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Thursday, August 27, 2009

...मेरे महबूब कहीं और मिलाकर मुझसे उर्फ ताज़


वृंदावन से हमलोग मथुरा की तरफ जाने लगे। रास्ते में ड्राईवर ने हमें पूछा कि मथुरा चलें या फिर आगरा ?... हालांकि उसने बताया कि पहले आगरा ही चलें क्योंकि वहां ताजमहल में साढ़े छह बजे तक ही प्रवेश मिल पाएगा... और लौटती समय में मथुरा में शाम की आरती तक यहां पहुंच जाएंगे। हमें उसका आइडिया पसंद आया और हम सीधे आगरा की तरफ निकल लिये... रास्ते में एक जगह लिखा मिला बरसाना 12 किलोमीटर। ख़ैर। रास्ते में ड्राईवर ने एक हरियाणवी गाना लगा दिया जो पॉप अंदाज में गाया गया है- आ बैठ बुलेरो में... सपेशल तेरी ख़ातिर लाया।... पिताजी के कहने पर गाना बंद भी करा दिया। आगरा पहुंचने से काफी पहले अंदाजा मिल गया कि हम जल्द ही पहुंचने वाले हैं... हर जगह जैसे ताजमहल का नजारा था। एक गुरुद्वारानुमा सफ़ेद इमारत देखी जिसमें ताजमहल जैसी गुंबदें बुलंद थीं। आगरा की ज़ामा मस्ज़िद। ...आगरा के जर्रे- जर्रे पर जैसे ताज का अक्स था। ताज़ को लेकर दिल में एक जमाने से तरह- तरह के ख़यालात थे... ताज़ को मैने कभी इतिहास के नज़रिये से देखा तो कभी फिल्मों के नजरिये से... कभी दुनिया के सात आश्चर्यों में शामिल ताज को उसी अंदाज में देखने की कोशिश की तो कभी वहां होकर आए सैलानियों की जुबानी सुनी।... सबने उस्ताज जाक़िर हुसैन की तर्ज पर जैसे कहा हो- वाह ताज़। हर तरफ ताज की संगमरमरी खुबसूरती की तारीफ़ सुनी... लेकिन मैं ताज को लेकर साहिर के ख़यालात से ख़ुद को नज़दीक पाता रहा... पहला ऐसा इंक़लाबी शायर जिसने ताज को नये नज़रिये से देखने की कोशिश की... पहली बार मुहब्बत की इमारत कहे जाने ताज़महल की तस्वीर पर लगी पैबंदों की शिनाख़्त की। आपको याद हो न हो...साहिर साहब की नज़्म- ताजमहल- की इन पंक्तियों को दोबारा ताज़ा करें- ताज तेरे लिये इक मज़हरे- उल्फ़त ( प्यार का प्रतिमान) ही सही/ तुझको इस वादी-ए- रंगीं से अक़ीदत ही सही/ मेरे महबूब कहीं और मिलाकर मुझसे/बज़्म- ए- शाही में ग़रीबों का ग़ुज़र क्या मानी/ सब्त जिस राह पे हों सतवते शाही के निशां/ उसपे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मानी/ मेरे महबूब पसे- पर्दा-ए- तशहीरे- वफ़ा तूने/ सतवत के निशां को तो देखा होता/मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली/ अपने तारीक-मकानों को तो देखा होता/ अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्‍बत की है/ कौन कहता है सादिक़ न थे जज़्बे उनके/ लेकिन उनके लिए तशहीर का सामान नहीं/ क्‍योंकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे/ ये इमारतो-मकाबिर, ये फ़सीलें, ये हिसार/ मुतलक-उल-हुक्‍म शहंशाहों की अज़्मत के सुतूं/ दामने-दहर पे उस रंग की गुलकारी है/ जिसमें शामिल है तेरे और मेरे अज़दाद का खूं/ मेरी मेहबूब, उन्‍हें भी तो मुहब्‍‍बत होगी/ जिनको सन्‍नाई ने बख्‍शी शक्‍ले-जमील/ उनके प्‍यारों के मक़ाबिर रहे बेनामो-नुमूद/ आज तक उन पे जलाई ना किसी ने कंदील/ये चमनज़ार, ये जमना का किनारा, ये महल/ ये मुनक्‍क़श दरोदीवार, ये मेहराब, ये ताक़/ इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर/ हम ग़रीबों की मुहब्‍बत का उड़ाया है मज़ाक़/ मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझे। ... गाड़ी के ड्राईवर ने हमसबको ताजमहल के मुख्यद्वार के आगे चौराहे पर उतारा और हम रिक्शे में नहीं बैठे... बैटरी से चलने वाली उस गाड़ी में भी नहीं बैठे जिसपर ज्यादातर विदेशी बैठे थे...हम सब एक ऊंट गाड़ी में बैठे जिसे देखते ही मेरा बेटा स्वप्निल और भतीजा अमर्त्य...दोनों एकसाथ कैमल- कैमर का शोर मचाते हुए मचल उठे थे। सबको बिठाकर पिताजी के साथ मैं और छोटे भाई का साला चंदन... खरामा –खरामा ताजमहल की ओर चल पड़े...। (जारी)

तिमिर मिटाता एक दीप



तहलका में रेमन मैगसेसे पुरस्कार विजेता दीप जोशी के बारे में जानें -संजीव


देश की तस्वीर बदलने का सपना देखने और इस दिशा में जुनून के साथ काम करने वाले दीप जोशी को रेमन मैगसेसे पुरस्कार मिला है. अपनी धुन के पक्के इस मुसाफिर के सफर के बारे में बता रही हैं तुषा मित्तल
‘अगर मेरे हाथ में एक जादुई छड़ी होती तो मैं कुछ ऐसा करता कि विकास से जुड़े कामों की तरफ भी युवाओं का वैसा ही आकर्षण हो जैसा इंजीनियरिंग, मेडिकल या मैनेजमेंट जैसे विकल्पों की तरफ होता हैं’
इलाहाबाद में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते दीप जोशी जब उत्तराखंड में बसे अपने गांव जाते तो बस की लंबी यात्रा के दौरान अक्सर उनके मन में ख्याल आता, ‘पहाड़ के लोगों की जिंदगी में बदलाव लाने के लिए मैं अपनी पढ़ाई को किस तरह इस्तेमाल कर सकता हूं?’ 25 साल बाद इस सवाल का जवाब उनके लिए प्रतिष्ठित रेमन मैगसेसे पुरस्कार लेकर आया है. इस पुरस्कार को एशिया का नोबेल भी कहा जाता है. पुरस्कार के लिए नामों का चुनाव करने वाली ज्यूरी का कहना था कि भारत में ग्रामीण विकास के क्षेत्र में जोशी ने अपने संगठन प्रदान के जरिए जिस तरह से अपने दिल और दिमाग का इस्तेमाल किया है उसने गैर सरकारी संगठनों के आंदोलन को एक पेशेवर स्वरूप दिया है.
जोशी का बचपन उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के एक गांव में बीता. उनसे उनके बचपन के बारे में पूछिए और वो उन दिनों को याद करते हैं जब वो जंगल में पशुओं को चराने जाते थे और वहां से चूल्हे के लिए लकड़ियां इकट्ठी करके भी लाते थे. वो कहते हैं, ‘सुविधाएं नहीं होने पर भी वो जगह रिश्तों की आत्मीयता और जीवन की संपूर्णता से भरी-पूरी थी. हिमालय के पहाड़ों में जिंदगी कहीं ज्यादा समानतावादी थी मगर अब चीजें खराब हो रही हैं.’
इलाहाबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से 1972 में इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए जोशी ने अमेरिका की राह पकड़ी. यहां उन्होंने जाने-माने मैसेच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलजी में दाखिला लिया. 1977 में वो स्वदेश लौटे और पुणे स्थित एक गैरसरकारी संगठन में काम करने लगे. फिर एक दिन उनकी मुलाकात रजनीकांत और माबेल एरोल से हुई जो अमेरिकी डॉक्टर थे और स्थानीय लोगों को सामुदायिक स्वास्थ्य-कर्मी बनने के लिए प्रशिक्षित कर रहे थे. ये दोनों डॉक्टर पुणे के झमखेड़ इलाके पर खास ध्यान दे रहे थे जहां नवजात मृत्यु दर प्रति 1000 पर 60 थी जो राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा थी. जोशी कहते हैं, ‘जिस तरह से वे लोगों की मदद करने के लिए अपनी बुद्धि और भावनाओं का इस्तेमाल कर रहे थे उससे मुझे बेहद प्रेरणा मिली.’
जोशी ने महसूस किया कि अगर एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सके जो ज्यादा शिक्षित लोगों को जमीनी मुद्दों की तरफ खींच सके तो इस देश की तस्वीर बदल जाएगी. वो कहते हैं, ‘राज्य नियम बना सकता है और पैसा बांट सकता है मगर ये लोगों को गरीबी से बाहर नहीं निकाल सकता. राज्य को ज्यादा मतलब शक्ति से होता है. हम एक ऐसे माध्यम के जरिए विकास की उम्मीद किस तरह कर सकते हैं जिसको चलाने वाला ईंधन सत्ता हो. ये बुनियादी रूप से गलत धारणा है.’
फोर्ड फाउंडेशन से मिली डेढ़ लाख डॉलर की आर्थिक सहायता और आईआईटी और आईआईएम के पढ़े विजय महाजन की मदद से उन्होंने 1983 में प्रोफेशनल असिस्टेंस फॉर डेवलपमेंट एक्शन यानी प्रदान की स्थापना की. आज प्रदान भारत के 3000 गांवों के करीब 1.7 लाख परिवारों की जिंदगी बेहतर बना रहा है. इसकी सबसे सफलतम परियोजनाओं में से एक है आदिवासियों का एक पोल्ट्री कोऑपरेटिव. जोशी कहते हैं, ‘दस साल पहले अगर कोई मुझसे कहता कि आदिवासियों का पोल्ट्री कोऑपरेटिव एक दिन 60 करोड़ रुपये सालाना का टर्नओवर हासिल कर लेगा तो मैं खूब हंसता.’1983 में जब प्रदान शुरू हुआ था तो इसमें 100 से भी कम स्वयंसेवक थे. आज ये हर साल 70,000 से भी ज्यादा छात्र स्वयंसेवकों को अपनी तरफ खींचता है. भविष्य के बारे में जोशी कहते हैं, ‘अगर मेरे हाथ में एक जादुई छड़ी होती तो मैं कुछ ऐसा करता कि विकास से जुड़े कामों की तरफ भी युवाओं का वैसा ही आकर्षण हो जैसा इंजीनियरिंग, मेडिकल या मैनेजमेंट जैसे विकल्पों की तरफ होता हैं.’

Monday, August 24, 2009

बेहतर भविष्य के इंतज़ार में

भुवन के ब्लॉग -लूज़ शंटिंग - पर दीप्ति का ताजा पोस्ट पढ़ें... । इसके जरिये अपने आसपास... और समाज को महसूस करें - संजीव

नाम- इंतज़ार
उम्र- 15 साल (लगभग)
स्थानीय निवासी- उत्तर प्रदेश
फिलहाल बसेरा- पुरानी दिल्ली का एक रैन बसेरा
जब हम उससे और उसके साथियों से मिलने के लिए शैल्टर होम पहुंचे तो वो सभी बच्चे टीवी पर टॉम एण्ड जैरी देख रहे थे। असल में हम अपने आप में एक अनोखे बैंक को कवर करने के मक़सद से वहाँ पहुंते थे। इतंज़ार से जब मैं मिली तो सबसे पहली बात जो मैंने कही वो थी कि क्या नाम है, शानदार...
इंतज़ार, शादियों और पार्टियों में लाइट सिर पर उठाने का काम करता है। साथ-साथ वो एक बैंक का मैनेजर भी है। बैंक को वो बैंक नहीं बल्कि ख़ज़ाना कहता हैं। क्योंकि उनके इसे बैंक कहने पर भारतीय रिज़र्व बैंक को आपत्ति थी। इंतज़ार फ़िलहाल अपने इस व्यस्त दिनचर्या के साथ पढ़ाई भी कर रहा है। वो सातवीं क्लास में पढ़ता है। इंतज़ार से मिलने पर वो एक गंभीर और अपने भविष्य के प्रति सजग बच्चा लगता है। जब उससे बातचीत शुरु हुई तो मालूम चला कि वो अपने घर से भागकर दिल्ली आया था। वो इतना तो बताता है कि उसका घर उत्तर प्रदेश में है लेकिन, वहाँ कहाँ ये वो नहीं बताता है। न ही वो अपने माता-पिता का नाम बताने को तैयार है। भविष्य में इलैक्ट्रिशिय बनने के ख़्वाब संजोए इंतज़ार पहले एक नशेड़ी था। भयंकर नशा करना उसका रोज़ाना का काम था, वो जो भी कमाता था नशे में उड़ा देता था। ऐसे में उसका कई बार कई तरह से शोषण भी हुआ, जिसके बारे में खुलकर वो कुछ नहीं कहता है। इतंज़ार फिलहाल एक स्वयंसेवी संस्था बटरफ़्लाई के शेल्टर होम में रहता है। सरकारी रैन बसरे के एक कमरे का ये शेल्टर होम आज उसका घर है। इंतज़ार अकेला नहीं है, यहाँ उसके जैसे कुछ 40 बच्चे रह रहे हैं। ये सभी अपने घरों से भागकर दिल्ली आए हुए हैं। पुरानी दिल्ली रेल्वे स्टेशन के आसपास भटकते इन बच्चों को बटरफ़्लाई एक बेहतर ज़िंदगी देना चाहता हैं। इस शेल्टर होम में बच्चों को खाने-पीने से लेकर पढ़ाई तक की व्यवस्था है। यहाँ से बच्चों को स्कूल भेजा जाता है। उन्हें योग सिखाया जाता है। उनकी नशे और जुए जैसी लतों को दूर करने में मदद की जाती हैं। यहाँ काम करनेवाले बताते हैं दिल्ली भाग कर आनेवाले बच्चों की तादाद बहुत ज़्यादा है। पुरानी दिल्ली के आसपास एक ऐसा पूरा गिरोह काम करता है जो कि इन बच्चों का शोषण करता हैं और उन्हें पकड़कर बेच देता है। संस्था के एक सदस्य का कहना था कि यहाँ एक भी बच्चा ऐसा नहीं है जिसका शोषण न हुआ हो। यहाँ रह रहे बच्चे अलग-अलग राज्यों से है। ये बच्चे सालों तक अपनी असलियत छुपाकर रखते हैं। कितना भी पूछो घर का पता नहीं बताते हैं। कुछ अगर बता भी दे तो वापस नहीं जाना चाहते हैं। बेमक़सद घरों से भागे इन बच्चों के पास आज एक मक़सद हैं और वो है ख़जा़ना। ख़ज़ाना, का पूरा नाम चिल्डर्न डेवेलपमेंट ख़ज़ाना है। ये ख़जा़ना बटरफ़्लाई ने इन बच्चों के साथ मिलकर खोला है। इसमें बच्चे अपनी कमाई, अपनी बचत जमा करते हैं। महीने में 20, 30 या 50 रुपए अपने ही इस ख़ज़ाने में जमा करने वाले ये बच्चे इसे ख़ुद ही चलाते हैं। इनके शेल्टर होम में बाक़ायदा एक काउन्टर है। सभी के अकाउन्ट नंबर है और सभी के पास अपनी पास बुक है। ये पूरे मायनों में बैंक की तरह काम करता हैं। यहाँ पैसा जमा करनेवालों को ब्याज भी मिलता हैं। बटरफ़्लाई कि ये योजना बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने और फ़िजूलखर्ची से बचाने के लिए है। ख़ासकर नशे से बच्चों को दूर रखने के लिए। पास में पैसे न होने पर ये बच्चे नशा नहीं करते हैं। यहाँ रह रहा रोहित स्कूल जाता है और काम भी करता है। वो रोज़ाना दस रुपए ख़ज़ाना में जमा करता है, वो कहता है कि ऐसा करने से उसका भविष्य संवर जाएगा। गोपाल की उम्र कुछ 10 साल होगी। उसने फिलहाल ख़ज़ाना में 7 रुपए जमा करवाए है, वो बड़ी मासूमियत से बताता है कि जमा तो 27 थे लेकिन, उसने 20 रुपए चॉकलेट के लिए निकाल लिए। उत्तराखंड से भागकर आया गोपाल पायलट बनना चाहता है इसके लिए वो पैसे जमा करना चाहता है। ख़ज़ाना अपने आप में बहुत बेहतरीन पहल मालूम होती है। ये स्कीम फिलहाल भारत के 4 या 5 शहरों के साथ-साथ श्रीलंका, अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश और क़जाकिस्तान के कुछ शहरों में चल रही हैं। इसके चलते कई नौजवान अपने पैरों पर खड़े हुए हैं और एक बेहतर भविष्य की उम्मीद में बटरफ़्लाई इसे और आगे बढ़ाना चाहता हैं...

Sunday, August 23, 2009

...बोलो वृंदावन बिहारी लाल की


मेरी मां और पिताजी बहुत दिनों के बाद हमारे यहां कुछ दिनों के लिए आए। उसके बारे में बाद में बताऊंगा। अभी जन्माष्टमी से ठीक एक दिन के बाद मां-पिताजी को उनकी काफी उत्सुकता और इच्छा को देखते हुए उन्हें लेकर वृंदावन, मथुरा और आगरा गया था। लाख मना करने के बावजूद गाड़ी का किराया बहाने से पूछकर पिताजी ने जबरन थमा दिया- 3200 रुपये। सुबह साढ़े आठ बजे बिना कुछ खाये- पीये ( चाय तक नहीं) मां- पिताजी, मैं और मेरी पत्नी के साथ दो छोटे- छोटे बच्चे, मेरा छोटा भाई और उनकी पत्नी के साथ बेटा और एक साला एक बड़ी गाड़ी में सवार होकर निकले। तक़रीबन साढ़े दस बजे हम वृंदावन में थे…। सुबह से ही छाये काले बादल दिल्ली की बजाय वृंदावन पहुंचते- पहुंचते पूरे तरन्नुम के साथ बरस रहे थे। शहर के बाहरी हिस्से में रमणरेती पुलिस चौकी के पास लंबे जाम को देखते हुए वहीं एक गली में गाड़ी खड़ी कर दी। बाहर बेतहाशा बारिश और सड़कों पर गाड़ियों और लोगों की भीड़ को देखते हुए मैने अनमने ढंग से पिताजी से कहा कि पहले मथुरा चलते हैं ..लौटती वक़्त में आ यहां जाएंगे... पिताजी हैरान हुए। बोले, बारिश ही तो हो रही है... एकबार आए हैं तो बिना दर्शन के नहीं जाएंगे। अनमने ढंग से जूते गाड़ी में उतारकर मूसलाधार बारिश के बीच सड़कों पर आ गए। घुटने- घुटने भर पानी और टूटी सड़कों के कारण तलवे के नीचे आने वाले ईंट- पत्थर... लेकिन पिताजी और मां को बड़े मजे में आगे बढ़ते देखा तो जैसे जोश आ गया... महिलाओं में अलग किस्म का जोश था। लेकिन मंदिर का पता नहीं होने के कारण कुछ देर ऐसे ही भटकते रहे... गाइड भी हमें बार- बार घेर रहे थे लेकिन परिवार के साथ परेशानी में फंसा हुआ देख दो सौ –तीन सौ मांग रहे थे। मैं दे भी देता... लेकिन पिताजी की मौजूदगी में इतना पैसा पानी में देने की हिम्मत नहीं थी। सो, बड़ी मुश्किल से एक ऑटोवाला नज़र आया... पूछा तो बोला सौ रुपये में मंदिर तक पहुंचा देगा। हमसब उसी में बैठ गए। बीच- बीच में देशी- विदेशी श्रद्धालुओं की भीड़ और गाड़ियों का रेला। मंदिर पहुंचते- पहुंचते ऑटो में सवार होने के बाद भी हमसब तरबतर हो चुके थे और बारिश की गति और भी तेज। ख़ैर। ऑटो वाले ने हमें जहां उतारा वहां से मंदिर जाने के लिए गलीनुमा सड़क है। वहां आसपास की दुकानें राधामय थीं। किसी भजनीक का भजन बज रहा था- राधे- राधे ...राधे बरसाने वाली राधे। पिताजी ग़ौर से सुनने लगे... हमसबको भी बेहद मधुर लगा। फिर घुटने –घुटने भर पानी में हम मंदिर की ओर बढ़ने लगे। बूढ़े, बच्चे और महिलाओं की भीड़ पर मूसलाधार बारिश का मानो कोई असर ही नहीं था।...सब तरफ बस राधे- राधे की गूंज थी... काफी मशक्कत के बाद हम मंदिर परिसर में आख़िरकार पहुंच गए। बेहद छोटे मंदिर में काफी दूर से ही दर्शन कर लिया... भीड़ के बीच में मैं मां- पिताजी को लेकर अंदर गया लेकिन बहुत आगे तक नहीं जा पाया... मंदिर से बाहर बरामदे की तरफ आने के समय मां-पिताजी के चेहरे दमक रहे थे...भीड़ के साथ- साथ मां- पिताजी भी हाथ उठाकर राधे- राधे का जयघोष कर रहे थे.... मां का भाव कुछ ऐसा था जो कुछ वर्षों पहले जब मैं उन्हें पहली बार ऋषिकेष लेकर गया था उस समय लक्ष्मण झूला पर खड़ी मां रोने लगी... मैं हतप्रभ। मां से पूछा तो जैसे मुंडी हिलाकर खोयी हुई मुद्रा में खड़ी रही... बगल में ले जाकर पिताजी ने बताया कि अपने इधर ये माना जाता है कि बेटा अगर तीर्थयात्रा पर ले जाए तो जनम सफल हो जाता है... इसलिये खुशी के मारे रो रही है। ...तो मित्रो, पिताजी- मां वृंदावन तो आए थे अपने पैसे से लेकिन इसका श्रेय आज भी हम दोनों भाइयों को देते हुए जैसे आशीर्वाद दे रहे थे। धर्म में मेरी वाक़ई आस्था नहीं है लेकिन वृंदावन आकर, मां- पिताजी के दमकते- चहकते चहरों को देखकर धर्म से इनकार करने को जी नहीं चाहता। उसी मूसलाधार बारिश में पिताजी ने वापस चलने की इच्छा भी जताई जिससे कि समय पर मथुरा भी पहुंच जाएं। सो, आनन- फानन में दोबारा जब सड़क तक पहुंचे तो कोई ऑटोवाला नहीं था। दुकान में किसी तरह सब लोग खड़े हो गए... सबको चाय पिलवाई और उनसब को चाय पीता हुआ छोड़कर मैं तक़रीबन एक किलोमीटर दूर तक ऑटो की तलाश में निकल गया। बड़ी मुश्किल से एक ऑटोवाला तैयार हुआ और उसे लेकर मंदिर तक आया। उसमें सवार होकर निकले तो सड़कों पर इतना पानी भर गया कि ऑटो के भीतर भी चलते समय पानी घुसने लगा... ऑटोवाले ने स्थानीय ब्रज की भाषा में बोला कि जमुना मैया आज इधर ही आ गई लगती है... उसी ने इशारे से दिखाया... नजदीक में ही यमुना बहती हैं।... फिर सौ रुपये देकर हम अपनी गाड़ी तक पहुंच गए। (जारी)

Wednesday, August 19, 2009

जिन्ना के बहाने जसवंत का जलजला

बीजेपी ने अपने पार्टी नेता जसवंत सिंह को बाहर का रास्ता दिखा दिया। ये बहुत अप्रत्याशित नहीं है। लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद बीजेपी के भीतर सत्ता को लेकर जिस तरह की छटपटाहट देखी जा रही थी, ये उसी की परिणति है। पार्टी के बड़े नेता अपने ही दल के नेताओं के बीच सवालों के तीर से परेशान थे। जसवंत सिंह ने उन्हीं नेताओं में से एक थे जिन्होंने पार्टी नेतृत्व पर सवाल खड़ा किया... फिर पार्टी के संसदीय दल के नेता को लेकर असंतोष जाहिर कर चुके थे... ऐसे में जिन्ना पर लिखी उनकी क़िताब जैसे बहाना बन गई। पार्टी ने उन्हें बाहर करने में देरी नहीं की। अब उस जसवंत सिंह को पार्टी से निकालने का बीजेपी नेतृत्व का अंदाज जरा देखिये जो पार्टी में तीस वर्षों से थे... और वाजपेयी की सरकार में अहम जिम्मेदारियां उन्हें दी गई। जसवंत का दुख भी यही तो था कि जिस वाजपेयी सरकार में उन्हें हनुमान बताया जा रहा था... पार्टी ने उन्हें रावण की तरह बाहर कर दिया। पार्टी ने उनकी सदस्यता ख़त्म किये जाने को लेकर लोकतांत्रितक रवैया नहीं अपनाया। मसलन, कारण बताओ नोटिस जारी करना तो दूर उन्हें पहले तो फोन पर पार्टी की शिमला में होने वाली चिंतन बैठक में शामिल नहीं होने का निर्देश दिया गया...और जसवंत जब आखिरकार शिमला भी पहुंच गए तो उन्हें फोन पर ही उनके निष्कासन की सूचना भेज दी गई। दरअसल, बीजेपी का ये अंदाज भी नया नहीं है। जसवंत सिंह के निष्कासन से बीजेपी के भीतर लोकतांत्रिक ढांचे की पोल खोलता है। बीजेपी के साथ दिक़्कत ये है कि अपने हीरो को लेकर वो दिग्भ्रमित रही है। जैसे, कांग्रेस गांधी को मानती है... समाजवादी पार्टी लोहिया और बीएसपी डॉ.अंबेडकर को अपनी पार्टी का चेहरा मानती है। लेकिन बीजेपी के साथ दिक्कत ये है कि उसके पास ऐसे नेताओं की कमी है। डॉ.हेडगेवार, गोलवरकर जी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी सहित तमाम नाम ऐसे हैं जो मौजूदा दौर में बहुत ज्यादा जाने- पहचाने चेहरे नहीं हैं। ऐसे में बीजेपी को अगर अपने मुख्य विपक्षी कांग्रेस पर निशाना साधना हो तो गांधी पर साध नहीं सकते... क्योंकि लोगों को वो स्वीकार्य नहीं होगा। इसलिये पार्टी ने नेहरू का चयन किया। लेकिन बीजेपी में अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में ऐसा भी दौर आया जिसमें वाजपेयी नेहरू वाद के ज्यादा करीब दिखने लगे। पार्टी के कुछ नेताओं ने इसका रास्ता निकालते हुए जिन्ना की प्रशंसा करते हुए कांग्रेस को झुलसाने की कोशिश की। लेकिन बीजेपी जिन्ना को भी अपना हीरो नहीं मान सकती क्योंकि ये उसकी जड़ों को ही बर्दाश्त नहीं होगा और न ही इसकी स्वीकार्यता होती। सो, जसवंत की बलि चढ़ गई। अब देखिये कि जसवंत ने पहले ही साफ कर दिया उनकी क़िताब बीजेपी का दस्तावेज नहीं है। पुस्तक के विमोचन अवसर पर भी पार्टी का कोई नेता या विचारक नहीं था... वहां थे तो मार्क्सवादी आलोचक डॉ.नामवर सिंह, अधिवक्ता रामजेठमलानी और पत्रकार एम.जे.अक़बर। पार्टी ने भी जसवंत की किताब को उनका निजी विचार बताते हुए पल्ला झाड़ लिया था। फिर ऐसा क्या हुआ जो पार्टी को जसवंत से किनारा करना पड़ा? जिन्ना प्रेम ही अगर कारण है तो आडवाणी भी ये गुनाह कर चुके हैं।..पार्टी ने जसवंत को बाहर कर दिया लेकिन पार्टी के लिए सवाल अब भी ख़त्म हो गया क्या?... असल में पार्टी का सवालों से जी चुराने का यही रवैया मौजूदा राजनीति में उसके अप्रासंगिक होते जाने का बड़ा कारण है।

Saturday, August 15, 2009

शीला जी! ऐसा विकास आपको ही मुबारक़


दिल्ली की मुख्यमंत्री को मैं इसलिये जानता हूं क्योंकि वे रह-रहकर दिल्ली में नागरिक सुविधाओं में कमी के लिए बाहरी लोगों के बहाने पूर्वी यूपी और बिहार के मजदूरों, रिक्सा चालकों और ग़रीबों को जिम्मेदार मानती रही हैं। शीला दीक्षित को इसलिये जानता हूं क्योंकि महंगाई, लगातार बढ़ता अपराध, बटला हाउस एनकाउंटर जैसे तमाम मामलों के बावजूद विधानसभा चुनाव में दिल्ली की जनता शीला दीक्षित सरकार पर रीझ गई और दोबारा दिल्ली की गद्दी सौंप दी। ... लेकिन उन्हें नये कारणों से मैं जानूंगा। शीला दीक्षित ने तरक्की और विकास को लेकर नई स्थापना दी है। उन्होंने विकास और महंगाई का अनोखा संबंध देश की मूरख जनता को समझाया है। अद्भुत बिल्कुल मौलिक, खालिस कांग्रेसी परिभाषा उन्होंने गढ़ी है। उत्तर प्रदेश के रामपुर में गई शीला दीक्षित ने लगातार बढ़ती महंगाई की वजह बताई। शीला दीक्षित की मानें तो देश चूंकि बड़ी तरक्की कर रहा है इसलिए महंगाई बढ़ रही है। उनके कहने का लब्बोलुबाव था कि आज लोग विदेशों में शॉपिंग करते हैं, जो हमारी तरक्की का सबूत है।
यानी, हम जितनी तरक्की करेंगे, महंगाई उतनी बढ़ेगी। यानी, हमारे विकास दर के साथ महंगाई दर भी कुलांचे भरेगा। यानी, हमारी अमीरी के बरअक्स ग़रीबी का ग्राफ भी बढ़ता जाएगा। यानी, हिंदुस्तान में अनाज खा-खाकर अघाए लोगों की संख्या जितनी बढ़ेगी, कुपोषण पढ़ेगा और भुखमरी की संख्या भी बढ़ेगी। चलिये, शीला जी के बयान का ये मतलब न भी निकालें तो ये तो निकाल ही सकते हैं कि देश तरक्की कर रहा है। महंगाई के बावजूद (बकौल शीला जी)। देखिये कि शीला जी के उसी तरक्कीशुदा मुल्क़ में बुंदेलखंड आता है। उसी देश में विदर्भ है। उसी हिंदुस्तान में बिहार, बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा जैसे सूबे भी है जहां पिछड़ेपन की स्थिति लगातार भयावह हो रही है। इन राज्यों में शीला जी की दिल्ली की तरह की तरक्की नहीं है.. इन राज्यों में केवल महंगाई और पिछड़ापन है। इन राज्यों में कितने लोग विदेशों में जाकर शॉपिंग करते हैं... शीला जी ही बेहतर बता सकती हैं।
अर्थ नीति जानने वाले शीला दीक्षित के बयान को किस तरह से लेते हैं पता नहीं, लेकिन लगता है कि शीला दीक्षित अभी भी ध्यान बंटाने का कोई प्रभावी सियासी तरीका नहीं जान पाई हैं। महंगाई को लेकर शीला दीक्षित का बयान बचकाना लगता है। लेकिन शीला दीक्षित के उस बयान को लेकर क्या कहियेगा जो वे बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों को लक्ष्य करके देती रही हैं। दरअसल, शीला दीक्षित हमेशा ही बहानों की तलाश में रही हैं। लोग जब दिल्ली में पानी –बिजली की किल्लत की बात कहते हैं तो शीला जी कहती हैं कि दिल्ली में बहुत ज्यादा बाहरी लोगों के आने से ये स्थिति पैदा हुई। लेकिन शीला जी को उनके सचिवों ने बताया या नहीं, रोजी- रोटी की तलाश में दिल्ली आए इन्हीं बाहरी लोगों ने उनके मिशन कॉमनवेल्थ की तैयारियों का जिम्मा उठाए घूंम रहे हैं। चमचमाती सड़कों, फ्लाईओवर, मेट्रो लाइनों से लेकर तमाम जगहों पर इन सूबों से आए मेहनतकश ही दिल्ली के ऐश-ओ- आराम के इंतजाम में लगे हैं। शीला जी ने इन्हीं बाहरी वोटरों को रिझाने के लिए ऐन चुनाव के पहले उन लोगों को दिल्ली में ठौर देने का सब्जबाग दिखाया था जो महाराष्ट्र से पिट- पिटाकर आ रहे थे। दिल्ली के कई विधानसभा इलाकों में इन बाहरी लोगों ( शीला जी के लिए वोटर) की बड़ी संख्या को देखते हुए छठ पूजा के मौके पर अपनी मौजूदगी दिखा आई। अब चुनाव बीते दिनों की बात हो गई तो बाहरी लोगों पर नागरिक सुविधाओं की कमी का ठीकरा फोड़ रही हैं। क्या पता कॉमनवेल्थ गेम्स अच्छी तरह से संपन्न हो जाने के बाद इन बाहरी लोगों को दिल्ली से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया जाए। क्या पता आने वाले दिनों में महंगाई के लिए भी कुछ सूबों को यह कहते हुए जिम्मेदार बता दिया जाए वहां के लोग ज्यादा खाते हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश अनाज के आसमान छूते दामों के लिए हिंदुस्तान को यही कहते हुए तो जिम्मेदार ठहराया था। अगर इस रूप में देखें तो शीला दीक्षित का महंगाई को लेकर दिया गया बयान भी आधुनिक, तरक्कीपसंद और मौलिक लगता है। विकास और महंगाई का ये रिश्ता, जो शीला जी ने बताया है... ऐसा ही है तो ऐसी तरक्की शीला जी और उनके अपनों को ही मुबारक़।

Monday, August 10, 2009

मासूम मुहब्बत और दुविधाएं- लव आजकल


समीक्षा पढ़कर किसी फ़िल्म या क़िताब के बारे में मैं कोई राय नहीं बनाता था... लेकिन तहलका पर नई फिल्म -लव आजकल- की समीक्षा अच्छी लगी। फिल्मों में आपकी दिलचस्पी हो तो पढ़ें और वक़्त मिले तो देखने का मशविरा भी दूंगाः संजीव

फिल्म समीक्षा
फिल्म लव आजकल
निर्देशक इम्तियाज अली
कलाकार सैफ अली खान, दीपिका पादुकोण

‘हम आम आदमी हैं. मैंगो पीपल..और हमें अमर नहीं होना. हमें इसी जन्म में मिलना है और साथ रहना है.’ यह मौजूदा दौर की प्रेम कहानी है जो अगले जन्म के वादों के भरोसे यह पूरा जन्म अलग अलग बिताने को कतई तैयार नहीं
इम्तियाज बॉलीवुड की अब तक की सबसे मासूम प्रेम-कहानियां बना रहे हैं और यह तब, जब उनके किरदारों के पास अभूतपूर्व खिलंदड़पना है. ओमकारा या कल हो न हो से कहीं अधिक लव आजकल के लिए सैफ को याद रखा जाएगा. यह ऐसी फिल्म है जिसे सैफ खास बना देते हैं और जो सैफ को और भी खास बना देती है. यह सिर्फ एक संयोग नहीं है कि इम्तियाज ने करीना और सैफ दोनों को उनके करियर की क़रीब क़रीब सर्वश्रेष्ठ फिल्में दी हैं. पिछले दशक की सतही प्रेमकथाओं से निकल कर हम भाग्यशाली समय में हैं कि ऐसी फिल्में देख पा रहे हैं. इम्तियाज के पास वास्तविक और मजेदार संवादों का ऐसा खजाना है कि आप हंसते और अभिभूत रहते हैं. दीपिका भी इतनी शोख और मुखर इससे पहले कभी नहीं दिखी. अगर आपने सोचा न था और जब वी मेट देखी है तो आपको पहले से ही पता होगा कि नतीजा क्या होगा? कहानी के कुछ हिस्से अलग परिस्थितियों में अलग ढंग से दोहराए जाते हैं और आप उन्हें हर बार पकड़ भी लेते हैं. साथ ही प्रीतम का मधुर संगीत है जिसके कुछ हिस्से इधर उधर से उठा लिए गए हैं. लेकिन तभी आप फिर से फिल्म में डूब जाते हैं क्योंकि कहानी वो तत्व नहीं है जो इम्तियाज की फिल्मों को इतना रोचक बनाती है. वह तत्व है उस कहानी को कहने का तरीका और उसके पीछे की ईमानदारी. आप जानते हैं कि मिलन होगा ही और सब कुछ अच्छा हो जाएगा, लेकिन आप नायक-नायिका के बीच होने वाले संवाद को सुनने को उत्सुक रहते हैं. वे जब पहली बार एक दूसरे को छूते हैं, तब से फिल्म के अंत तक उनके रिश्ते में बच्चों की सी मासूमियत है.
‘हम आम आदमी हैं. मैंगो पीपल..और हमें अमर नहीं होना. हमें इसी जन्म में मिलना है और साथ रहना है.’ यह मौजूदा दौर की प्रेम कहानी है जो अगले जन्म के वादों के भरोसे यह पूरा जन्म अलग अलग बिताने को कतई तैयार नहीं. वह हीर रांझा या रोमियो जूलियट की तरह अमर होने की बजाय साथ रहने को ज्यादा जरूरी समझता है. मोबाइल और इंटरनेट के युग में हमारे रिश्तों में जो दोस्ती, प्यार और कमिटमेंट के बीच की दुविधाएं हैं, यह उन दुविधाओं की फिल्म है. इसमें आपसी सहमति से होने वाले ब्रेक अप हैं, उनको मनाने के लिए दी गई पार्टियां भी और फिर दूरियों से बढ़ने वाला प्रेम भी जिसे आजकल की आपाधापी भरी जिन्दगी भी मैला नहीं कर पाई है. यह युवाओं की फिल्म है जिसमें गजब की मिठास है.गौरव सोलंकी

Tuesday, August 4, 2009

भोर के बेरौशन जुगनू

(भाग- दो) श्रीकांत और मुझमें शेरों को लेकर अजीब तरह की खींचतान चलती रहती थी। श्रीकांत इस मामले में ज्यादा धनी था और शेरों की समझ और पसंद दोनों ही उसके विद्वान होने का भ्रम पैदा करती। वो शायर तो नहीं मगर श्रोता अच्छा था। मुझे शेर पसंद थे लेकिन वे मुझे याद नहीं रहते...दूसरी दिक्क़त थी कि मुझे सीधे समझ में आने वाले शेर ही पसंद पड़ते। इसलिये श्रीकांत अक्सर मुझे ट्रक के पीछे लिखे शोरों का हवाला देते हुए मेरी पसंद को थकी हुई बताता। मसलन, अकेला हूं सफ़र में कोई नहीं, दुल्हन सजी है बाराती कोई नहीं- या फिर – रहा गुलशन तो फूल खिलेंगे, रही ज़िंदगी तो फिर मिलेंगे- टाइप की लाइनें बोलकर मुझे शर्मिंदा करने की कोशिश करता। मेरी पसंद इतनी वाहियात नहीं थी...और कई बार मैं श्रीकांत को कड़ी टक्कर देने की कोशिश करता। इधर- उधर पढ़ी लाइनों को मैं श्रीकांत पर किसी हथियार की माफ़िक दे मारता। मुझे याद है एकबार रिपोर्टर ने हिंदूवादी संगठनों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से रुष्ट होकर सभा की। इसमें एक हिंदूवादी नेता ने वाजपेयी के लिए शेर की लाइनें पढ़ी थी और सभा को कवर करने गए रिपोर्टर ने उन्हीं पंक्तियों से अपने ख़बर की शुरुआत की थी। मैं फर्स्ट पेज पर जब उसकी ख़बर पढ़ी तो शेर की लाइनें श्रीकांत पर रोब ग़ालिब करने की मंशा से उसे पहुंच गया। लाइनें थीं- हद-ए-ग़म हस्ती से गुजर क्यों नहीं जाते, जीना नहीं आता तो मर क्यों नहीं जाते, मंजिल को अगर पाना है तो तूफ़ां भी मिलेंगे, डर अगर लगता है तो किश्ती से उतर क्यों नहीं जाते।
मेरे हिसाब से लाइनें बड़ी ख़ास थी लेकिन श्रीकांत ने सुनते ही तपाक से कहा कि – इसकी अगली लाइनें सुनाऊं क्या ?... मैने सोचा मजाक कर रहा है। लेकिन उसका प्रवचन जारी था... इन लाइनों में कैसे जीने- मरने की बात कही गई है, मेरी लाइनें सुनो...कैसे उसमें जीवन की बात है... अगर मैं वाजपेयी होता तो इन्हीं लाइनों से जवाब देता- मौसम को इशारों से बुला क्यों नहीं लेते, रूठा है तो उसे मना क्यों नहीं लेते, दीवाना है तेरा कोई ग़ैर नहीं, मचला है तो सीने से लगा क्यों नहीं लेते ?... मैं हैरान- परेशान होकर बगलें झांकने लगा।
उर्दू जुबान को लेकर श्रीकांत एक हद तक जुनूनी था। उसने उर्दू –हिंदी डिक्शनरी ले रखी थी जिसमें बेशुमार शब्द थे...। श्रीकांत बिहार से मेरठ आया था... लेकिन मैं पक्के तौर पर नहीं जानता कि शायरी का श़ौक उसे कबसे था। मेरठ में होने वाले मुशायरे में थोड़ी देर के लिए ही सही, मगर जाता था। एकबार मुझे भी जबरन ले गया। मैं तभी राजी हुआ जब मुझे मेरा कोटा उसने पिलवा दिया... नशे के आलम में मुझे सिर्फ इतना भर याद है कि कोई खूबसूरत –सी मोहतरमा थीं जो शायरी कर रही थीं या फिर जाने क्या कर रही थीं। दूसरे दिन, श्रीकांत ने मुशायरे का पूरा वाक़या सुनाया तो मुझे अपने नशे में होने का अफसोस हुआ। दरअसल, ये मुशायरा 1857 की क्रांति के सौ वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था, जिसमें नामीगिरामी शायरों के साथ गीतकार गोपालदास नीरज भी आए थे। लेकिन मुशायरे में मौके की मर्यादा का खास ख्याल नहीं रखा गया था...।
मेहमान-ए- खुसूसी के शमां रौशन करते ही संचालक ने ये कहते हुए एक शायरा को बुलाया कि हाज़रीन...अब ऐसी शायरा को बुला रहा हूं जो ख़ुद में ग़ज़ल हैं और उन्हें सुनिये कम और देखिये जियादा। शायरा जब मंच पर आईं तो उन्होंने संचालक को लक्ष्य करते हुए कहा कि फलां भाई मुझसे मजाक कर रहे हैं इसलिये उनके लिए एक शेर। शेर का मतलब था कि मुझे इठराती नदी मत समझना, समुंदर हूं, गिरोगे तो डूब जाओगे। ... इसे सुनकर संचालक ने उसका जवाब ऐसा दे दिया जिससे वहां सन्नाटा छा गया और मंच पर बैठे गोपालदास नीरज परेशां। कुछ झुंझलाहट में उन्होंने मंच से उठकर जाने की कोशिश की। ख़ैर संचालक महोदय ने तुरंत माइक पर कहा- नीरज साहब की तबियत अचानक नासाज हो गई है और वे तत्काल जाना चाहते हैं... लिहाजा, आप सब कहें तो नीरज साहब को तुरंत पढ़वाकर उन्हें होटल भेज दूं। सबने सोचा, ये बूढ़ा ऐसी महफिल में क्या कर पाएगा जहां इस गिरे स्तर की शायरी हो रही हो। ख़ैर... नीरज आए तो पहले एक शेर पढ़ा और उसका असर ये हुआ कि अगले दो घंटे तक अनवरत लोगों ने केवल उन्हें ही सुना। शुरू में कहा गया उनका शेर था- अब न वो साज, न वो सोज, न वो गाने रहे/ अब न वो दर्द, न वो दिल, न वो दीवाने रहे/ साक़ी, अब भी तू यहां किस लिये बैठा है/ अब न दो जाम, न वो मय, न वो पैमाने रहे।– भीड़ पागल हुई जाती थी और नीरज पूरे तरन्नुम में जारी रहे। ( जारी)

Sunday, August 2, 2009

...राखी तुम टीआरपी हो


(पुरखे कह गए कि नारी तुम श्रद्धा हो.. राखी के स्वयंवर पर सरसरी निग़ाह डाली तो विश्वास हो गया।...राखी के बहाने नारी चर्चा ः संजीव)
राखी तुम आसक्ति हो। राखी तुम विरक्ति हो।
राखी तुम फ़साना हो। राखी तुम हक़ीकत हो।
राखी तुम जीवन हो। राखी तुम नाटक हो।
राखी तुम नज़ीर हो। राखी तुम बेनज़ीर हो।
राखी तुम असली हो। राखी तुम नक़ली हो।
राखी तुम गंगाजल हो। राखी तुम काला जल हो।

राखी तुम उष्मा हो। राखी तुम ठिठुरन हो।
राखी तुम ताजा झोंका हो। राखी तुम तपिश हो।
राखी तुम हिंदी हो। राखी तुम उर्दू हो।
राखी तुम सच्चाई हो। राखी तुम शिगूफ़ा हो।
राखी तुम शर्मीली हो...राखी तुम विद्रोही हो।
राखी तुम सनातनी हो। राखी तुम बिंदास हो।
राखी तुम विवाद हो। राखी तुम निर्विवाद हो।
राखी तुम आम हो। राखी तुम ख़ास हो।
राखी तुम परंपरा हो। राखी तुम विद्रोह हो।
राखी तुम वर्तमान हो। राखी तुम भविष्य हो।
राखी तुम बेबाक हो। राखी तुम बे-बात हो।
राखी तुम मासूम हो। राखी तुम मौक़ापरस्त हो।
राखी तुम हिट हो। राखी तुम फ्लॉप हो।
राखी तुम समस्या हो। राखी तुम समाधान हो।
राखी तुम विश्वास हो। राखी तुम अविश्वास हो।
राखी तुम भरोसा हो। राखी तुम झूठ हो।
राखी तुम इस पार हो। राखी तुम उस पार हो।
राखी तुम आंसू हो। राखी तुम हंसी हो।
राखी तुम दर्शन हो। राखी तुम मिथ्या हो।
राखी तुम आग़ाज हो। राखी तुम अंजाम हो।
राखी तुम चतुर हो। राखी तुम मासूम हो।
राखी तुम जवाब हो। राखी तुम लाजवाब हो।
राखी तुम मिसाल हो। राखी तुम बेमिसाल हो।
राखी तुम सवाल हो। राखी तुम जवाब हो।

(अब कुछ नये तथ्य ः क्षमा याचनाओं के साथ)
राखी तुम बाईस्कोप हो। राखी तुम सिनेमास्कोप हो।
राखी तुम चढ़ता हुआ सेंसेक्स हो। राखी तुम टीआरपी हो।