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Tuesday, August 4, 2009

भोर के बेरौशन जुगनू

(भाग- दो) श्रीकांत और मुझमें शेरों को लेकर अजीब तरह की खींचतान चलती रहती थी। श्रीकांत इस मामले में ज्यादा धनी था और शेरों की समझ और पसंद दोनों ही उसके विद्वान होने का भ्रम पैदा करती। वो शायर तो नहीं मगर श्रोता अच्छा था। मुझे शेर पसंद थे लेकिन वे मुझे याद नहीं रहते...दूसरी दिक्क़त थी कि मुझे सीधे समझ में आने वाले शेर ही पसंद पड़ते। इसलिये श्रीकांत अक्सर मुझे ट्रक के पीछे लिखे शोरों का हवाला देते हुए मेरी पसंद को थकी हुई बताता। मसलन, अकेला हूं सफ़र में कोई नहीं, दुल्हन सजी है बाराती कोई नहीं- या फिर – रहा गुलशन तो फूल खिलेंगे, रही ज़िंदगी तो फिर मिलेंगे- टाइप की लाइनें बोलकर मुझे शर्मिंदा करने की कोशिश करता। मेरी पसंद इतनी वाहियात नहीं थी...और कई बार मैं श्रीकांत को कड़ी टक्कर देने की कोशिश करता। इधर- उधर पढ़ी लाइनों को मैं श्रीकांत पर किसी हथियार की माफ़िक दे मारता। मुझे याद है एकबार रिपोर्टर ने हिंदूवादी संगठनों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से रुष्ट होकर सभा की। इसमें एक हिंदूवादी नेता ने वाजपेयी के लिए शेर की लाइनें पढ़ी थी और सभा को कवर करने गए रिपोर्टर ने उन्हीं पंक्तियों से अपने ख़बर की शुरुआत की थी। मैं फर्स्ट पेज पर जब उसकी ख़बर पढ़ी तो शेर की लाइनें श्रीकांत पर रोब ग़ालिब करने की मंशा से उसे पहुंच गया। लाइनें थीं- हद-ए-ग़म हस्ती से गुजर क्यों नहीं जाते, जीना नहीं आता तो मर क्यों नहीं जाते, मंजिल को अगर पाना है तो तूफ़ां भी मिलेंगे, डर अगर लगता है तो किश्ती से उतर क्यों नहीं जाते।
मेरे हिसाब से लाइनें बड़ी ख़ास थी लेकिन श्रीकांत ने सुनते ही तपाक से कहा कि – इसकी अगली लाइनें सुनाऊं क्या ?... मैने सोचा मजाक कर रहा है। लेकिन उसका प्रवचन जारी था... इन लाइनों में कैसे जीने- मरने की बात कही गई है, मेरी लाइनें सुनो...कैसे उसमें जीवन की बात है... अगर मैं वाजपेयी होता तो इन्हीं लाइनों से जवाब देता- मौसम को इशारों से बुला क्यों नहीं लेते, रूठा है तो उसे मना क्यों नहीं लेते, दीवाना है तेरा कोई ग़ैर नहीं, मचला है तो सीने से लगा क्यों नहीं लेते ?... मैं हैरान- परेशान होकर बगलें झांकने लगा।
उर्दू जुबान को लेकर श्रीकांत एक हद तक जुनूनी था। उसने उर्दू –हिंदी डिक्शनरी ले रखी थी जिसमें बेशुमार शब्द थे...। श्रीकांत बिहार से मेरठ आया था... लेकिन मैं पक्के तौर पर नहीं जानता कि शायरी का श़ौक उसे कबसे था। मेरठ में होने वाले मुशायरे में थोड़ी देर के लिए ही सही, मगर जाता था। एकबार मुझे भी जबरन ले गया। मैं तभी राजी हुआ जब मुझे मेरा कोटा उसने पिलवा दिया... नशे के आलम में मुझे सिर्फ इतना भर याद है कि कोई खूबसूरत –सी मोहतरमा थीं जो शायरी कर रही थीं या फिर जाने क्या कर रही थीं। दूसरे दिन, श्रीकांत ने मुशायरे का पूरा वाक़या सुनाया तो मुझे अपने नशे में होने का अफसोस हुआ। दरअसल, ये मुशायरा 1857 की क्रांति के सौ वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था, जिसमें नामीगिरामी शायरों के साथ गीतकार गोपालदास नीरज भी आए थे। लेकिन मुशायरे में मौके की मर्यादा का खास ख्याल नहीं रखा गया था...।
मेहमान-ए- खुसूसी के शमां रौशन करते ही संचालक ने ये कहते हुए एक शायरा को बुलाया कि हाज़रीन...अब ऐसी शायरा को बुला रहा हूं जो ख़ुद में ग़ज़ल हैं और उन्हें सुनिये कम और देखिये जियादा। शायरा जब मंच पर आईं तो उन्होंने संचालक को लक्ष्य करते हुए कहा कि फलां भाई मुझसे मजाक कर रहे हैं इसलिये उनके लिए एक शेर। शेर का मतलब था कि मुझे इठराती नदी मत समझना, समुंदर हूं, गिरोगे तो डूब जाओगे। ... इसे सुनकर संचालक ने उसका जवाब ऐसा दे दिया जिससे वहां सन्नाटा छा गया और मंच पर बैठे गोपालदास नीरज परेशां। कुछ झुंझलाहट में उन्होंने मंच से उठकर जाने की कोशिश की। ख़ैर संचालक महोदय ने तुरंत माइक पर कहा- नीरज साहब की तबियत अचानक नासाज हो गई है और वे तत्काल जाना चाहते हैं... लिहाजा, आप सब कहें तो नीरज साहब को तुरंत पढ़वाकर उन्हें होटल भेज दूं। सबने सोचा, ये बूढ़ा ऐसी महफिल में क्या कर पाएगा जहां इस गिरे स्तर की शायरी हो रही हो। ख़ैर... नीरज आए तो पहले एक शेर पढ़ा और उसका असर ये हुआ कि अगले दो घंटे तक अनवरत लोगों ने केवल उन्हें ही सुना। शुरू में कहा गया उनका शेर था- अब न वो साज, न वो सोज, न वो गाने रहे/ अब न वो दर्द, न वो दिल, न वो दीवाने रहे/ साक़ी, अब भी तू यहां किस लिये बैठा है/ अब न दो जाम, न वो मय, न वो पैमाने रहे।– भीड़ पागल हुई जाती थी और नीरज पूरे तरन्नुम में जारी रहे। ( जारी)

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"अकेला हूं सफ़र में कोई नहीं, दुल्हन सजी है बाराती कोई नहीं- या फिर – रहा गुलशन तो फूल खिलेंगे, रही ज़िंदगी तो फिर मिलेंगे- टाइप की लाइनें बोलकर मुझे शर्मिंदा करने की कोशिश करता। मेरी पसंद इतनी वाहियात नहीं थी...और कई बार मैं श्रीकांत को कड़ी टक्कर देने की कोशिश करता। इधर- उधर पढ़ी लाइनों को मैं श्रीकांत पर किसी हथियार की माफ़िक दे मारता।"

मनोभावों को दर्शाती पोस्ट के लिए बधाई।

Bhuwan said...

मजेदार...

भुवन वेणु
लूज़ शंटिंग