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Sunday, September 13, 2009

नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की




शाम हो चुकी थी जब हम ताजमहल को देखने के बाद मथुरा की ओर चले... रास्ते में एक जगह आगरा का मशहूर पेठा लिया...एक चौराहे पर बड़ी –सी दुकान में। फिर बारिश शुरू हुई तो मथुरा तक अनवरत बरसती रही। दिल्ली- मथुरा रोड पर अंदेरे में जुगनुओं की तरह दिखने लगा तो अंदाजा मिल गया कि मथुरा आ गए... मथुरा की रिफाइनरी में लगी लाइटें रात के अंधेरे में रौशन होने वाले जुगुनू की तरह ही दिखते हैं। और जल्द ही हम मथुरा में मंदिर के आसपास पहुंच गए... बारिश थोड़ी थम गई। हम भीगते- भीगते ही मंदिर की तरफ चल निकले... दो- चार मिनट पहले ही आरती ख़त्म हो गई थी और देशी- विदेशी श्रद्धालुओं का रेला उधर से आता दिखा। हम मंदिर के गेट पर पहुंचे...द्वार पर सैकड़ों साल पहले की डिजाइन की तरह ही दो द्वारपाल अंकित हैं और दरवाजा भी परंपरागत डिजाइन का दिखा। वहां सिक्योरिटी चेकिंग के लिये हमें वहां रोक दिया गया। तसल्ली से तलाशी ली गई... थोड़ी बदमतमीजी से पेश आए यूपी पुलिस के जवान... शर्ट के भीतर अपना पहचान पत्र डाले था... जब ज़िद की तो वो भी निकाल दिया... प्रेस का कार्ड देखकर उसने थोड़ी मेहरबानी की और जाने दिया। अंदर गया तो मंदिर से लगती हुई मस्जिद दिखी... खैर हम अंदर गए तो महामाया देवी की मूर्ति देखी... वहां से जन्मभूमि की तरफ और श्रद्धालु जा रहे थे तो हम भी भूलभूलैया जैसे रास्ते से खोह में बने श्रीकृष्ण जन्मभूमि स्थल पर पहुंचे... मैं अवाक रह गया। ये वास्तव में ये कंस की जेल ही नहीं उस स्पेशल सेल की तरह है जिसमें असाधारण किस्म के कैदी उस ज़माने में रखे जाते होंगे। अंदर दीवारों पर अंकितम चित्रों पर यहां का महात्म दिखाया गया है और श्रीकृष्ण के जन्म की कहानी गाइड वगैरह श्रद्धालुओं को समझा रहे थे। मैं ये सोचकर जैसे अभिभूत हो गया कि नंदलला का जन्म यहीं हुआ होगा। पूरे परिवार ब़ड़ी देर तक जड़वत बने रहे। ...थोड़ी देर बाद हमसब ऊपर आए। वहां कुछ देर मंदिरों में घूमने के बाद औरतों ने कुछ ख़रीदारी भी की। वहां चाक- चौबंद सुरक्षाकर्मियों को भी देखा।... वहां से हम सबलोग दोबारा वहां आए जहां गाड़ी खड़ी की थी... वहीं एक दुकान से मथुरा के पेड़े ख़रीद लिये ...भरपूर। अब गाड़ी में दोबारा बैठे और दिल्ली की तरफ हमारा कुनबा निकल लिया... घड़ी देखी ठीक बारह बजे थे। एक ढाबे पर गाड़ी रुकवाकर हम सबका भोजन हुआ... काफी महंगा था खाना। ढाबे पर काम करने वाले स्टाफ ने हमें बंगाली समझ लिया तो एक ने पूछा- दादा- दादा भात खाबो ? ..मैने उसे डपटकर कहा कि तू बिहारी है का रे ?...वो खींसे निपोरने लगा...यानी वो भी समझ गया और मैं भी। बड़े प्रेम से खाना खिलाया...। पौने बजे के आसपास हम दिल्ली की ओर निकल पड़े... तीन बजे भोर में हम दिल्ली पहुंचे... रास्ते भर गीत सुनते आए- राधे- राधे –राधे बरसाने वाली राधे... श्रीराधे- राधे बरसाने वाली राधे।

4 comments:

समयचक्र said...

नन्द के आनंद भयो जाय कन्हैया लाल की .....राधे- राधे

समयचक्र said...

नन्द के आनंद भयो जाय कन्हैया लाल की .....राधे- राधे

संजय तिवारी ’संजू’ said...

आपको हिन्दी में लिखता देख गर्वित हूँ.

भाषा की सेवा एवं उसके प्रसार के लिये आपके योगदान हेतु आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

जय कन्हैया लाल की!