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Friday, September 25, 2009

...मेहरबानी करके पत्रकार साथी न पढ़ें

(अगर आप पेशे से पत्रकार हैं या फिर डॉक्टर हैं तो इस पोस्ट को कतई न पढ़ें। सबसे पहले पत्रकार। मुझे अहसास हुआ है कि हम सब एक ऐसी सुविधाजनक दुनिया में जी रहे हैं जहां यूटोपिया जैसी स्थिति है... वहां कोई बीमार नहीं पड़ता, कोई नहीं मरता, वहां कोई दुखी नहीं है,, उनके साथ कोई होनी- अनहोनी नहीं होती, हम किसी ( ऊपरवाले भी) से नहीं डरते.. अगर उनके नाते- रिश्तेदार दुखी हैं, मुफलिसी में हैं, मुश्किल में हैं... जरूरतमंद हैं तो हम पत्रकार उन्हें उनके दुखों के साथ छोड़कर वापस अपनी हंसती- खिलखिलाती दुनिया में आ जाते हैं... क्योंकि जीना- मरना दुनिया का नियम है।..इसलिये ऊपरवाले से दुआ मांगें कि आपका कोई जानने वाला पत्रकार न हो ...अगर हो भी तो उससे कभी किसी भी मोड़ पर मदद मांगने की जरूरत न पड़े...और अगर जरूरत पड़े भी तो उनसे मदद मांगना मत। हां, डॉक्टर भी न पढ़ें क्योंकि जन्म और मृत्यु उनके लिए एक कागजी दस्तावेज भर है, जिसपर वे अपनी ग़ैर जज्बाती कलम से दिन और तारीख भर देते हैं.)
मित्रों, अभी मेरे एक रिश्तेदार सख़्त बीमार हुए... पहले बिहार के मुजफ्फरपुर में उनका ऑपरेशन हुआ और बाद में पटना में। दिक्कत ये हुई थी कि मरीज़ जो थे वे पोलियो अभियान के लिए साईकिल से जा रहे थे, गिर पड़े। पता चला कि कूल्हे की हड्डी टूट गई। डॉक्टर भी हैरान... साईकिल से गिरने भर से हड्डी टूट जाए। टेस्ट कराया और ऑपरेशन कर दिया। ऑपरेशन तो सही हुआ लेकिन दूसरी समस्या डॉक्टर ने बता दी कि किडनी डैमेज हो गया है। दस –पंद्रह दिनों में कई बार डायलिसिस भी कराया...अंत में पटना के लिए रेफर कर दिया। पटना में डॉक्टरों की हड़ताल के दौरान पीएमसीएच की बजाय उन्हें नालंदा मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। वहां के डॉक्टरों ने इन दो रोगों का इलाज करते- करते बता दिया कि फेफड़े में पानी चला गया है और इसका इलाज चंडीगढ़ में ही संभव है। मुझे सूचना दी गई... चंडीगढ़ पीजीआई में मैने अपने सोर्स भिड़ाए। वहां एक वरिष्ठ पत्रकार मेरे जानने वाले हैं...उन्होंने तसल्ली दी कि यहां भर्ती करा दिया जाएगा। मैने भी पटना सूचना दे दी और तीसरे ही दिन वे लोग पटना से राजधानी एक्सप्रेस में सवार होकर दिल्ली पहुंच गए। दिल्ली में एंबुलेंस लेकर मैं अपने एक और रिश्तेदार के साथ मौजूद था। स्ट्रेचर पर उन्हें ट्रेन से उतारकर एंबुलेंस तक लाया... वहां मेरी पत्नी ने उन्हें देखा तो अवाक रह गईं... मेरे ससुर के छोटे भाई हैं..यानी मेरी पत्नी के चाचा। दाढ़ी बढ़ी हुई...आंखों के चारों तरफ कालिमा....बदरंग चेहरा। लेकिन फिर भी जीने की एक उम्मीद लिये शून्य को निहारते रहे। उनकी पत्नी और छोटे भाई का परिवार भी साथ आया था। हम सबलोग एंबुलेंस में सवार होकर चंडीगढ़ पीजीआई पहुंचने वाले थे उससे पहले चंडीगढ़ के अपने परिचितों को फोन किया...उन्होंने अपने एक रिपोर्टर का मोबाइल नंबर दिया और भरोसा दिलाया कि अस्पताल के गेट पर मिल जाएगा। हम हैरान- परेशान होकर दोपहर तक़रीबन दो बजे पीजीआई में पहुंचे।
वहां का नजारा देखकर हिल गए। बाहर भीड़ लगी थी और लोगों के बीच स्ट्रेचर के लिए मारामारी मची थी। एंबुलेंस वाला जल्दी मचा रहा था, उसे दिल्ली वापस लौटना था। एक स्ट्रेचर पर एक महिला मरीज सोई थी और उसके पास एक गाड़ी लगी तो मुझे लगा कि मरीज़ को उतारने के बाद स्ट्रेचर खाली हो जाएगा। सो, मैं लपका। लेकिन मेरे जो रिश्तेदार दिल्ली से मेरे साथ गए थे उन्होंने इशारों में बताया कि लाश है... स्ट्रेचर के पास महिला का पति सिसकियां भर रहा था और महिला की लाश स्ट्रेचर पर पड़ी थी। ख़ैर, मैने उस रिपोर्टर को फोन मिलाया तो उसने कहा कि दो मिनट में आ रहा हूं ...इसी बीच आधे घंटे की मशक्कत के बाद हम एक स्ट्रेचर हासिल करने में सफल हुए और अपने मरीज को लेकर अंदर जाने लगे तो गेट पर रोक दिया गया... दो लोगों से ज्यादा नहीं।
फिर ख्याल आया कि रिपोर्टर को फोन मिलाऊं....उसने फिर कहा कि दो मिनट में आ ही रहा हूं। मैने बताया कि बामुश्किल अंदर आ पाया हूं... अगर जल्दी आकर इलाज शुरू करा सको तो बेहतर। विश्वास मानिये, ( कसम खाकर कहता हूं) लगभग सवा घंटे के बाद रिपोर्टर साहब जबतक नामूदार हुए तबतक हम इमर्जेंसी में किसी तरह अपने मरीज को लेकर घुसने में कामयाब हो गए। रिपोर्टर का फोन आया तो सामने खड़ा था। मुझे तसल्ली हुई कि अबतक हुई फजीहत ख़त्म ...इनका रोज हस्पताल आना- जाना होगा इसलिये इलाज तो कम- से- कम फौरन शुरू हो ही जाएगा। वजह ये थी कि मरीज की हालत कुछ ज्यादा ही ख़राब होने लगी थी, लंबी यात्रा की वजह से। रिपोर्टर साहब मुझे वहां रिस्पेशन के भीतर ले गए और एक साहब ( उस आदमी को ज़िंदगी में दोबारा देखने की इच्छा नहीं है) से परिचय कराया। साहब का ठाठ इतना कि उन्होंने न तो मेरी ओर नजर उठाने की जहमत उठाई और मेरा बढ़ा हुआ हाथ उनके हाथ की बाट जोहता दोबारा पैंट की जेब में चला गया... उन्होंने देखा... मगर बहुत देर के बाद। हाथ मिलाना तो खैर। इसके बावजूद रिपोर्टर साहब बार- बार कहते रहे कि आपकी हर समस्या से फलां साहब सुलझा देंगे और अब आप आराम से मरीज के आसपास रहिये...कई डॉक्टरों को फोन किया है...सबके सब आते ही होंगे। मैं मरीज के पास आया तो वहां उनकी पत्नी और भाई खड़े मिले। एक डॉक्टर ने दवा की एक पर्ची पकड़ाई ...मैं फौरन से पेश्तर उसे अंदर के मेडिकल स्टोर ले लाकर मरीज के पास इस उम्मीद में खड़ा हो गया कि अब इलाज तो शुरू हो जाए। आसपास गुजर रहे कई डॉक्टरों से आग्रह किया लेकिन जबतक मेरी बात पूरी होती, डॉक्टर कई बेड बाद नजर आता। मेरे जैसे परेशां तीमारदार कई थे। ख़ैर दो घंटे बाद एक डॉक्टर फिर आया...मैने गलती ये की कि उससे शिकायत कर बैठा कि एक डॉक्टर साहब ने ये दवा लाने दी थी लेकिन तब से वे दिखे ही नहीं। डॉक्टर साहब फायर हो गए... कहने लगे कि क्या समझते हो कि डॉक्टर दवा मांगकर कहीं भाग गया?... माइंड योअर लैंग्वेज..मैन। मैं खामोश रहा और डॉक्टर साब गुस्से के मारे वहां से चले गए... उन्होंने भी दवा नहीं दी। दस मिनट बाद एक और डॉक्टर जब आया तो मैंने या किसी ने भी उनसे कुछ नहीं कहा। उन्होंने बड़ी खामोशी से दवा दे दी और चले गए। (जारी)

4 comments:

drparveenchopra said...

इतना पढ़ कर ही मेरी तो भाई बोलती बंद हो गई है ---और क्या लिखूं ? मुझे आप के मरीज़ की कुशलता जाने हेतु अगली पोस्ट का इंतज़ार है।
ऐसे अनुभव पढ़ कर हम लोग यह जान पाते हैं कि देश में विभिन्न राज्यों में जो AIIMS जैसी इंस्टीच्यूट बनाने की जो बात है ( शायद पटना में भी) ... वह कितनी ज़रूरी बात है।
नमस्कार।
बाकी फिर कभी ---भविष्य के लिये शुभकामनायें.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

मरीज की सेहतमन्द होने की दुआ करता हूँ!

अजय कुमार झा said...

सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूं कि..इन हालातों मे लगता है कि काश...परिवार के साथ न होकर...यदि गुंडे..मवाली...या आतंकवादी होते ...तो ऐसे में शायद देश से एक आध गंदगी कम हो जाती....अगला भाग नहीं पढ पाऊंगा....मगर आपके परिचित की कुशलती जानने ...झांकने जरूर आऊंगा....

Anil Pusadkar said...

शर्मनाक और अफ़्सोस भी है कि ऐसे भी पत्रकार होते हैं।ईश्वर से आपके चाचा ससुर के ज़ल्द स्वस्थ होने की कामना करता हूं।