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Saturday, December 5, 2009

सरकार, नाराज़ हो रहे हैं

पिछले दिनों संसद में वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी साहब हत्थे से उखड़ गए। महंगाई के सवाल पर उखड़े थे। उससे दो दिनों पहले मुंबई आतंकी हमले में प्रभावित परिवारों को मुआवजे को लेकर लालकृष्ण आडवाणी की बात पर प्रणब दा उखड़ गए।... प्रणब दा का कहना था कि मुंबई आतंकी हमले की आंच पर बीजेपी अपनी सियासी रोटी सेंक रही है। जबकि आडवाणी इसका ब्यौरा दे रहे थे कि कितनों को मुआवजा नहीं मिला जो उन्हें मिलना चाहिये था।... उससे पहले सरकार में विदेश मंत्री एसएम कृष्णा और विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर फाइव स्टार होटलों में पाए गए। दोनों, खर्च कटौती की सोनिया गांधी की नई मुहिम को पलीता लगाते रहे और हो- हल्ला होने पर दोनों शाहखर्च मंत्री अकड़ गए कि वे अपने खर्चे पर फाइव स्टार होटलों में सुकून ढूंढ़ रहे थे। हाल में इसी यूपीए सरकार के एक और मंत्री सुल्तान अहमद भी फाइव स्टार होटल का सुकून उठाते देखे गए। लेकिन उम्मीदों से कहीं उलट बंगाल शेरनी ममता बनर्जी ने उस न्यूज़ चैनल को सीपीएम का न्यूज़ चैनल बता दिया जिसने इस ख़बर को प्रमुखता से दिखाया था। उस दिन भी लोगों को हैरानी हुई होगी देश में चीनी के लगातार बढ़ते दाम के कारण आम लोग परेशान थे।... गन्ना समर्थन मूल्य को लेकर किसान आंदोलन तेज था। लेकिन प्रणब दा विकास दर को लेकर अच्छा संकेत दे रहे थे। या फिर सरकार की तरफ से ये भी कहा जा रहा था कि हिंदुस्तान में आर्थिक मंदी बेअसर रहा। एक और अवसर आया... जब सवाल पूछने वाले सांसद लोकसभा से ग़ैर हाज़िर थे। सरकार की तरफ से बयान आया कि इतना पैसा जाया होता है...कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला ने इसे चिंताजनक बताया। दरअसल, सवाल पूछने वाले 18 सांसद सदन से ग़ायब थे और बीस सवाल पूछे जाने थे।...इसके ठीक दो दिनों बाद राज्यसभा में भी सवाल पूछने वाले सदस्य ग़ायब पाए गए जिसमें समाजवादी पार्टी के अमर सिंह के साथ कई और सदस्य ग़ायब थे... लेकिन दिलचस्प बात ये है कि ग़ायब रहने वालों की फेहरिस्त में राजीव शुक्ला का भी नाम शामिल था जो दो दिनों पहले सवाल पूछने वाले सदस्यों की ग़ैर हाजिरी को चिंताजनक बता रहे थे।
इन तथ्यों को देखने के बाद साफ है कि सरकार आत्मविश्वास से भरी हुई है। लोकसभा चुनाव नतीजों ने यूपीए और ख़ासतौर पर कांग्रेस को जिस तरह की सफलता मिली, उसने विपक्षी दलों के लिए जैसे हताशा जैसी स्थिति पैदा कर दी है।... साफ लग रहा है कि कमजोर विपक्ष के रहते सरकार पूरी तरह से निश्चिंत है। यहां तक कि सहयोगी दल भी उसपर किसी तरह से दबाव बनाने की हैसियत में नहीं हैं। किसी ने घुड़की दिखाई तो सरकार के पास कई विकल्प हैं... जो सरकार की पालकी ढो सकते हैं। वामदल, लालू और पासवान सरीखे कह रहे हैं कि वे जब कमजोर पड़े तो विपक्ष पर इसका सीधा असर पड़ा है। सरकार की मनमानियों के ख़िलाफ़ वामदलों के पास बोलने की ताक़त नहीं रह गई है। लेकिन कॉमरेडों के पास जब ताक़त थी, तो उनका जनवादी चेहरा कमजोर था। लालू यादव अब दो रुपये किलो आलू का प्रचार कर रहे हैं लेकिन जब इनमें सामर्थ्य था... ताक़त थी तो जनता के सवालों पर जूझने की बजाय उन सबने यूपीए सरकार की पालकी ढोयी। इसलिए उनका ये कहना, बहाने से कम नहीं लगता कि अगर वे बेहतर ताक़त में होते तो सरकार ऐसी मनमानियां नहीं कर पाती। विपक्ष भी जानता है कि महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा है, लेकिन अव्वल तो वे भी मौजूदा सरकार का कोई विकल्प दे पाने में अबतक विफल रहे... दूसरे, उनके पास इसका हौसला भी नहीं रह गया है। सो, प्रणब दा उखड़ रहे हैं... बंगाल शेरनी लाल- पीला हो रही हैं... लोग, बस ताक रहे हैं।

2 comments:

bindas bol said...

bahut khoob

Anonymous said...

बढ़िया है