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Monday, August 10, 2009

मासूम मुहब्बत और दुविधाएं- लव आजकल


समीक्षा पढ़कर किसी फ़िल्म या क़िताब के बारे में मैं कोई राय नहीं बनाता था... लेकिन तहलका पर नई फिल्म -लव आजकल- की समीक्षा अच्छी लगी। फिल्मों में आपकी दिलचस्पी हो तो पढ़ें और वक़्त मिले तो देखने का मशविरा भी दूंगाः संजीव

फिल्म समीक्षा
फिल्म लव आजकल
निर्देशक इम्तियाज अली
कलाकार सैफ अली खान, दीपिका पादुकोण

‘हम आम आदमी हैं. मैंगो पीपल..और हमें अमर नहीं होना. हमें इसी जन्म में मिलना है और साथ रहना है.’ यह मौजूदा दौर की प्रेम कहानी है जो अगले जन्म के वादों के भरोसे यह पूरा जन्म अलग अलग बिताने को कतई तैयार नहीं
इम्तियाज बॉलीवुड की अब तक की सबसे मासूम प्रेम-कहानियां बना रहे हैं और यह तब, जब उनके किरदारों के पास अभूतपूर्व खिलंदड़पना है. ओमकारा या कल हो न हो से कहीं अधिक लव आजकल के लिए सैफ को याद रखा जाएगा. यह ऐसी फिल्म है जिसे सैफ खास बना देते हैं और जो सैफ को और भी खास बना देती है. यह सिर्फ एक संयोग नहीं है कि इम्तियाज ने करीना और सैफ दोनों को उनके करियर की क़रीब क़रीब सर्वश्रेष्ठ फिल्में दी हैं. पिछले दशक की सतही प्रेमकथाओं से निकल कर हम भाग्यशाली समय में हैं कि ऐसी फिल्में देख पा रहे हैं. इम्तियाज के पास वास्तविक और मजेदार संवादों का ऐसा खजाना है कि आप हंसते और अभिभूत रहते हैं. दीपिका भी इतनी शोख और मुखर इससे पहले कभी नहीं दिखी. अगर आपने सोचा न था और जब वी मेट देखी है तो आपको पहले से ही पता होगा कि नतीजा क्या होगा? कहानी के कुछ हिस्से अलग परिस्थितियों में अलग ढंग से दोहराए जाते हैं और आप उन्हें हर बार पकड़ भी लेते हैं. साथ ही प्रीतम का मधुर संगीत है जिसके कुछ हिस्से इधर उधर से उठा लिए गए हैं. लेकिन तभी आप फिर से फिल्म में डूब जाते हैं क्योंकि कहानी वो तत्व नहीं है जो इम्तियाज की फिल्मों को इतना रोचक बनाती है. वह तत्व है उस कहानी को कहने का तरीका और उसके पीछे की ईमानदारी. आप जानते हैं कि मिलन होगा ही और सब कुछ अच्छा हो जाएगा, लेकिन आप नायक-नायिका के बीच होने वाले संवाद को सुनने को उत्सुक रहते हैं. वे जब पहली बार एक दूसरे को छूते हैं, तब से फिल्म के अंत तक उनके रिश्ते में बच्चों की सी मासूमियत है.
‘हम आम आदमी हैं. मैंगो पीपल..और हमें अमर नहीं होना. हमें इसी जन्म में मिलना है और साथ रहना है.’ यह मौजूदा दौर की प्रेम कहानी है जो अगले जन्म के वादों के भरोसे यह पूरा जन्म अलग अलग बिताने को कतई तैयार नहीं. वह हीर रांझा या रोमियो जूलियट की तरह अमर होने की बजाय साथ रहने को ज्यादा जरूरी समझता है. मोबाइल और इंटरनेट के युग में हमारे रिश्तों में जो दोस्ती, प्यार और कमिटमेंट के बीच की दुविधाएं हैं, यह उन दुविधाओं की फिल्म है. इसमें आपसी सहमति से होने वाले ब्रेक अप हैं, उनको मनाने के लिए दी गई पार्टियां भी और फिर दूरियों से बढ़ने वाला प्रेम भी जिसे आजकल की आपाधापी भरी जिन्दगी भी मैला नहीं कर पाई है. यह युवाओं की फिल्म है जिसमें गजब की मिठास है.गौरव सोलंकी

2 comments:

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

गौरव भाई पहले ये बताओ की आपने फिल्म की समीक्षा की है या फिल्म एवं सैफ का promotion किया है ? भाई किसी भी एंगल से ये फिल्म की समीक्षा नहीं लगती बल्की एक promotion लगता है | आप ही देखिये , आपके शब्द क्या बोलते हैं :

-> "इम्तियाज बॉलीवुड की अब तक की सबसे मासूम प्रेम-कहानियां बना रहे हैं" --> क्या हिंदी मैं इससे अच्छी और मासूम प्रेम कहानी नहीं बनी है ?

कहानी मैं क्या नयापन आपको दिख गया ? आज-कल हर हिंदी फिल्मों मैं अमेरिका, लन्दन, स्विट्जरलैंड ही दिखाया जाता है | वही इस movie मैं भी किया गया है |

आज-कल हर तीसरे movie मैं यही दिखाया जाता है की लड़के-लडकी सब कुछ करते हैं पर उन्हें प्रेम का पता ही नहीं होता | वाह कितने बोले भले हाँ आज-कल के किरदार , क्यों? जब लड़के या लडकी की शादी होने वाली रहती है तभी अचानक इनको प्रेम का पता चलता है | आने वाली फिल्मों मैं अब प्रेम का पता अगले जनम मैं ही लगेगा |

और भाई एक सुझाव दूंगा, तहेल्का को सब लोग जानते हैं की वो क्यों ऐसी review छपते हैं, उन्हें पैसा मिलता ही | आपको भी यदि ऐसा रेविएव लिखने मैं पैसा मिलता है तो जरुर लिखिए ... पर यदि पैसा नहीं मिलता है तो सोच समझ कर निष्पक्ष लिखिए | मैंने ये फिल्म कल ही देखि है .... there is nothing special in this movie.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत बधाई।