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Monday, September 28, 2009

आस्था के चटख रंग


बंगाल में विजयदशमी के दिन शादीशुदा महिलाएं सिंदूर खेला में हिस्सा लेती हैं... बंगाल की ये परंपरा आस्था के रंगों में पगी होती है।

Sunday, September 27, 2009

...काली बिल्ली ने आख़िरकार हमारा रास्ता काट दिया

शाम लगभग सात बज चुके थे... मैं अपने एक और रिश्तेदार के साथ वापस दिल्ली जाना चाहता था लेकिन डॉक्टर ने कहा कि डायलिसिस होगा...अभी, इसी वक़्त। उन्हें स्ट्रेचर पर ले गया। वहां 120 रुपये की पर्ची कटाने के बाद तत्काल डायलिसिस कर दी गई। लगभग एक घंटे बाद मरीज़ को वापस ले जाते समय एक डॉक्टर ने कहा कि डिपार्टमेंट के हेड डॉ.विवेकानंद झा आपको याद कर रहे हैं... मैं इस डर से झिझकते हुए गया कि पता नहीं फिर बेवजह डांटना न शुरू कर दे...लेकिन बेहद ज़हीन किस्म के डॉ.झा ने जाते ही बताया कि आपके अखबार के एक साथी का फोन आया था...मैने मरीज को देख लिया है लेकिन ये हमारे डिपार्टमेंट का मामला नहीं है...आप उन्हीं अखबारी साथी से कहो कि हड्डी वाले डॉक्टर से आपको मिलवाएं...क्योंकि किडनी फिलहाल ठीक है। थोड़ा संतोष हुआ और उसी रिपोर्टर को फोन करके पूरी बात बताई। उसने भरोसा दिया कि अब आप सेफ हैं...हेड की निगाह में आपका केस आ गया है तो आप किस्मतवाले हैं...यहां किसी भी दूसरे मरीज़ का ऐसा नसीब नहीं होता है कि हेड खुद उसके बारे में जांच- पड़ताल करे। मैने उनसे गुजारिश की कि भाई एक वार्ड तो दिलवा ही दो... स्ट्रेचर पर भला कैसे मरीज को रखा जा सकता है क्योंकि इलाज लंबा चलना है...उसने कहा कि यहां यही मुश्किल है... वार्ड नहीं मिल सकता...आपको उसी तरह काम चलाना होगा...पीजीआई में ढाई सौ बेड हैं लेकिन मरीजों की संख्या नौ सौ के आसपास है, भला कैसे वार्ड मिलेगा। ( वे ऐसा ब्यौरा दे रहे थे जो गाहे- बगाहे हेथ बीट की रिपोर्टिंग करते समय अपने अखबार में छापते भी रहे होंगे)... मैने उससे बात करने के बाद उस रिपोर्टर के बॉस से बात की जो मेरे परिचित पत्रकार हैं... बेहद मानवीय और संवेदनाओं से भरे। खुद अखबारी व्यस्तताओं के कारण वे आ नहीं पाए थे लेकिन फोन पर लगातार जानकारी ले रहे थे। उनसे बताया कि सर, जरा रिपोर्टर से कहकर वार्ड तो दिलवा दें। उन्होंने तुरंत रिपोर्टर से बात की और रिपोर्टर का फोन दन्न से मेरे पास। उसने बताया कि उसकी बात हो गई है फलां डॉक्टर से...आप उनसे मिल लो। मरीज को स्ट्रेचर सहित इमर्जेंसी में पहुंचाने के बाद मैं भागा- भागा उस डॉक्टर के पास वार्ड के इंतजाम के लिए गया। डॉक्टर ने साफ कर दिया कि उनके डिपार्टमेंट का केस ही नहीं है इसलिये यहां बेड नहीं मिल सकता... फिर उसी रिपोर्टर को फोन मिलाकर पूरी बात बताई तो उसने कहा कि किडनी का मामला है इसलिये हड्डी वार्ड में कैसे बेड मिल सकता है?...खैर मैं ऊब चुका था...सो, मरीज के पास आ गया। वहां देखा तो ससुर जी स्ट्रेचर पर बेहोशी की हालत में पड़े थे और मेरी सास अनवरत खड़ी... क्योंकि वहां मरीजों के तीमारदारों के बैठने की कोई जगह नहीं थी। वहां मौजूद दूसरे मरीजों के तीमारदार भी या तो खड़े थे या प्लास्टिक की अपनी स्टूल ख़रीद लाए थे।
मैं फिर वापस दिल्ली लौटने की बात सोचने लगा...चूंकि एक दिन की ही छुट्टी ली थी इसलिये रुकना थोड़ा मुश्किल हो सकता था। फिर एक डॉक्टर साहब आए और उन्होंने कहा कि अभी के अभी मरीज़ का यूरिन, ब्लड टेस्ट के साथ ईसीजी होगा। मैने उनसे कहा कि साहब कल नहीं हो सकता है क्या... उन्होंने पूछा अभी क्यों नहीं... मैने कहा कि मरीज के साथ कोई होगा नहीं और मैं दिल्ली वापस हो रहा हूं। डॉक्टर ने बिफरते हुए कहा कि मरीज को भी साथ ले जाओ...मेरे को क्या है...एक डेथ सर्टिफिकेट ही तो बनाना है। सुनते ही मैने डॉक्टर की तरफ ख़ामोश रहने का इशारा करते हुए युरिन टेस्ट के लिए पिशाब की थैली का नॉब ढूंढ़ने लगा जिससे कि शीशी में युरिन का नमूना लिया जा सके। पंद्रह मिनट की कोशिशों के बाद भी थैली नहीं खुली... मेरे साथ और भी लोगों ने कोशिश की लेकिन नतीजा नहीं निकला... फिर मैने उसी डॉक्टर की तरफ असहाय मुद्रा में देखते हुए गुहार लगाई ...बार- बार कहा कि सिर्फ बता भर दें... लेकिन डॉक्टर ने नहीं सुनी। एक नर्स आती दिखी...उनसे कहा तो उसने मुझे कंधे से हटाते हुए अपने रास्ते निकल गई। मैं दोबारा आकर नमूना लेने के लिए थैली में नॉब ढूंढ़ने लगा। आसपास के तीमारदारों को आग्रह किया लेकिन वे सब पहले ही इतने दुखों के मारे थे कि दुनिया से बेजार मुद्रा में देखते रहे। ख़ैर...बड़ी कोशिशों के बाद जब नॉब मिला तो मेरी बेवकूफी से थैली से पिशाब का फौव्वारा निकलने लगा... जबतक संभालता, फर्श पर काफी बिखर चुका था। खैर हमने नमूना लेकर युरिन दे दिया... खून का नमूना भी डॉक्टर साब दे चुके थे उसे भी जमा कराया... और वापस आकर मरीज को ईसीजी के लिए ले गया... वहां भी दिक्क़त ज्यादा नहीं हुई और आधे घंटे में तीनों काम निबटाकर वापस आ गया।...लेकिन मरीज़ की बेहोशी नहीं टूटी... उनका बुखार दुगुना लग रहा था... डॉक्टर जब आया तो थर्मामीटर लगाकर देखा... तपतपाते शरीर में चार डिग्री बुखार निकला। उन्होंने दवा दे दी तो मेरी सास ने अपनी चिंता छोड़ते हुए मुझसे और मेरे साथ के और लोगों से खाना खा लेने की ज़िद करने लगीं। सबने बारी- बारी से बाहर निकलकर खा लिया तो मैं भी एक और रिश्तेदार के साथ हॉस्पिटल से बार ढाबे में खाने पहुंचा। रेट लिस्ट देखा तो हैरानी हुई... पचास रुपये में दाल –रोटी। हम दो आदमी थे और सौ रुपये का टोकन लेकर खाना खा लिया। ढाबे पर मौजूद लोगों की थाली भरी-पूरी थी... कहीं चिकन कराही और किसी थाली में दूसरे नॉनवेज आइटम। महंगा ढाबा होने के बाद भी लोगों की भीड़ इतनी कि बामुश्किल हमें जगह मिली तो हमने जल्दी- जल्दी खाकर निबटाया। वापस आने लगे तो सामने सड़क पर काली बिल्ली मिली... उसे देखकर मेरे कदम ठिठके... थोड़ी देर बाद जब दोबारा जाने लगा तो पता नहीं कहां से उसी काली बिल्ली ने आकर मेरा रास्ता काट दिया... मैं आशंका से भरा हुआ अस्पताल में दाखिल हुआ। (जारी)

Friday, September 25, 2009

...मेहरबानी करके पत्रकार साथी न पढ़ें

(अगर आप पेशे से पत्रकार हैं या फिर डॉक्टर हैं तो इस पोस्ट को कतई न पढ़ें। सबसे पहले पत्रकार। मुझे अहसास हुआ है कि हम सब एक ऐसी सुविधाजनक दुनिया में जी रहे हैं जहां यूटोपिया जैसी स्थिति है... वहां कोई बीमार नहीं पड़ता, कोई नहीं मरता, वहां कोई दुखी नहीं है,, उनके साथ कोई होनी- अनहोनी नहीं होती, हम किसी ( ऊपरवाले भी) से नहीं डरते.. अगर उनके नाते- रिश्तेदार दुखी हैं, मुफलिसी में हैं, मुश्किल में हैं... जरूरतमंद हैं तो हम पत्रकार उन्हें उनके दुखों के साथ छोड़कर वापस अपनी हंसती- खिलखिलाती दुनिया में आ जाते हैं... क्योंकि जीना- मरना दुनिया का नियम है।..इसलिये ऊपरवाले से दुआ मांगें कि आपका कोई जानने वाला पत्रकार न हो ...अगर हो भी तो उससे कभी किसी भी मोड़ पर मदद मांगने की जरूरत न पड़े...और अगर जरूरत पड़े भी तो उनसे मदद मांगना मत। हां, डॉक्टर भी न पढ़ें क्योंकि जन्म और मृत्यु उनके लिए एक कागजी दस्तावेज भर है, जिसपर वे अपनी ग़ैर जज्बाती कलम से दिन और तारीख भर देते हैं.)
मित्रों, अभी मेरे एक रिश्तेदार सख़्त बीमार हुए... पहले बिहार के मुजफ्फरपुर में उनका ऑपरेशन हुआ और बाद में पटना में। दिक्कत ये हुई थी कि मरीज़ जो थे वे पोलियो अभियान के लिए साईकिल से जा रहे थे, गिर पड़े। पता चला कि कूल्हे की हड्डी टूट गई। डॉक्टर भी हैरान... साईकिल से गिरने भर से हड्डी टूट जाए। टेस्ट कराया और ऑपरेशन कर दिया। ऑपरेशन तो सही हुआ लेकिन दूसरी समस्या डॉक्टर ने बता दी कि किडनी डैमेज हो गया है। दस –पंद्रह दिनों में कई बार डायलिसिस भी कराया...अंत में पटना के लिए रेफर कर दिया। पटना में डॉक्टरों की हड़ताल के दौरान पीएमसीएच की बजाय उन्हें नालंदा मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। वहां के डॉक्टरों ने इन दो रोगों का इलाज करते- करते बता दिया कि फेफड़े में पानी चला गया है और इसका इलाज चंडीगढ़ में ही संभव है। मुझे सूचना दी गई... चंडीगढ़ पीजीआई में मैने अपने सोर्स भिड़ाए। वहां एक वरिष्ठ पत्रकार मेरे जानने वाले हैं...उन्होंने तसल्ली दी कि यहां भर्ती करा दिया जाएगा। मैने भी पटना सूचना दे दी और तीसरे ही दिन वे लोग पटना से राजधानी एक्सप्रेस में सवार होकर दिल्ली पहुंच गए। दिल्ली में एंबुलेंस लेकर मैं अपने एक और रिश्तेदार के साथ मौजूद था। स्ट्रेचर पर उन्हें ट्रेन से उतारकर एंबुलेंस तक लाया... वहां मेरी पत्नी ने उन्हें देखा तो अवाक रह गईं... मेरे ससुर के छोटे भाई हैं..यानी मेरी पत्नी के चाचा। दाढ़ी बढ़ी हुई...आंखों के चारों तरफ कालिमा....बदरंग चेहरा। लेकिन फिर भी जीने की एक उम्मीद लिये शून्य को निहारते रहे। उनकी पत्नी और छोटे भाई का परिवार भी साथ आया था। हम सबलोग एंबुलेंस में सवार होकर चंडीगढ़ पीजीआई पहुंचने वाले थे उससे पहले चंडीगढ़ के अपने परिचितों को फोन किया...उन्होंने अपने एक रिपोर्टर का मोबाइल नंबर दिया और भरोसा दिलाया कि अस्पताल के गेट पर मिल जाएगा। हम हैरान- परेशान होकर दोपहर तक़रीबन दो बजे पीजीआई में पहुंचे।
वहां का नजारा देखकर हिल गए। बाहर भीड़ लगी थी और लोगों के बीच स्ट्रेचर के लिए मारामारी मची थी। एंबुलेंस वाला जल्दी मचा रहा था, उसे दिल्ली वापस लौटना था। एक स्ट्रेचर पर एक महिला मरीज सोई थी और उसके पास एक गाड़ी लगी तो मुझे लगा कि मरीज़ को उतारने के बाद स्ट्रेचर खाली हो जाएगा। सो, मैं लपका। लेकिन मेरे जो रिश्तेदार दिल्ली से मेरे साथ गए थे उन्होंने इशारों में बताया कि लाश है... स्ट्रेचर के पास महिला का पति सिसकियां भर रहा था और महिला की लाश स्ट्रेचर पर पड़ी थी। ख़ैर, मैने उस रिपोर्टर को फोन मिलाया तो उसने कहा कि दो मिनट में आ रहा हूं ...इसी बीच आधे घंटे की मशक्कत के बाद हम एक स्ट्रेचर हासिल करने में सफल हुए और अपने मरीज को लेकर अंदर जाने लगे तो गेट पर रोक दिया गया... दो लोगों से ज्यादा नहीं।
फिर ख्याल आया कि रिपोर्टर को फोन मिलाऊं....उसने फिर कहा कि दो मिनट में आ ही रहा हूं। मैने बताया कि बामुश्किल अंदर आ पाया हूं... अगर जल्दी आकर इलाज शुरू करा सको तो बेहतर। विश्वास मानिये, ( कसम खाकर कहता हूं) लगभग सवा घंटे के बाद रिपोर्टर साहब जबतक नामूदार हुए तबतक हम इमर्जेंसी में किसी तरह अपने मरीज को लेकर घुसने में कामयाब हो गए। रिपोर्टर का फोन आया तो सामने खड़ा था। मुझे तसल्ली हुई कि अबतक हुई फजीहत ख़त्म ...इनका रोज हस्पताल आना- जाना होगा इसलिये इलाज तो कम- से- कम फौरन शुरू हो ही जाएगा। वजह ये थी कि मरीज की हालत कुछ ज्यादा ही ख़राब होने लगी थी, लंबी यात्रा की वजह से। रिपोर्टर साहब मुझे वहां रिस्पेशन के भीतर ले गए और एक साहब ( उस आदमी को ज़िंदगी में दोबारा देखने की इच्छा नहीं है) से परिचय कराया। साहब का ठाठ इतना कि उन्होंने न तो मेरी ओर नजर उठाने की जहमत उठाई और मेरा बढ़ा हुआ हाथ उनके हाथ की बाट जोहता दोबारा पैंट की जेब में चला गया... उन्होंने देखा... मगर बहुत देर के बाद। हाथ मिलाना तो खैर। इसके बावजूद रिपोर्टर साहब बार- बार कहते रहे कि आपकी हर समस्या से फलां साहब सुलझा देंगे और अब आप आराम से मरीज के आसपास रहिये...कई डॉक्टरों को फोन किया है...सबके सब आते ही होंगे। मैं मरीज के पास आया तो वहां उनकी पत्नी और भाई खड़े मिले। एक डॉक्टर ने दवा की एक पर्ची पकड़ाई ...मैं फौरन से पेश्तर उसे अंदर के मेडिकल स्टोर ले लाकर मरीज के पास इस उम्मीद में खड़ा हो गया कि अब इलाज तो शुरू हो जाए। आसपास गुजर रहे कई डॉक्टरों से आग्रह किया लेकिन जबतक मेरी बात पूरी होती, डॉक्टर कई बेड बाद नजर आता। मेरे जैसे परेशां तीमारदार कई थे। ख़ैर दो घंटे बाद एक डॉक्टर फिर आया...मैने गलती ये की कि उससे शिकायत कर बैठा कि एक डॉक्टर साहब ने ये दवा लाने दी थी लेकिन तब से वे दिखे ही नहीं। डॉक्टर साहब फायर हो गए... कहने लगे कि क्या समझते हो कि डॉक्टर दवा मांगकर कहीं भाग गया?... माइंड योअर लैंग्वेज..मैन। मैं खामोश रहा और डॉक्टर साब गुस्से के मारे वहां से चले गए... उन्होंने भी दवा नहीं दी। दस मिनट बाद एक और डॉक्टर जब आया तो मैंने या किसी ने भी उनसे कुछ नहीं कहा। उन्होंने बड़ी खामोशी से दवा दे दी और चले गए। (जारी)

Sunday, September 13, 2009

नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की




शाम हो चुकी थी जब हम ताजमहल को देखने के बाद मथुरा की ओर चले... रास्ते में एक जगह आगरा का मशहूर पेठा लिया...एक चौराहे पर बड़ी –सी दुकान में। फिर बारिश शुरू हुई तो मथुरा तक अनवरत बरसती रही। दिल्ली- मथुरा रोड पर अंदेरे में जुगनुओं की तरह दिखने लगा तो अंदाजा मिल गया कि मथुरा आ गए... मथुरा की रिफाइनरी में लगी लाइटें रात के अंधेरे में रौशन होने वाले जुगुनू की तरह ही दिखते हैं। और जल्द ही हम मथुरा में मंदिर के आसपास पहुंच गए... बारिश थोड़ी थम गई। हम भीगते- भीगते ही मंदिर की तरफ चल निकले... दो- चार मिनट पहले ही आरती ख़त्म हो गई थी और देशी- विदेशी श्रद्धालुओं का रेला उधर से आता दिखा। हम मंदिर के गेट पर पहुंचे...द्वार पर सैकड़ों साल पहले की डिजाइन की तरह ही दो द्वारपाल अंकित हैं और दरवाजा भी परंपरागत डिजाइन का दिखा। वहां सिक्योरिटी चेकिंग के लिये हमें वहां रोक दिया गया। तसल्ली से तलाशी ली गई... थोड़ी बदमतमीजी से पेश आए यूपी पुलिस के जवान... शर्ट के भीतर अपना पहचान पत्र डाले था... जब ज़िद की तो वो भी निकाल दिया... प्रेस का कार्ड देखकर उसने थोड़ी मेहरबानी की और जाने दिया। अंदर गया तो मंदिर से लगती हुई मस्जिद दिखी... खैर हम अंदर गए तो महामाया देवी की मूर्ति देखी... वहां से जन्मभूमि की तरफ और श्रद्धालु जा रहे थे तो हम भी भूलभूलैया जैसे रास्ते से खोह में बने श्रीकृष्ण जन्मभूमि स्थल पर पहुंचे... मैं अवाक रह गया। ये वास्तव में ये कंस की जेल ही नहीं उस स्पेशल सेल की तरह है जिसमें असाधारण किस्म के कैदी उस ज़माने में रखे जाते होंगे। अंदर दीवारों पर अंकितम चित्रों पर यहां का महात्म दिखाया गया है और श्रीकृष्ण के जन्म की कहानी गाइड वगैरह श्रद्धालुओं को समझा रहे थे। मैं ये सोचकर जैसे अभिभूत हो गया कि नंदलला का जन्म यहीं हुआ होगा। पूरे परिवार ब़ड़ी देर तक जड़वत बने रहे। ...थोड़ी देर बाद हमसब ऊपर आए। वहां कुछ देर मंदिरों में घूमने के बाद औरतों ने कुछ ख़रीदारी भी की। वहां चाक- चौबंद सुरक्षाकर्मियों को भी देखा।... वहां से हम सबलोग दोबारा वहां आए जहां गाड़ी खड़ी की थी... वहीं एक दुकान से मथुरा के पेड़े ख़रीद लिये ...भरपूर। अब गाड़ी में दोबारा बैठे और दिल्ली की तरफ हमारा कुनबा निकल लिया... घड़ी देखी ठीक बारह बजे थे। एक ढाबे पर गाड़ी रुकवाकर हम सबका भोजन हुआ... काफी महंगा था खाना। ढाबे पर काम करने वाले स्टाफ ने हमें बंगाली समझ लिया तो एक ने पूछा- दादा- दादा भात खाबो ? ..मैने उसे डपटकर कहा कि तू बिहारी है का रे ?...वो खींसे निपोरने लगा...यानी वो भी समझ गया और मैं भी। बड़े प्रेम से खाना खिलाया...। पौने बजे के आसपास हम दिल्ली की ओर निकल पड़े... तीन बजे भोर में हम दिल्ली पहुंचे... रास्ते भर गीत सुनते आए- राधे- राधे –राधे बरसाने वाली राधे... श्रीराधे- राधे बरसाने वाली राधे।

Tuesday, September 8, 2009

एक अश्रु मोती... समय के गाल पर



हम ताजमहल की झलक पाते उससे पहले ही दर्शकों की लंबी लाइन दिखी… काले घने बादल। शाम चार बज चुके थे और छह बजे ताजमहल का द्वार दर्शकों के लिए बंद हो जाता है। लाइन लंबी थी इसलिये हम उम्मीद छोड़ चुके थे कि हम ताजमहल को देख सकेंगे। ख़ैर जैसे- तैसे टिकट कटाकर हम पूरे परिवार लाइन में लग गए....मगर आसपास घूम रहे दलालों ने हमें परेशां कर दिया। ये दलाल ताजमहल में तुरंत प्रवेश के नाम पर डेढ़ सौ से लेकर तीन सौ रुपये तक मांग रहे थे। उससे पूछा कि किस रास्ते ले जाओगे भला...उसने कहा, ये हम पर छोड़ दो। हम नहीं माने। बादलों को देख बड़ी संख्या में छाते वाले तंग करने लगे... डेढ़ सौ रुपये से लेकर ढाई सौ रुपये तक के छाते... मगर सभी छाते सेकेंड हैंड। धीरे- धीरे जब हम प्रवेश द्वार के क़रीब पहुंचे तो समझ में आ गया कि दलालों की कमाई रास्ता भी यही है... यहीं से दलाल लोगों को पुलिस वालों की सरपरस्ती में जबरन लाइन में घुसा दे रहे थे... हमारे आगे भी तीन- तीन बूढ़े और अधेड़ घुसकर खींसें निपोरने लगे... हमने भी संतोष कर लिया। हालांकि हर दलाल बुरा होता है लेकिन ये ताज के दलाल के रूप में मेरे जेहन में जैसे बैठ गए। सिक्योरिटी चेकिंग के दौरान एक बच्चे के हाथ में खिलौने वाला मोबाइल फोन देखकर गार्ड ने उससे छीनकर कचरे के डब्बे में फेंक दिया... बच्चा हैरानी और रुआसे का भाव लिये अंदर चला गया और उसके पिता (शायद)... हें- हें- हें –हें करते हुए भीड़ में गुम हो गए।
अंदरूनी हिस्से में ताजमहल का दरवाजा... मैदान की हरी- हरी घास का दरीचा।.... उफ़... सामने ही ताज था...इतना खूबसूरत जैसे किसी शाहजहां के आदेश पर बीस हजार मजदूरों की सेना ने इसे नहीं बनाया बल्कि खुद कुदरत ने अपनी निगहबानी में....अपनी छुअन से... इस इमारत में मोहब्बत और खूबसूरती का अहसास भर दिया हो।... ऐसा जैसे हर तारीफ़ जहां पहुंचकर अधूरी रह जाती है... यहां पहुंचकर टैगोर ने लिखा- एक अश्रु मोती ...समय के गाल पर। ताजहमल के उस हिस्से में पहुंचकर मैने आगरा के किले की तरफ देखा... जहां क़ैद एक शहंशाह या फिर कहिये एक आशिक़ निगाह... फ़क़त एक झरोखे से अपनी माशूक की कब्र को निहारता हुआ दुनिया से फ़ना हो गया। कहते हैं कि ताजमहल के तैयार होने के तत्काल बाद शाहजहां को उसके बेटे औरंगजेब ने आगरा किले में कैद में डाल दिया था। मराठी उपन्यासकर नागनाथ इनामदार – शहंशाह- नाम के अपने उपन्यास में लिखते हैं कि औरंगजेब ने अपने पिता शारजहां को क़ैद करने को अपनी सियासी मजबूरी मानी थी... सत्ता पाने की होड़ में अपने ही पिता को क़ैद में रखना मजबूरी भरा उसका फ़ैसला था लेकिन उसने पिता के जज्बातों की कद्र करते हुए किले के कैदखाने में एक झरोखा बनवाया था जहां से ताज़ दिखता है... और कैद में सोते- जागते इसी झरोखे से ताज को निहारते शाहजहां का इंतक़ाल हुआ।
ताजमहल के सामने बेंच पर बैठकर मैने अपने मां और पिताजी के फोटो खींचे... भाई को उसके परिवार के साथ और फिर भाई के साले ने हमसबका एक फोटो खींचा। इस बेंच पर दुनिया के नामीगिरामी लोगों को फोटो खिंचवाते हुए सैकड़ों दफे देखा है।...अचानक बेटे के सवाल से मेरी तंद्रा टूटी... स्वप्निल ने पूछा कि – पापा ये मंदिर है ?...मैं लटपटा गया। ख़ैर मैने संक्षिप्त –सा जवाब देकर पीछा छुड़ाया... नहीं बेटा, ये एक इमारत है... वर्षों पुरानी। ...ताजमहल को लेकर बाकी तमाम बातें मैने स्वप्निल को यह सोचकर नहीं बताई कि स्कूल में उसे और बच्चों के साथ ताजमहल के बारे में शायद बेहतर ढंग से बताया जाएगा।...इसी बीच मेरी बीबी थोड़ी चुहल करने लगी... उसने शिकायती अंदाज में कहा कि शाहजहां ने अपनी बीबी के लिये ताजमहल बनवाया था और आप मेरे लिए एक मकान तक नहीं बनवा सकते....मैंने सोचा कहूं- बावली...ये मक़बरा है जो शाहजहां ने मुमताज के इंतक़ाल के बाद बनवाया... और तुम्हारे लिये जिंदा रहते मकान बनवाना (ख़रीदना) दूसरी बात है।... उसका मूड बिगड़ न जाए इसलिये ख़ामोश रहा। ( जारी)