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Wednesday, August 19, 2009

जिन्ना के बहाने जसवंत का जलजला

बीजेपी ने अपने पार्टी नेता जसवंत सिंह को बाहर का रास्ता दिखा दिया। ये बहुत अप्रत्याशित नहीं है। लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद बीजेपी के भीतर सत्ता को लेकर जिस तरह की छटपटाहट देखी जा रही थी, ये उसी की परिणति है। पार्टी के बड़े नेता अपने ही दल के नेताओं के बीच सवालों के तीर से परेशान थे। जसवंत सिंह ने उन्हीं नेताओं में से एक थे जिन्होंने पार्टी नेतृत्व पर सवाल खड़ा किया... फिर पार्टी के संसदीय दल के नेता को लेकर असंतोष जाहिर कर चुके थे... ऐसे में जिन्ना पर लिखी उनकी क़िताब जैसे बहाना बन गई। पार्टी ने उन्हें बाहर करने में देरी नहीं की। अब उस जसवंत सिंह को पार्टी से निकालने का बीजेपी नेतृत्व का अंदाज जरा देखिये जो पार्टी में तीस वर्षों से थे... और वाजपेयी की सरकार में अहम जिम्मेदारियां उन्हें दी गई। जसवंत का दुख भी यही तो था कि जिस वाजपेयी सरकार में उन्हें हनुमान बताया जा रहा था... पार्टी ने उन्हें रावण की तरह बाहर कर दिया। पार्टी ने उनकी सदस्यता ख़त्म किये जाने को लेकर लोकतांत्रितक रवैया नहीं अपनाया। मसलन, कारण बताओ नोटिस जारी करना तो दूर उन्हें पहले तो फोन पर पार्टी की शिमला में होने वाली चिंतन बैठक में शामिल नहीं होने का निर्देश दिया गया...और जसवंत जब आखिरकार शिमला भी पहुंच गए तो उन्हें फोन पर ही उनके निष्कासन की सूचना भेज दी गई। दरअसल, बीजेपी का ये अंदाज भी नया नहीं है। जसवंत सिंह के निष्कासन से बीजेपी के भीतर लोकतांत्रिक ढांचे की पोल खोलता है। बीजेपी के साथ दिक़्कत ये है कि अपने हीरो को लेकर वो दिग्भ्रमित रही है। जैसे, कांग्रेस गांधी को मानती है... समाजवादी पार्टी लोहिया और बीएसपी डॉ.अंबेडकर को अपनी पार्टी का चेहरा मानती है। लेकिन बीजेपी के साथ दिक्कत ये है कि उसके पास ऐसे नेताओं की कमी है। डॉ.हेडगेवार, गोलवरकर जी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी सहित तमाम नाम ऐसे हैं जो मौजूदा दौर में बहुत ज्यादा जाने- पहचाने चेहरे नहीं हैं। ऐसे में बीजेपी को अगर अपने मुख्य विपक्षी कांग्रेस पर निशाना साधना हो तो गांधी पर साध नहीं सकते... क्योंकि लोगों को वो स्वीकार्य नहीं होगा। इसलिये पार्टी ने नेहरू का चयन किया। लेकिन बीजेपी में अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में ऐसा भी दौर आया जिसमें वाजपेयी नेहरू वाद के ज्यादा करीब दिखने लगे। पार्टी के कुछ नेताओं ने इसका रास्ता निकालते हुए जिन्ना की प्रशंसा करते हुए कांग्रेस को झुलसाने की कोशिश की। लेकिन बीजेपी जिन्ना को भी अपना हीरो नहीं मान सकती क्योंकि ये उसकी जड़ों को ही बर्दाश्त नहीं होगा और न ही इसकी स्वीकार्यता होती। सो, जसवंत की बलि चढ़ गई। अब देखिये कि जसवंत ने पहले ही साफ कर दिया उनकी क़िताब बीजेपी का दस्तावेज नहीं है। पुस्तक के विमोचन अवसर पर भी पार्टी का कोई नेता या विचारक नहीं था... वहां थे तो मार्क्सवादी आलोचक डॉ.नामवर सिंह, अधिवक्ता रामजेठमलानी और पत्रकार एम.जे.अक़बर। पार्टी ने भी जसवंत की किताब को उनका निजी विचार बताते हुए पल्ला झाड़ लिया था। फिर ऐसा क्या हुआ जो पार्टी को जसवंत से किनारा करना पड़ा? जिन्ना प्रेम ही अगर कारण है तो आडवाणी भी ये गुनाह कर चुके हैं।..पार्टी ने जसवंत को बाहर कर दिया लेकिन पार्टी के लिए सवाल अब भी ख़त्म हो गया क्या?... असल में पार्टी का सवालों से जी चुराने का यही रवैया मौजूदा राजनीति में उसके अप्रासंगिक होते जाने का बड़ा कारण है।

2 comments:

ramnandan said...

Mera khayal yah hai ki BJP ab barbaadi ke kagaar pe hai, iske logon ke paas dimag nahi hai ki kaise desh ke logon ka dil jeeta jae.A.B.Vajpayee jee ke Sanyas ke baad is party ka koi astitva nahi nazar aa raha hai.Har baar Ram mandir ko mudda banati hai aur chahti hai ki vote mile.Is party mein sirf buddhe log bache hue hain isliye yah party ab is desh ke logon ko nahi rijha pa rahi hai.Rajniti karna to koi Congress se sikhe.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

ये सब वोट बटोरने के हथकण्डे है।