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Wednesday, November 25, 2009

मुफ़लिसी में हंसी


पवन के कार्टून का मुरीद रहा हूं... रेखाचित्रों से ज्यादा उनके कार्टून का सब्जेक्ट जोरदार रहा है। कार्टून पर जाकर क्लिक कीजिये और आप भी मजा लीजियेः संजीव

Monday, November 16, 2009

एक दिलचस्प टिप्पणी

वरिष्ठ टीवी पत्रकार श्री अंशुमान त्रिपाठी जी को मैने व्यंग्य- लुटेरों के लिए भी आचार संहिता बने- मेल किया था। जिसे पढ़ने के बाद उनकी दिलचस्पी टिप्पणी आईः संजीव
संजीव भाई, लुटेरों के लिए ही आचार सहिता होती हैं। शर्माजी हमारे आपके जैसे इंसान हैं। नाईयों की मदद से ही हम आपकी जिंदगी संवरती सुधरती है। बीबियां भी हमारी मर्दानगी के किससे मुश्किल से ही सुनती है। और हिंदी न्यूज चैनलों में काम करते करते बाहर रिरियाने की,कमजोर को छकाने की और अपनों के बीच गाल बजाने की आदत हो जाती है। लइके बड़े लायक थे। जिस नाई के यहां बैठते थे उसीकी नहीं बजाते थे। हमारा तो पेशा ही ज़रा उल्टा है। गर्लफ्रेंड अगर शर्माजी की भी होती तो कसम से वो रिक्शे पर बैठे बैठे मोबाइल पर बतियाते हुए आते। पीटीसी समझा रहे होते, एंगल बता रहे होते या फिर उसके खिलाफ साज़िश का पर्दाफाश सुना रहे होते। ज़रूर शर्माजी कापी रायटर रहे होंगे। अदने से, लिए हुए छोटे छोटे से सपने से,सुंदरी अगर कॉपी जंचवाने आजाए तो सुंदर सपनों में खो जाते होंगे। उन्हें जीवन जगत का प्रेमी बनाया होगा ऐसे ही किसी प्यार ने। बड़े प्यारे जीव हैं पत्नी से बात करने का वक्त निकाल लेते हैं। या तो उनका बॉस नई नौकरी या छोकरी ढूंढ़ने में व्यस्त होगा। वरना न्यूज़ चैनलों से खबरों के गायब होने के लिए वो ही जिम्मेदार माने जाते। तो कुल मिला कर समस्या यही है कि किसके आचार को आधार बना कर संहिता बनाई जाए। शर्माजी, वो लुटेरे,या अमर नाई जिसने 500 के नोट में मोबाइल जायदाद वापिस दिलवाई। हां भाई सब जानते हैं कि महंगा मोबाइल खरीद पाना हैसियत से बाहर है लेकिन हैसियत बढ़ाने के लिए दिखाना ज़रूरी है। तो पत्रकार के लिए मोबाइल अचल संपत्ति के बराबर ही है। कईयों की नज़रें टेढ़ी हुई होंगी- कहां से खरीदा इतना महंगा मोबाइल। मोबाइल से उनका ये लगाव ही उनको महंगा पड़ा। बहरहाल संजीव भाई देख लीजिए कहीं हमने खींच खींच कर इसे लंबा तो नहीं कर दिया। मुख्य लेख से अगर बड़ा हो गया हो तो माफी चाहुंगा। दरसल बचपन में संपादकजी को पत्र भेज भेज कर लिखना सीखा था। कुछ साथी उप संपादक मुख्य लेख से बड़ी मेरी प्रतिक्रिया छाप देते थे। मुझे मेरी प्रतिभा का अहसास बचपन में ही हो गया था। बाद में पता चला कि ये प्रतिक्रियाएं ही बड़े पत्रकारों का लेख होती हैं। यानि नया लिखने के लिए तो रिसर्च की ज़रूरत पड़ती है। इसलिए ज़ल्द से जल्द इतना बड़ा पत्रकार बन जाना चाहिए कि प्रतिक्रिया ही मूल पर भारी पड़ जाए। तो संजीव भाई आचार संहिता तो हमारे जैसे पत्र लेखकों के लिए भी बननी चाहिए जो मूल रचना की कनपटी पर लंबी प्रतिक्रिया की दोनाली रख कर भोकाल क्रिएट करते हैं। अगर ये दोनाली लेकर आप साइबर यात्रा पर निकल जाए और दिन भर में 25-50 ब्ल़ाग पर डाका मार आए, तो यकीनन आप रातों रात ऑन लाइन जर्नलिज्म में छा जाइएगा। टारगेट ञाडिएंस की पूरी टीआरपी मिलेगी। सो माफ कीजिएगा, अआगे फिर कहीं मुलाकात होगी।

Saturday, November 14, 2009

लुटेरों की भी आचार संहिता बने

ग़ाज़ियाबाद में मेरे पड़ोसी एकदिन लुट- लुटाकर घर आए... पिटना रह गया था सो ये नहीं लिख रहा हूं कि लुट- पिटकर वापस आए। मित्रों, शर्मा जी भले आदमी हैं और मेरे जैसे दुष्ट के पड़ोसी हैं इसलिये इस भरोसे के साथ उनके लुटने की दास्तां लिख रहा हूं कि वे नाराज़ नहीं होंगे... नाराज़ हो भी गए तो उसी तरह चुप लगा बैठेंगे जैसे लुटने के बाद चुपचाप घर आ गए। उन्हें लूटने के लिए कोई चंगेज़ खां नहीं आया था... पड़ोस में ही लुट गए। नोयडा के फिल्म सिटी में उनका दफ़्तर है और एक हिंदी न्यूज़ चैनल में काम करते हैं। वसुंधरा तक बस में जाते हैं और वहां से रिक्शे में सवार होकर घर लौट रहे थे। लुटे इसलिये कि ग़लती शर्मा जी की थी। रिक्शे में सवार होकर हाथों में मोबाइल रखने की उन्हें क्या ज़रूरत थी?... मगर जवानी में बचपना कर गए। मोहल्ले के ही दो-चार लड़के रिक्शे के पास आकर उन्हें रोका और उनसे मोबाइल फोन लेकर लगे नाचने... शर्मा जी ने सोचा, शायद कोई परिचित है। अंधेरे में चौंधियाते हुए शर्मा जी ने चेहरा देखा तो सबके सब मोहल्ले के छिछेरे थे... मन ही मन शर्मा जी इनसे दबते रहे हैं। सो बोलती बंद हो गई... मोबाइल फोन मांगने के लिए रिरियाने लगे तो उनके सामने ...उनके ही मोबाइल फोन से लौंडे अपनी गर्लफ्रैंड से बातें करने लगे।
शर्मा जी लुटे थे इसलिये लुटी हुई मुद्रा में घर आए और पत्नी को सूरत-ए-हाल कह सुनाया। निदान निकाला गया कि ये लड़के जिस नाई की दुकान पर उठते- बैठते हैं उनसे गुहार की जाए। दूसरे दिन सुबह- सुबह शर्मा जी ने सैलून में जाकर उसके मालिक से बातचीत की... उसने कहा कि पांच सौ रुपये उन्हें दे देने पर दस हजार की उनकी मोबाइल वापस मिल सकती है। शर्मा जी खुश हो गए... लुटेरों के इस पेशेवर अंदाज पर जैसे फ़िदा हो गए... उनकी ईमानदारी पर जैसे मुग्ध हो गए। तुरंत से पहले पांच सौ का नोट दिया और शाम को उनका मोबाइल फोन वापस हो गया।
तो शर्मा जी लुटेरों की इस अदा पर फ़िदा थे और हर वक़्त चहक रहे थे...ऐसे ही चहकते हुए मेरे पास आए और लूट के पेशे पर बहस करने बैठे। लूट को लेकर मैने भी अपना तजुर्बा उन्हें सुनाया। बताया कि एकबार मुझसे एक लड़के ने टाइम पूछा... दन से ऊपर के दाहिनी जेब से मोबाइल निकालकर उसे टाइम बताने के लिए देखने लगा कि लुटेरे को मेरा मोबाइल पसंद आ गया... बताने की उसने जरूरत नहीं समझी और मोबाइल छीनकर ले भागा।...ऐसे ही किस्सों से बात बढ़ी। फिर ये हुआ कि लुटेरों का भी एक आचार संहिता होनी चाहिये। इस पाक़ पेशे में इन दिनों कई नापाक़ लोग आ गए हैं। मसलन, कहीं भी किसी के कान पर सटाकर दम निकाल दे रहे हैं। उन्हें भी पता है कि मारना नहीं है और लुटने वाले को भी पता है कि ये बेवजह का भौकाल कान पर चिपकाए दे रहा है। ये कोई छिछोरा पेशा तो है नहीं इसलिये इसका भी कोई क़ायदा और अपनी तहजीब होनी चाहिये। होना ये चाहिये कि लुटेरे जब कभी किसी को लूटें तो एक कूपन दे दें... उस कूपन की वैधता एक महीने- दो महीने या साल भर होनी चाहिये। यानी, जो एक बार लुट गया उसे कम- से- कम उस कूपन की वैधता तक बेधड़क कहीं भी आने- जाने मोबाइल और पर्स साथ ले जाने की छूट मिले। ये सुविधा स्त्रीलिंग और पुल्लिंग, दोनों पर बहाल होनी चाहिए।
कूपन रहते कोई पाक़ किस्म का लुटेरा हाथ लगाता है तो उस कूपन को दिखाकर आगे बढ़ जाएं...। इसमें छोटा रीचार्ज स्टाइल वाली भी व्यवस्था हो...अगर मोटा कैश लेकर कहीं आना- जाना हो तो तीन दिनों या दो दिनों के छोटे रीचार्ज पर भी काम चलाया जा सके... और हां, बिना कूपन के कोई मिले तो बनियान छोड़कर लुटेरे उसका सबकुछ उतरवा सकते हैं... या लुटेरे चाहें तो ऐसे सज्जन को इस जुर्म में जेल भिजवाने की सिफारिश भी करवा सकते हैं... जैसे डीटीसी बसों में लिखा होता है कि बिना टिकट पकड़े गए तो छह माह की सश्रम जेल या इतने हजार रुपये जुर्माना या दोनों ही भुगतना पड़ेगा।...लुटेरों को सुविधा ये होगी कि वे किसी भी वेष में रह सकते हैं। मसलन, ऑटो चालक, टैक्सी चालक, सार्वजनिक जगहों पर ...यानी हर कहीं...जाने किस रूप में भगवान मिल जाएं। किसी को भी किसी भी वक़्त टिकट चेक करने की मुद्रा में लुटेरों को लोगों का बटुआ तलाशने की सुविधा होगी। ये उनपर होगा कि लूट के समय मिला नोकिया का कौन -सा मॉडल उन्हें सूट करता है। पसंद नहीं आने पर लप्पड़- थप्पड़ करने की भी उन्हें सुविधा होगी...नागरिकों को ये सुविधा नहीं होगी (अबतक है क्या?) कि ऐसे मामलों में ख़्वामख़ाह थाने और पुलिस को परेशां करें... अगर थाने भी गए तो पुलिस को ऐसे लोगों को लतियाकर निकाल बाहर करने की सुविधा होगी। और लुटेरों को ये सुविधा किसी भी वक़्त... दिन हो या रात... हर वक़्त होगी, ये उनकी इच्छा है कि उन्हें किस शिफ़्ट में काम करना पसंद आता है... लेकिन अख़बार वालों को ये सुविधा नहीं होगी कि वे ऐसा लिख दें कि दिनदहाड़े लूट... वे ये भी नहीं लिखेंगे कि फलां जगह एक आदमी लुटा या पिटा। हां, वे लिख सकते हैं कि - रिचार्ज कूपन नहीं रखने की सजा मिली।
शर्मा जी से बहस के बाद इस नतीजे पर पहुंचा कि इस तरह की संहिता बन जाने के बाद जैसे रामराज का मंज़र हर ओर दिखने लगेगा। शर्मा जी भी खुश हुए कि इसमें हर वर्ग का ख़्याल रखा गया है... क्या शरीफ़ और क्या लुटेरे। क्या पुलिस और क्या पब्लिक। क्या महिला और क्या पुरुष। आजकल हम इसी आचार संहिता को व्यापक रूप देने में लगे हैं।