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Monday, July 20, 2009

भोर के बेरौशन जुग़नू

मित्रों, जैसा कि मैंने आपसे वायदा किया था... एक कहानी की शुरुआत कर रहा हूं। एकबार फिर से आग्रह करूंगा कि इसे किसी की आत्मकथा न समझी जाए तो मुझे अच्छा लगेगा। कहानी लिखने की एक ईमानदार कोशिश भर है- संजीव
रात तक़रीबन साढ़े दस बज चुके थे। अभी- अभी मेरठ से लौटकर दिल्ली आया हूं। जहां मैं खड़ा हूं या यूं कहिये दारू पी रहा हूं... ये दिल्ली और ग़ाजियाबाद का बॉर्डर है। सामने आनंद विहार बस अड्डा है। यहां एक सरकारी ठेका है...सब खुले मैदान में जाम टकरा रहे हैं। अंग्रेजी- देसी... अमीर –ग़रीब सब। मेरे पास से एक अधेड़ उम्र का शराबी लड़खड़ाता हुआ आया... न हाथ में गिलास न पानी की बोतल ...बस एक देसी का पौव्वा... आसपास दूसरे लोगों के फेंके गए गिलास ढूंढ़ता रहा.. जब जल्दी से नहीं मिला तो अंजुली लगाकर बिना पानी के ही गटगटा गया.. मेरा जी मितला गया।...मैं मेरठ गया था...बस से अभी दस मिनट पहले ही लौटा हूं। मेरठ में दिनभर वहां रेडलाइट एरिया कबाड़ी बाज़ार में रहा। लोकेशन देखे और रेडलाइट में रहने वाली महिलाओं से भी बातचीत की। यहां के रेडलाइट एरिया पर मैं एक डॉक्युमेंट्री बनाने की कोशिश में हूं... महिलाओं तो न कहें, यहां के अभागे बच्चों को लेकर ये डॉक्युमेंट्री होगी।
असल में डॉक्युमेंट्री बनाने का आइडिया मेरा नहीं था। एक मेरे मित्र थे, श्रीकांत। तक़रीबन साल भर पहले सड़क हादसे में गुजर गए। अपने पीछे दो छोटे- छोटे बच्चों को छोड़ गए हैं। न्यूज़ चैनल में काम करते थे... और चैनल की गाड़ी से वापस घर लौटते समय हादसा हुआ। मौके पर ही मौत हो गई। श्रीकांत से मेरा काफ़ी पुराना ताल्लुक है। हम मेरठ में ही एक अख़बार के लिए काम करते थे। चौबीस घंटे में हमारा तक़रबन सोलह घंटे का साथ होता था। उस वक़्त उसकी शादी नहीं हुई थी... और हम देर रात गए उसके घर पर ही बैठकी लगाते थे। तब वो तो पीता नहीं था... और मुझे कोई ऐसा ठीया चाहिये होता था जहां बैठकर पी जा सके और घंटों बकैती की जा सके। शुरू में वो किसी उजबक़ की नाईं मुझे स्टील के गिलास में ओल्ड मॉंक रम ढालते हुए देखता। मैं उससे कहता कि कांच के गिलास मंगवा लो... लेकिन मेरी बात उसने कभी नहीं मानी। उसे गिलास का फ़र्क नहीं पता था। उसके यहां कोई नमकीन भी नहीं होती थी..... श्रीकांत ढाबे में चार तंदूरी रोटियां और दाल लेकर आता था... मैं उसी में अपनी शराब भी पी लेता था। मेरे पी लेने के बाद श्रीकांत अच्छे श्रोता की भूमिका में आ जाता। उसके लिए ये थोड़ा असहज होता था लेकिन पीने के बाद मेरी बदतमीजियों से वो वाक़िफ़ था। सो, मेरी हवाई बातों... चुगली... दूसरे साथियों को दी गई गालियां, सबकुछ जब्त कर लेता। उसके साथ सुविधा ये थी कि इसका ज़िक्र वो दूसरे दिन किसी से न करता, खुद मुझसे भी नहीं। पीने वाले के लिए श्रीकांत किसी आदर्श मित्र की तरह था। मैं देर रात गए उसे गले से लगाकर भाई- भौजाई करता हुआ... अपना स्कूटर स्टार्ट कर अपने शास्त्रीगनर वाले घर की तरफ़ निकल लेता। मुझे तो अपने घर पहुंचने का पूरा भरोसा होता लेकिन श्रीकांत अक्सर इसे लेकर सशंकित होता। ख़ैर, लगभग सात- आठ वर्षों तक अनवरत ये चलता रहा। जाड़ा-गर्मी बरसात... मौसम का इस मुलाकात पर कोई असर नहीं पड़ता। कई बार वो पीछा छुड़ाने की मुद्रा में आता तो दिनभर उसे खुला छोड़ने के बाद रात निकलने वक़्त मैं उसे धर लेता। अपने स्कूटर पर उसे पीछे बिठाकर दिल्ली चुंगी पर फ़ौरन पहुंचता... जब ठेका बंद होने को आता। फौरन से पेश्तर मैं अपना कोटा लेकर आता... इसी दौरान श्रीकांत बगल के ढाबे से अपनी रोटी। कई बार होता कि काम करते-करते उसे देर होती तो मैं बीच में ही स्कूटर से अपना कोटा लेकर दोबारा दफ़्तर में जाकर उसका इंतजार करता। पीता उसके यहां ही था...और कहीं भी नहीं।
मेरठ में रहते हम दोनों की कई बाईलाइन स्टोरीज धड़ल्ले से छपी। श्रीकांत का मिज़ाज कुछ अलग था... सोशल इश्यूज़ उसके पसंद के क्षेत्र थे। वहां कई बार रेडलाइट एरिया के बारे में उसने रिपोर्ताज लिखे थे... कई बार उसने मुझे इसके बारे में बताया भी था... कि कैसे तंग कमरों में ज़िंदगियां धधकती हैं। ...कि कैसे एक ही बिस्तर पर वेश्या और ग्राहक होते हैं और वेश्या के दूध पीते बच्चे की नींद कैसे टूट जाती है... ग्राहक बच्चे को एक हाथ धकेल देता है। उसकी मां चुप। खामोशी उसकी नियति होती है। बच्चे का फेंका जाना उसकी नियति। रेडलाइट एरिया के एक बच्चे के बारे में श्रीकांत ने बताया था कि अक्सर ग्राहक अपने साथ दारू की बोतल लेकर आता है। सौदा तय होने के बाद ग्राहक खुद और उस वेश्या को दारू पिलाता है। ये तय फॉर्मूला है... किसी भी रेडलाइट एरिया का। ग्राहकों का ये ट्रेंडनुमा शौक़ है। लेकिन कबाड़ी बाजार की एक वेश्या का बच्चा महज आठ साल की उम्र में ही शराबी बन गया...उसकी जब भी आंखें खुलती तो वो दारू की मांग करता था...। एकबार श्रीकांत ने इस बच्चे से बातचीत की उसके बारे में पूछा तो वो खुद तो कुछ नहीं बता पाया लेकिन उसकी मां ने श्रीकांत से बताया कि ग्राहक जब आते थे तो बच्चा बहुत तंग करता था... एक-दो बार ग्राहक ने शराब की एकाध ढक्कन बच्चे के मुंह में डाल दिया तो वो फ़ौरन परेशान करना छोड़ गाढ़ी नींद में सो गया। बच्चा अपनी मां के बेहद क़रीब था... ग्राहक जब भी आता तो बच्चा परेशान करता। इसलिये ग्राहकों ने बच्चे की नींद के लिए यही तरीक़ा आजमाया। आगे चलकर शराब बच्चे की जरूरत बन गई। बच्चे की मां की शिकायत थी कि दूसरे कोठे के बच्चों को ग्राहक चाट-पकौरी के लिए पैसे देकर बाहर भेज देते हैं तो बच्चे मान जाते हैं...मगर ये कलमुहां बग़ैर दारू के बिल्कुल ही न माने...अब तो उसके सब ग्राहक जानते हैं... आते ही बच्चे को थोड़ी –सी शराब दे देते हैं तो बौराता हुआ कोठे के सीढ़ी से नीचे चला जाता है।... बच्चे की मां पूरा मुंह खोलकर हंसती है तो उसके दांतों के बीच जमी काली परतें साफ दिखती हैं। ...तो श्रीकांत इन बच्चों पर ही डॉक्युमेंट्री बनाना चाहता था। उसे लगता था कि रंडियों पर फिल्में तो बहुत बनीं... लेकिन इन स्याह गलियारों के जुगुनूओं पर भी फिल्म बननी चाहिये। वो ख़ुद इसके लिए पूरी तैयारी कर रहा था। चूंकि मैं इसमें दिलचस्पी ले रहा था इसलिये उसने मुझे भी इसके बारे में बताया और चाहता था कि मैं भी इसमें उसकी मदद करूं। वो फिल्म बनाकर शोहरत चाहता था... पैसा चाहता था और सबसे ज्यादा एक पत्रकार के तौर पर एक इत्मीनान। वो दिल्ली भी गया तो ये डॉक्युमेंट्री उसके दिल में रही, किसी माशूक की तरह। न्यूज़ चैनल में गया तो प्रोडक्शन का काम उसने बखूबी समझा।...उसके दिल में इस डॉक्युमेंट्री को ज़िंदा करने की उम्मीद बनी रही। वो सड़क चलते उन ग़रीब बच्चों को ग़ौर से देखता –सुनता था जो भीख़ मांगने के लिए गीत गुनगुनाते...वो ऐसे ही किसी गीत से अपनी डॉक्युमेंट्री की शुरुआत करना चाहता था। उसने वॉयस ओवर करना सीखा, सिर्फ डॉक्युमेंट्री के वास्ते। उसने कई बार बताया था कि कैसे वो बोलेगा... स्क्रिप्ट क्या होगी। वो अपनी पत्नी मयूरी को भी इसके बारे में बहुत कुछ बताता था... बाक़ायदा पका देता था हमसबको। मैं दारू के नशे में होता तो श्रीकांत मुझे जाने क्या- क्या लगता। समाज सुधारक... एक जुनूनी और एक चिरकुट पत्रकार... जो कभी जीवन में पैसा नहीं बना पाया..चुतियापे की बात पर ज़िंदगी निकाल दी...उसके किताबों के ढेर मुझे बकवास लगते। उसका शायराना मिजाज़ और फक्कड़ तबियत से तब घिन होती जब मैं उससे दारू के लिए कुछ रुपये मांगता और वो शर्तिया कहता कि नहीं हैं..न तो अपनी गाड़ी ख़रीद पाया और न ही जीवन बीमा करा पाया। बीमा को लेकर उसका तर्क अलहदा था... उसे ये सब बकवास लगता था।..इसी चुतियापे को जीता हुआ आख़िरकार बीच सफ़र में ही दुनिया को अलविदा कह दिया... एक साल पहले भेजा गया उसका मैसेज मेरे मोबाइल के मैसेज बॉक्स में अब भी पड़ा है। मैने संभालकर रखा है... क्योंकि जवाब देने का भी वक़्त उसने नहीं दिया... मैं कई दिनों से न उससे बात कर पाया था और न ही मुलाकात हो पाई थी। मैं भी अपने चैनल के काम में मशरूफ़ था और वो उससे भी कहीं ज्यादा। सो, एकदिन उसका मैसेज आया- सांसों का पिंजरा किसी दिन टूट जाएगा, फिर मुसाफ़िर किसी राह में छूट जाएगा, अभी साथ हो तो बात कर लिया करो, क्या पता कब ये दोस्त तुम्हारी ख़ामोशी से रूठ जाएगा।
(जारी)

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सांसों का पिंजरा किसी दिन टूट जाएगा,
फिर मुसाफ़िर किसी राह में छूट जाएगा,
अभी साथ हो तो बात कर लिया करो,
क्या पता कब ये दोस्त
तुम्हारी ख़ामोशी से रूठ जाएगा।

बहुत बढ़िया।

mehek said...

aage intazar rahega

Jayant chaddha said...

जिंदगी के टुकडों का सलीके से भरा ड्राफ्ट और बहुत अछे से सजाये गए बारीक पॉइंट्स के बावजूद आपकी पुरजोर सिफारिशों के चलते मैं इसे आत्मकथा नहीं मान रहा हूँ.....
काश की दारू के बोतलों और मरती हुई संवेदनाओं का सच दुनिया के किसी पत्रकार की आत्मा कथा न बने.....
www.nayikalam.blogspot.com

राजन अग्रवाल said...

अच्छी है. आत्मकथात्मक अंदाज़ में लिखी गयी बेहद करीने से पिरोने की कोशिश, पढ़ते हुए लग रहा था कि किसी की आत्मकथा ही पढ़ रहा हूँ, लेकिन आप पहले भी कह चुके हैं की इसे कहानी ही मन जाये, इसलिए कोई बयां नहीं, सिर्फ टिप्पणी . जारी रखिये, जब तक डॉक्युमेंटरी पूरी नहीं हो जाती.