Pages

Sunday, August 23, 2009

...बोलो वृंदावन बिहारी लाल की


मेरी मां और पिताजी बहुत दिनों के बाद हमारे यहां कुछ दिनों के लिए आए। उसके बारे में बाद में बताऊंगा। अभी जन्माष्टमी से ठीक एक दिन के बाद मां-पिताजी को उनकी काफी उत्सुकता और इच्छा को देखते हुए उन्हें लेकर वृंदावन, मथुरा और आगरा गया था। लाख मना करने के बावजूद गाड़ी का किराया बहाने से पूछकर पिताजी ने जबरन थमा दिया- 3200 रुपये। सुबह साढ़े आठ बजे बिना कुछ खाये- पीये ( चाय तक नहीं) मां- पिताजी, मैं और मेरी पत्नी के साथ दो छोटे- छोटे बच्चे, मेरा छोटा भाई और उनकी पत्नी के साथ बेटा और एक साला एक बड़ी गाड़ी में सवार होकर निकले। तक़रीबन साढ़े दस बजे हम वृंदावन में थे…। सुबह से ही छाये काले बादल दिल्ली की बजाय वृंदावन पहुंचते- पहुंचते पूरे तरन्नुम के साथ बरस रहे थे। शहर के बाहरी हिस्से में रमणरेती पुलिस चौकी के पास लंबे जाम को देखते हुए वहीं एक गली में गाड़ी खड़ी कर दी। बाहर बेतहाशा बारिश और सड़कों पर गाड़ियों और लोगों की भीड़ को देखते हुए मैने अनमने ढंग से पिताजी से कहा कि पहले मथुरा चलते हैं ..लौटती वक़्त में आ यहां जाएंगे... पिताजी हैरान हुए। बोले, बारिश ही तो हो रही है... एकबार आए हैं तो बिना दर्शन के नहीं जाएंगे। अनमने ढंग से जूते गाड़ी में उतारकर मूसलाधार बारिश के बीच सड़कों पर आ गए। घुटने- घुटने भर पानी और टूटी सड़कों के कारण तलवे के नीचे आने वाले ईंट- पत्थर... लेकिन पिताजी और मां को बड़े मजे में आगे बढ़ते देखा तो जैसे जोश आ गया... महिलाओं में अलग किस्म का जोश था। लेकिन मंदिर का पता नहीं होने के कारण कुछ देर ऐसे ही भटकते रहे... गाइड भी हमें बार- बार घेर रहे थे लेकिन परिवार के साथ परेशानी में फंसा हुआ देख दो सौ –तीन सौ मांग रहे थे। मैं दे भी देता... लेकिन पिताजी की मौजूदगी में इतना पैसा पानी में देने की हिम्मत नहीं थी। सो, बड़ी मुश्किल से एक ऑटोवाला नज़र आया... पूछा तो बोला सौ रुपये में मंदिर तक पहुंचा देगा। हमसब उसी में बैठ गए। बीच- बीच में देशी- विदेशी श्रद्धालुओं की भीड़ और गाड़ियों का रेला। मंदिर पहुंचते- पहुंचते ऑटो में सवार होने के बाद भी हमसब तरबतर हो चुके थे और बारिश की गति और भी तेज। ख़ैर। ऑटो वाले ने हमें जहां उतारा वहां से मंदिर जाने के लिए गलीनुमा सड़क है। वहां आसपास की दुकानें राधामय थीं। किसी भजनीक का भजन बज रहा था- राधे- राधे ...राधे बरसाने वाली राधे। पिताजी ग़ौर से सुनने लगे... हमसबको भी बेहद मधुर लगा। फिर घुटने –घुटने भर पानी में हम मंदिर की ओर बढ़ने लगे। बूढ़े, बच्चे और महिलाओं की भीड़ पर मूसलाधार बारिश का मानो कोई असर ही नहीं था।...सब तरफ बस राधे- राधे की गूंज थी... काफी मशक्कत के बाद हम मंदिर परिसर में आख़िरकार पहुंच गए। बेहद छोटे मंदिर में काफी दूर से ही दर्शन कर लिया... भीड़ के बीच में मैं मां- पिताजी को लेकर अंदर गया लेकिन बहुत आगे तक नहीं जा पाया... मंदिर से बाहर बरामदे की तरफ आने के समय मां-पिताजी के चेहरे दमक रहे थे...भीड़ के साथ- साथ मां- पिताजी भी हाथ उठाकर राधे- राधे का जयघोष कर रहे थे.... मां का भाव कुछ ऐसा था जो कुछ वर्षों पहले जब मैं उन्हें पहली बार ऋषिकेष लेकर गया था उस समय लक्ष्मण झूला पर खड़ी मां रोने लगी... मैं हतप्रभ। मां से पूछा तो जैसे मुंडी हिलाकर खोयी हुई मुद्रा में खड़ी रही... बगल में ले जाकर पिताजी ने बताया कि अपने इधर ये माना जाता है कि बेटा अगर तीर्थयात्रा पर ले जाए तो जनम सफल हो जाता है... इसलिये खुशी के मारे रो रही है। ...तो मित्रो, पिताजी- मां वृंदावन तो आए थे अपने पैसे से लेकिन इसका श्रेय आज भी हम दोनों भाइयों को देते हुए जैसे आशीर्वाद दे रहे थे। धर्म में मेरी वाक़ई आस्था नहीं है लेकिन वृंदावन आकर, मां- पिताजी के दमकते- चहकते चहरों को देखकर धर्म से इनकार करने को जी नहीं चाहता। उसी मूसलाधार बारिश में पिताजी ने वापस चलने की इच्छा भी जताई जिससे कि समय पर मथुरा भी पहुंच जाएं। सो, आनन- फानन में दोबारा जब सड़क तक पहुंचे तो कोई ऑटोवाला नहीं था। दुकान में किसी तरह सब लोग खड़े हो गए... सबको चाय पिलवाई और उनसब को चाय पीता हुआ छोड़कर मैं तक़रीबन एक किलोमीटर दूर तक ऑटो की तलाश में निकल गया। बड़ी मुश्किल से एक ऑटोवाला तैयार हुआ और उसे लेकर मंदिर तक आया। उसमें सवार होकर निकले तो सड़कों पर इतना पानी भर गया कि ऑटो के भीतर भी चलते समय पानी घुसने लगा... ऑटोवाले ने स्थानीय ब्रज की भाषा में बोला कि जमुना मैया आज इधर ही आ गई लगती है... उसी ने इशारे से दिखाया... नजदीक में ही यमुना बहती हैं।... फिर सौ रुपये देकर हम अपनी गाड़ी तक पहुंच गए। (जारी)

3 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा संस्मरण चल रहा है. जय हो-जारी रहिये.

गणेश-चतुर्थी की शुभकामनायें

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर एवं अच्छी जानकारी।
गणेश उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।

Bhuwan said...

बेहद भावनात्मक पोस्ट..