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Saturday, October 17, 2009

...बगल की बेड पर मरीज़ गुजर गया

बीच में कुछ दिनों तक बीमार पड़ने की वजह से आपको -मृत्यु- नाम से लिखी जा रही श्रृंखला की अगली किस्त तुरंत नहीं पढ़ा पाया। खेद है। आगे पढ़िये। - संजीव
...किसी अनहोनी की आशंका में हैरान- परेशान हमदोनों अस्पताल में दाख़िल हुए... मेरे ससुर जी ( मरीज़) बिस्तर पर बेहोशी की हालत में पड़े थे और मेरी सास बगल वाले बेड के पास खड़ी होकर संताप में डूबी महिला के पास अवाक मुद्रा में खड़ी थीं... यानी उसके बुजुर्ग पति दुनिया में नहीं रहे। लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो चुका था। अस्पताल वाले आए और दस मिनट के भीतर मरीज़ की नाक और मुंह में लगे तमाम उपकरण हटाकर ॥चेहरा चादर से ढंक दिया और बाहर की ओर स्ट्रेचर लेकर गए... बरामदे में महिला अपने पति की लाश के साथ खड़ी थी... जो न रो पा रही थी और न ही संयत थी। उदास भाव से हम भी घंटे- डेढ़ घंटे बाद कहीं सिर टिकाने की जगह खोजने लगे...लेकिन तीमारदारों के बड़े सभागार में इतने ज्यादा तीमारदार थे कि हॉल किसी तंग कमरे में तब्दील हो गया था। लोग जहां- तहां जमीन पर सोये थे...बेंचों पर बैठे लोग भी ऊंघ- ऊंघकर गिर रहे थे। हम बरामदे में आ गए...देखा कुछ लोग वहां भी किनारे में साये पड़े थे। हम भी एक चादर ले आए और इस इरादे से जूते उतार कर बैठ गए कि इसी मुद्रा में कुछ आराम तो मिलेगा। लेकिन गार्ड ने हमे देखते ही करीब आया और गुरुमुखी में डंडा दिखाते हुए कहा कि यहां से तामझाम हटाओ। हमने कहा कि हम तो सो नहीं रहे... बाकी लोग सो भी रहे हैं...तुम्हें उनपर क्यों नहीं एतराज है भाई ?...उसने या तो मेरी हिंदी समझी नहीं या फिर वह भी नींद से भरा होने के कारण झुंझलाया था... कहा कि फ़ौरन यहां से हटाओ। हमने बहस छोड़ चादर लेकर दूसरी मंजिल पर आ गए जहां कुछ अंधेरा था और बरामदे में काफी लोग सो भी रहे थे। हमने भी इधर- उधर देखने की बजाय रास्ते के ठीक बगल में औरों की तरह चादर बिछाई और चोरी चले जाने के डर से जूतों को चादर के नीचे डालकर बेखबर सो गए... लेकिन कानों के पास से चहलकदमी का अहसास पूरी रात होता रहा जब बरामदे से होकर लोग गुजरते थे।...तक़रीबन पौने पांच बजे नींद खुली तो देखा मेरे साथी मुकेश जी पहले ही उठ चुके हैं....लेकिन सफाईकर्मी बरामदे में पोछे लगा रहे थे और वे जैसे- जैसे आगे बढ़ रहे थे... बरामदे में सोए लोग वैसे...वैसे अपनी चादर लेकर भाग रहे थे... सफाईकर्मियों के लिए ये रोज का मंजर था... इसलिए इसमें उनके लिए कोई रस नहीं रह गया था। हम भी लपककर मरीज के वार्ड में गए। वहां मेरी सास उसी मुद्रा में बैठी थीं जिस मुद्रा में उन्हें रात छोड़ गया था। मुकेश जी ने मुझे देखते ही कैंटीन से सबके लिए चाय ली। चाय पीते- पीते ख़ासा वक्त हो गया... हम शौच के लिए इधर- उधर भटकने लगे। क्योंकि अस्पताल के हर मंजिल पर सिर्फ दो शौचालय मगर इस्तेमाल करने वालों की बड़ी भीड़...। अब करें तो क्या करें... हम अस्पताल के बाहर सड़क के पार भी गए लेकिन कोई शौचालय नहीं मिला। दोबारा जब आए तो सबसे ऊपरी मंजिल पर जाकर देखा... वहां एक शौचालय मिला जो साफ- सुथरा... शायद किसी की निग़ाह उसपर नहीं पड़ी होगी क्योंकि सबसे ऊपरी मंजिल पर था। मैं और मुकेश जी वहां से फ़ारिग होकर वार्ड में आए... वार्ड में ससुर जी की तंद्रा टूट चुकी थी... वे बेड पर बैठने की मुद्रा में लेटे हुए थे और मेरी सास उन्हें ब्रश करने में मदद कर रही थीं। खुशी का ठिकाना नहीं रहा... उन्होंने कुछ हल्की- फुल्की बातचीत भी की।... अचानक ध्यान आया कि खून देने के लिए ब्लड बैंक भी जाना है... और मुकेश जी को खून देना था...इसलिए हम ब्लड बैंक की तरफ लपके। उसने कहा कि पहले भरपूर नाश्ता कर लो फिर ब्लड लेंगे। हम अस्पताल के बाहर आकर नाश्ते का जुगाड़ देखने लगे। हम तीन लोग थे और सुबह में नाश्ते का भला क्या इंतजाम हो सकता था। नजर पड़ी एक ठेले वाले पर जो गर्मागर्म परांठे परोस रहा था। हम ऑर्डर देकर बैठ गए... कई और ग्राहक वहां खा रहे थे। दस मिनट- पंद्रह मिनट- आधा घंटा बीत गया तो मेरा धैर्य जवाब दे गया। मेरे बाद आए ग्राहकों को तो वो खिला रहा था लेकिन हमारी तरफ देखना भी गंवारा नहीं। समझ में आया... हमारे साथ गए लोगों ने बिहारी अंदाज में परांठे का ऑर्डर दिया था जिसे लेकर परांठेवाला बार- बार पंजाबी में भुनभुना रहा था। मैने उससे कहा कि भाई ब्लड देने के लिए जाना है...अगर जल्द से दो या एक ही प्लेट दे दो या फिर हम चलें। अनमनाते ढंग से उसने फिर क़रीब बीस मिनट बाद तीन प्लेट परांठे लगाने लगा। मैने उसे रोक दिया... मैने कहा कि सिर्फ दो प्लेट देना... मुझे तुम्हारे परांठे बिल्कुल नहीं खाने। ...पता नहीं उसने समझा या नहीं, उसपर कोई फ़र्क नहीं पड़ा। दोनों को नाश्ता कराने के बाद हम ब्लड बैंक में आ गए।( जारी)