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Thursday, August 27, 2009

...मेरे महबूब कहीं और मिलाकर मुझसे उर्फ ताज़


वृंदावन से हमलोग मथुरा की तरफ जाने लगे। रास्ते में ड्राईवर ने हमें पूछा कि मथुरा चलें या फिर आगरा ?... हालांकि उसने बताया कि पहले आगरा ही चलें क्योंकि वहां ताजमहल में साढ़े छह बजे तक ही प्रवेश मिल पाएगा... और लौटती समय में मथुरा में शाम की आरती तक यहां पहुंच जाएंगे। हमें उसका आइडिया पसंद आया और हम सीधे आगरा की तरफ निकल लिये... रास्ते में एक जगह लिखा मिला बरसाना 12 किलोमीटर। ख़ैर। रास्ते में ड्राईवर ने एक हरियाणवी गाना लगा दिया जो पॉप अंदाज में गाया गया है- आ बैठ बुलेरो में... सपेशल तेरी ख़ातिर लाया।... पिताजी के कहने पर गाना बंद भी करा दिया। आगरा पहुंचने से काफी पहले अंदाजा मिल गया कि हम जल्द ही पहुंचने वाले हैं... हर जगह जैसे ताजमहल का नजारा था। एक गुरुद्वारानुमा सफ़ेद इमारत देखी जिसमें ताजमहल जैसी गुंबदें बुलंद थीं। आगरा की ज़ामा मस्ज़िद। ...आगरा के जर्रे- जर्रे पर जैसे ताज का अक्स था। ताज़ को लेकर दिल में एक जमाने से तरह- तरह के ख़यालात थे... ताज़ को मैने कभी इतिहास के नज़रिये से देखा तो कभी फिल्मों के नजरिये से... कभी दुनिया के सात आश्चर्यों में शामिल ताज को उसी अंदाज में देखने की कोशिश की तो कभी वहां होकर आए सैलानियों की जुबानी सुनी।... सबने उस्ताज जाक़िर हुसैन की तर्ज पर जैसे कहा हो- वाह ताज़। हर तरफ ताज की संगमरमरी खुबसूरती की तारीफ़ सुनी... लेकिन मैं ताज को लेकर साहिर के ख़यालात से ख़ुद को नज़दीक पाता रहा... पहला ऐसा इंक़लाबी शायर जिसने ताज को नये नज़रिये से देखने की कोशिश की... पहली बार मुहब्बत की इमारत कहे जाने ताज़महल की तस्वीर पर लगी पैबंदों की शिनाख़्त की। आपको याद हो न हो...साहिर साहब की नज़्म- ताजमहल- की इन पंक्तियों को दोबारा ताज़ा करें- ताज तेरे लिये इक मज़हरे- उल्फ़त ( प्यार का प्रतिमान) ही सही/ तुझको इस वादी-ए- रंगीं से अक़ीदत ही सही/ मेरे महबूब कहीं और मिलाकर मुझसे/बज़्म- ए- शाही में ग़रीबों का ग़ुज़र क्या मानी/ सब्त जिस राह पे हों सतवते शाही के निशां/ उसपे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मानी/ मेरे महबूब पसे- पर्दा-ए- तशहीरे- वफ़ा तूने/ सतवत के निशां को तो देखा होता/मुर्दा शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली/ अपने तारीक-मकानों को तो देखा होता/ अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्‍बत की है/ कौन कहता है सादिक़ न थे जज़्बे उनके/ लेकिन उनके लिए तशहीर का सामान नहीं/ क्‍योंकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे/ ये इमारतो-मकाबिर, ये फ़सीलें, ये हिसार/ मुतलक-उल-हुक्‍म शहंशाहों की अज़्मत के सुतूं/ दामने-दहर पे उस रंग की गुलकारी है/ जिसमें शामिल है तेरे और मेरे अज़दाद का खूं/ मेरी मेहबूब, उन्‍हें भी तो मुहब्‍‍बत होगी/ जिनको सन्‍नाई ने बख्‍शी शक्‍ले-जमील/ उनके प्‍यारों के मक़ाबिर रहे बेनामो-नुमूद/ आज तक उन पे जलाई ना किसी ने कंदील/ये चमनज़ार, ये जमना का किनारा, ये महल/ ये मुनक्‍क़श दरोदीवार, ये मेहराब, ये ताक़/ इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर/ हम ग़रीबों की मुहब्‍बत का उड़ाया है मज़ाक़/ मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझे। ... गाड़ी के ड्राईवर ने हमसबको ताजमहल के मुख्यद्वार के आगे चौराहे पर उतारा और हम रिक्शे में नहीं बैठे... बैटरी से चलने वाली उस गाड़ी में भी नहीं बैठे जिसपर ज्यादातर विदेशी बैठे थे...हम सब एक ऊंट गाड़ी में बैठे जिसे देखते ही मेरा बेटा स्वप्निल और भतीजा अमर्त्य...दोनों एकसाथ कैमल- कैमर का शोर मचाते हुए मचल उठे थे। सबको बिठाकर पिताजी के साथ मैं और छोटे भाई का साला चंदन... खरामा –खरामा ताजमहल की ओर चल पड़े...। (जारी)

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बेहतरीन यात्रा संस्मरण रहा।
बधाई!

Suman said...

मेरे मेहबूब कहीं और मिला कर मुझे।