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Thursday, August 27, 2009

तिमिर मिटाता एक दीप



तहलका में रेमन मैगसेसे पुरस्कार विजेता दीप जोशी के बारे में जानें -संजीव


देश की तस्वीर बदलने का सपना देखने और इस दिशा में जुनून के साथ काम करने वाले दीप जोशी को रेमन मैगसेसे पुरस्कार मिला है. अपनी धुन के पक्के इस मुसाफिर के सफर के बारे में बता रही हैं तुषा मित्तल
‘अगर मेरे हाथ में एक जादुई छड़ी होती तो मैं कुछ ऐसा करता कि विकास से जुड़े कामों की तरफ भी युवाओं का वैसा ही आकर्षण हो जैसा इंजीनियरिंग, मेडिकल या मैनेजमेंट जैसे विकल्पों की तरफ होता हैं’
इलाहाबाद में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते दीप जोशी जब उत्तराखंड में बसे अपने गांव जाते तो बस की लंबी यात्रा के दौरान अक्सर उनके मन में ख्याल आता, ‘पहाड़ के लोगों की जिंदगी में बदलाव लाने के लिए मैं अपनी पढ़ाई को किस तरह इस्तेमाल कर सकता हूं?’ 25 साल बाद इस सवाल का जवाब उनके लिए प्रतिष्ठित रेमन मैगसेसे पुरस्कार लेकर आया है. इस पुरस्कार को एशिया का नोबेल भी कहा जाता है. पुरस्कार के लिए नामों का चुनाव करने वाली ज्यूरी का कहना था कि भारत में ग्रामीण विकास के क्षेत्र में जोशी ने अपने संगठन प्रदान के जरिए जिस तरह से अपने दिल और दिमाग का इस्तेमाल किया है उसने गैर सरकारी संगठनों के आंदोलन को एक पेशेवर स्वरूप दिया है.
जोशी का बचपन उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के एक गांव में बीता. उनसे उनके बचपन के बारे में पूछिए और वो उन दिनों को याद करते हैं जब वो जंगल में पशुओं को चराने जाते थे और वहां से चूल्हे के लिए लकड़ियां इकट्ठी करके भी लाते थे. वो कहते हैं, ‘सुविधाएं नहीं होने पर भी वो जगह रिश्तों की आत्मीयता और जीवन की संपूर्णता से भरी-पूरी थी. हिमालय के पहाड़ों में जिंदगी कहीं ज्यादा समानतावादी थी मगर अब चीजें खराब हो रही हैं.’
इलाहाबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से 1972 में इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए जोशी ने अमेरिका की राह पकड़ी. यहां उन्होंने जाने-माने मैसेच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलजी में दाखिला लिया. 1977 में वो स्वदेश लौटे और पुणे स्थित एक गैरसरकारी संगठन में काम करने लगे. फिर एक दिन उनकी मुलाकात रजनीकांत और माबेल एरोल से हुई जो अमेरिकी डॉक्टर थे और स्थानीय लोगों को सामुदायिक स्वास्थ्य-कर्मी बनने के लिए प्रशिक्षित कर रहे थे. ये दोनों डॉक्टर पुणे के झमखेड़ इलाके पर खास ध्यान दे रहे थे जहां नवजात मृत्यु दर प्रति 1000 पर 60 थी जो राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा थी. जोशी कहते हैं, ‘जिस तरह से वे लोगों की मदद करने के लिए अपनी बुद्धि और भावनाओं का इस्तेमाल कर रहे थे उससे मुझे बेहद प्रेरणा मिली.’
जोशी ने महसूस किया कि अगर एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सके जो ज्यादा शिक्षित लोगों को जमीनी मुद्दों की तरफ खींच सके तो इस देश की तस्वीर बदल जाएगी. वो कहते हैं, ‘राज्य नियम बना सकता है और पैसा बांट सकता है मगर ये लोगों को गरीबी से बाहर नहीं निकाल सकता. राज्य को ज्यादा मतलब शक्ति से होता है. हम एक ऐसे माध्यम के जरिए विकास की उम्मीद किस तरह कर सकते हैं जिसको चलाने वाला ईंधन सत्ता हो. ये बुनियादी रूप से गलत धारणा है.’
फोर्ड फाउंडेशन से मिली डेढ़ लाख डॉलर की आर्थिक सहायता और आईआईटी और आईआईएम के पढ़े विजय महाजन की मदद से उन्होंने 1983 में प्रोफेशनल असिस्टेंस फॉर डेवलपमेंट एक्शन यानी प्रदान की स्थापना की. आज प्रदान भारत के 3000 गांवों के करीब 1.7 लाख परिवारों की जिंदगी बेहतर बना रहा है. इसकी सबसे सफलतम परियोजनाओं में से एक है आदिवासियों का एक पोल्ट्री कोऑपरेटिव. जोशी कहते हैं, ‘दस साल पहले अगर कोई मुझसे कहता कि आदिवासियों का पोल्ट्री कोऑपरेटिव एक दिन 60 करोड़ रुपये सालाना का टर्नओवर हासिल कर लेगा तो मैं खूब हंसता.’1983 में जब प्रदान शुरू हुआ था तो इसमें 100 से भी कम स्वयंसेवक थे. आज ये हर साल 70,000 से भी ज्यादा छात्र स्वयंसेवकों को अपनी तरफ खींचता है. भविष्य के बारे में जोशी कहते हैं, ‘अगर मेरे हाथ में एक जादुई छड़ी होती तो मैं कुछ ऐसा करता कि विकास से जुड़े कामों की तरफ भी युवाओं का वैसा ही आकर्षण हो जैसा इंजीनियरिंग, मेडिकल या मैनेजमेंट जैसे विकल्पों की तरफ होता हैं.’

3 comments:

Ram said...

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संगीता पुरी said...

विकास से जुड़े कामों की तरफ भी युवाओं का वैसा ही आकर्षण होना चाहिए .. इंजीनियरिंग, मेडिकल या मैनेजमेंट जैसी डिग्री लेने के बाद भी वे विकास से जुडे काम कर सकते हें .. पर युवाओं में नैतिक मूल्‍यों की घोर कमी होते जाना ही इसका मुख्‍य कारण है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

श्री दीप जोशी जी के बारे में जान कर अच्छा लगा।