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Tuesday, September 8, 2009

एक अश्रु मोती... समय के गाल पर



हम ताजमहल की झलक पाते उससे पहले ही दर्शकों की लंबी लाइन दिखी… काले घने बादल। शाम चार बज चुके थे और छह बजे ताजमहल का द्वार दर्शकों के लिए बंद हो जाता है। लाइन लंबी थी इसलिये हम उम्मीद छोड़ चुके थे कि हम ताजमहल को देख सकेंगे। ख़ैर जैसे- तैसे टिकट कटाकर हम पूरे परिवार लाइन में लग गए....मगर आसपास घूम रहे दलालों ने हमें परेशां कर दिया। ये दलाल ताजमहल में तुरंत प्रवेश के नाम पर डेढ़ सौ से लेकर तीन सौ रुपये तक मांग रहे थे। उससे पूछा कि किस रास्ते ले जाओगे भला...उसने कहा, ये हम पर छोड़ दो। हम नहीं माने। बादलों को देख बड़ी संख्या में छाते वाले तंग करने लगे... डेढ़ सौ रुपये से लेकर ढाई सौ रुपये तक के छाते... मगर सभी छाते सेकेंड हैंड। धीरे- धीरे जब हम प्रवेश द्वार के क़रीब पहुंचे तो समझ में आ गया कि दलालों की कमाई रास्ता भी यही है... यहीं से दलाल लोगों को पुलिस वालों की सरपरस्ती में जबरन लाइन में घुसा दे रहे थे... हमारे आगे भी तीन- तीन बूढ़े और अधेड़ घुसकर खींसें निपोरने लगे... हमने भी संतोष कर लिया। हालांकि हर दलाल बुरा होता है लेकिन ये ताज के दलाल के रूप में मेरे जेहन में जैसे बैठ गए। सिक्योरिटी चेकिंग के दौरान एक बच्चे के हाथ में खिलौने वाला मोबाइल फोन देखकर गार्ड ने उससे छीनकर कचरे के डब्बे में फेंक दिया... बच्चा हैरानी और रुआसे का भाव लिये अंदर चला गया और उसके पिता (शायद)... हें- हें- हें –हें करते हुए भीड़ में गुम हो गए।
अंदरूनी हिस्से में ताजमहल का दरवाजा... मैदान की हरी- हरी घास का दरीचा।.... उफ़... सामने ही ताज था...इतना खूबसूरत जैसे किसी शाहजहां के आदेश पर बीस हजार मजदूरों की सेना ने इसे नहीं बनाया बल्कि खुद कुदरत ने अपनी निगहबानी में....अपनी छुअन से... इस इमारत में मोहब्बत और खूबसूरती का अहसास भर दिया हो।... ऐसा जैसे हर तारीफ़ जहां पहुंचकर अधूरी रह जाती है... यहां पहुंचकर टैगोर ने लिखा- एक अश्रु मोती ...समय के गाल पर। ताजहमल के उस हिस्से में पहुंचकर मैने आगरा के किले की तरफ देखा... जहां क़ैद एक शहंशाह या फिर कहिये एक आशिक़ निगाह... फ़क़त एक झरोखे से अपनी माशूक की कब्र को निहारता हुआ दुनिया से फ़ना हो गया। कहते हैं कि ताजमहल के तैयार होने के तत्काल बाद शाहजहां को उसके बेटे औरंगजेब ने आगरा किले में कैद में डाल दिया था। मराठी उपन्यासकर नागनाथ इनामदार – शहंशाह- नाम के अपने उपन्यास में लिखते हैं कि औरंगजेब ने अपने पिता शारजहां को क़ैद करने को अपनी सियासी मजबूरी मानी थी... सत्ता पाने की होड़ में अपने ही पिता को क़ैद में रखना मजबूरी भरा उसका फ़ैसला था लेकिन उसने पिता के जज्बातों की कद्र करते हुए किले के कैदखाने में एक झरोखा बनवाया था जहां से ताज़ दिखता है... और कैद में सोते- जागते इसी झरोखे से ताज को निहारते शाहजहां का इंतक़ाल हुआ।
ताजमहल के सामने बेंच पर बैठकर मैने अपने मां और पिताजी के फोटो खींचे... भाई को उसके परिवार के साथ और फिर भाई के साले ने हमसबका एक फोटो खींचा। इस बेंच पर दुनिया के नामीगिरामी लोगों को फोटो खिंचवाते हुए सैकड़ों दफे देखा है।...अचानक बेटे के सवाल से मेरी तंद्रा टूटी... स्वप्निल ने पूछा कि – पापा ये मंदिर है ?...मैं लटपटा गया। ख़ैर मैने संक्षिप्त –सा जवाब देकर पीछा छुड़ाया... नहीं बेटा, ये एक इमारत है... वर्षों पुरानी। ...ताजमहल को लेकर बाकी तमाम बातें मैने स्वप्निल को यह सोचकर नहीं बताई कि स्कूल में उसे और बच्चों के साथ ताजमहल के बारे में शायद बेहतर ढंग से बताया जाएगा।...इसी बीच मेरी बीबी थोड़ी चुहल करने लगी... उसने शिकायती अंदाज में कहा कि शाहजहां ने अपनी बीबी के लिये ताजमहल बनवाया था और आप मेरे लिए एक मकान तक नहीं बनवा सकते....मैंने सोचा कहूं- बावली...ये मक़बरा है जो शाहजहां ने मुमताज के इंतक़ाल के बाद बनवाया... और तुम्हारे लिये जिंदा रहते मकान बनवाना (ख़रीदना) दूसरी बात है।... उसका मूड बिगड़ न जाए इसलिये ख़ामोश रहा। ( जारी)

6 comments:

नीरज गोस्वामी said...

दिलचस्प पोस्ट...लेकिन लिखा सही है आपने...दलाल आजकल आपको हर कहीं मिलेंगे चाहे वो भगवान् का मंदिर हो या सिनेमाघर.

नीरज

रंजना said...

अत्यंत सुरुचिपूर्ण रोचक विवरण....बड़ा आनंददाई लगा पढना....आभार.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"....मैंने सोचा कहूं- बावली...ये मक़बरा है जो शाहजहां ने मुमताज के इंतक़ाल के बाद बनवाया... और तुम्हारे लिये जिंदा रहते मकान बनवाना (ख़रीदना) दूसरी बात है।... उसका मूड बिगड़ न जाए इसलिये ख़ामोश रहा। "

सच्चाई तो यही है।
मगर इसमें मुहब्बत भी तो छिपी है।
बधाई!

Udan Tashtari said...

बहुत दिलचस्प लेखन..

Bhuwan said...

...उसने शिकायती अंदाज में कहा कि शाहजहां ने अपनी बीबी के लिये ताजमहल बनवाया था और आप मेरे लिए एक मकान तक नहीं बनवा सकते....मैंने सोचा कहूं- बावली...ये मक़बरा है जो शाहजहां ने मुमताज के इंतक़ाल के बाद बनवाया... और तुम्हारे लिये जिंदा रहते मकान बनवाना (ख़रीदना) दूसरी बात है।... उसका मूड बिगड़ न जाए इसलिये ख़ामोश रहा। .... मज़ा आ गया...

भुवन
लूज़ शंटिंग

अजय मूड़ौतिया said...

अफ़सोस..!!वो बात कहीं नजर नहीं आई जिसके लिए आप जाने जाते है..!!