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Sunday, September 27, 2009

...काली बिल्ली ने आख़िरकार हमारा रास्ता काट दिया

शाम लगभग सात बज चुके थे... मैं अपने एक और रिश्तेदार के साथ वापस दिल्ली जाना चाहता था लेकिन डॉक्टर ने कहा कि डायलिसिस होगा...अभी, इसी वक़्त। उन्हें स्ट्रेचर पर ले गया। वहां 120 रुपये की पर्ची कटाने के बाद तत्काल डायलिसिस कर दी गई। लगभग एक घंटे बाद मरीज़ को वापस ले जाते समय एक डॉक्टर ने कहा कि डिपार्टमेंट के हेड डॉ.विवेकानंद झा आपको याद कर रहे हैं... मैं इस डर से झिझकते हुए गया कि पता नहीं फिर बेवजह डांटना न शुरू कर दे...लेकिन बेहद ज़हीन किस्म के डॉ.झा ने जाते ही बताया कि आपके अखबार के एक साथी का फोन आया था...मैने मरीज को देख लिया है लेकिन ये हमारे डिपार्टमेंट का मामला नहीं है...आप उन्हीं अखबारी साथी से कहो कि हड्डी वाले डॉक्टर से आपको मिलवाएं...क्योंकि किडनी फिलहाल ठीक है। थोड़ा संतोष हुआ और उसी रिपोर्टर को फोन करके पूरी बात बताई। उसने भरोसा दिया कि अब आप सेफ हैं...हेड की निगाह में आपका केस आ गया है तो आप किस्मतवाले हैं...यहां किसी भी दूसरे मरीज़ का ऐसा नसीब नहीं होता है कि हेड खुद उसके बारे में जांच- पड़ताल करे। मैने उनसे गुजारिश की कि भाई एक वार्ड तो दिलवा ही दो... स्ट्रेचर पर भला कैसे मरीज को रखा जा सकता है क्योंकि इलाज लंबा चलना है...उसने कहा कि यहां यही मुश्किल है... वार्ड नहीं मिल सकता...आपको उसी तरह काम चलाना होगा...पीजीआई में ढाई सौ बेड हैं लेकिन मरीजों की संख्या नौ सौ के आसपास है, भला कैसे वार्ड मिलेगा। ( वे ऐसा ब्यौरा दे रहे थे जो गाहे- बगाहे हेथ बीट की रिपोर्टिंग करते समय अपने अखबार में छापते भी रहे होंगे)... मैने उससे बात करने के बाद उस रिपोर्टर के बॉस से बात की जो मेरे परिचित पत्रकार हैं... बेहद मानवीय और संवेदनाओं से भरे। खुद अखबारी व्यस्तताओं के कारण वे आ नहीं पाए थे लेकिन फोन पर लगातार जानकारी ले रहे थे। उनसे बताया कि सर, जरा रिपोर्टर से कहकर वार्ड तो दिलवा दें। उन्होंने तुरंत रिपोर्टर से बात की और रिपोर्टर का फोन दन्न से मेरे पास। उसने बताया कि उसकी बात हो गई है फलां डॉक्टर से...आप उनसे मिल लो। मरीज को स्ट्रेचर सहित इमर्जेंसी में पहुंचाने के बाद मैं भागा- भागा उस डॉक्टर के पास वार्ड के इंतजाम के लिए गया। डॉक्टर ने साफ कर दिया कि उनके डिपार्टमेंट का केस ही नहीं है इसलिये यहां बेड नहीं मिल सकता... फिर उसी रिपोर्टर को फोन मिलाकर पूरी बात बताई तो उसने कहा कि किडनी का मामला है इसलिये हड्डी वार्ड में कैसे बेड मिल सकता है?...खैर मैं ऊब चुका था...सो, मरीज के पास आ गया। वहां देखा तो ससुर जी स्ट्रेचर पर बेहोशी की हालत में पड़े थे और मेरी सास अनवरत खड़ी... क्योंकि वहां मरीजों के तीमारदारों के बैठने की कोई जगह नहीं थी। वहां मौजूद दूसरे मरीजों के तीमारदार भी या तो खड़े थे या प्लास्टिक की अपनी स्टूल ख़रीद लाए थे।
मैं फिर वापस दिल्ली लौटने की बात सोचने लगा...चूंकि एक दिन की ही छुट्टी ली थी इसलिये रुकना थोड़ा मुश्किल हो सकता था। फिर एक डॉक्टर साहब आए और उन्होंने कहा कि अभी के अभी मरीज़ का यूरिन, ब्लड टेस्ट के साथ ईसीजी होगा। मैने उनसे कहा कि साहब कल नहीं हो सकता है क्या... उन्होंने पूछा अभी क्यों नहीं... मैने कहा कि मरीज के साथ कोई होगा नहीं और मैं दिल्ली वापस हो रहा हूं। डॉक्टर ने बिफरते हुए कहा कि मरीज को भी साथ ले जाओ...मेरे को क्या है...एक डेथ सर्टिफिकेट ही तो बनाना है। सुनते ही मैने डॉक्टर की तरफ ख़ामोश रहने का इशारा करते हुए युरिन टेस्ट के लिए पिशाब की थैली का नॉब ढूंढ़ने लगा जिससे कि शीशी में युरिन का नमूना लिया जा सके। पंद्रह मिनट की कोशिशों के बाद भी थैली नहीं खुली... मेरे साथ और भी लोगों ने कोशिश की लेकिन नतीजा नहीं निकला... फिर मैने उसी डॉक्टर की तरफ असहाय मुद्रा में देखते हुए गुहार लगाई ...बार- बार कहा कि सिर्फ बता भर दें... लेकिन डॉक्टर ने नहीं सुनी। एक नर्स आती दिखी...उनसे कहा तो उसने मुझे कंधे से हटाते हुए अपने रास्ते निकल गई। मैं दोबारा आकर नमूना लेने के लिए थैली में नॉब ढूंढ़ने लगा। आसपास के तीमारदारों को आग्रह किया लेकिन वे सब पहले ही इतने दुखों के मारे थे कि दुनिया से बेजार मुद्रा में देखते रहे। ख़ैर...बड़ी कोशिशों के बाद जब नॉब मिला तो मेरी बेवकूफी से थैली से पिशाब का फौव्वारा निकलने लगा... जबतक संभालता, फर्श पर काफी बिखर चुका था। खैर हमने नमूना लेकर युरिन दे दिया... खून का नमूना भी डॉक्टर साब दे चुके थे उसे भी जमा कराया... और वापस आकर मरीज को ईसीजी के लिए ले गया... वहां भी दिक्क़त ज्यादा नहीं हुई और आधे घंटे में तीनों काम निबटाकर वापस आ गया।...लेकिन मरीज़ की बेहोशी नहीं टूटी... उनका बुखार दुगुना लग रहा था... डॉक्टर जब आया तो थर्मामीटर लगाकर देखा... तपतपाते शरीर में चार डिग्री बुखार निकला। उन्होंने दवा दे दी तो मेरी सास ने अपनी चिंता छोड़ते हुए मुझसे और मेरे साथ के और लोगों से खाना खा लेने की ज़िद करने लगीं। सबने बारी- बारी से बाहर निकलकर खा लिया तो मैं भी एक और रिश्तेदार के साथ हॉस्पिटल से बार ढाबे में खाने पहुंचा। रेट लिस्ट देखा तो हैरानी हुई... पचास रुपये में दाल –रोटी। हम दो आदमी थे और सौ रुपये का टोकन लेकर खाना खा लिया। ढाबे पर मौजूद लोगों की थाली भरी-पूरी थी... कहीं चिकन कराही और किसी थाली में दूसरे नॉनवेज आइटम। महंगा ढाबा होने के बाद भी लोगों की भीड़ इतनी कि बामुश्किल हमें जगह मिली तो हमने जल्दी- जल्दी खाकर निबटाया। वापस आने लगे तो सामने सड़क पर काली बिल्ली मिली... उसे देखकर मेरे कदम ठिठके... थोड़ी देर बाद जब दोबारा जाने लगा तो पता नहीं कहां से उसी काली बिल्ली ने आकर मेरा रास्ता काट दिया... मैं आशंका से भरा हुआ अस्पताल में दाखिल हुआ। (जारी)

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

कुछ रूढ़ियाँ मान्यता का रूप ले चुकी हैं।
दुख की बात है कि पढ़े-लिखे भी
अक्ल के पीछे लट्ठ लिए घूम रहे हैं।

Udan Tashtari said...

जारी रहिये, पढ़ रहे हैं.

Anil Pusadkar said...

मह्सूस कर रहा हूं।ऐसा लग रहा है सब कुछ आंखो के सामने घट रहा है।