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Friday, July 31, 2009

...तुम्हीं चल दिये दास्तां कहते- कहते

31 जुलाई 1981... आपके लिए थोड़ा अजीब होगा, लेकिन मुझे याद है। वो उमस भरी दोपहर... बिहार के छपरा शहर के विश्वेश्वर सेमिनरी हाईस्कूल के परिसर का सन्नाटा... मेरे नानाजी रिटायर हो रहे थे। उनका विदाई समारोह था। ये स्कूल उनके नाम पर नहीं था लेकिन संयोग था कि उनका भी नाम यही था... ये न भी हो तो भी इस स्कूल के जर्रे- जर्रे में उनके व्यक्तित्व का असर साफ था.. इसी स्कूल में तक़रीबन अट्ठारह वर्षों की सेवा के बाद यहां के प्रिंसिपल साब यानी, आचार्य विश्वेश्वर रिटायर हो गए थे। मेरे नानाजी और इस स्कूल के प्रिंसिपल साब की हनक का आख़िरी दिन। वही प्रिंसिपल साहब जो कभी भी किसी भी क्लास में अचानक घुस जाते और छात्रों के साथ शिक्षकों से भी सवाल पूछ बैठते। मेरे जेहन में वह तस्वीर ज़िंदा है... जब अपने यहां से छपरा जाकर मेरा नाम नानाजी के स्कूल में लिखवाया गया था। पांचवीं कक्षा में... मैं अपने मम्मी- पापा की याद में जार- जार आंसू बहाया करता था। स्कूल में खोया- खोया रहता था। धीरे- धीरे खुला... तो क्लास में अपने नानाजी के प्रिंसिपल होने की धौंस ग़ालिब करता क्लास को हलकान रखता। न होमवर्क करता न क्लास में किसी सवाल का जवाब देता। एकदिन क्लास मॉनीटर ...उसका उपनाम हमने भुआल ( एक ऐसा कीड़ा जो शरीर के किसी भी हिस्से को छू जाए तो दिन भर खुजली होती है)... रखा था, उसे ही नाक पर दे मारा और पेश्तर उसकी नाक के खून निकल आया... थोड़ा डरा और ख़ामोश बैठ गया। मॉनीटर ने मेरा नाम तत्कालीन प्रथा के मुताबिक ब्लैक बोर्ड पर लिख दिया... संजीव कुमार। क्लास मॉनीटर का काम ही यही था, कि शिक्षक की ग़ैर मौजूदगी में शैतानी करने वाले बच्चों का नाम ब्लैक बोर्ड पर लिख दे... और जो भी शिक्षक आए, वो शैतानों की फेहरिस्त पर निगाह डालकर यथासंभव दंडित करे। ख़ैर क्लास में शिक्षक आए..सबसे पहले मेरा नाम, उसके बाद पांच और नाम भी थे। उन्होंने डांट –फटकार करके बिठा दिया...औरों को छड़ी लगी। इतने में प्रिंसिपल साब आए तो उन्होंने नए सिरे से ब्लैक बोर्ड पर निगाह डाली... मैं शेखी भरी नज़रों से क्लास रूम को देख रहा था कि मेरे नाम के बाद के नामों पर प्रिंसिपल साब निगहबान होंगे और उनपर रहमतों की बारिश करेंगे। मगर मुझे तब काठ मार गया जब प्रिंसिपल साब ने जोर से चिल्लाकर मेरा नाम पुकारा.. मैं थोड़ी सकपकाई मुद्रा में खड़ा हो गया... उन्होंने चपरासी से बेंत लेकर मुझपर जमकर बरसाया... हालांकि दो बेंत में ही पैंट में ही शू- शू हो गया... मुझे कूटने के बाद प्रिंसिपल साब फ़ौरन कक्षा से चले गए, ये मेरे लिये दोहरी मार थी।
प्रिंसिपल साब से मैने इतनी मार खाई... लेकिन आदमी कभी नहीं बन पाया। वे मुझे राम गोज़ और आई गो का अंतर नहीं समझा पाए... मैं राम को भी गो ही कहता और खुद को भी गो... मुझे लगता कि भला राम ने क्या ग़लती कर दी कि उसके नाम के आगे इतना भारी- भरकम शब्दों का बोझ डालूं.. जबकि गो भर कह देने से सब समझ लेते हैं। तो परिणाम निकलता कि प्रिंसिपल साहब बेसाख्ता बिफर पड़ते। ख़ैर, प्रिसिंपल साब की सत्ता उर्फ अपने ननिहाल में मैं कंचे नहीं खेल सकता था... क्योंकि ये लफंगों का खेल है। मैं गोलगप्पे नहीं खा सकता था क्योंकि गोलगप्पे वाले का नाखून बड़ा होता है और उसमें बेशुमार गंदगी भरी होती थी। मैं पतंग नहीं उड़ा सकता था क्योंकि लोफड़ों का शग़ल है और इसमें छत के गिरने की आशंका होती है। नानाजी के लिए खेल बस फुटबॉल था... जो स्कूल के मैदान में खेलने वाले बड़ी उम्र के लड़के मुझे खिलाने को कतई तैयार नहीं होते।
प्रिंसिपल साहब के लिए उनके स्कूल के बच्चे ही उनके लिये सबकुछ थे... हम तो बेकार हैं... किसी काम के लायक नहीं (जैसा यदा-कदा कहते भी थे, और हम खुद को वैसा ही समझते भी थे... न भी समझें तो बाद में चलकर इसकी पुष्टि भी हो गई)। बोर्ड का इम्तिहान देने वाले छात्रों के घर लगभग हर शाम छह- सात बजे खुद पहुंच जाते... सबके घर का पता उनके पास होता था। छात्र को पढ़ते नहीं देखते तो उसके साथ- साथ मां- बाप की भी दुर्गति अलग होती। रिजल्ट आता और उनके स्कूल के बच्चे जिले भर में धूम मचाते तो जैसे कई दिनों तक प्रिंसिपल साहब खुशी से सो नहीं पाते। वाद- विवाद प्रतियोगिता के लिए अपने स्कूल के छात्रों का खुद चयन करते और उसे मंच पर बोलवाने की प्रैक्टिस कराते। एक दीपक था जिसे नानाजी कुलदीपक कहते... एक जगजीत सिंह था... सरदार... दोनों ने वाद-विवाद प्रतियोगिता में जिले स्तर पर कामयाब होने के बाद राज्य स्तर पर इनाम हासिल किया था। दोनों नानाजी के लिए बेहद प्रिय थे।... उनके स्कूल का अनुशासन ऐसा कि किसी भी छात्र की हिम्मत नहीं कि साइकिल पर बैठकर परिसर के भीतर आ जाए... किसी छात्र की हिम्मत नहीं कि परिसर के बाहर बिकने वाले गोलगप्पे खा ले। सिनेमा देखना तो दूर... किसी के बारे में जानकारी भी मिल जाए तो जैसे पिल पड़ते।
प्रिंसिपल साब फिल्मों के सख़्त ख़िलाफ़ थे। मैं अपनी बड़ी बहन के साथ नानाजी के यहां रहता था और हम दोनों भाई बहन फिल्में देखने के लिए नानीजी से चिरौरी करते। कभी- कभी नानाजी पटना जाते काम से तो हमारी बांछें खिल उठतीं... दोपहर में नानीजी हमें रिक्शे में लेकर फिल्म दिखाने ले जातीं... बैजू बावरा... भक्त प्रह्लाद, कोहिनूर जैसी कुछ फिल्में मुझे याद हैं... नानीजी नई फिल्में दिखाने में परहेज करतीं। घर लौटकर रिक्शे पर भगवान से प्रार्थना करता कि नानाजी अबतक घर न पहुंचे हों... देर रात जब नानाजी घर पहुंचते तो मुझे बड़ी मायूसी होती।
लेकिन 1996 आते- आते परिदृश्य बदल गया। मैं अगर किसी के बहुत क़रीब था तो नानाजी। तब वे प्रिंसिपल साब नहीं थे। मैं मुजफ्फरपुर में नौकरी करता था.. और विश्वकर्मा पूजा के दिन केवल इसलिये नानाजी के यहां पटना आ गया क्योंकि अख़बार में विश्वकर्मा पूजा की छुट्टी थी। दोपहर में एक ही समय में दोनों नाना- नाती ने भोजन किया... इधर- उधर की बातें हुई। दोपहर में सो गया... शाम पांच बजे नानाजी ने मेरे घुटने को हिलाकर बताता कि घूमने जा रहे हैं... मैं सोकर उठा तो नानाजी के इंतजार में कुछ देर बैठा रहा। नानाजी नहीं आए... देर शाम खबर आई कि किसी स्कूटर सवाल ने नशे की हालत में नानाजी को टक्कर मार दी। नानाजी कॉमा में चले गए। ...सात दिनों तक उसी स्थिति में रहने के बाद उनके प्राण छूट गए। सितंबर का महीना था। उनके कमरे में अक्सर एक प्रशस्ति पत्र टंगा मिलता था, जो उन्हें विश्वेश्वर सेमिनरी से रिटायरमेंट के समय किसी शिक्षक ने दिया था- बड़े शौक़ से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं चल दिये दास्तां कहते- कहते।

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"नानाजी कॉमा में चले गए। ...सात दिनों तक उसी स्थिति में रहने के बाद उनके प्राण छूट गए। सितंबर का महीना था। उनके कमरे में अक्सर एक प्रशस्ति पत्र टंगा मिलता था, जो उन्हें विश्वेश्वर सेमिनरी से रिटायरमेंट के समय किसी शिक्षक ने दिया था- बड़े शौक़ से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं चल दिये दास्तां कहते- कहते।"

नाना जी को भाव-भीनी श्रद्धांजलि।

Bhuwan said...

बेहद रोचक कहानी.. मार्मिक अंत के साथ.

भुवन वेणु
लूज़ शंटिंग

jainendra jyoti said...

Aksar dekha jata hai ki jo log bachpan me badmash hote hain aur nahi padhte hain, wahi aage chalkar bade-bade kaam karke naam raushan karte hain.Waise yah kafi acchhi kahani hai.