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Monday, August 24, 2009

बेहतर भविष्य के इंतज़ार में

भुवन के ब्लॉग -लूज़ शंटिंग - पर दीप्ति का ताजा पोस्ट पढ़ें... । इसके जरिये अपने आसपास... और समाज को महसूस करें - संजीव

नाम- इंतज़ार
उम्र- 15 साल (लगभग)
स्थानीय निवासी- उत्तर प्रदेश
फिलहाल बसेरा- पुरानी दिल्ली का एक रैन बसेरा
जब हम उससे और उसके साथियों से मिलने के लिए शैल्टर होम पहुंचे तो वो सभी बच्चे टीवी पर टॉम एण्ड जैरी देख रहे थे। असल में हम अपने आप में एक अनोखे बैंक को कवर करने के मक़सद से वहाँ पहुंते थे। इतंज़ार से जब मैं मिली तो सबसे पहली बात जो मैंने कही वो थी कि क्या नाम है, शानदार...
इंतज़ार, शादियों और पार्टियों में लाइट सिर पर उठाने का काम करता है। साथ-साथ वो एक बैंक का मैनेजर भी है। बैंक को वो बैंक नहीं बल्कि ख़ज़ाना कहता हैं। क्योंकि उनके इसे बैंक कहने पर भारतीय रिज़र्व बैंक को आपत्ति थी। इंतज़ार फ़िलहाल अपने इस व्यस्त दिनचर्या के साथ पढ़ाई भी कर रहा है। वो सातवीं क्लास में पढ़ता है। इंतज़ार से मिलने पर वो एक गंभीर और अपने भविष्य के प्रति सजग बच्चा लगता है। जब उससे बातचीत शुरु हुई तो मालूम चला कि वो अपने घर से भागकर दिल्ली आया था। वो इतना तो बताता है कि उसका घर उत्तर प्रदेश में है लेकिन, वहाँ कहाँ ये वो नहीं बताता है। न ही वो अपने माता-पिता का नाम बताने को तैयार है। भविष्य में इलैक्ट्रिशिय बनने के ख़्वाब संजोए इंतज़ार पहले एक नशेड़ी था। भयंकर नशा करना उसका रोज़ाना का काम था, वो जो भी कमाता था नशे में उड़ा देता था। ऐसे में उसका कई बार कई तरह से शोषण भी हुआ, जिसके बारे में खुलकर वो कुछ नहीं कहता है। इतंज़ार फिलहाल एक स्वयंसेवी संस्था बटरफ़्लाई के शेल्टर होम में रहता है। सरकारी रैन बसरे के एक कमरे का ये शेल्टर होम आज उसका घर है। इंतज़ार अकेला नहीं है, यहाँ उसके जैसे कुछ 40 बच्चे रह रहे हैं। ये सभी अपने घरों से भागकर दिल्ली आए हुए हैं। पुरानी दिल्ली रेल्वे स्टेशन के आसपास भटकते इन बच्चों को बटरफ़्लाई एक बेहतर ज़िंदगी देना चाहता हैं। इस शेल्टर होम में बच्चों को खाने-पीने से लेकर पढ़ाई तक की व्यवस्था है। यहाँ से बच्चों को स्कूल भेजा जाता है। उन्हें योग सिखाया जाता है। उनकी नशे और जुए जैसी लतों को दूर करने में मदद की जाती हैं। यहाँ काम करनेवाले बताते हैं दिल्ली भाग कर आनेवाले बच्चों की तादाद बहुत ज़्यादा है। पुरानी दिल्ली के आसपास एक ऐसा पूरा गिरोह काम करता है जो कि इन बच्चों का शोषण करता हैं और उन्हें पकड़कर बेच देता है। संस्था के एक सदस्य का कहना था कि यहाँ एक भी बच्चा ऐसा नहीं है जिसका शोषण न हुआ हो। यहाँ रह रहे बच्चे अलग-अलग राज्यों से है। ये बच्चे सालों तक अपनी असलियत छुपाकर रखते हैं। कितना भी पूछो घर का पता नहीं बताते हैं। कुछ अगर बता भी दे तो वापस नहीं जाना चाहते हैं। बेमक़सद घरों से भागे इन बच्चों के पास आज एक मक़सद हैं और वो है ख़जा़ना। ख़ज़ाना, का पूरा नाम चिल्डर्न डेवेलपमेंट ख़ज़ाना है। ये ख़जा़ना बटरफ़्लाई ने इन बच्चों के साथ मिलकर खोला है। इसमें बच्चे अपनी कमाई, अपनी बचत जमा करते हैं। महीने में 20, 30 या 50 रुपए अपने ही इस ख़ज़ाने में जमा करने वाले ये बच्चे इसे ख़ुद ही चलाते हैं। इनके शेल्टर होम में बाक़ायदा एक काउन्टर है। सभी के अकाउन्ट नंबर है और सभी के पास अपनी पास बुक है। ये पूरे मायनों में बैंक की तरह काम करता हैं। यहाँ पैसा जमा करनेवालों को ब्याज भी मिलता हैं। बटरफ़्लाई कि ये योजना बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने और फ़िजूलखर्ची से बचाने के लिए है। ख़ासकर नशे से बच्चों को दूर रखने के लिए। पास में पैसे न होने पर ये बच्चे नशा नहीं करते हैं। यहाँ रह रहा रोहित स्कूल जाता है और काम भी करता है। वो रोज़ाना दस रुपए ख़ज़ाना में जमा करता है, वो कहता है कि ऐसा करने से उसका भविष्य संवर जाएगा। गोपाल की उम्र कुछ 10 साल होगी। उसने फिलहाल ख़ज़ाना में 7 रुपए जमा करवाए है, वो बड़ी मासूमियत से बताता है कि जमा तो 27 थे लेकिन, उसने 20 रुपए चॉकलेट के लिए निकाल लिए। उत्तराखंड से भागकर आया गोपाल पायलट बनना चाहता है इसके लिए वो पैसे जमा करना चाहता है। ख़ज़ाना अपने आप में बहुत बेहतरीन पहल मालूम होती है। ये स्कीम फिलहाल भारत के 4 या 5 शहरों के साथ-साथ श्रीलंका, अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश और क़जाकिस्तान के कुछ शहरों में चल रही हैं। इसके चलते कई नौजवान अपने पैरों पर खड़े हुए हैं और एक बेहतर भविष्य की उम्मीद में बटरफ़्लाई इसे और आगे बढ़ाना चाहता हैं...

1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

मनोभावों को अच्छा बाँधा है।
बधाई!