वरिष्ठ टीवी पत्रकार श्री अंशुमान त्रिपाठी जी को मैने व्यंग्य- लुटेरों के लिए भी आचार संहिता बने- मेल किया था। जिसे पढ़ने के बाद उनकी दिलचस्पी टिप्पणी आईः संजीव
संजीव भाई, लुटेरों के लिए ही आचार सहिता होती हैं। शर्माजी हमारे आपके जैसे इंसान हैं। नाईयों की मदद से ही हम आपकी जिंदगी संवरती सुधरती है। बीबियां भी हमारी मर्दानगी के किससे मुश्किल से ही सुनती है। और हिंदी न्यूज चैनलों में काम करते करते बाहर रिरियाने की,कमजोर को छकाने की और अपनों के बीच गाल बजाने की आदत हो जाती है। लइके बड़े लायक थे। जिस नाई के यहां बैठते थे उसीकी नहीं बजाते थे। हमारा तो पेशा ही ज़रा उल्टा है। गर्लफ्रेंड अगर शर्माजी की भी होती तो कसम से वो रिक्शे पर बैठे बैठे मोबाइल पर बतियाते हुए आते। पीटीसी समझा रहे होते, एंगल बता रहे होते या फिर उसके खिलाफ साज़िश का पर्दाफाश सुना रहे होते। ज़रूर शर्माजी कापी रायटर रहे होंगे। अदने से, लिए हुए छोटे छोटे से सपने से,सुंदरी अगर कॉपी जंचवाने आजाए तो सुंदर सपनों में खो जाते होंगे। उन्हें जीवन जगत का प्रेमी बनाया होगा ऐसे ही किसी प्यार ने। बड़े प्यारे जीव हैं पत्नी से बात करने का वक्त निकाल लेते हैं। या तो उनका बॉस नई नौकरी या छोकरी ढूंढ़ने में व्यस्त होगा। वरना न्यूज़ चैनलों से खबरों के गायब होने के लिए वो ही जिम्मेदार माने जाते। तो कुल मिला कर समस्या यही है कि किसके आचार को आधार बना कर संहिता बनाई जाए। शर्माजी, वो लुटेरे,या अमर नाई जिसने 500 के नोट में मोबाइल जायदाद वापिस दिलवाई। हां भाई सब जानते हैं कि महंगा मोबाइल खरीद पाना हैसियत से बाहर है लेकिन हैसियत बढ़ाने के लिए दिखाना ज़रूरी है। तो पत्रकार के लिए मोबाइल अचल संपत्ति के बराबर ही है। कईयों की नज़रें टेढ़ी हुई होंगी- कहां से खरीदा इतना महंगा मोबाइल। मोबाइल से उनका ये लगाव ही उनको महंगा पड़ा। बहरहाल संजीव भाई देख लीजिए कहीं हमने खींच खींच कर इसे लंबा तो नहीं कर दिया। मुख्य लेख से अगर बड़ा हो गया हो तो माफी चाहुंगा। दरसल बचपन में संपादकजी को पत्र भेज भेज कर लिखना सीखा था। कुछ साथी उप संपादक मुख्य लेख से बड़ी मेरी प्रतिक्रिया छाप देते थे। मुझे मेरी प्रतिभा का अहसास बचपन में ही हो गया था। बाद में पता चला कि ये प्रतिक्रियाएं ही बड़े पत्रकारों का लेख होती हैं। यानि नया लिखने के लिए तो रिसर्च की ज़रूरत पड़ती है। इसलिए ज़ल्द से जल्द इतना बड़ा पत्रकार बन जाना चाहिए कि प्रतिक्रिया ही मूल पर भारी पड़ जाए। तो संजीव भाई आचार संहिता तो हमारे जैसे पत्र लेखकों के लिए भी बननी चाहिए जो मूल रचना की कनपटी पर लंबी प्रतिक्रिया की दोनाली रख कर भोकाल क्रिएट करते हैं। अगर ये दोनाली लेकर आप साइबर यात्रा पर निकल जाए और दिन भर में 25-50 ब्ल़ाग पर डाका मार आए, तो यकीनन आप रातों रात ऑन लाइन जर्नलिज्म में छा जाइएगा। टारगेट ञाडिएंस की पूरी टीआरपी मिलेगी। सो माफ कीजिएगा, अआगे फिर कहीं मुलाकात होगी।
1 कुछ तो लिखिए जनाब:
सबसे पहले तो प्रणाम...अंशुमान त्रिपाठी जी की टिप्पणी पढ़कर मजा आया...लेकिन आपकी आचार संहिता की सिफारिश उससे भी अच्छी लगी..आप लोगों के आशीर्वाद से मैं भी ब्लॉग पर आ गया हूं...नाम है...बोलुंगा डॉट ब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम....चाहुंगा...आप उस पर भी अपनी टिप्पणियां प्रेषित करें...और त्रुटियां बताकर मार्गदर्शन में सहयोग करें...जय हो आपका....अरविंद शुक्ला
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