हैं।... यह अलग बात है कि कहानियां सुनने या पढ़ने की बजाय कहानियां देखने में लोगों की दिलचस्पी अधिक है। टीवी सीरियल्स से लेकर न्यूज चैनल्स तक को देख लें... सब जगह कहानियां ही कहानियां हैं। उन्हें कहानियों की तरह की दिखाया जाता है और लोग कहानियों की तरह ही देखते हैं। ख़ासतौर पर न्यूज़ चैनल्स में शिगूफ़ेबाजी की तरह ( वह चाहे फिल्मी हो या सियासी या फिर सामाजिक मसले के तौर पर फिज़ा, मटुकनाथ, पांडा...आदि अनादि) परोसे जाने वाली ख़बरें। इसमें न्यूज़ वेल्यू ढूंढ़ें तो कहां हैं लेकिन इसे लोग इसलिये देखते हैं क्योंकि उसमें कथा है... कहानी का फ्लेवर है... किस्से का तत्व है। लोग देखते हैं इसलिये उसमें टीआरपी भी है।... यह भी न हो तो आप सड़क चलते देखें... एक लड़का- लड़की आपस में गर्मजोशी से मिलते हुए दिख जाएं तो भीड़ थम जाती है... सरेराह चलते आपस में झगड़ने लगें तो तमाशबीनों की भीड़ दुगुनी हो जाती है।... कोई पियक्कड़ नशे के आलम में बेजा हरकतें करता है तो तमाशबीनों को मजा आ जाता है। सास- बहु का झगड़ा हो तो पड़ोसियों के कान खड़े हो जाते हैं। ...ये सब क्या है?... ज़िदगी की बिखरी हुई कहानियां ही तो हैं जिसमें लोगों की दिलचस्पी है। तो कहानियां न तो ख़त्म हुई है और न ही इसके श्रोता, पाठक और दर्शक कम हुए।
मैं अख़बारों में तो छपता रहा हूं लेकिन कभी कहानियां छपवाने जैसा सामर्थ्य नहीं रहा। ...एक बेहतर पाठक जरूर रहा हूं। सब पढ़ लेता हूं... अच्छा- बुरा। लेकिन ब्लॉग जैसा जरिया मिला है तो मुझे भी वर्षों पुरानी इच्छा बलवती हुई है। कहानियां लिखने का साहस जुटा पाया हूं। मैं ऑन लाइन ही यह प्रयोग करना चाहता हूं... पता नहीं पूरा कर भी पाऊंगा या नहीं लेकिन शुरू करने का इरादा जरूर है। तीन- चार दिनों में एक-एक पन्ने आपको पढ़वाना चाहूंगा। कहानी बहुत लंबी हो सकती है और छोटी भी... कोई गारंटी नहीं दूंगा क्योंकि कहानी को बेहद स्वभाविक ढंग से अंत करना चाहूंगा... कहानी पर कुछ थोपूंगा नहीं। हां, इसके किरदारों को समझते हुए उसे मेरी आत्मकथा नहीं मानने की गुजारिश भी करूंगा... क्योंकि कहानी हमारे- आपके जैसों की होगी।... वैसे, इसे मेरी आत्मकथा मानकर ही पढ़ने में आपको ज्यादा दिलचस्प लगे तो भला मैं आपको रोक भी कैसे सकता हूं। ...तो दो- तीन दिनों के भीतर इसकी शुरुआत कर दूंगा। इतनी लंतरानियों के लिए आपने वक़्त दिया, शुक्रगुजार हूं।

5 comments:

Udan Tashtari said...

जल्दी शुरु करो!!

Jayant chaddha said...

इंतजार रहेगा.....!!!!

राजन अग्रवाल said...

shuru to kijiye

uday said...

intejar hai...aapke dwara likhe jane wali dilchasp kahani ki...wo kahani dilchasp is lie bhi hogi..kyaonki aap khud behad dilchasp hain........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बस शुरू कर दीजिएओ
इंतजार कर रहे हैं.....!!!!