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Friday, August 13, 2010

सच और झूठ

प्रोफ़ेसर नवीनचंद लोहनी, चौधरी चरण सिंह विवि के हिंदी विभागाध्यक्ष हैं। उनके ब्लॉग -नब्बूजी- पर जाना हुआ तो लौटते हुए आपके लिए यह कविता ले आया- संजीव

मुझसे पिता ने कहा

पिता को उनके पिता समझा गये होंगे

‘‘सत्य बोलना पुत्र,सत्य की सदा विजय होती है।’’

तब कौन सा युग-धर्मसिखा रहे थे पिता अपने बेटों को।

अब भी क्या वैसा हो होगा,सत्य का प्रतिरूप?

जैसा कि दादा, परदादा

सिखाते रहे थे अपने बच्चों को,

और जैसा पिता समझाते रहे हमें।

कि सूर्य एक है

ऐसे ही सत्य है एक, शाश्वत।

सब बातें, सारी किताबें के

उलट - पुलट हो रहे हैं अर्थ,

कि ‘सत्य बोलना’ जुर्म सा हो गया हो

अब, जबकि,

तब क्या हम भी यही

सिखायेंगे बच्चों को?

क्या मजबूरी होती है पिताओं की

कि वे बच्चों को सिखाना चाहते हैं,

केवल सच, जबकि

आज बन गया है एक जुर्म

सच बोलना, सुनना या देखना।

झूठ है किस

सच बोलकर ही जी जा सकती है खुशनुमा जिन्दगी।

आज जबकि हम देख रहे हैं,

सच के मुँह पर है ताला,

और झूठ रहा है खिलखिला,

सच्चों को जीने की देता है शिक्षा

तब हम क्या सिखायेंगे बच्चों को।

जबकि बच्चे जन्मते ही

हो जाते हैं सयाने।

कि पकड़ सकते हैं

मुंह पर ही हमारा झूठ।

Wednesday, August 4, 2010

...जब मैं मॉल देखने गया

दोस्तो, कई चीजों पर आपसे अपना अनुभव बांटना चाहता हूं। सो, इसकी पहली किस्त आपके सामने है। (इसे गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं, बस यूं ही चकल्लसबाजी भर है )- संजीव।
ठाकरे साब के मच्छर वाले बयान की क़सम। बहन जी के गले में डाली गई नोटों की माला की क़सम। क़सम राहुल महाजन के छिछोरेपन की। कसम कलमाडी के कॉमनवेल्थ की। ...मैं ऐसी कसमें किसके लिए खा रहा हूं ? क्यों आंय- बांय की कसमें खाकर पाठकों को पकाए जा रहा हूं?
इतना किरिया- कसम खाने के बाद भगवान झूठ न बुलवाए। यह 21वीं सदी का उत्तरार्ध था। जगह- जगह मॉल खुल रहे थे। अंग्रेज़ी के MALL को हम अज्ञानी, मूर्ख और जाहिल जन, सहज भाव से - माल- मानकर पढ़ते और यही सोचते। मित्रो! जानता हूं कि आप भी यहां माल का मतलब माल- आसबाब से नहीं लेंगे लेकिन आपको स्वतंत्रता है कि बौद्धिक दिखने के लिए ऐसा कर लें। जैसा कि जानते हैं कि हम जैसे छिछोरों के लिए माल का मतलब एक ही है। तो ऐसा ही मैं समझता था।
ख़ैर। मूर्ख था, सो मूर्ख़ों से ही दोस्ती थी। यही दोस्त मजा लेते- बेट्टा, अंदर ढुककर (घुसकर) देखो...एक-से-एक माल है ! अंधरिया रात में मौक़ा देखकर एकदिन मॉल के बहाने माल देखने चला। चेहरे की भौतिक दशा ऐसी थी, मानो मॉर्निंग शो में अंग्रेज़ी की एडल्ट फिल्म देखने जा रहे हों।
दोस्तो, भगवान झूठ न बुलवाए। किशोरावस्था के इस शग़ल के कारण कई बार जूते पड़े लेकिन एडल्ट फिल्म देखने का कर्म पूरी तरह से निभाया। चपंडुक दोस्त, जो एडल्ट फिल्म देखने के माहिर, तज़ुर्बेकार और अनुभवी थे (कच्ची कली, जवानी की आग जैसी फिल्में दूध का दांत टूटने से पहले ही देख चुके थे) उनके आगे घुन्ना बन जाता। देख तो मैं भी चुका था लेकिन इन दोस्तों के सामने इंप्रेशन देता कि ये बातें मेरे लिये वाहियात हैं। या मेरी इन सब चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं। दोस्तो, मैं न तो बौद्धिक था न ही मुझमें बौद्धिकता के लेश मात्र भी लक्षण थे लेकिन जीवंत और सहज ढोंग में पारंगत मैं तब से लेकर अबतक बौद्धिक समझा जाता रहा हूं।
तो मॉल के दर्शन के समय ऐसा ही भाव था। या फिर ऐसा, जैसे पहली बार घर से भागकर पटना के अशोक सिनेमा हॉल में -शोले- फिल्म देखी थी। चार दिनों की रेकी (हेडली भाई साहब की मुंबई आतंकी हमलों के दौरान की गई रेकी की ख़बर पढ़ने के बाद समझ पाया कि इसे रेकी कहते हैं) के बाद पांचवें दिन टिकट खिड़की में डर के मारे कंपकपाते हाथ घुसेड़ दिये। डर लग रहा था कि टिकट वाला पूछ देगा- कहां घुस रहा है रे ? टिकट वाले ने पूछा कि किस क्लास का टिकट चाहिये ?...घिग्घी बंध गई। कहीं यह तो नहीं पूछ रहा कि किस क्लास में पढ़ते हो ?...घबराते हुए ऐसे कहा जैसे सब्जी बाजार में आलू ख़रीदते हुए अक्सर कहता था- जितना का आ जाए, दे दीजिये। झल्लाकर उसने सबसे आगे का टिकट थमा दिया। एकबार फिर मैं बाहर जाकर इत्मीनान हो आया कि कहीं बाहर तो कोई जान- पहचान वाला नहीं है। टिकट वाले मुच्छड़ को भी मैंने यह झांसा देने की कोशिश की कि मैंने ख़ुद के लिए यह टिकट नहीं खरीदा है बल्कि किसी सक्षम और वैध सज्जन के लिए मैने टिकट खरीदने में उल्लेखनीय योगदान भर दिया है।
ख़ैर। फिल्म शुरू होने के आधे घंटे बाद अंधेरे में टऊआते हुए सीट पर बैठे। आगे की सीट के कारण विशालकाय पर्दा। ट्रेन पर चल फाइटिंग सीन। ढिशुंग- ढिशुंग। एक- एक कर डकैतों को ट्रेन से फेंक रहे थे जय और वीरू। इंटरवल में बत्ती जलने पर असहज हो गया। मूंगफली वाले। पापड़ वाले। ठंडा बेचने वाले। घुरियाकर चले गए मगर मैं एकदम से मुंह सुखाए सीट से हिटा नहीं। कुछ देर बाद पर्दे पर स्टिल की सूरत में प्रचार आने लगा- आनंद साड़ी...गृहणियों की एकमात्र पसंद। हमारे शोरूम में आएं और घर की ख़ुशियां ख़रीदकर ले जाएं। कुछ ऐसे ही विज्ञापन आने के बाद लास्ट में आया- पिक्चर हॉल में बीड़ी, सिगरेट पीना मना है- आज्ञा से, सिनेमाहॉल प्रबंधक। दोबारा लाइट बुझी तो दिल को करार आया। मगर घर पर लातियाये जाने के डर से बेचैनी इतनी बढ़ी कि इंटरवल के पंद्रह मिनट बाद ही फिल्म छोड़कर निकल दिये। घर पर किसी को शक नहीं। वाह, आगे का रास्ता खुल गया! बस, कसक रह गई कि ठाकुर की बेवा पुत्रवधु को लालटेन जलाते- बुझाते छोड़ आया था।
तो ऐसा ही सुंदर, मनोरम और अतुलनीय भाव लिये मॉल देखने गया था। पहले भी एकाधा बार बाहर से झांक- झूंककर वापस चले गए थे। इसबार इरादा पक्का था और मंजिल सामने थी। सिक्योरिटी वाले चेक कर रहे थे। डर लगा। सोचा टिकट पूछेगा। कोई देख लेगा। चंडूखाने के वही मित्र कहेंगे- बेटा अकेले -अकेले माल देखने आया है? चौकन्नी नज़रों से इधर- उधर देखा। टिकट खिड़की कहां थी, जहां माल देखने का टिकट मिलता ? इसी अवस्था में सिक्योरिटी गार्ड ने अचानक क्रांतिकारी कदम उठाया और ठोंक दिया सलाम। बौराए अंदाज़ में सलाम का जवाब उसी अंदाज़ में सलाम ठोंककर दिया। क्रमश: दांत निपोर कर उसके आगे खड़े हो गए। (जारी)

Tuesday, July 27, 2010

बाज़ार में बनारस

हमारे मित्र पत्रकार राकेश पाठक ने अपने शहर बनारस को दिलचस्प अंदाज़ में याद किया है। आप भी पढ़ें, मजा आएगा। उनके ब्लॉग - इस मोड़ पर- से उड़ाया गया हैः संजीव
मेरा शहर है बनारस, जब आप कभी यहां आएंगे तो हो सकता है कि इसकी गुनगुनी तासीर में एक एक लम्स मेरा भी मिल जाए। खैर... बचपन में जब आप पिता जी की अंगुलियों को पकड़कर किसी शहर को बस और बस खुद के नज़रिए से देखने के लिए निकलते हैं तो कितना नया लगता है सब वैसा ही मुझे भी लगता था। कबीर चौरा चौराहे पर सोमनाथ चचा की पान की दुकान। जिसपर ब्रास की चद्दर चढ़ी चौकी पर लाल रंग के कपड़े में भीगे हुए पान लिपटे रखे रहते थे। शाम के वक्त बाबूजी के साथ उस दुकान तक पहुंचना मेरे लिए लंबा सफर था जो पहले पैदल फिर उनकी गोद में बैठकर पूरा होता था और रोचक होता था। अब ये सफ़र बहुत छोटा है बमुश्किल पांच से सात मिनट का पैदल...उबाऊ नहीं कहुंगा क्योंकि इतने कम वक्त में आप ऊब भी नहीं सकते। उनकी दुकान पर पहुंच कर मैं उस दुकान के पूरे कैरेक्टर को खामोश निगाहों से खोजता...सोमनाथ तो मिलते ही...उनके भाई मदन और उनकी मां...जिन्हे मैं देखता डरने के लिए था। मुझे सोमनाथ चचा कतई पसंद नहीं थे...अक्सर अकड़ में रहते हां पहुंचने पर ये उसी भावभंगिमा के साथ ये ज़रूर बोलते 'गुरूजी पालगी' और खिस्स से हंस देते वो और वहां खड़े सभी। मेरी मुट्ठियां बाबूजी के उंगली के इर्द-गिर्द और भिंच जाती। क्योंकि मुझे सबका अटेंशन पाने से परेशानी होती।एक छोटा मीठे पान का बीड़ा मेरे लिए भी होता था कभी-कभी। जिसे सोमनाथ चचा चुपचाप मेरे तक बढ़ा देते और मैं बाबूजी की तरफ सर उठाकर देखता और फिर सहमति मिलते ही उसी स्टाइल से दबा भी लेता। मेरी कोशिश ये होती थी कि जल्द से जल्द यहां से निकला जाए कहीं सोमनाथ चचा की मां न आ जाएं...पर किस्मत अक्सर खराब ही होती थी। वो कभी दुकान के अंदर से या फिर बाहर से चिल्लाते हुए आ ही जाती थीं। सफेद मटमैली धोती...वैसे ही बाल और चेहरे पर दुनिया भर से चिढ़े हुए भाव...और मुंह में गालियां। वो मुझे किसी कहानी की बुढ़िया जादूगरनी लगती थीं। गुस्सा हांलाकि उनके नाक पर होता था लेकिन मुझसे स्नेह था...सोमनाथ चचा से पूछतीं कि बच्चा के पान खिउवले...?कबीर चौरा दरअसल बनारस का क्लासिकल इलाका है। बनारस का 'दर्शन' अगर घाटों पर है तो 'शास्त्रीय बनारस' कबीर चौरा पर। शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना, कबीर चउरा से नागरी नाटक मंडली के बीच सड़क उस पार बसा है। पं कंठे महराज, उसके बाद गुदई महाराज, किशन महाराज, राजन-साजन मिश्र, बिरजू महाराज सब एक ज़माने में कबीर चौरा चौराहे से लेकर पिपलानी कटरा तक झूलते थे। गोपी की दुकान पर कचौड़ी सरियाते और भईया लाल की दुकान पर चाय के साथ गप-सड़ाका लगाते थे। मेरे बचपन में कबीर चौरा चौराहा और पिपलानी कटरा के बीच (जो एक किमी से भी कम क्षेत्र है) कम से कम चार किताबों की दुकानें थीं। यहां कोर्स की किताबों के अलावा स्टेशनरी मिला करती थी। इसके अलावा एक पत्र-पत्रिकाओं की दुकान हुआ करती थी। आज इस इलाके में एक भी किताबों की दुकान नहीं। इसका मतलब ये कतई नहीं कि दुकानें नहीं रहीं दुकाने तो पहले से ज्यादा हैं लेकिन कुछ में इंटरनेट कैफे है...और कहीं तो ठंडी बियर की दुकान तक खुल गई है। कांबिनेशन देखिए एक मंदिर है हनुमान जी का और उसके बगल में है ठंडी बियर की दुकान। बनारस एक समय में मोक्ष की नगरी थी। पर माफ किजिएगा अब नहीं है। पहले यहां की फिज़ां में भांग की मस्ती होती थी। अब दारू की दुर्गंध है। सड़क के मकान दुकानों में तब्दील हो गए हैं। गली के मकान कटरों में। मंदिरों के चारदिवारियों को भी दुकानों में बदल दिया गया है। और मंदिर तो दुकान हैं ही। एक अजीब सा घालमेल चल रहा है। ये उन्ही लोगों की साज़िश है जो बनारस के हैं और बनारस को ज़िंदा नहीं रखना चाहते। विकास बाज़ार का हो रहा है, बनारस का नहीं। ये बाज़ार बनारस में किसी कैंसर की तरह पनप रहे हैं। बनारस की धमनियों रक्त रूक-रूक के दौड़ता है आजकल। यही वजह है कि जब आप बनारस आते हैं तो घुटते शहर को देखकर आपको भी अफनाहट हो सकती है। सड़के जाम है, गलियां की बजबजाती रहती हैं भीड़ से, दुकानों से और ओवर फ्लो होते सीवर से। जानेमाने लेखक और समीक्षक काशी नाथ सिंह जी ने 'काशी की अस्सी' में जिस काशी का ज़िक्र किया है जिन कैरेक्टर्स को खींचा है उनमें से आज एक भी बनारस में ज़िंदा नहीं। पहले वो कैरेक्टर बनारस की हर चाय की दुकान, पान की दुकान पर या फिर गलियों में नज़र आते थे। अब लोग भांग का कर बौराते नहीं है दारू पीकर नालियों में लुढ़कते हैं और मक्खियों से लिपटे पाए जाते हैं। होश आने पर नज़रें शर्म से झुकती नहीं बल्कि उजड्डों की तरह घूरती निकल जाती हैं। उजड्ड लफंगों की टोली बनारसी मस्ती के नाम पर नंगा नाच करती है हाथों में दारू की बोतल और मुंह में चिकन की टुकड़ा दबाए। ये टोली हर त्योहार में पाशविक हो उठती है। बनारस को बेचती ऐसी कई टोलियां आपको जाने पहचाने इलाकों में मिलेंगी...ये नए बनारस के 'बाज़ार संस्कृति' की संकर औलादें हैं जो बनारस को बुझाने और इसकी तासीर बर्बाद करने का षडयंत्र रच रही हैं। इन्हे देखकर लगता है कि वो दिन दूर नहीं जब बनारस किसी बाज़ार में बिकता नज़र आएगा...या फिर तेज़ी से बनते बाज़ार के ब्लैक होल में समा जाएगा।

Thursday, July 22, 2010

गोलकीपरों की नियति

फुटबॉल को लेकर आप क्या राय रखते हैं ?...आपको किस पोजीशन में खेलने वाला खिलाड़ी पसंद है ? ज़ाहिर है कि सेंटर फॉरवर्ड से खेलने वाले खिलाड़ी को ही आप पसंद करेंगे। जो गोल दागता है। विरोधियों को पछाड़ाता, उनकी सांसें उखाड़ता, किसी सनसनी की तरह चक्रव्यूह को तोड़ता, उनके दुर्ग यानी डी एरिया तक पहुंच जाता है। आख़िर में गोल दागकर खुशियां मनाता, अपने खेमे की तरफ लौटता है या फिर गोल नहीं कर पाने का अफसोस लिये।
फुटबॉल भी अजब खेल है। इस खेल में अलग- अलग पोजीशन से खेलने वाले ख़िलाड़ियों के साथ न्याय नहीं होता है। अगली पंक्ति के ख़िलाड़ियों को आप शायद ही खेल प्रेमियों के बीच `खलनायक' के तौर पर पाते हैं। कभी- कभी, गोल करने का आसान -सा मौक़ा चूक जाने पर आप उस खिलाड़ी को कोसते हैं लेकिन उसे मैच के ख़लनायक के तौर पर शायद नहीं देखते।
अगली पंक्ति के यही खिलाड़ी जब गोल- दर- गोल दागते हैं तो प्रशंसकों पर उनका करिश्मा सिर चढ़कर बोलता है। फुटबॉल के ज्यादातर स्टार खिलाड़ी, इसी अगली पंक्ति से खेलने वाले हुए। पेले हों या फिर मेराडोना। बेकहम हों या फिर रोनाल्डो। अगली पंक्ति में खेलने वाले स्टार खिलाड़ियों के नामों की फेहरिस्त लंबी है।
अगली पंक्ति के इन खिलाड़ियों के साथ कुछ सुविधाएं भी हैं। ये खिलाड़ी अगर अपनी टीम के लिए गोल करते रहें तो मैच हारने के बाद भी उनके पास स्टार बने रहने के अवसर हैं। उनके साथ प्रशंसकों की यह सहानुभूति हमेशा बनी रहती है कि उस खिलाड़ी ने अपना काम बख़ूबी किया।
इसके बरअक़्स कभी गोलकीपर की स्थिति पर ग़ौर करें तो आप हैरान रह जाएंगे। गोलकीपर मैदान में खड़ा अकेला खिलाड़ी होता है, जिसके पास गोल दागने की कोई गुंजाइश नहीं होती। उसके पास गोल दागने के बाद अपनी जर्सी को मैदान में उतारकर खुशियां मनाने का अवसर कभी नहीं होता।
आप कह सकते हैं कि गोलकीपर हथियार नहीं ढाल हैं। एक गोलकीपर के तौर पर वह सिर्फ विरोधियों के आक्रमण को विफल भर कर सकता है। गोल रोकने की उसकी हर तरतीब, हर बाज़ीगरी और कोशिश, ड्यूटी के तौर पर ली जाती है। कभी- कभार ही उसे दर्शकों की तालियां नसीब होती हैं।
गोलकीपरों के लिए दर्शकों के बीच स्टार का दर्ज़ा हासिल कर पाना बेहद मुश्किल होता है। गोलकीपर अगर टीम का कप्तान हो, तो उसका भाग्य जरूर संवर सकता है। मसलन, हाल की विश्वकप विजेता स्पेन की टीम के कैप्टन केसिलास का उदाहरण सामने है। लेकिन यहां भी केसिलास की गोलकीपर के तौर पर हासिल की गई उपलब्धियां बहुत चर्चा में नहीं हैं, बल्कि विश्वकप विजेता टीम के कप्तान की हैसियत से उनकी चर्चा है। जबकि इसी विश्वकप में कैसिलास, सर्वश्रेष्ठ कप्तान के साथ- साथ सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर भी चुने गए।
गोलकीपरों की हैसियत, क्रिकेट के विकेटकीपर से भी बहुत कम होती है। क्रिकेट में विकेटकीपर, बैट्समैन को स्टम्प कर आउट कर सकता है या फिर विकेट के पीछे शानदार कैच कर किसी भी छोटे- बड़े बैट्समैन को पवेलियन के लिये भेज सकता है। लेकिन गोलकीपरों के पास क्या गोल कर पाने का कोई अवसर है ? वे गोल खा सकते हैं, गोल कर नहीं सकते।
विकेटकीपर के मुकाबले गोलकीपरों को देखें तो एक और चीज़ सामने आती है। विकेटकीपर जितनी बार बल्लेबाज को स्टम्प करता है, यह उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों में दर्ज़ भी होता है। फुटबॉल में खिलाड़ी जितनी भी गोल करता है, यह भी उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों में दर्ज़ होता है। लेकिन गोलकीपर की तक़दीर देखिये, उन्होंने कितने गोल रोके, कितनी दफ़ा गोल रोकने के उसके तजुर्बे ने टीम को निश्चित हार से बचा लिया, यह उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों में कहीं दर्ज़ नहीं होता। एक गोलकीपर जब अपना खेल करियर ख़त्म करता है तो उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों में आख़िरकार क्या होता है ? महज़ शून्य या फिर फक़त गोल।
गोलकीपरों की मायूसियों का सबब इतना भर नहीं है। प्रशंसकों में भी गोलकीपर की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। ज्यादातर नज़दीकी मुक़ाबलों में गोलकीपर अगर हारी हुई टीम का सदस्य है, तो उसके ख़ाते में सिर्फ आलोचना आती है। टीम की हार का ज्यादातर ठीकरा सबसे पीछे खड़े उस अकेले खिलाड़ी पर फूटता है, जिसके पास कोई करिश्मा कर दिखाने का मौक़ा नहीं होता।
अभी फुटबॉल विश्वकप के दौरान हुए इंग्लैंड और अमेरिका के बीच हुए ग्रुप सी के पहले मुक़ाबले को ही याद करें। माना गया कि शुरुआती बढ़त के बावज़ूद इंग्लैंड के गोलकीपर रॉबर्ट ग्रीन की भयंकर भूल की वज़ह से यह मैच ड्रॉ हो गया। फुटबॉल के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जब मैच के खलनायकों के तौर पर गोलकीपरों को चिह्नित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई।
जबकि टीम अगर जीतती है तो कभी गोलकीपरों की वज़ह से नहीं बल्कि अगली पंक्ति के खिलाड़ियों के कारण जीतती है। अगली पंक्ति के खिलाड़ी ही विपक्षी खेमे पर गोल दागकर टीम को जीत तक ले जाते हैं, जिसमें गोलकीपरों की कोई भूमिका नहीं होती है। इसलिये गोलकीपरों को टीम की हरेक जीत में ही अपनी खुशी भी ढूंढ़नी होती है और टीम की हरेक हार की जिम्मेदारी स्वीकारने का उसे जैसे अभिशाप होता है। थोड़े ख़ुशनसीब वे गोलकीपर हैं जो अपनी टीम के कप्तान हैं और क़ामयाब कप्तान के तौर पर वे शोहरत बटोरते हैं। यानी, फुटबॉल की इसबार की विश्वविजेता टीम स्पेन के कैप्टन केसिलास की तरह दूसरे गोलकीपरों का भाग्य इतना बुलंद नहीं है।

Tuesday, July 13, 2010

हैप्पी बर्थ डे पापा...

पत्रकार अमृत उपाध्याय ने अपने पिता को उनके जन्मदिन पर याद किया हैः संजीव
13 जुलाई,मेरे लिए बेहद ख़ास तारीख़, कथाकार और पत्रकार रामेश्वर उपाध्याय का न्मदिन है आज। रामेश्वर उपाध्याय की पहचान एक सशक्त लेखक, जुझारू पत्रकार और ज़िंदादिल इंसान के तौर पर सबसे ज़्यादा रही। चौहत्तर के आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने के साथ-साथ कलम की बदौलत बदलाव की उनकी कोशिश जारी रही। 'मीसा' के तहत नजरबंदी के दौरान ‘नागतंत्र के बीच’ उपन्यास की रचना, चर्चित कहानी संग्रह ‘दुखवा में बीतल रतिया’ और 'गृहयुद्ध' उपन्यास लिखा उन्होंने। बतौर पत्रकार रामेश्वर उपाध्याय ने 'नवभारत टाइम्स', 'धर्मयुग', 'श्रीवर्षा', 'रविवार' और 'न्यूज ट्रैक' जैसे अख़बारों और पत्रिकाओं में लगातार लिखा।‘भोजपुर न्यूज’ अख़बार का संपादन किया। अख़बार और खुद पर कई मुकदमे हो जाने की वजह से उन्होंने वकालत शुरू की।
ये सारी बातें मैं इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि अब से 13 साल पहले 19 अक्टूबर 1997 को रामेश्वर उपाध्याय की हत्या कर दी गई। हत्या के 13 साल बाद, 13 जुलाई को इन बातों का जिक्र इसलिए करना पड़ा क्योंकि उस दौर से इस दौर के बीच का तार कहीं टूट ना जाए। मुझे फ़क्र है बेहद, कि मैं रामेश्वर उपाध्याय का बेटा हूं, और अफसोस, कि उनके जैसे बनने की बचपन से चल रही कोशिश में मैं 99 फीसदी पीछे रह गया। रामेश्वर उपाध्याय से जुड़ी कुछ तस्वीरें और अहमियत वाली कुछ चीज़ें ब्लॉग पर जारी कर रहा हूं। दरअसल मैंने कुछ और लिखा है उनकी याद में, लेकिन यादों को सिलसिलेवार काग़ज़ पर उतारते वक्त काफी लंबा लिख दिया मैंने। अब संकोचवश इसे नहीं जारी कर रहा हूं फिलहाल।(ऊपर:मीसा के तहत नजरबंदी के बाद की तस्वीर)
(कमलेश्वर के साथ तमाम लेखकों की ये दुर्लभ तस्वीर है शायद, तस्वीर में बीच में कमलेश्वर हैं, उनके बायें हाथ के ठीक पीछे प्रेम कुमार मणि, उनके हाथ से सटे ठीक बायें मधुकर सिंह, और इन दोनों के बीच में पीछे रामेश्वर उपाध्याय...तस्वीर में दाहिने से दूसरे नंबर पर, जिनका हाथ एक बच्चे के कंधे पर है, वो हैं हृषिकेश सुलभ , सारे लेखकों को मैं दरअसल नहीं पहचान सका हूं अबतक)

Tuesday, July 6, 2010

मीडिया, माही और महंगाई

मेरे एक मित्र ने भारत बंद को लेकर एक दिलचस्प सवाल पूछ दिया। उनका कहना था कि रविवार की बजाय सोमवार को भारत बंद के दौरान अगर महेंद्र सिंह धोनी शादी करते तो मीडिया में भारत बंद की हवा निकल जाती। हालांकि मेरा कहना था कि मीडिया में धोनी की शादी का बैंड बज जाता।
रविवार को धोनी की शादी और सोमवार को भारत बंद गुजर जाने के बाद मुझे अपनी ग़लती का अहसास हो गया है। धोनी की शादी चाहे भारत बंद के दौरान होती या फिर मुल्क पर आई किसी हाहाकारी कुदरती आपदा के वक़्त, टीवी स्क्रीन पर धोनी की शेरवानी, घोड़ा और शादी पर पकवान बनाने वाले हलवाई ही नज़र आते।
शादी के दूसरे दिन सोमवार को जब धोनी देहरादून से दिल्ली के लिये रवाना हो चुके थे, कई चैनलों पर उस रिसॉर्ट की तस्वीरें दिखाई जा रही थी। चारों तरफ़ बिखरे बासी फूल और ऊंघते- अनमनाते माहौल में पसरे हुए फर्नीचरों के सिवा वहां आख़िरकार क्या होता?.. वही थे। प्राइम टाइम में कई चैनलों ने इसे दिखाया।
शादी में मीडिया के लिए दरवाजे बाक़ायदा बंद थे। बावजूद इसके खबरचियों ने जान पर खेलकर `ख़ास आपके लिये' शादी की कुछ तस्वीरें हासिल कर ली थी। उन तस्वीरों को कुछ इस अंदाज़ में दर्शकों/ पाठकों के सामने परोसा गया, जैसे ये तस्वीरें न होती तो मीडिया की नाक कट गई होती।
कुछ चैनल धोनी की शादी से उनके क्रिकेट करियर पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में बता रहे थे। क्रिकेट विशेषज्ञ बता रहे थे कि कुछ पत्नियां इतनी लकी होती हैं कि मर्द की तक़दीर खुल जाती है। धोनी की पत्नी साक्षी भी उनके लिये लकी होंगी और माही इसबार क्रिकेट वर्ल्ड कप लेकर आएंगे। कुछ चैनल अतीत में क्रिकेटरों के मोहब्बत की दास्तां और शादी के रूप में उसकी परिणति के बारे में बता रहे थे।
मीडिया की मनोदशा पर समाजवादी नेता शरद यादव बिफ़र गए। दिल्ली में सोमवार को भारत बंद के बाद हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने खूब खरी -खोटी सुनाई। उनका कहना था `देश की करोड़ों जनता के सवाल को दरकिनार कर मीडिया, धोनी के ब्याह की ख़बरें दिखाता रहा। महंगाई के ख़िलाफ़ भारत बंद की ख़बरें चैनलों पर बहुत नहीं थी।'
क्या मीडिया को लेकर शरद यादव की शिक़ायत वाज़िब है? मीडिया की जरूरत ड्रामा है। सनसनी है। ग्लैमर है। शरद जी को ध्यान हो न हो, पॉलिटिकल ड्रामे के वक़्त मीडिया में नेता ही तो छाये रहते हैं। अभी हाल में नरेंद्र मोदी को लेकर बीजेपी- जेडीयू की वर्षों पुरानी मुहब्बत में आई तक़रार की ख़बरें क्या कम थीं?
पॉलिटिक्स में अगर ग्लैमर का तड़का हो तो वह भी तो खूब दिखाया जाता है। याद न हो तो अपने शशि थुरूर साहब प्रकरण को ही देख लीजिये।...तो शरद जी, ख़्वामख़ाह मायूस न हों। आपका भी ड्रामे का मंच है। आप भी अपने रंगकर्मियों को तैयार कीजिये। वे जब जलवा अफ़रोज़ होंगे तो टीवी स्क्रीन पर छा जाएंगे। मीडिया हर प्रकार के ड्रामे को महंगाई की मार से हलकान देश की जनता की थाली में परोसने को तैयार है।

Friday, July 2, 2010

Vinod Dua sings Ude Jab Jab Jhulfen Teri with wife Chinni.flv

वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ और उनकी धर्मपत्नी, शादी के एक समारोह में अपनी जुगलबंदी से मजा बांध दिया। youtube पर भी उपलब्ध है। सुनिये और आप भी गुनगुनाइयेः संजीव

Monday, June 28, 2010

रामनाम सत है!


नेता आख़िरकार नेता ही होता है। उसका सार्वजनिक जीवन, उसकी निज़ी ज़िंदगी, दोनों पर राजनीति का मुलम्मा चढ़ा होता है। अब तो लगता है कि बीवी- बच्चों के साथ भी उसके भीतर का नेता हमेशा सतर्क रहता होगा। राजनीति के साथ नेता जीते हैं, राजनीति के साथ ही मरते हैं। राजनीति चल रही है तो नेता को ज़िंदा मानिये, राजनीति ख़त्म तो नेता भी ख़त्म। लेकिन पिछले दिनों एक अच्छे नेता वाक़ई दुनिया छोड़ गए... हालांकि उनकी राजनीति अभी बहुत पड़ी थी। राजनीति ख़त्म नहीं हुई थी, दिग्विजय सिंह की ज़िंदगी ख़त्म हो गई।
दिग्विजय सिंह इसबार बांका संसदीय सीट से निर्दलीय चुनाव लड़कर जीते थे। उन्होंने नीतीश कुमार की अगुवाई में जेडीयू का यह मुग़ालता तोड़कर रख दिया था कि उन्हें चुनावी जीत के लिए जेडीयू की ज़रूरत है। जिस पार्टी को सींचकर बड़ा किया था, नीतीश कुमार की हनक में उसी पार्टी से उनका पत्ता साफ कर दिया गया था।
निर्दलीय चुनावी जीत के बाद भी नीतीश कुमार एंड कंपनी ने अपनी भूल को करेक्ट करने की कोई कोशिश नहीं की। जिस तरह से जॉर्ज फर्नांडीज़ का टिकट काटकर पार्टी ने दोबारा उन्हें राज्यसभा में भेज दिया, वह कलेजा नीतीश कुमार, दिग्विजय सिंह के मामले में नहीं दिखा पाए। ख़ैर, यह तो दिग्विजय सिंह के जीते- जी की राजनीति थी। उनके निधन की ख़बर पर नीतीश कुमार मीडिया के सामने आए। उन्होने विश्वास यात्रा पर निकलने से पहले पत्रकारों से बात की। इसबार दिग्विजय सिंह के बारे में नीतीश कुमार के पास कहने को ख़ास नहीं था। फिर भी कहा कि `उनके निधन पर गहरा दुख है। वह एक लोकप्रिय नेता थे और उनके समर्थकों- दोस्तों का दायरा बहुत बड़ा था।‘
कुछ घंटे के भीतर नीतीश कुमार जहानाबाद पहुंच गए, जहां उनकी विश्वास यात्रा का कार्यक्रम था। कुछ घंटे पहले तक मातमी हावभाव में दिख रहे नीतीश कुमार जनसभा को संबोधित करते हुए पूरी रौ में थे। वह अपनी सरकार की उपलब्धियां गिना रहे थे। विरोधियों पर हुंकार भर रहे थे। जनता- जनार्दन तालियां बजा रही थी।
यह तो बिहार की राजनीति थी। दिल्ली में भी दिग्विजय सिंह के आवास पर कुछ ऐसा ही मंज़र देखने को मिला। जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव ने ग़मगीन मुद्रा में बीजेपी के यशवंत सिन्हा को गले लगाया। ...चलते- चलते वहां खड़े कुछ बड़े पत्रकारों की खैरियत पूछी... जया जेटली की आंखों से भी आंसू निकले। एक बड़े कांग्रेसी नेता अफसोस के साथ बता रहे थे कि दिग्विजय सिंह को कांग्रेस में शामिल किये जाने की पूरी पटकथा उन्होंने तैयार कर दी थी... लेकिन उससे पहले ही वह दुनिया छोड़ गए।
दूसरे दिन दिग्विजय सिंह का पार्थिव शरीर ट्रेन के जरिये उनके पैतृक गांव जा रहा था। अपने कैबिनेट में मंत्री रहीं सुधा श्रीवास्तव के अंतिम संस्कार के लिए समय नहीं निकाल पाए नीतीश कुमार पटना स्टेशन पर दिग्विजय सिंह को अंतिम विदाई देने पहुंचे। नीतीश कुमार ने दिग्विजय सिंह को याद किया। यहां लालू प्रसाद यादव भी पहुंचे। उन्होंने दिग्विजय सिंह को याद करते हुए उन्हें महान नेता बताया। यह बताना नहीं भूले कि पटना के गांधी मैदान में दिग्विजय सिंह की अगुवाई में राज्य सरकार के ख़िलाफ़ महापंचायत हुई थी। लालू की शिकायत थी कि मरने के बाद भी राज्य सरकार दिग्विजय सिंह को उचित सम्मान नहीं दे पाई। दिग्विजय सिंह के पैतृक गांव नयागांव में उनकी अंतिम यात्रा निकाली गई... कई नेता भीड़ में शामिल थे। छोटे- बड़े सभी। अंतिम यात्रा में शामिल लोग ग़मगीन मुद्रा में बोल रहे थे- रामनाम सत है।

Sunday, June 27, 2010

वर चाहिये तो इधर आइए

दोस्तो, अभी- अभी - तहलका- से होकर आया हूं... इस बार तहलका ने कहानी विशेषांक प्रकाशित किया है जिसमें ख़्यातिलब्ध कथाकार काशीनाथ सिंह की कहानी छपी है। पढ़कर मिजाज एकदम्मे से तर हो गया। बहुत दिनों बाद किसी समाचार पत्रिका ने कहानी विशेषांक प्रकाशित किया और उम्दा कहानियां प्रकाशित की हैं। इस कहानी को आप यहां पढ़िये या फिर सीधे तहलका पर पढ़िये... लेकिन पढ़िये ज़रूर, बेहद मजा आएगा। टीवी के धारावाहिकों की प्रपंचों भरी कहानी, लकदक कपड़ों में सजे -संवरे, सुविधाओं से अघाए किस्म के किरदार और साजिशों से भरी हरक़तों के बीच इस तरह की कहानियां किसी ताज़ादम झोंके की तरह हैः संजीव



खरवांस उतर गया है और आज भोर से ही जीयनपुर के बगीचे में कोयल कूंकने लगी है.
ऐ दुनियावालों ! अगर तुम्हारे घर कोई कन्या है, कुंवारी है और सयानी हो चुकी है, हाई स्कूल पास या फेल है, चिट्ठी पत्री लिखना सीख गई है (भले प्राणनाथ प्राड़नाथ लिखते हुए उनकी कुसलता चाहती हो), अपनी सहेली के घर ज्यादा आने-जाने लगी है और उसके भाई के साथ एक-आध बार पकड़ी गई है और आपको अपनी नाक की चिंता होने लगी है तो घबड़ाइए नहीं, इधर आइए. बाबू जोखन सिंह तीन साल से आप जैसे ही देखुआर का इंतजार कर रहे हैं पर शर्त यह है कि वह सास-ससुर की इज्जत करना जानती हो, हलवा मोहन भोग बना लेती हो सिलाई-तंगाई में माहिर हो, पति लाख लुच्चई करे मगर वह सती हो, सावित्री हो.
जोखू ने अपने बड़े लड़के को शहर भेज कर पांच किलो आदमचीनी चावल मंगा लिया है, अरहर तो अपने यहां भी चार-पांच पसेरी हो जाती है लेकिन ठीक से पकती नहीं, इसलिए दो किलो अरहर की दाल भी आ गई है, कोआपरेटिव से आधा मन चीनी, मिट्टी का तेल, डेढ़ावल बाजार से दो बट्टी लाइफबाय, ब्राह्मी आंवला की शीशी, भुर्रा चाय, आधा किलो बताशे, शीशा-कंघी गरज कि आप के आवभगत का पूरा-पूरा इंतजाम है.
जाड़े में विकट अनुभव हुए थे जोखू को. उन्होंने माधो के साथ मिलकर पिछली गर्मी में ही भविष्य को ध्यान रखकर आधे दर्जन प्याले और तश्तरियां मंगवाई थीं और संयोग देखिए कि एक ही दिन दोनों जने के यहां देखुआर आ गए. जब जोखू ने अपने लड़के को दौड़ाया तो माधो नट गए. इनकी कितनी बेइज्जती हुई होगी इसकी कल्पना की जा सकती है. इसी खार पर उन्होंने शहर की देखा देखी स्टील के मग मंगवा लिए हैं. न टूटने का डर, न फूटने का! माधो से बोलचाल जरूर बंद है लेकिन अब निश्चिंत हैं वे.
ऐसे ही परसाल जो देखुआर आए थे, उनमें कुछ सूट-बूट वाले लौंडे भी थे. खटिया पर बैठते ही नहीं बनता था उनसे और उनमें से एक जो बदमाश और फंटूश जैसा लगता था, खाने के वक्त चम्मच मांग बैठा. परसनेवाले अनसुनी कर रहे हैं लेकिन बात वह समझ नहीं रहा है या समझ कर भी जोखू की इज्जत उतारने पर उतारू था और वह कोई और भी नहीं था, लड़की का भाई था- खास भाई. जोखन सिंह ने इससे सबक सीखा. उन्होंने जाड़े में एक पेड़ कटवाया, उससे दो बेंचे और दो कुर्सियां बनवाईं और इनके साथ कचहरी से लौटते वक्त आधा दर्जन चम्मच भी ले लिए. अब कोई चाय में ऊपर से चीनी भी मांगे तो कोई बात नहीं.
एक और काम किया है इस खरवांस में उन्होंने. जब पप्पू दर्जा नौ में पहुंचा था और पहली बार देखुआर आए थे तब नातजुर्बेकारी में एक गड़बड़ी हो गई थी उनसे. चीनी तो थी लेकिन उसमें डालने के लिए कुछ न था- न दूध न दही. ये थे जरूर मगर सीते के घर और उनसे मुकदमेबाजी थी. एक की इज्जत पूरे गांव भर की इज्जत हुआ करती है. इज्जत के लिए ये झुके लेकिन सीता की मेहर ने सारा दोष बिल्ली के सिर मढ़ दिया. तब से जोखू हर खरवांस में जरूरते नागहानी माधो की देखा देखी अपने यहां भी 'रूह आफ़ज़ा' की बोतल रखते हैं.
माधो ने कच्चे मकान के रहते पक्का बनवाने के लिए ईंटो का भट्टा लगवाया तो उनके पोते की कीमत दुगनी तिगुनी हो गई. जोखू ने इसके बाद ही अपने दुआर के आगे दो ट्रक बालू गिरवा लिए और पांच ट्रक ईंटे. हालांकि मकान तो तभी बनेगा, जब सौहर होगा लेकिन इसके फायदे सामने आने लगे हैं. अब कोई यह नहीं पूछता कि आप जो इतना मांग रहे हैं, ठीक है देंगे लेकिन बताइए यह कि लड़की आएगी तो कहां रहेगी? इस खोबार में? अब तो खुद जोखू ही उलट के सवाल पूछते हैं कि लड़की आएगी तो रहेगी कहां? ईंट और बालू से क्या होगा? सीमेंट, लोहे-लक्कड़, हेन तेन सारा कुछ तो पड़ा है करने को. और किसी तरह से ढांचा खड़ा भी हो गया तो सोफासेट, बाजा, मोटरसैकिल के बेगार कैसा लगेगा?
जोखू, माधो की तरह लनतरानियां नहीं हांकते- सिवान दिखाकर देखुआरों से यह नहीं कहते कि 'यह सब आप ही का है!' खुद तो घास करें या गोबर फेंके और जब मेहमान आएं तो नहलाने के लिए कहार बुलवा लें, भट्टी पर से खोया मंगवा लें, बीड़ी के लालच में दो-चार बैठकबाजों को बुलवा लें, कोयर-कांटा और झाड़ू-बुहारू के लिए एक दो लौंडो को लगा दें... जोखू यह सब नहीं करते. किराए पर ट्रैक्टर मंगवाते हैं और जुताई-बुआई-दंवाई-ओसाई करवा के मस्त रहते हैं. वे इसलिए भी नहीं करते कि उन्हें अपने पप्पू पर- उसके रंग, रूप और गुण पर भरोसा है.
आप या जो भी वरदेखुआ सादी ब्याह के लिए जाएगा, वह जमीन-जायदाद से तो ब्याह करेगा नहीं, करेगा लड़के से और अगर वही खोटा है तो दुनिया भर का टीमटाम किस काम का? इसमें शक नहीं कि जगह-जमीन के कारण देखुआर माधो के यहां अधिक जाते हैं लेकिन जोखू के लिए तकलीफ नहीं खुशी का कारण है- कि एक दिन ससुर इसी तरह खिलाते-खिलाते उजड़ जाएंगे और तब मिलेगा क्या? घंटा !
तो इस मसले को लेकर माधो और जोखू में जितनी ही लाग-डांट है, पप्पू और मुन्ना में उतनी ही छनती है. पप्पू- जिनका रजिस्टर का नाम गणपत सिंह है- अपने टोले के मेधावी विद्यार्थी हैं. मेधावी इसलिए कि उन्होंने अपने लंगोटिया यार मुन्नाजी को पीछे छोड़ दिया और खुद इंटर में आ गए. ये दोनों मित्र तीन साल से हाई स्कूल में थे और हर साल परीक्षा के समय इनके लिए गांव और संगी साथी दो महीने पहले से युद्धस्तर पर तैयारी करते थे. जामवंत यादव- जो अहिरान के थे और फौज से रिटायर कर गए थे- बंदूक के साथ विद्यालय के बगीचे में बिठाए जाते, कुछ दूसरे नौजवान छूरे-तमंचों के साथ बस स्टेशन के पास रहते जहां से गार्डी करने वाले अध्यापक चलते और मुन्ना का कोई एक दोस्त- जिसके पास मोटर साइकिल थी- अपने तीनों चेलों के साथ विद्यालय के पिछवाड़े खड़ा रहता. उनमें से एक पर्चा लाता, दूसरा किताबों और कुंजियों से उत्तर फाड़ता और तीसरे की जिम्मेदारी होती- झरोखे या गार्ड या पानी पिलाने वाले या पहरे पर तैनात सिपाही के हाथों कागज उन तक पहुंचाना.
इस रणनीति में कहीं कोई चूक नहीं हुई लेकिन किस्मत का खेल कि मुन्ना रह गए और तीसरे प्रयत्न में पप्पू सप्लीमेंटरी के रास्ते धूमधाम से उत्तीर्ण हो गए. इसका नतीजा यह निकला कि पप्पू का भाव वरदेखुओं के बाजार में मुन्ना के टक्कर में आ गया- हल-बैल न होने के बावजूद!
माधो ने तय किया है कि वे मुन्ना को तब तक पढ़ाएंगे जब तक उसका ब्याह नहीं हो जाता. अगर लड़का घर बैठ गया तो कौन झांकेगा? इधर जोखू बोलते थे दो लाख और एक फटफटिया, उधर माधो बोलते थे तीन लाख और एक मारुति. पप्पू के हाई स्कूल पास करने के बाद जोखू ने कहा- चार लाख तो बसंत पंचमी के दिन दुआर की नींव खुदवा कर माधो ने किया - पांच लाख. इन मांगों में गहने और खिचड़ी वाले वे सामान नहीं शामिल हैं जो अपने दुआर की इज्जत के मुताबिक आप लजाते-लजाते भी देंगे (यानी एक सुनने वाला बाजा, एक देखने वाला बायस्कोप, सोफा, पलंग आदि आदि), लेकिन कार के बिना दोनों में से किसी का काम न चलेगा. लोगों ने पूछा कि कार का करोगे क्या? तो दोनों का कहना था कि और कुछ नहीं तो धानापुर से मुगलसराय तक मुन्ना-पप्पू सवारी ढोएंगे. बिजनेस...
जोखू जानते हैं कि माधो और ब्याहों की तरह इसमें भी धोखा करेगा और चढ़ावे का गहना सोनार से भाड़े पर ले आएगा. और माधो की पॉलिटिक्स यह है कि लड़के का बाजार भाव इतना चढ़ा दिया जाय कि होड़ में जोखू का माल धरा का धरा रह जाय. तो दुनियावालों, इस वक्त इन कश्यपगोत्रियों, दोनों सूर्यवंशी क्षत्रिय कुमारों की कीमत सात लाख और एक नैनो लगाई गई है. अगर आपकी लड़की बिचारी को किसी योग्य वर की जरूरत हो तो आइए, अपनी किस्मत आजमाइए.
गांव घर का मामला है, किसी एक की ओर से बोलना दूसरे से झगड़ा मोल लेना है. यों लड़के आप-आप को दोनों ही लाखों में एक हैं. दोनो इस समय सहर बनारस में कोचिंग कर रहे हैं. काहे की? यह मत पूछिए. जब उन्हें ही नहीं पता तो हम क्या बताएं? बस आ जाइए ! दूसरे आएं इससे पहले. बाजार के हिसाब से ये चीपो के चीपो और बेस्टो के बेस्टो पड़ेंगे आप के लिए.।

Thursday, June 24, 2010

नीतीश के रूठने के मायने


बिहार में सत्ताधारी बीजेपी- जेडीयू गठबंधन पर गंभीर संकट है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई में इस गठबंधन ने राज्य में साढ़े चार वर्षों तक शासन किया है। इसी गठबंधन की सरकार ने बिहार में लालू `राज' को पीछे छोड़ते हुए विकास की नई संभावनाएं तलाशी। सामूहिक नरसंहार और पिछड़ेपन के लिये बदनाम रहा बिहार, पहली बार राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फलक पर विकास के लिए पहचाना गया। यह इसी गठबंधन का शासन था, जिसकी प्रशंसा अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने की और न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी इसे सराहा। यह जेडीयू- बीजेपी गठबंधन की ही सरकार थी जिसमें माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स ने कोसी इलाके में खुद जाकर वहां स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाने की पेशकश की।
चुनावी वेला में `सुशासन' के इस गठबंधन वाली सरकार में दरारें साफ दिख रही हैं। अबतक अपने काम के भरोसे चुनावों में उतरने का दावा करने वाले इस गठबंधन के दोनों दल अपने -अपने हित की चिंता ज्यादा करने लगे। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी तस्वीर वाले विज्ञापन से बिफरे नीतीश कुमार बौखलाहट छिपा नहीं पाए। 12 जून को पटना में बीजेपी कार्यकारिणी के दौरान बीजेपी नेताओं को दिया जाने भोज उन्होंने रद्द कर दिया। उससे भी दो कदम आगे बढ़कर उन्होंने पांच करोड़ की सहायता राशि गुजरात सरकार को वापस कर दी। नीतीश कुमार की विश्वास यात्रा में उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने जाने से मना किया तो नीतीश कुमार ने उस इलाके का अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया, जो इलाका बीजेपी नेता और स्वास्थ्य मंत्री नंदकिशोर यादव का था। हालत यहां तक पहुंची कि कैबिनेट की बैठक में बीजेपी मंत्री अपने- अपने कारणों से शामिल नहीं हुए।
विपदा के समय एक राज्य की दूसरे राज्य को दी गई मदद वापस किये जाने की नई परंपरा बिहार से शुरू हुई है। गुजरात की जनता ने कोसी बाढ़ के दौरान मुख्यमंत्री राहत कोष में पांच करोड़ की राशि दी थी, जिसे गुजरात सरकार ने बिहार सरकार को दी थी। बिहार सरकार ने गुजरात सरकार की सहायता राशि वापस किये जाने का फ़ैसला किया और उसे वापस भी कर दिया। ख़ास बात यह है कि सहायता राशि लौटाने का फ़ैसला बिहार सरकार का नहीं बल्कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित उनके दल के मंत्रियों का था। इस अहम फै़सले पर चर्चा के लिए उन्होंने न तो अपने सहयोगी बीजेपी को विश्वास में लिया और न ही उनसे राय मांगी गई। यानी, सरकार के स्तर पर लिया जाने वाला फ़ैसला एकतरफ़ा दलगत स्तर पर लिया गया।
गुजरात सरकार को जो सहायता राशि वापस की गई है, उसे लेकर भी नीतीश कुमार की सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कोसी बाढ़ पीड़ितों के लिये विशेष पैकेज़ नहीं दिये जाने का हवाला देकर केंद्र की यूपीए सरकार की आलोचना करते रहे हैं। लेकिन जब गुजरात की पांच करोड़ की मदद उन्होंने वापस कर दी है, तो सवाल ये है कि आख़िरकार मदद की इस राशि का अबतक उपयोग क्यों नहीं हुआ था ? कोसी की बाढ़ से तबाह हुई एक बड़ी आबादी आज भी मदद की राह देख रही है।
मदद की राशि वापस किये जाने को नीतीश कुमार का चुनावी पैंतरा माना जा रहा है तो इसके पर्याप्त कारण हैं। साढ़े चार साल तक सरकार चलाने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने सहयोगी बीजेपी में सांप्रदायिक चेहरा देख रहे हैं। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी को बिहार नहीं आने देने के लिए दबाव बनाने वाले नीतीश कुमार, चुनाव के तत्काल बाद लुधियाना रैली में नरेंद्र मोदी से सार्वजनिक तौर पर हाथ मिलाते देखे गए। गुजरात के सांप्रदायिक दंगों की वजह से नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी से परहेज है। लेकिन गुजरात दंगे के ख़िलाफ़ न तो नीतीश कुमार और न ही जेडीयू, उस समय की वाजपेयी सरकार से बाहर आने की हिम्मत जुटा पाए।
अब जबकि नीतीश कुमार ठीक विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए की बांह झटकने की ताक़त जुटा पाए हैं तो उनके सामने कई विकल्प हैं। कांग्रेस पहले ही इस गठबंधन के टूटने पर नज़रें गड़ाए बैठा है। या फिर, नीतीश कुमार भी उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की राह पर चलते दिख रहे हैं जिन्होंने उड़ीसा विधानसभा चुनाव से ठीक पहले झटके से बीजेपी का साथ छोड़कर राज्य की सत्ता में दोबारा अकेले दम पर आए। ऐसी परिस्थिति में नीतीश कुमार ने एक नहीं बल्कि कई मौके पर अपनी मंशा जाहिर कर दी है, अब बीजेपी को तय करना है कि जेडीयू के साथ अपने रिश्तों को किस तरह से देखती है।
दरअसल, बीजेपी के सामने जेडीयू के मान- मनौव्वल की मजबूरी भी है। बीजेपी के पास न तो गठबंधन को तोड़ने की ताक़त है और न ही उसके सामने बिहार में जेडीयू जैसे साथी दल का दूसरा विकल्प। आख़िरकार बीजेपी किस क्षेत्रीय ताक़त के भरोसे इस गठबंधन को तोड़ने की हिम्मत जुटाए, उसके सामने सवाल यही है। एनडीए के रूप में पहले ही उसके ज्यादातर साथी दल गच्चा दे चुके हैं। एनडीए के नाम पर बीजेपी के साथ सिर्फ शिवसेना, अकाली दल और जेडीयू ही बड़ी ताकत बचे हैं। नीतीश कुमार को बीजेपी की इस कमजोरी का अहसास है। इसलिये ऐन चुनावी वक़्त पर वह बीजेपी को लगातार झटके दे रहे हैं और उस बैसाखी पर भी आंखें तरेर रहे हैं जिसके भरोसे अबतक सरकार चलाई। उन्हें पता है कि आने वाले समय में उनकी ताक़त बढ़ेगी और उनके सामने संभावनाएं कई हैं। इसलिये बहुत संभव है कि बीजेपी आलाकमान जेडीयू की तमाम शर्तों को मान जाए।

Wednesday, June 9, 2010

नीतीश कुमार दोबारा सत्ता में आएंगे?


बिहार की नीतीश कुमार की सरकार क्या दोबारा सत्ता में आ पाएगी ? यह एक दिलचस्प सवाल है। नीतीश कुमार एंड कंपनी, बिहार विधानसभा चुनाव में अपने काम के भरोसे दोबारा सत्ता में आने का मंसूबा देख रही है। नीतीश कुमार बिहार के अलग- अलग हिस्सों में चल रही विश्वास यात्रा में अपने सुशासन का दावा कर रहे हैं। नीतीश कुमार ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि बिहार में कानून के राज की स्थापना, एक बड़ी चुनौती थी जिसे उन्होंने कर दिखाया है।
विश्वास यात्रा में नीतीश कुमार बड़े ही दिलचस्प तरीके से बताते हैं कि उनकी सरकार से पहले हाल ये था कि बाहुबली लंबी- लंबी गाड़ियों में चलते थे और गाड़ी का शीशा उतारकर राइफल की नली बाहर निकाल देते थे। अपनी सरकार में शुरू किये गए बालिका साइकिल योजना के बारे में भी नीतीश कुमार दिलचस्प अंदाज में बताते हैं। वे कहते हैं कि लड़कियों को साइकिल दी तो लड़के कुछ कुम्हला गए इसलिये सरकार ने सभी बालक- बालिका को साइकिल देने का फ़ैसला किया। इस यात्रा में वह केंद्र की नाइंसाफी का पुराना राग भी अलाप रहे हैं। ख़ास तौर पर केंद्र की सड़क पर बिहार सरकार की तरफ से लगाए गए पैसे का उल्लेख करते हुए वह विपक्षियों से सवाल पूछते हैं कि कौन सा केंद्र का पैसा?
आप कह सकते हैं कि बिहार में तक़रीबन साढ़े चार साल के राज से मिले तजुर्बे और लालू यादव जैसे विपक्षियों के हमलों को झेलते- झेलते, नीतीश कुमार तुर्की- ब- तुर्की जवाब देना भी अच्छी तरह से सीख गए हैं। ख़ामोशी से काम करने वाली उनकी छवि बदल रही है। वह और नेताओं की तरह ही बताते हैं कि दुनिया भर में उनके काम की तारीफ़ हो रही है। अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने उनकी सरकार को सराहा। बिल गेट्स बिहार दौरे पर आए और वॉशिंगटन पोस्ट में उनकी सरकार की तारीफ़ छपी। नीतीश कहते हैं कि जब लोग उनसे इस कायाकल्प का राज पूछते हैं तो मैं कहता हूं कि मैने कुछ नहीं किया बल्कि बिहार के लोगों के संकल्प की वजह से ऐसा संभव हो पाया।
नीतीश कुमार जब भी ऐसा कहते हैं तो मुझे लालू प्रसाद यादव का रेल मंत्री रहते अक्सर दिया जाने वाला बयान याद आता है। आत्ममुग्ध लालू कहा करते थे कि जब लोग रेलवे को घाटे से उबारने का रहस्य पूछते हैं तो मैं कहता हूं कि अभी तो किया है जादू और बाकी है टोना। लालू यादव के रेल मंत्री रहते आईआईएएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में रेल के घाटे से उबरने की गाथा शोध का विषय रही। बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए लालू यादव की वह मुहिम भी याद आ रही है जब उनकी सरकार ने चरवाहा विद्यालय खोले थे। ग़रीब -गुरबों की बस्तियों में जाकर लालू यादव ने गंदगी में सने बच्चों को नहलाने- बाल कटवाने और उन्हें साक्षर करने का कार्यक्रम शुरू किया था। उस वक्त नामीगिरामी पत्र- पत्रिकाओं ने लालू की इस मुहिम को काफी सराहा था। ऐसे ही कुछेक अच्छे कामों के बूते बिहार में लंबे अरसे तक लालू यादव का राज रहा।
फिर आते हैं नीतीश कुमार पर। विश्वास यात्रा के दौरान नीतीश कुमार लोगों को बिहार की तरक्की की जो सूरत दिखाते हैं, वह विपक्षी दलों के साथ –साथ किसी को भी अविश्वसनीय लग सकता है। वह बिहार में जितने भयमुक्त समाज की तस्वीर पेश करते हैं, उसमें बड़ी शंकाएं हैं। नीतीश कुमार का बिहार अगर वास्तव में इतना ही चमक रहा है, तो आख़िरकार निवेशक अबतक बिहार से कतराते क्यों रहे हैं। सड़क जैसे मसले पर निश्चय ही उनकी सरकार ने बेहतर किया है लेकिन जिन- जिन मोर्चों पर सरकार फेल हुई है, उसके लिये नीतीश कुमार केंद्र सरकार के असहयोग का पुराना राग अलापते देर नहीं लगाते। बानगी के तौर पर नीतीश कहते हैं कि राज्य में बिजली इसलिये नहीं है क्योंकि कोयला पर केंद्र का अधिकार है और केंद्र सरकार इसके लिए मंजूरी नहीं दे रही है। कोसी प्रभावित लोगों के लिए सरकार इसलिये मदद नहीं कर पाई क्योंकि केंद्र सरकार ने दूसरे राज्यों को तो सहायता दी लेकिन बिहार को विशेष पैकेज नहीं दिया। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने से पहले नक्सली बिहार के जिन सीमित जिलों तक सिमटे हुए थे, उनके राज के दौरान नक्सलियों की सक्रियता का विस्तार हुआ। नक्सलवाद की समस्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झूलती रही है। जाहिर है कि बिहार में भी नीतीश कुमार की सरकार ने और राज्यों की तरह केंद्र सरकार पर ही इसका ठीकरा फोड़ा।
अपनी सत्ता के शुरुआती दिनों में एक ख़ामोश नेता के तौर पर राज्य की कमान संभालने वाले नीतीश कुमार की अगुवाई में उनका खुद का संगठन कमजोर होता गया। जेडीयू कमजोर हुआ और जाने- अनजाने नीतीश कुमार का इसमें अहम किरदार देखा जा सकता है। बिहार की चुनावी बेला में अगर देखें तो जेडीयू के सामने कई संकट हैं। अलग- अलग नेताओं के साथ जेडीयू से जुड़े जातीय गुट बहुत कुछ छिटक रहे हैं। दिग्विजय सिंह, प्रभुनाथ सिंह, ललन सिंह, नागमणि, एजाज अली सहित कई बड़े नेता या तो बागी हो चुके हैं या निकाले जा चुके हैं। अब पार्टी में नीतीश की कद- काठी का कोई दूसरा नेता उनके दल में नहीं है। ऊपर से अगड़े वर्ग के मतदाता बंटाईदारी कानून को लेकर नीतीश कुमार पर शंकाएं कर रहे हैं, जिसका ख़ामियाजा चुनाव में जेडीयू की उठाना पड़ सकता है। ख़ास बात ये है कि ये सभी नेता नीतीश विरोधियों के साथ एकजुट हो रहे हैं। इस गुट ने अगर थोड़ा ही सही चुनावों में नीतीश एंड कंपनी को नुकसान पहुंचाया तो यह काफी भारी पड़ सकता है।

Tuesday, June 1, 2010

तीरथ के तारणहार

तीर्थ पुरोहितों या पंडों के बारे में -तहलका- की यह रिपोर्ट पढ़िये, मजा आ जाएगा- संजीव
पंडों का नाम भले ही कड़वे अनुभवों का पर्याय बन चुका हो मगर बदरी-केदार के पंडे अपनी विशेषताओं के कारण आज भी अपने यजमानों के दिलों में बसे हैं. मनोज रावत की रिपोर्ट
बात उन दिनों की है जब केंद्रीय पर्यटन मंत्री जगमोहन हुआ करते थे. एक बार वे पर्यटन और रोजगार को प्रोत्साहित करने के लिए बनी चार धाम सर्किट योजना की समीक्षा करने बदरीनाथ पहुंचे. वहां उन्हें बताया गया कि कुछ पंडे उनसे मिलना चाहते हैं. ये पंडे जानना चाहते थे कि जगमोहन का पैतृक स्थान कहां है. मगर जगमोहन ने उनमें खास दिलचस्पी नहीं दिखाई और कह दिया कि उनका घर दिल्ली है. मगर पंडों ने आग्रह किया कि वे पाकिस्तान स्थित अपने मूल क्षेत्र का नाम बताएं. झिझकते हुए जब जगमोहन ने प्रांत और जिले का नाम बताया तो पंडों की भीड़ छंट गई. सिर्फ एक दुबला-पतला युवक ही वहां खड़ा रहा जिसका कहना था कि उस जिले का पंडा वह है. बाद में जब उस युवा पंडे ने जगमोहन को उनके पैतृक गांव के लोगों के बारे में भी बताना शुरू किया तो वे हैरान रह गए. इसके बाद उन्होंने भी खुद पंडे की बही में अपनी बदरीनाथ यात्रा का विवरण दर्ज किया.
यह एक छोटा-सा उदाहरण है जो बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे महत्वपूर्ण तीर्थों की यात्रा में यहां के तीर्थपुरोहितों यानी पंडों की भूमिका और उनके योगदान के बारे में बताता है. मीडिया और तकनीक के इस युग में आज हर तरह की जानकारी और सुविधा सुलभ है. लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब स्थितियां इसके उलट थीं. जानकारी और सुविधाएं नहीं के बराबर थीं और बदरी-केदार की यात्रा इतनी दुष्कर और खतरों से भरी हुआ करती थी कि जाने वाले अक्सर कहते थे कि क्या पता अब मिलना हो न हो. इतने कठिन समय में भी अगर लोग इस यात्रा पर जाने का साहस जुटा लेते थे तो इसमें उनकी श्रद्धा के साथ बदरी-केदार के तीर्थ-पुरोहितों यानी पंडों का भी अहम योगदान था. आज भी ऐसे यात्रियों की संख्या बहुत है जिन्हें दूसरी किसी भी व्यवस्था की तुलना में अपने पंडों पर ज्यादा भरोसा है.
बदरी-केदार के कपाट छह महीने ही यात्रा के लिए खुलते हैं. सर्दियों में विकट भौगोलिक परिस्थितियों और पौराणिक मान्यताओं के कारण इन्हें बंद रखा जाता है. सड़क मार्ग न होने के कारण मोक्ष धाम बदरीनाथ (ऊंचाई 3,133 मीटर) और द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ (3,680 मीटर) तक पहुंचना पहले बहुत टेढ़ी खीर हुआ करता था. चीन के हमले के बाद, वर्ष 1965 में बदरीनाथ तक सड़क मार्ग पहुंचाना सरकार की मजबूरी हो गई. हालांकि केदारनाथ मंदिर तक पहुंचने के लिए आज भी गौरीकुंड से 14 किलोमीटर पैदल चढ़ाई चढ़कर जाना पड़ता है. यात्रा की मुश्किलों और सुविधाओं के अभाव के कारण उन दिनों यात्री भी कम संख्या में आते थे. प्रसिद्ध घुम्मकड़ राहुल सांकृत्यायन 17 मई 1951 को बदरीनाथ पहुंचे थे. यहां उन्होंने तीन दिन प्रवास किया. अपने यात्रा विवरण में वे लिखते हैं, ‘मंदिर के आसपास के कुछ मकानों को छोड़कर बदरीपुरी में कच्चे मकान ही हैं. इन्हीं झोपड़ियों में छह महीने के यात्रा काल में आने वाले कुछ हजार यात्री ठहरते हैं.’
श्री बदरीनाथ पंडा पंचायत के अध्यक्ष मुकेश भट्ट ‘प्रयागवाल’ बताते हैं, ‘सौ साल पहले तो परिस्थितियां और भी दुष्कर थीं. ऋषिकेश से आगे कहीं भी सड़क मार्ग नहीं थे.’ जानकार बताते हैं कि उस समय पैदल यात्रा चट्टी व्यवस्था के भरोसे चलती थी. चट्टी यानी वह जगह जहां पर आस-पास के गांवों के लोग यात्रियों को राशन और चौका-बर्तन उपलब्ध कराते थे. हर 5 मील पर कम से कम एक चट्टी होती थी. ऋषिकेश से लेकर बदरीनाथ तक की यात्रा में 46 चट्टियां पड़ती थीं. तब यात्रा पर भी ज्यादातर बुजुर्ग लोग ही आते थे. प्रयागवाल बताते हैं, ‘उस कठिन समय में भी तीर्थ-पुरोहितों ने हिमालय के इन दुर्गम तीर्थों की यात्रा करने के लिए श्रद्धालुओं को तैयार किया.’
श्री केदार पंडा पंचायत के तीर्थपुरोहित श्रीनिवास पोस्ती तथा प्रयागवाल का दावा है कि उत्तराखंड में तीर्थपुरोहित परंपरा आदिगुरु शंकराचार्य की बदरी-केदार यात्रा के समय से ही शुरू हो गई थी. पोस्ती बताते हैं कि केदारखंड में भी बदरीकाश्रम निवासी धर्मदत्त नामक ब्राह्मण के अवंति नगर जाकर चंद्रगुप्त नामक वैश्य को यात्रा पर आने के लिए प्रेरित करने का वर्णन है. बदरी-केदार के पंडों की बहियों में लगभग दो सौ साल पुराने यजमानों के यात्रा विवरण उपलब्ध हैं. पोस्ती कहते हैं, ‘पहले यात्री बदरीनाथ तथा केदारनाथ की यात्रा पर बहुत कम संख्या में आते थे इसलिए उनकी जानकारी मौखिक रुप से ही रहती थी. बाद में जब संख्या बढ़ने लगी और शिक्षा का प्रसार होने लगा तो यात्रियों के नाम बहियों में दर्ज किए जाने लगे.’ आज यहां आने वाले लोग जब अपने पुरखों द्वारा अंकित साक्ष्यों को देखते हैं तो उन्हें हैरानी के साथ-साथ गौरव का भी अनुभव होता है. इस तरह यहां आने वाला व्यक्ति स्वयं ही इस परंपरा से जुड़ जाता है.
बदरीनाथ पंडा पंचायत के महासचिव रहे मुकेश अल्खानियां अपने यजमान रायबहादूर कस्तूर चंद समीर चंद डागर के अभिलेखों को दिखाते हुए कहते हैं, ‘दो सौ साल पहले इसी परिवार ने बदरीनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था तथा तप्त कुंड से लेकर मंदिर तक की सीढियां भी बनवाई थीं.’ बदरी-केदार के पंडों के पास राजा-महाराजाओं की दी सनदें और ताम्र पत्र भी मिलते हैं.
बदरी-केदार के कपाट बंद होने के बाद भी पंडों का यजमानों से संपर्क नहीं टूटता. श्रीनिवास पोस्ती बताते हैं, ‘सर्दियों में ये तीर्थपुरोहित देश भर में अपनी-अपनी यजमानी के क्षेत्रों में जाते हैं. भौगोलिक रूप से दुष्कर तीर्थों में हुई सेवा-सत्कार से कृतज्ञ यजमान अपने घरों में इन तीर्थपुरोहितों का दिल खोलकर स्वागत करते हैं. तीर्थपुरोहितों के अपने यजमानों के साथ आत्मीय पारिवारिक संबंध होते हैं इसलिए तीर्थपुरोहित अपने रिश्तेदारों से अधिक अपने यजमानों के सुख-दुख में सम्मिलित होते हैं. शीतकाल की इन यात्राओं सेे पंडों और यजमानों के पुराने संबंधों में एक नया पहलू तो जुड़ता ही है उस क्षेत्र के अन्य श्रद्धालुओं को भी बदरी-केदार यात्रा पर आने का संबल और प्रेरणा मिलती है. तीर्थपुरोहितों का मानना है कि सदियों से अनवरत चली आ रही इस परंपरा का ही परिणाम है कि पहले संैकड़ों की संख्या में आने वाले यात्रियों की संख्या समय बीतने के साथ लाखों में पहुंच गई है.
तिब्बत सीमा के पास चमोली जिले में स्थित बदरीनाथ धाम में उत्तराखंड और नेपाल के पंडे चमोली जिले के डिमरी जाति के हैं. बाकी सारे भारत के तीर्थपुरोहित बदरीनाथ से लगभग 250 किमी नीचे देवप्रयाग कस्बे के आसपास स्थित टिहरी और पौड़ी जिले के 20-25 गांवों के निवासी हैं. केदारनाथ (रुद्रप्रयाग जिला) के पंडे जाड़ों में मंदिर के कपाट बंद होने पर वहां से 60-70 किमी नीचे आकर ऊखीमठ और गुप्तकाशी के पास के गांवों में रहते हैं. बदरी तथा केदार दोनों तीर्थों के पुरोहितों के तीर्थ कृत्य भी अलग-अलग हैं. बदरीनाथ के पंडे तप्त कुंड व पंच शिला पूजन कराकर जाते समय यात्रियों को सुफल आशीर्वाद देते हैं तो केदारनाथ के तीर्थपुरोहित यात्रियों के पूर्वजों के पिंड भरते हैं मंदिर के भीतर संकल्प पूजा कराते हैं और सावन के महीने यात्रियों द्वारा संकल्पित ब्रह्म कमल के पुष्पों को केदारनाथ मंदिर के शिवलिंग पर चढ़ाते हैं. पिछले साल राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल बदरीनाथ यात्रा पर आई थीं. उनके तीर्थ पुरोहित प प्रकाश नारायण बाबुलकर ‘शास्त्री’ बताते हैं, ‘महामहिम ने सभी धार्मिक कार्य श्रद्धापूर्वक संपन्न कराए.’
प्रतिष्ठित यात्रियों का आना भले ही सम्मानजनक हो परंतु बदरी-केदार के ये तीर्थ पुरोहित अपने सभी यजमानों को समभाव से देखते हैं. पोस्ती बताते हैं, 'होटल और धर्मशालाओं का किराया देने में असमर्थ गरीब यात्रियों को तीर्थपुरोहित अपने घरों में ठहराते हैं. यात्रियों को वापस जाते समय सुफल(यात्रा आर्शीवाद) देते हुए उनसे यह भी पूछा जाता है कि उनके पास वापस जाने के लिए धन है या नहीं. यात्रियों के पास धनाभाव होने पर पंडे उन्हें वापस जाने कर खर्चा भी देते हैं. बाद में जब इन गरीब किसानों के घरों में धन-धान्य होता है तो ये श्रद्धालु तीर्थपुरोहितों से लिए गए इस धन को वापस कर देते हैं. पोस्ती बताते हैं कि यात्री को पहचाने बिना भी सारा लेन-देन पीढ़ियों से चले आ रहे आपसी विश्वास पर चलता है.'
इस बारे में एक घटना उल्लेखनीय है. बदरीनाथ के पास 7 साल पहले एक बस दुर्घटना हुई थी. बस में सवार यात्री पूर्वी उत्तर प्रदेश के थे जिनकी आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं थी. इन गरीब यात्रियों को सबसे पहले मिलने उनका पंडा ही आया. पंडे को देखते ही यात्रियों में जान आ गई. हालांकि पंडे की भी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी इसलिए उसने उधार लेकर 30,000 रुपए का बंदोबस्त किया और पहले बदरीनाथ अस्पताल में भर्ती घायलों को रजाइयां भेजीं. इसके बाद वह बदरीनाथ से सबसे नजदीक स्थित कस्बे जोशीमठ पहुंचा जहां कुछ और घायल भर्ती थे. फिर वह पंडा एक और कस्बे गोपेश्वर पहुंचा जहां गंभीर रूप से घायल यात्री भर्ती थे और जहां दुर्घटना में मरे यात्रियों का पोस्टमार्टम भी होना था. यात्रियों के परिजनों के आने तक पंडा अन्तिम संस्कार की तैयारी भी कर चुका था. बदरीनाथ के तत्कालीन थाना प्रभारी दिनेश बौंठियाल इस घटना की पुष्टि करते हैं.
दुर्गम हिमालय की यात्रा में अपनेपन का अहसास, तन -मन-धन से सेवा और धार्मिक कार्यों को संपन्न कराने का काम कोई भी ट्रैवल एजेंसी नहीं कर सकती इसीलिए किसी भी माध्यम से बदरी-केदार आने वाला यात्री यहां आकर अपने पंडे से जरूर मिलता है. श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी जगत सिंह बिष्ट कहते हैं, 'यात्रा को बढ़ावा देने में तीर्थपुरोहितों का सबसे बड़ा योगदान है. परंपरा से बने विश्वास के कारण यात्री बेहिचक अपने तीर्थपुरोहितों की बात पर विश्वास कर नि:संकोच यात्रा करने आते हैं.'
तीर्थपुरोहितों के उपनाम भी उनके यजमानी के क्षेत्रों के नाम से हो जाते हैं. जैसे इलाहाबाद के आस-पास के क्षेत्र के पंडे प्रयागवाल, कंुमायूं के पंडे कूर्मांचली, नेपाल राजपरिवार के पंडे लालमुह्रया और मेरठ के पंडे मेरठवाल के नाम से जाने जाते हैं. देश भर में घूमने वाले पंडे अपने यजमानों के क्षेत्र की भाषा, संस्कृति, खान-पान और रीति-रिवाजों को उस क्षेत्र के निवासियों से अधिक जानते हैं. देवप्रयाग संस्कृत महाविद्यालय के आचार्य शैलेंद्र कोटियाल ‘शास्त्री’ बताते हैं, 'तीर्थपुरोहितों के गांवों में मिनी भारत बसता है. इन गांवों में भारत की सभी भाषाओं के जानकार मिल जाते हैं.'
शास्त्री आगे बताते हैं कि तीर्थपुरोहित उत्तराखंड जैसे दुर्गम क्षेत्र में पूरे भारत की संस्कृति लाए और सदियों के इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान से पहाड़ के दुर्गम इलाकों मंे आर्थिकी का संचार होने के साथ-साथ शिक्षा का प्रसार भी हुआ. वे कहते हैं, '100 साल पहले देवप्रयाग मे मुकुंद दैवज्ञ के निर्देशन में संस्कृत व ज्योतिष के संैकड़ों स्तरीय ग्रंथ प्रकाशित हुए. बाद में उनकी परंपरा को उनके शिष्य आचार्य चक्रधर जोशी ने आगे बढ़ाते हुए न केवल प्रकाशन कार्य जारी रखा बल्कि ज्योतिष की तथ्यपरक व वैज्ञानिक जानकारियों के लिए देवप्रयाग में एक वेद्यशाला भी खोली.' पोस्ती बताते हैं कि केदार के तीर्थपुरोहितों ने भी 200 साल पहले गुप्तकाशी के पास शोणितपुर में संस्कृत पाठशाला खोली जो आज भी शिक्षा के प्रसार में लगी है. देश के अन्य तीर्थों में भले ही तीर्थ पुरोहितों के साथ यात्रियों को कड़वे अनुभव होते हों मगर बदरी-केदार के तीर्थ पुरोहित अपनी कुछ विशिष्टताओं के कारण आज भी अपने यजमानों के दिलों में बसे हैं.

Sunday, May 16, 2010

...टीवी की ख़बरों ने मुझे बीमार बनाया

आजकल मैं दहशत में हूं। मैं पिछले कई दिनों से पूरे मन के साथ भोजन नहीं कर पा रहा हूं। घी मुझे बेहद पसं थी...ख़ासतौर पर घी में बने परांठे भला किसे पसंद नहीं? लेकिन अब घी सामने रखते ही उबकाई -सी आने लगती है। आईसक्रीम इतना पसंद था कि सप्ताह में तीन- चार दिन जरूर खा लेता था। जूस तो दिन में जितनी बार मौका लगे या फिर जेब इजाजत दे, उतनी बार पीने में भी परहेज नहीं था। मावे की बनी मिठाइयां तो दो- तीन साल पहले ही खाना छोड़ दिया। जबकि मिठाइयां मैं किसी भी वक़्त खा सकता था। अब तो चीनी खाने से भी डर लगने लगा है। दूध का गिलास मुंह के पास ले जाते ही अजीब -सी गंध नाक में पहुंचती है।
फलों की बात हो तो सेव का स्वाद जी से उतर गया है। तक़रीबन हरेक सब्जी मैं पसंद से खाता था। जब भी मंडी जाने का मौका लगा, ढेर सारी सब्जियां लेकर आता था। जरूरत नहीं होने के बावजूद हरी सब्जियों को देखकर दिल जैसे मचलने लगता था। लेकिन अब तो अपनी पसंद की सब्जियां भी छूने की इच्छा नहीं होती। वह चाहे लौकी हो या बैंगन। चूल्हे पर भगोने से सब्जियों के साथ भुनते मसालों की खुशबू उठती थी तो बार- बार किचन की तरफ जाने को जी करता था। लेकिन मसालों की यह गंध, मुझे विश्वसनीय नहीं लगती।
दोस्तों, पिछले कुछ समय लगातार ख़बरों को देखने का यह नतीजा है। ख़बरों ने मुझे इतना बाख़बर कर दिया कि खाने-पीने की सामग्रियों की गुणवत्ता को लेकर मेरा भरोसा ही उठ गया। एक न्यूज़ चैनल अगर चर्बी वाली घी की ख़बर दिखाता है तो दूसरा नकली मावे और नाले के पानी में बनने वाली आईसक्रीम की ख़बर दिखा रहा है। एक दिखाता है कि मुर्दे के लिए इस्तेमाल होने वाली क्रीम से सेव चमकाए जा रहे हैं तो दूसरा दिखाता है कि लाश को ले जाये जाने के लिए इस्तेमाल होने वाली बर्फ, जूस में डाली जा रही है। जो चैनल ख़ामोश हैं वह दिखाने लगते हैं कि ऐसी चीनी तैयार की जा रही है जो अंतरियों को चीरकर रख दे। या फिर लौकी -बैंगन में दवा के इंजेक्शन घुसेड़े जा रहे हैं। यह देखकर जी मितलाने लगा कि मिलावट खोर मसालों में गधे की लीद डाल रहे हैं। नकली मावे और उससे बनी मिठाइयां या फिर सिंथेटिक दूध का मामला तो जरा पुराना हो चुका है। इसलिये उनके इस्तेमाल के ख़तरे उठाने के लिए अगर आप तैयार हैं तो बेशक़ इस्तेमाल कर सकते हैं।
मुझे लगता है कि मिलावट का यह धंधा नया नहीं है। पहले सोने में मिलावट होती थी और अब नोटों की असली गड्डियों में फर्जी नोटों की मिलावट हो रही है। पंद्रह साल पहले पटना के मीठापुर में गलियों में घूमने वाले दूधिये अपनी गायों को इंजेक्शन लगाकर दूध निकालते थे। उम्र कम थी इसलिये दूध और इंजेक्शन का कनेक्शन नहीं समझता था। लगता था कि गाय के शरीर में इंजेक्शन दिया गया और गाय अपने शरीर के अवयवों से दूध को छान- छूनकर उसे हमें दे देती है। अब इसी तरह के इंजेक्शन लौकियों में घुसेड़े जा रहे हैं। मसालों और ताजे सब्जियों में रंग मिलाकर ग्राहकों को धोखा दिया जाता था तो अब मसालों में गधे की लीद मिलाई जा रही है।
मगर मेरी दिक्क़त दूसरी है। खाने- पीने की सामग्रियों से मेरा मन उचाट हो गया है। मुझे शक़ है कि यह कोई बीमारी न हो। मुझे लगता है कि न्यूज़ चैनल में दिखाए जाने वाली मिलावट की ख़बरों ने मुझे इस मानसिक स्थिति के आसपास पहुंचाया है। पत्नी से ज़िक्र किया तो उसने सरल समाधान बताया कि मिलावट संबंधी ख़बरें देखना बंद कर दीजिये... ये ऐसे ही दिखाते हैं। लेकिन न्यूज़ चैनल में काम करते हुए खुद इन ख़बरों के विजुअल्स देखना, उसे तैयार करना मजबूरी है। सबसे बड़ी तो यह कि न्यूज़ चैनलों की इन ख़बरों पर भरोसा करने की मजबूरी है।... इन ख़बरों पर आपका विश्वास बना रहे, इसके लिए जरूरी है कि हम जैसों को ख़ुद इनपर विश्वास करना होगा। ...अंत में, भगवान न करे लेकिन आप भी मेरी तरह की मनःस्थिति में हैं तो बताइएगा जरूर।..लगेगा कि मैं अकेला बीमार नहीं हूं।

Wednesday, May 12, 2010

हिंदुस्तानी ईस्ट इंडिया कंपनी


हिंदुस्तान में ईस्ट इंडिया कंपनी का स्याह इतिहास हर किसी को मालूम है। अब यह कंपनी नया इतिहास लिखने जा रही है। पढ़िये `तहलका' के ताजा अंक में।

कभी देश पर राज करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी अब एक भारतीय की होकर भारतीय बन चुकी है, बता रहे हैं अतुल चौरसिया
लम्हों की खता उस वक्त सदियों की सजा बन गई जब 1615 में मुगल बादशाह जहांगीर ने सर थॉमस रो के साथ एक व्यावसायिक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. थॉमस रो उस कंपनी के तेज-तर्रार अधिकारी थे जिसने आने वाले साढ़े तीन सौ सालों तक भारत के इतिहास का एक ऐसा अजीबोगरीब अध्याय लिखा जिसमें शोषण और अत्याचार के साथ आधुनिकता और औद्योगीकरण, सभ्यता और शिष्टाचार के साथ वहशत और बर्बरता की इबारतें यहां-वहां छिटकी नज़र आती हैं. वह ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में पहला कदम था. अतिथि को भगवान मानने वाले देश ने इस नई नस्ल का भी दिल खोलकर स्वागत किया. किंतु यहां की नायाब विरासत और अकूत दौलत ने इस अपेक्षाकृत छोटे-से व्यापारिक समझौते को जल्द ही साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा की सुरसा मे तब्दील कर दिया. बाद में कंपनी के हाथ से भारत का शासन ब्रिटिश सरकार के हाथों में चला गया.
'भावनात्मक स्तर पर मेरे लिए यह अभिभूत कर देने वाला पल है. यह सोचना ही जोश से भर देता है कि आज मैं उस कंपनी का मालिक हूं जिसका कभी मेरे पूरे देश पर राज था'
ज्यादातर लोगों के लिए यह कहानी 1947 में देश की आजादी के साथ ही खत्म हो गई लेकिन साढ़े तीन सौ साल तक चले भलाई-बुराई, लूट-खसोट, मनमानी-तानाशाही के खेल का अंतिम अध्याय लिखा जाना अभी बाकी था. और बीते फरवरी महीने की एक शाम मुंबई के एक व्यवसायी संजीव मेहता ने अपने वतन से दूर लंदन में बिल्कुल खामोशी से यह अंतिम अध्याय लिख दिया. इस दिन वे अपने वतन पर सैकड़ों साल तक राज करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी के मालिक बन गए.आश्चर्य की बात है कि जिस हिंदुस्तान में इस बात की सबसे अधिक चर्चा होनी चाहिए थी वहां इसकी जानकारी भी बमुश्किल थोड़े ही लोगों को होगी.
इतिहास के इस अंतिम अध्याय को लिखने की अहमियत का अंदाजा संजीव को भी अच्छी तरह से हैः एक कंपनी जिसे दुनिया की पहली बहुराष्ट्रीय कंपनी होने का गौरव हासिल है, जिसके झंडे तले एक समय दुनिया के कुल मानव श्रम का एक-तिहाई हिस्सा काम करता था, ऐसी कंपनी जिसके अतीत में जितने उजले पन्ने हैं उससे कहीं ज्यादा स्याह पक्ष हैं.
ईस्ट इंडिया कंपनी में संजीव ने लगभग 250 करोड़ रुपए का निवेश किया है. इसके भविष्य के लिए संजीव की योजनाएं बेहद विस्तृत हैं लेकिन कंपनी की पुरानी साम्राज्यवादी सोच का इनमें कोई स्थान नहीं है. मार्च में ही लंदन के विशिष्ट इलाके मेफेयर में कंपनी ने अपना पहला ईस्ट इंडिया कंपनी स्टोर खोला है और आने वाले कुछेक सालों में कंपनी एक बार फिर से भारत में अपने कदम रखने वाली है. लेकिन इस बार स्थितियां और भूमिकाएं अलग रहेंगी. चाय, कॉफी और मसालों की जगह रियल एस्टेट, सुपर स्टोर्स, हॉस्पिटैलिटी ले लेगी.सन 1600 के आस-पास ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने लंदन के 30-40 व्यापारियों को 'द कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन ट्रेडिंग इन टू ईस्ट इंडिया' के नाम से लाइसेंस दिया था जिससे उन्हें ब्रिटिश शासन के तहत पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने की इजाजत मिल गई थी. पीढ़ी दर पीढ़ी इन्हीं 30-40 परिवारों के पास इस कंपनी के अधिकार चले आ रहे थे. 2005 से ही संजीव कंपनी को खरीदने की हिमालयी मुहिम में लगे हुए थे. इतने सारे मालिकाना हक रखने वालों को किसी एक मुद्दे पर एकमत करना टेढ़ी खीर था इसलिए पांच साल बाद 2010 में जाकर संजीव को अपने लक्ष्य में कामयाबी मिल सकी.ज्यादातर लोगों के लिए कहानी एक बार फिर से खत्म हो चुकी है लेकिन कुछ लोगों के लिए यह एक नई कहानी की शुरुआत है. ईस्ट इंडिया कंपनी अब जाकर केवल नाम की नहीं बल्कि हकीकत में भारतीय कंपनी बन गई है.

Monday, April 26, 2010

जज्बे को सलाम!

हिंदी पत्रिका तहलका में `सलीब पर साहस' नाम से एक कॉलम प्रकाशित किया जा रहा है। जिसमें बिहार के बक्सर के एक किसान की ज़िद और जज्बे के बारे में पढ़ा। आप भी पढ़ें अच्छा लगेगाः संजीव

बिहार के बक्सर जिले में स्थित सरिन्जा गांव के शिवप्रकाश को कई साल तक यही लगता रहा कि भारत को लोगों को असली आजादी तो 2005 में मिली जब सूचना का अधिकार कानून पास हुआ. लेकिन जब इस आजादी का इस्तेमाल करने की कोशिश में उन्हें और उनके जसे 18 लोगों को मार खानी पड़ी और जेल जाना पड़ा तो उनकी यह खुशफहमी अब दूर हो गई है.
'डीएम ने मुझे नौ सादे कागज दिए. उन्होंने मुझ पर यह लिखने के लिए दबाव डाला कि मुझे वे सूचनाएं मिल गई हैं, जिनकी मांग मैंने की थी. जब मैंने इसका विरोध किया, तो उन्होंने धमकी देनी शुरू की. वे कहने लगे-’मैं तुम्हें और तुम्हारे परिवार को बरबाद कर दूंगा. मैं तुम्हें जेल भेज दूंगा’
2005 से प्रकाश सूचना के अधिकार का इस्तेमाल उन चीजों से जुड़ी जानकारियां पाने के लिए कर रहे थे जो उनके गांव के किसानों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती हैं, जैसे वार्ड कमिश्नर ने अपने कार्यकाल में कितना काम किया है या सरकारी योजनाओं से कितने किसानों को फायदा पहुंचा है आदि. उदाहरण के लिए केंद्र सरकार ने गरीब किसानों के लिए हैंडपंप की खरीद और ट्यूबवेल लगवाने पर 35 प्रतिशत की रियायत दी थी. आरटीआई दस्तावेजों के अनुसार प्रकाश ने पाया कि स्थानीय प्रशासन के दावों में भारी विसंगतियां हैं. वे बताते हैं कि प्रशासन ने स्टेशन रोड स्थित नवीन हार्डवेयर से 1000 ट्यूबवेलों या पीपी रोड स्थित अनिल मशीनरी के यहां से पंपसेटों की खरीद की सूची बनाई है. लेकिन इन दुकानों का अस्तित्व ही नहीं है. खरीद की अधिकतर रसीदें जाली हैं. प्रकाश को अनुमान है कि उनके अपने जिले में ही 10 करोड़ से अधिक का घोटाला हुआ है. उन्हें यकीन है कि इस तरह की धोखाधड़ी पूरे राज्य में चल रही है.
इसके बाद प्रकाश ने कई और सवाल पूछे. आवेदनों की बड़ी संख्या देख कर स्थानीय प्रशासन जवाब देने से कतराने लगा. 2006 में प्रकाश ने बक्सर जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय से शिक्षित बेरोजगार योजना के लाभार्थियों और सरकारी रियायती दर पर हैंडपंप और ट्यूबवेल खरीदनेवाले किसानों की सूची मांगी. वे कहते हैं, ‘मुझे लगा कि सरकारी फंड से करोड़ों रुपए फर्जी नामों पर उठाए गए हैं.’ लेकिन उन्हें प्रशासन से कोई जवाब नहीं मिला. इसके बाद प्रकाश ने नियमित अंतराल पर डीएम के कार्यालय को नौ आवेदन भेजे. जब उन्हें कोई जवाब नहीं मिला तो प्रकाश ने बिहार सूचना आयोग से संपर्क किया. उन्हें उम्मीद कम ही थी मगर आयोग ने उनकी शिकायतों पर कार्रवाई की और डीएम से जवाब तलब किया. प्रकाश कहते हैं, ‘इसीलिए डीएम ने तय कर लिया था कि मुझे सबक सिखाना है.’
बक्सर लौटते ही डीएम ने प्रकाश से कहा कि सारी सूचना उनके चेंबर में रखी हुई है और वे आकर उन्हें ले लें. प्रकाश 2 फरवरी, 2008 को डीएम कार्यालय पहुंचे. लेकिन यहां घटी घटना ने प्रकाश के जीवन को एक दूसरी ही दिशा दे दी. प्रकाश बताते हैं, ‘डीएम ने मुझे नौ सादे कागज दिए. उन्होंने मुझ पर यह लिखने के लिए दबाव डाला कि मुझे वे सूचनाएं मिल गई हैं, जिनकी मांग मैंने की थी. जब मैंने इसका विरोध किया, तो उन्होंने धमकी देनी शुरू की. वे कहने लगे-’मैं तुम्हें और तुम्हारे परिवार को बरबाद कर दूंगा. मैं तुम्हें जेल भेज दूंगा.’ जब प्रकाश ने झुकने से इनकार किया तो पुलिस बुला कर उन्हें हिरासत में ले लिया गया. उनके खिलाफ डीएम से रंगदारी वसूलने और उनकी हत्या करने की कोशिश के आरोप में एक एफआईआर दायर की गई. 29 दिन तक हिरासत में रहने के बाद प्रकाश सबूतों के अभाव में छूट गए.
जेल से निकलने के बाद प्रकाश का इरादा और मजबूत हुआ. उन्होंने हर जिले में घूम-घूम कर लोगों को आरटीआई और इसके उपयोग के बारे में बताया. उन्होंने अपने जैसे कुछ लोगों के साथ मिल कर आरटीआई मंच का गठन किया ताकि आरटीआई कार्यकर्ताओं को सुरक्षा दी जा सके. प्रकाश बताते हैं कि अन्य 18 कार्यकर्ताओं को भी निशाना बनाया गया है और उन्हें जेल भेजा गया है. वे कहते हैं, ‘डीजीपी ने खुद स्वीकार किया है कि बिहार में आरटीआई कार्यकताओं के खिलाफ जांच के 30 मामले चल रहे हैं.’
आजादी का शुरुआती भ्रम तेजी से बिखर रहा है. लेकिन प्रकाश अब भी डटे हुए हैं. वे कहते हैं, ‘मेरे घरवालों को यह काम पसंद नहीं. उन्हें हम बेवकूफ लगते हैं. ऐसा लगता है कि केवल भ्रष्ट लोगों को ही दौलत और शोहरत मिल सकती है. सच्चाई के रास्ते पर चलना बड़ा मुश्किल है.’

Thursday, March 11, 2010

बंदूक की नई फ़सल

टीवी पत्रकार अमृत उपाध्याय की ये कविता उनके ब्लॉग - कशमकश- से साभार ली गई हैः संजीव

घर के पिछुआड़े,
बोई थी कुछ बन्दूकें
कुछ दाने और कारतूस,
इस बार घर गया तो खोजा, बन्दूक की फसल बर्बाद हो गई शायद,
पता नहीं क्यों,
नहीं ऊगे बंदूक
और ना दाने कारतूस बन पाए
क्यों न रोता,
फफक कर रोया,
अपनी जहरीली हंसी को भूल,
वही जिसने झुलसा दिया शायद
बंदूक की फसल...

Tuesday, March 9, 2010

...मुसीबतों के सात दिन

मुआफ करें। पिछले दिनों मैं एक संस्मरणनुमा –मौत- के नाम से लिखना शुरू किया था। तीन किस्तें लिखने के बाद कुछ ख़ास वजह से उसे जारी नहीं रख पाया। आपने पुराना पढ़ा या नहीं, लेकिन इन सबको संक्षेप में लिखते हुए एक ही किस्त में पूरा कर रहा हूंः संजीव

नाम चाहे कुछ भी रख लें। उम्र, यही कोई 58 साल (जैसा कि अस्पताल में दाखिल कराते समय लिखाया गया था)। बड़ी बेटी, उड़ीसा में बीटेक फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रही है। छोटी, आठवीं क्लास की स्टूडेंट है। पत्नी घरेलू किस्म की महिला हैं, बाहर निकलने पर बार- बार अपना पल्लू सिर पर डालने की उनकी वर्षों पुरानी आदत है। वे ख़ुद बिहार के दलसिंहसराय में उद्यान विभाग के सामान्य किस्म के मुलाजिम थे।
काम पर जाते समय एकदिन वे अपनी पुरानी साइकिल से गिर पड़े। स्थानीय डॉक्टर को दिखाया गया। एक्सरे में पता चला कि कूल्हे की हड्डी टूट गई है। मुजफ्फरपुर के एक `बड़े' अस्पताल में ऑपरेशन हुआ लेकिन सात दिन अस्पताल में रहने के बाद मामला और बिगड़ गया तो उन्हें पटना रेफर कर दिया गया। हालांकि तबतक डेढ़ लाख रुपये से ज्यादा ख़र्च हो चुके थे।
पटना के पीएमसीएच में उस वक़्त डॉक्टरों की हड़ताल थी इसलिये उन्हें नालंदा मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिला। यहां तक़रीबन आठ दिन रहने के बाद डॉक्टरों ने बताया कि मुजफ्फरपुर में लगातार पेन किलर दिये जाने की वजह से उनकी किडनी पर असर पड़ा है इसलिये उनका बेहतर इलाज चंडीगढ़ पीजीआई में हो सकता है। यहां भी लगभग एक लाख रुपये ख़र्च हो चुके थे और उनकी पत्नी ने गहने गिरवी रखकर आगे के इलाज के लिए शायद डेढ़ लाख रुपये का इंतज़ाम किया।
मरीज़ मेरी ससुराल के दूर के रिश्तेदार थे। मेरे कुछ पत्रकार साथी चंडीगढ़ में हैं, इसलिये मैने भी हामी भर दी। उन्हें राजधानी एक्सप्रेस से दिल्ली लाया गया, जहां मैं स्ट्रेचर की व्यवस्था कर प्लेटफॉर्म पर था। एम्बुलेंस में उन्हें लेकर निकलते समय पार्किंग वाले ने सामान्य वाहनों से ज्यादा लिया। यानी, पंद्रह की जगह पैंतीस रुपये।
चंडीगढ़ जाते समय एम्बुलेंस में उनकी तबियत कई बार बिगड़ी। उनकी पत्नी लगातार अपने पति का चेहरा देखकर ललाट को बार- बार सहला रही थीं। लगभग छह घंटे बाद पीजीआई पहुंचे तो उन पत्रकारों को फोन किया, जिनसे मैं पहले ही इसके लिए बात कर चुका था। उन सभी ने अपनी व्यस्तता का हवाला देते हुए अपने अख़बार के मेडिकल रिपोर्टर को भेजने की बात कही।
जबतक रिपोर्टर आशीष आता, हम फ़कत एक स्ट्रेचर के लिये जूझते रहे। एक स्ट्रेचर पर मरीज था और उसे एम्बुलेंस में लादा जाना था, मैं इंतज़ार कर रहा था कि स्ट्रेचर खाली हो तो उसे लें। लेकिन वहां खड़े मेरे एक रिश्तेदार ने इशारा किया कि उस स्ट्रेचर को नहीं लेना है क्योंकि उसपर लाश पड़ी है।...ख़ैर, लगभग एक घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद एक स्ट्रेचर मिला। हम उन्हें एम्बुलेंस से उतारकर अस्पताल में दाखिल हुए। उनके साथ दो तीमारदारों से ज्यादा अंदर नहीं जाने दिया गया।
रिपोर्टर आशीष आया तो उसने अस्पताल के पीआरओ से मेरा परिचय कराते हुए कहा कि ये आपकी तमाम समस्याओं का हल कर देंगे। ये अलग बात है कि पीआरओ ने मेरी तरफ नज़र उठाने की जहमत नहीं उठाई। हाथ मिलाने के लिए बढ़ा मेरा हाथ बड़ी देर तक हवा में रहने के बाद दोबारा जेब में आ गया।
ख़ैर उन्हें भर्ती तो कर लिया गया लेकिन और मरीजों की तरह ही मेरे मरीज़ को बेड नहीं मिल पाया। एक बड़े हॉल में साठ से ज्यादा गंभीर किस्म के मरीज़ स्ट्रेचर पर ही थे। तीमारदारों के बैठने की कोई व्यवस्था नहीं थी। मेरे मरीज़ की पत्नी अपने साथ ले गई एक बैग पर जागती आंखों से सात दिन काट दिये। मैं और साथ गए दो और लोग अस्पताल के गलियारे में फर्श पर चादर बिछाकर सोए, जिन्हें सुबह चार बजे सफाईकर्मी पानी की बौछार के साथ जगाते। कोई नर्स नहीं थी। मरीजों की टट्टी से लेकर तमाम दूसरी चीजें ख़ुद ही करनी पड़ी। तीसरे दिन मैं वापस दिल्ली आ गया।
जिस फोन का इंतज़ार था, सातवें दिन आ गया। उनका निधन हो गया। मौत के वक़्त उनकी पत्नी के सिवा कोई नहीं था। मैं और उनके कुछ दूसरे रिश्तेदार डेड बॉडी के साथ दिल्ली होकर बिहार के बेगूसराय के लिए एक गाड़ी से रवाना हुए। उनकी पत्नी पूरे रास्ते टुकुर- टुकुर अपने पति का चेहरा देखती रहीं। रह- रहकर संताप के स्वर ख़ामोशी को तोड़ जाती थी। रास्ते में कहीं खाने- पीने का सवाल नहीं था। उनकी पत्नी से पूछने की हिम्मत नहीं हुई। सिमरिया घाट में उनका अंतिम संस्कार हो गया। सब अपने -अपने जगह पर वापस लौट गए। लेकिन एक सवाल अब भी मुझे कचोटता है कि क्या मैं उनके इलाज की और बेहतर व्यवस्था नहीं कर सकता था? परिवार में सबलोग इसे `होनी' के कांधे पर टांगकर भूलने की कोशिश में हैं।

Thursday, March 4, 2010

...आपके लिये


टीवी पत्रकार राकेश पाठक ने आपके लिए दो कविताएं लिखी हैं। जिसे उनके ब्लॉग -इस मोड़ पर- से लिया गया हैः संजीव

1.
चिंगारियां पानी से नहीं बुझतीं
न कभी थकती हैं...
चिंगारियां मन में दबी हों...
तो मन भी नहीं थकता
चिंगारियां गुंजाइश रखती हैं

हर दौर में खुद के आजमाइश की
चिंगारियां जंगल की आग बुझा सकती हैं...
और सांस ले लें तो पूरा शहर जला सकती हैं...
तो चिंगारी को सहेजेंगे क्या खुद में चिंगारी बोएंगे क्या...
शर्त है ज़मीन उपजाऊ होनी चाहिए...
आग के भड़कने की भी गुंजाइश होनी चाहिए...
----------------------------------------------
2
अगर लगता है कि...
नई शुरूआत के लिए...
ज़रूरी है आग लगाना
तो जला दो न सब॥
अगर लगता है कि तंत्र खंडहर बन गया है...
तो, ढहा दो न सब...

Sunday, February 28, 2010

मित्रों, मदद करें! मेरी सांस एक घंटे से नहीं चल रही

दोस्तों, सबसे पहले आप सभी को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं। होली की ख़बर बनाते समय कल मथुरा से आए विजुअल्स देख रहा था। मथुरा के यमुना घाट पर चतुर्वेदी समाज के लोग अभी भी होली के दिन भांग घोंटते हैं। उनके बीच मान्यता है कि श्रीकृष्ण और बलराम ने यमुना घाट पर भांग घोंटने के बाद ही कंस का वध किया था। इसलिये चौबे समाज के लोग आज भी भांग छानते हैं और राधे- राधे का जयघोष करते हैं। बच्चे, बूढ़े और नौजवान...सब इसमें शामिल होते हैं। धार्मिक मान्यता चाहे जो भी हो, मैं इस वक़्त आपको सिर्फ भांग और उसके नशे के बारे में बताना चाहूंगा।- संजीव
भांग का नशा, किसी भी दूसरे नशे से बिल्कुल जुदा है। कहते हैं कि शराब का नशा आक्रमक बनाता है तो भांग का नशा डरपोक। भांग के नशे में एक तरंग -सी होती है जो लंबे समय तक रहती है। मुझे याद है जब मुंगेर में पढ़ाई करते समय मैं अकेले रहा करता था। मेरे घर के सामने मेरे दूर के एक मामा भी रहते थे जो उम्र में मुझसे तीन- चार साल ही बड़े थे इसलिये उनसे दोस्ताना संबंध थे। हम सब उन्हें मनोज मामा कहते थे और रोजाना उनकी साइकिल पर सवार होकर हम सब्जी मंडी जाते। मेरा खाना उनके यहां ही बनता था। उनके साथ सुबह -शाम का साथ था। मनोज मामा बहुत कम उम्र में ही टिकिया नुमा गोली -मोदक- खाने के आदी थे। बिहार में पान की दुकानों पर मोदक की टिकिया भी मिल जाया करती है। सब्जी ख़रीदने के बाद रोजाना मनोज मामा, एक ख़ास पान की दुकान पर रुकते। पानवाला उन्हें मोदक की टिकिया देता, जिसे वे मुंह में डालते और बगल में रखी स्टील की बाल्टी में रखा पानी लोटे में लेकर गटक जाया करते थे। उसके बाद हम दोनों पान खाकर वापस घर लौट आते। घर लौटते- लौटते मनोज मामा पर भांग का सुरूर चढ़ने लगता। लेकिन कभी घर में भी उन्होंने जाहिर नहीं होने दिया। तक़रीबन यही दिनचर्या थी हमारी।
होली की एक शाम को हम बाजार गए, बेमक़सद। उस दिन न तो सब्जी ख़रीदनी थी और न ही सब्जी मंडी खुली हुई थी। फिर भी मनोज मामा, अपनी खुराक के मकसद से भले निकले हों, मैं वैसे ही उनके साथ साइकिल पर बैठ गया। पान की दुकान खुली हुई थी। उस दिन मैं भी मोदक खाने की ज़िद पर अड़ गया। उन्होंने लाख समझाया मगर मैं माना नहीं। एक छोटा -सा टुकड़ा खाने के बाद पाचक जैसा स्वाद मिला। मैने कहा, थोड़ी और दे दो। तीन -चार दफे मांगने के बाद उन्होंने एक मोदक की टिकिया मेरे लिये भी ख़रीद दी। मैं पूरी टिकिया खा गया।
वापस घर आया... तबतक मैं होशमंद बना रहा और मनोज मामा से बहादुरी के अंदाज में बातें करता रहा। इसी बीच ज्योति मौसी हम दोनों के लिए एक कटोरी में रबड़ी लेकर आई और पानी से भरा गिलास रखकर चली गईं। हम दोनों बातचीत करते- करते पूरी रबड़ी खा ली और गिलास लेकर मैं पानी गटकने लगा...पानी ख़तम लेकर मेरे कंठ की आवाज आ रही थी गट- गट। मनोज मामा ने कहा कि शायद तुम्हें चढ़ गई है।...रबड़ी ने सारा सत्यानाश कर दिया था।
खाना खाते समय मनोज मामा सतर्क थे... मैं और भी पूड़ियां मांग रहा था, मनोज मामा मना करते- कराते मुझे मेरे यहां लेकर आ गए। मुझे सोने का मशविरा देकर वापस जाने लगे तो मैने उन्हें रोकते हुए कहा कि, मामा एक बात बताऊं... मैं सुबह तक शायद नहीं रहूं। आप मुझे एक कागज और पेन दो, जिसपर मैं लिखकर दे दूंगा कि मैने अपनी मर्जी से भांग खा लिया और मेरी मौत का जिम्मेदार सिर्फ मैं हूं... न कि मनोज मामा।
वे हंसने लगे। कहा कि कैसे समझे कि सुबह तक नहीं रहोगे?... मैने कहा कि ...असल में पिछले आधे घंटे से मेरी सांस ही नहीं चल रही है। उनकी हथेली अपनी नाक की तरफ खींचकर जोर-जोर से सांस बाहर फेंकने की कोशिश की...। फिर कहा कि देखा, सांस नहीं चल रही है। उन्होंने लाख समझाया कि हवा बराबर आ रही है, लेकिन मैं समझने को राज़ी नहीं। उन्होंने दलील देने के अंदाज में कहा कि तुम साइंस के स्टूडेंट हो लेकिन कह रहे हो कि आधे घंटे से सांस नहीं चल रही तो ज़िंदा कैसे हो भाई?... मैने तुरंत जवाब दिया कि भले साइंस का स्टूडेंट हूं लेकिन साइंस पर मेरा कतई विश्वास नहीं... अपने साथ होने वाली होनी- अनहोनी पर ही मेरा ज्यादा विश्वास है।
मेरा ध्यान बंटाने की मंशा से उन्होंने कहा कि कौन -सी हीरोईन तुम्हें पसंद है?... मैने कहा कि कई पसंद हैं। उन्होंने कहा कि किसी एक का नाम बताओ। मैं बेसाख्ता बोल कहा, डिंपल कपाड़िया। उन्होंने कहा कि डिंपल का क्या अच्छा लगता है?... मैने कहा, आप सीरियसली मेरी बात को नहीं ले रहे हैं... महाराज, मेरी सांस अब तो एक घंटे से नहीं चल रही है।
मित्रों, मनोज मामा तो जैसे- तैसे मुझसे पीछा छुड़ाकर ढाई -तीन बजे रात में चले गए लेकिन मुझे यह समझा पाने में विफल रहे कि कई घंटे तक सांस न चले तो भी आदमी कैसे ज़िंदा रह सकता है। मैं अब भी इस बात पर कायम हूं कि साइंस, चाहे कुछ भी इजाद कर ले लेकिन सांस नहीं चलने के बावजूद आदमी को ज़िंदा रखने की एक ही सूरत है- उसपर मेरी तरह भांग का सुरूर चढ़ जाए।

Friday, February 26, 2010

इस मक़बूलियत पर भारत नहीं है फ़िदा

अंग्रेजी अख़बार `द हिंदू' के पहले पेज पर जब पढ़ा कि कतर के शाही परिवार ने मक़बूल फिदा हुसैन को वहां की नागरिकता देने की पेशकश की है, तो लगा कि मकबूल इस पेशकश को नहीं मानेंगे। लेकिन मैं या फिर इस तरह की उम्मीद करने वाले तमाम हिंदुस्तानियों को मक़बूल ने निराश किया। उनके बेटे ने शुक्रवार को साफ कर दिया कि मकबूल अब हिंदुस्तानी नहीं रह गए हैं। मक़बूल ने कतर की नागरिकता हासिल कर ली है। यानी, हिंदुस्तान के हुसैन पर कतर फिदा हो गया। या फिर हिंदुस्तान और कतर ने अपने- अपने हिस्से के मकबूल फिदा हुसैन को बांट लिया। कौन कहां पैदा हो, इसपर जिस तरह किसी का वश नहीं है उसी तरह एमएफ हुसैन भी उस हिंदुस्तान में पैदा हुए, जिसपर अगर उनका वश चलता तो यहां पैदा होने से इनकार कर देते। लेकिन कतर की नागरिकता की पेशकश को स्वीकार कर लेना ख़ुद उनकी इच्छा थी। ख़ुद उनके बेटे ने ओवैश ने स्वीकार किया कि कतर के शाही परिवार की पेशकश को स्वीकारने का फ़ैसला हुसैन साहब की अपनी इच्छा है।
जिस तरह राजाओं के जमाने में एक राज से दूसरे राज को संदेश देने ख़लीता लेकर घोड़े पर सवार संदेशवाहक जाया करते थे। कुछ उसी अंदाज में मक़बूल फिदा हुसैन की छाप वाला घोड़ा, इस संदेश को लेकर आया। फिदा ने अपनी कूचियों से एक घोड़ा बनाया और उसपर लिखा- आई, द इंडियन ओरिजिन पेंटर, एमएफ हुसैन एट 95, हैव बीन ऑनर्ड बाय कतर नेशनलिटी। अख़बार को ख़ुद हुसैन साहब की तरफ से ये संदेश दिया गया था। इस ख़बर के साथ उन्होंने यह भी सफाई दी कि कतर के शाही परिवार की तरफ से उन्हें यह पेशकश दी गई है। इसके लिए उन्होंने अपनी तरफ से कोई आवेदन नहीं किया था।
जाहिर है कि हुसैन के इस संदेश के बाद भारत सरकार के लिए कुछ असहज स्थिति पैदा हो गई। सत्ता पक्ष ने भरोसा दिलाया कि हुसैन साहब, देश के सम्मानित नागरिक हैं और वे अगर वतन वापस लौटते हैं तो उन्हें पूरी सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी। जबकि विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार, हुसैन को सुरक्षा देने में विफल रही इसलिये ये नौबत आई। इसी बीच जब हुसैन ने कतर की नागरिकता स्वीकार कर ली तो उनके वापस लौटने का सवाल ही ख़त्म हो गया। अब इसे भारत के मान- अपमान से जोड़कर देखा जा रहा है।
हिंदूवादी कट्टरपंथियों का इल्जाम है कि हुसैन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में गुनाह को अंजाम दे रहे थे। हुसैन ने 1970 में हिंदु धर्म की देवियों को लेकर पेंटिंग बनाई थी लेकिन उस वक़्त इसपर कोई विरोध नहीं हुआ। `विचार मिमांसा' नाम की पत्रिका ने जब 1996 में हुसैन की इसी पेंटिंग पर अपनी कवर स्टोरी बनाकर उसे प्रकाशित किया तो जैसे विरोध का सैलाब उमड़ पड़ा। हिंदु धार्मिक भावनाओं को हुसैन की इस पेंटिंग ने भड़का दिया और उनके ख़िलाफ़ देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए। धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने को लेकर हुसैन के ख़िलाफ़ कानूनी मुकदमों का सिलसिला -सा चल निकला। दिलचस्प बात ये है कि हुसैन की जिस पेंटिंग पर विवाद हुआ वह 1970 में बनाई गई थी। ठीक उसके एक साल पहले 1969 में हुसैन ने समाजवादी नेता डॉ.राममनोहर लोहिया के कहने पर रामायण पर तक़रीबन 160 पेंटिंग्स बनाई थी। हुसैन ने अपनी आत्मकथा में इसका ज़िक्र भी किया है। हुसैन से जुड़े किस्सों की फेहरिस्त में रामायण पर बनाई गई उनकी बेमिसाल पेंटिंग्स का कभी ज़िक्र हालांकि नहीं आया।
देश से हुसैन की इस तरह की विदाई भारत के सामाजिक ताने- बाने पर एक सवाल है। देश के धर्मनिरपेक्ष चेहरे पर हुसैन किसी बदनुमा घाव की तरह उभरे हैं। जहां कट्टरपंथी ताकतों के सामने सरकार और समाज, दोनों घुटने टेकने के लिए मजबूर हैं। हाल के दिनों में इस तरह के उदाहरण बार- बार सामने आते हैं। अपनी सफाई में हम यह कह नहीं बच सकते है कि हुसैन स्व निर्वासित जीवन जी रहे थे। बाक़ायदा देश से बेदखल किये जाने का आदेश देना या स्वनिर्वासन के फैसले जैसे हालात पैदा कर देना, बहुत अंतर नहीं है। देश में कट्टरपंथियों की आगे के आगे हुसैन ने स्व निर्वासन का फैसला किया था। सरकार उन बजरंगियों से हुसैन को बचा पाने में तक़रीबन विफल रही, जो बार- बार हुसैन को निशाना बना रहे थे। पिछले चार या उससे अधिक वर्षों से हुसैन, दुनिया के अलग- अलग मुल्कों में स्व निर्वासन का जीवन जी रहे थे।
इस पूरे प्रकरण में दूसरे दलों की तरह वामदलों के नेताओं का बयान भी किसी चुटकुले की तरह सामने आया। वामदल के एक नेता यह कहते सुने गए कि भारत के लिए यह बड़ा झटका है कि कट्टरपंथी ताकतों की वजह हुसैन जैसे कलाकार को अपना देश छोड़ना पड़ता है। शायद उनके जेहन से तस्लीमा नसरीन का चेहरा उतर गया हो। कट्टरपंथियों से जान बचाने के लिए तस्लीमा पश्चिम बंगाल में पनाह देने की गुहार लगाती रहीं, लेकिन बंगाल की वाममोर्चे की सरकार इस मसले पर जैसे बजरंगियों के मार्क्सवादी संस्करण में बदल गई। तस्लीमा को रातोंरात दूसरे राज्यों में भेज दिया गया। आख़िरकार `जनता की भारी मांग पर' तमाम सरकारों ने तस्लीमा को पनाह देने से इनकार कर दिया। अब जबकि तस्लीमा, हुसैन जैसे तमाम नाम भारत की फेहरिस्त से ख़ारिज कर दिये गए हैं तो इस `रामराज' में निश्चय ही बजरंगियों के लिए ख़ुश होने का मौका है।

Wednesday, February 17, 2010

सांप- नेताः किसको किससे ख़तरा



बीजेपी का इंदौर में राष्ट्रीय अधिवेशन हो रहा है। अधिवेशन स्थल पर नाना प्रकार के सांप पाए जाने की ख़बर से नेता परेशान हैं। नेताओं पर सांपों का ख़तरा है। नेता बेचारे वातानुकूलित तंबुओं में सांपों के साए में किसी तरह रात बिता रहे हैं। लेकिन सांपों से नेता क्यों डरते हैं ? सांप तो पब्लिक को डराते हैं। पब्लिक को ही सांप काटते हैं। सांपों से जनता डरती और मरती है। नेता भला क्यों डरने लगे? आप याद करके बताइए कि कभी किसी सांप ने छोटे या बड़े किसी भी नेता को काटा है ? सांप कभी नेताओं को नहीं डसते। वे तो ख़ुद नेताओं की नस्ल से परहेज करते हैं। तय तो ये होना है कि कौन किसको काटता है। किसको किससे ख़तरा है। बेचारे सांप तो राह में किसी नेता की गंध पाते ही राह बदल देते हैं। नेताओं के सामने बड़े-से-बड़ा विषधर सांप भी विषहीन, दंतहीन गरल बन जाते हैं। इसलिये सांप अपनी नस्ल में किसी को नेता नहीं बनाते। लेकिन नेता डरे हुए हैं। बड़ी संख्या में सपेरों को लगाया गया है। जो रात भर सुरक्षा जांच अधिकारी की तरह डंडे से बने यंत्र को घुमाते हुए सांप तलाश रहे हैं। नेताओं और सांपों के बीच में सपेरे और उनका यही यंत्र है।
बीजेपी के अलावा भी आजकल सियासत में सांपों की बड़ी चर्चा है। अमर सिंह जी के लिए उनके नेताजी अब हरे सांप की तरह हैं। घास में बैठ जाएं तो घास जैसा, फसल में छुप जाएं तो फसल जैसा। आजम भाई के साथ हों तो उन जैसा, हिंदू शिरोमणि कल्याण जी के बगलगीर हों तो उन जैसा। पकड़ पाना जाना मुश्किल है। ये अलग बात है कि इसी हरे सांप को गले में डालकर ठाकुर साहब घूमते रहे।
मौजूदा दौर को आप राजनीति का सांप काल कह सकते हैं। अमर सिंह के लिए नेताजी और पासवान जी के लिए सुशासन बाबू के साथ लालूजी भी कुछ वैसे ही हैं। पासवान जी कहते हैं कि सुशासन बाबू काटने वाले और लालू जी `नहीं' काटने वाले सांप हैं। पासवान जी के लिए सांप दोनों हैं। इसलिये पासवान जी ज्यादा सुरक्षित लालूजी के साथ हैं।
मुझे याद आ रहा है कि कांशीराम जी ने कांग्रेस और बीजेपी को सांपनाथ और नागनाथ का नाम दिया था। उनके लिए कांग्रेस और बीजेपी सांप थे। इसलिये राजनीति के इस सांप काल में सांपों पर नारे गढ़े जा रहे हैं। सांपों का नाम लेकर सियासी शिगूफ़े छोड़े जा रहे हैं। बेचारे सांप फिर भी कुछ नहीं कहते। फुंफकारना तो दूर, नेताओं के सामने उनकी बोलती बंद हो जाती है। क्योंकि सांपों पर नेताओं का ख़तरा है।

Friday, February 12, 2010

राहुल कथायाम् प्रथमोध्याय:

राकेश पाठक, न्यूज़ चैनल में एंकर हैं। उन्होंने राहुल गांधी पर जो कुछ लिखा है, आप भी पढ़ें, दिलचस्प है। उनके ब्लॉग- ...इस मोड़ पर- से साभार लिया गया है -संजीव
राहुल गांधी…कौन राहुल गांधी? अरे इस देश में एक ही तो राहुल गांधी है। युवा राहुल गांधी। कांग्रेस का राहुल गांधी। सोनिया का लाल राहुल गांधी। चचा नेहरू का नाती राहुल गांधी। इंदिरा गांधी का पोता राहुल गांधी। राजीव गांधी का बेटा राहुल गांधी। और भी कुछ बताना पड़ेगा क्या। राहुल गांधी अब ‘बबुआ’ नहीं रहा बड़ा हो गया है समझदार हो गया है। राजनीति समझने लगा है। अब वो प्रेस को देखकर भकुआता नहीं है। बल्कि गुर्राता है भकाभक अपनी बात कहता है। ये अलग बात है कि उसकी बात भले ऐसी लगे कि किसी बच्चे को “लघुसिद्धांत कौमुदी” के कठिन सूत्र रटा दिए गए हों। कांग्रेस के नेता अभिभूतो हो रहे हैं। गदगद हो रहे हैं उनकी डूबती नइया को पार लगाने के लिए फिर से गांधी परिवार का एक युवा धरती पर आ चुका है। दुकानदारी बंद नहीं होगी। सभी नेता घर के इस बबुआ की बालक्रीड़ा को देखकर छहा रहे हैं। आ हा हा...बबुआ कितना समझदार हो गया है...देखो तो...अले ले ले...वाह वा वा....बबुआ भारत के चक्कर लगा रहा है। वोटबैंक साध रहा है। दलित बस्ती में जाकर रात गुज़ार रहा है हमें इत्मीनान से सोने दे रहा है। लोगों को बता रहा है भारत एक है। कितना समझदार है। अभी तक किसी ने कही थी ये बात वाह वा...वाह वा...अरे बबुआ तो हीरो भी है चॉकलेटी फेस देखकर लड़कियां फिसल रही हैं। हां भई कितना खूबसूरत चेहरा है बाबा का। राहुल बाबा....प्यारे राहुल बाबा....सभी अभिभूत हैं। देखो तो कितना गज़ब का भाषण देता है। अरे थोड़े ही देता है ये तो अलग ही शैली है वो ज्ञान देने में .यकीन थोड़े ही करता है वो तो ‘इंटरएक्ट’ करता है। लोगों से सवाल पूछता है जवाब मांगता है। अले ले ले कितना प्यारा लगता है। जब बांह चढ़ाकर बड़ों जैसे बातें करता है। कहता है कि अब युवाओं को राजनीति में आना चाहिए। कहता है कि परिवारवाद नहीं चलेगा। कहता है बस बहुत हुआ। वाह वा...वाह वा...वाह वा।दिग्विजय सिंह अभिभूत हैं...महासचिव अभिभूत हैं...रीता बहुगुणा तो ऐसा लगता है बालक्रीड़ा को देखकर सम्मोहित होती जाती हैं। राहुल बाबा ने हैलकॉप्टर उतारा...ज़ीरो विज़िविलिटी थी। पर अपने लोगों से मिलने के लिए जान की परवाह नहीं की। पायलट ने मना किया नहीं माने बोले उतारुंगा...न न न मैं तो यहीं उतारूंगा। और उतार दिया हेलीकॉप्टर ज़ीरो विज़िबिलटी में। अद्भुत...चमत्कार हो गया...प्रभू ये सक्षात आप हैं....भगवन ‘कलकी’ अवतार तो नहीं हो गया...वाह वा वाह वाह वा। मनमोहन का तो मन मोह लिया है राहुल बाबा ने मनमोहन ने तो सोच भी लिया है कि उनका वारिस बस और बस राहुल बाबा ही होंगे। देखो तो कितनी समझ है राजनीति की सब जल रहे हैं हमारे हीरे को देखकर सच में लड़का हीरा है...हीरा....वाह वा...वाह वा....वाह वा। सभी बालक्रीड़ा देखकर अघा रहे हैं। जैसे नंद के बेटे ‘लल्ला’ ‘कान्हा’ की बालक्रीड़ा देखकर अघा रहे थे। अरे देखो तो लल्ला को। अरे वाह कितना सुंदर है...कितना समझदार है...लल्ला भाग रहा है यहां से वहां लोग चिल्ला रहे हैं कान्हा कान्हा कान्हा। पर मुझे एक बात नहीं समझ आ रही। कांग्रेसी गोपी बने सो ठीक। कान्हा प्रेम में अधर में अटके सो ठीक लेकिन मीडिया को क्या हो गया है। कभी-कभी लगता है कि ये कलयुग में कृष्णवतार कैसे हो गया। क्या कांग्रेसी देश की आगे की राजनीति कृष्ण की राजनीति से साधने की कोशिश कर रहे हैं। बीजेपी तो राम का नाम लेकर राजनीतिक ज़मीन साधती रही अब क्या परोक्ष रूप से कृष्ण लीला की बारी है। बीजेपी ने रामरथ को चलाया कन्याकुमारी से अयोध्या तक। बहुत कुछ हासिल हुआ, ये अलग बात है कि पार्टी एक भी राम को पैदा नहीं कर सकी, हां पार्टी को डुबोने वाले रावण कई पैदा हो गए। आज पार्टी किनारे लग चुकी है। तो क्या कांग्रेसी राहुल बाबा को कृष्ण की छवि पढ़ाकर मैदान में उन्हे उतार चुके हैं। आखिर ये फील गुड क्यों कराया जा रहा है। मीडिया एकदम से राग राहुल क्यो गाने में जुट गया है। कहीं ये एक भारी सेटिंग तो नहीं है। ये अचानक क्या हो गया है। कोई आलोचना नहीं कोई क्रॉस इक्ज़ामिनेशन नहीं ‘न खाता न बही, राहुल कहें सो सही’ मीडिया क्या अपने मकसद से भटक गया है या भटकना चाहता है जानबूझकर। और भटका रहा है हमें भी। राहुल गांधी बिहार जाते हैं कहते हैं कि मुंबई सबकी है। एनएसए के कमांडो जो 26/11 में आतंकियों से लड़े वो बिहारी थे...उत्तर प्रदेश के थे। क्यों कहने की ज़रूरत है ये बिहार में खड़े हो कर इस वक्त? तो ज़रूरत है क्योंकि बेवकूफ बनाना है वोट साधना है चुनाव में डूबती लुटिया बचानी है। ये वही राहुल गांधी है जो उस वक्त मुंबई में अपने किसी दोस्त की पार्टी में शिरकत कर रहे थे जिसवक्त मनसे के कार्यकर्ता मुंबई पहुंचे उत्तर भारतीय छात्रों पर हमले कर रहे थे। उस वक्त क्यों राहुल बाबा को इस पूरी घटना पर टिप्पणी करने की ज़रूरत नज़र नहीं आई। अभी हाल की बात लीजिए महाराष्ट्र सरकार ने टैक्सी ड्राइवरों के मसले पर एक कानून बनाया कि पंद्रह साल का ‘डोमेसाइल’ टैक्सी ड्राइवरों के पास होने पर ही उन्हे परमिट दिया जाएगा। तब क्यों नहीं कुछ बोला गया। कहा गया आलोचना की गई। राहुल बाबा तब क्यों शांत रहे। आज़मगढ़ के संजरपुर में जाकर दिग्विजय सिंह (जिन्होंने मध्यप्रदेश में सत्ता से बुरी तरह से बेदखल होने के बाद बड़े रौबीले अंदाज़ में ये शपथ ली थी कि वो दस साल तक मध्यप्रदेश की राजनीति का रूख नहीं करेंगे और कांग्रेस के आम कार्यकर्ता के रूप में काम करेंगे) ने जो बटला हाउस इनकाउंटर पर बकबक की क्यों उसपर हमारे-आपके राहुल बाबा का कोई बयान नहीं आया। दिग्विजय तो बकबकाने के बाद होश में आ गए। दरअसल वोट साधे जा रहे हैं। हर दिशा में हर दिशा से। वोट साधने में कार्य मायने नहीं रखता कांग्रेसी समझ चुके हैं। अगर काम मायने रखता तो मंहगाई से त्राहि-त्राहि कर रही जनता दोबारा कांग्रेस को सत्ता तक नहीं पहुंचाती। मुंबई की लोकल में बैठकर राहुल बाबा बिहार के और यूपी के वोट एक साथ साध रहे हैं। राहुल को ये बात समझ में आ रही है या समझाई जा रही है कि यूपी-बिहार में वोट मुंबई से सधेंगे। राहुल बाबा ने नाग-नथैया कर दी है। यमुना रूपी मुंबई में निवास करने वाले विषधर के सिर पर चढ़कर उसके जबड़ों को सिलकर ये जतला दिया है कि उनकी निगाह दरअसल कहीं और हैं। महाराष्ट्र तो पहले ही सधा हुआ है। लेकिन राहुल की नज़र हैं कहां इसका इंटरप्रटेशन कहीं नहीं है। किसी मीडिया में नहीं न प्रिंट में न ही दुकानदारी चला रहे न्यूज़ चैनलों पर। मुनाफा शायद यहां ज्यादा नज़र आ रहा है। मीडिया आंखे फाड़े मुंह फाड़े चिल्लाता रहा वाह वा वाह वा...वाह वा क्या बात है मुंबई की लोकल में सफर...राहुल का जवाब....अचानक चले गए लोकल में....लेकिन दूसरे दिन सब साफ हो गया मुंबई पुलिस के ही सबसे बड़े अधिकारी ने कहा सब प्लान हमें मालूम था हमने पूरी तैयारी कर रखी थी। मीडिया चिल्ला रहा था एसपीजी को भी खबर नहीं थी....वाह वा वाह वा...वाह वा। ‘सो मुंदौ आंख कतो कछु नाहीं’ की राह पर सब चल रहे हैं। मीडिया तो ‘चारण’ की भूमिका में आ गया है। युवराज की जय हो....जय हो प्रभू की आवाज़ें आ रहीं हैं। नेशनल चैनल गदगद हैं युवराज की हर बात पर वाह वा...वाह वा..वाह वा...करते हुए। पर ये वाह वही अगर वास्तव में देश के लिए कोई मुक्कमल रोशन भविष्य देता हो तो मैं भी कहूं वाह वा। लेकिन भईया ऐसा कहीं होने नहीं जा रहा। लोग अगर राहुल बाबा की साफगोई पर मरे मिटे जा रहे हैं तो ज़रा इस सम्मोहन से जागिए। ये समय सोने का नहीं जागने का है। निश्चय करने का है कि हमें आखिर क्या चुनना है खूबसूरत फोटोजेनिक फेस....या फिर सधे रास्ते पर निखरता और निखरता भविष्य। पर क्या करें विकल्प भी तो नहीं हैं हमारे पास। राहुल ने आजकल एक राग छेड़ा है वहीं राग ‘नब्ज़’ है। राग युवा। युवाओं को उठना होगा। पर राहुल की सरपरस्ती में नहीं खुद की टीम खड़ी करनी होगी। राहुल गांधी अपनी टीम खड़ी कर रहे हैं युवाओं की टीम....पर युवा नेता नहीं होंगे कार्यकर्ता होंगे। नेता वहीं होंगे। जतिन प्रसाद, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सरीखे युवा.....जिनकी जीन में राजनीति है। इस जीन की बुरी बात ये है कि किसी को भी बर्दाश्त नहीं करती। कांग्रेस की राजनीति में एक म्यूचुअल अंडरस्टैडिंग है। गांधी परिवार प्रधानमंत्री या प्रधानमंत्री जैसी ताकत और रुतबा और बाकि मंत्री पुत्र उसके नीचे। बस। इसके आगे खड़ी पाई है यानि पूर्ण विराम। खैर....ये बात मीडिया न समझे ऐसा नहीं है....पर क्या करे सेटिंग से परेशान है। खबरों की सारी सेटिंग ही राहुल पर है। सभी चैनल चिल्ला रहे हैं...बड़े ब्रांड्स को वशीभूत कर लिया गया है लगता है। अब बस इंतज़ार उस दिन का है जब ये ब्रांडेड चैनल चलाएंगे राहुल की खबर पर एक स्टिंग.....‘यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजांम्यहम्’

Wednesday, February 10, 2010

उत्तमा जी ! मैं आपसे बिल्कुल असहमत हूं

डॉ. उत्तमा के ब्लॉग कलाजगत (http://www.kalajagat.blogspot.com/) पर रुचिका मामले के मुख्य अभियुक्त राठौर पर हमले को लेकर लिखी गई पोस्ट पढ़ने के बाद ख़्याल आया कि उनके ब्लॉग पर जाकर टिप्पणी करूं। इस वज़ह से ख़्याल को ख़ारिज कर दिया कि ब्लॉग की टिप्पणियां अमूमन चंद बरदाई रचनावली सरीखी होती है। यानी, सहमतियों से लबरेज, इरशाद- इरशाद करने वाली मुद्रा में की गई राजदबारी किस्म की छोटी- छोटी टिप्पणियां। कुछेक पोस्ट में असहमितयां होती हैं तो वे अक्सर बेवज़ह की गई टिप्णियां होती हैं, जिसे दिल पर लेने की जरूरत नहीं। इसलिये ब्लॉग की इस परिपाटी को बनाए रखते हुए मैने अपने ब्लॉग पर टिप्पणी लिखना ज्यादा मुफ़ीद समझा। -संजीव
राठौर पर हमला करने वाले उत्सव...या जो कुछ भी उसका नाम है, उसपर डॉ. उत्तमा की पोस्ट से मेरी सख़्त असहमति है। उत्तमा ने अपनी पोस्ट के जरिये उत्सव के हमले को अलग- अलग नज़रिये से देखने की कोशिश की लेकिन यह बताने में विफल रही कि आख़िरकार वह कौन –सी मनोदशा थी, जिसमें उत्सव ने राठौर पर हमला किया। इसके लिए उन्होंने उत्सव के पिता के उस बयान का सहारा लिया जिसमें वे कह रहे हैं कि `पढ़ने- लिखने में होशियार उत्सव कुछ दिनों से न्याय- अन्याय की बात करने लगा था।‘ उन्होंने रुचिका प्रकरण को लेकर चंडीगढ़ (जहां राठौर की पेशी हुई) के माहौल में राठौर को लेकर फिजाओं में घुली नफ़रत का ज़िक्र करते हुए कहा है कि उत्सव को इन ख़बरों ने भी उकसाया होगा। मेरा सवाल है कि इस मामले को छोड़कर कोई भी दूसरी ऐसी घटना बता दे (फिल्मों को छोड़कर) जिसमें किसी खबर ने किसी आदमी में इतनी नफ़रत भर दी हो कि वह उसी तरह हमलावर हो जाए जिस तरह उत्सव ने राठौर पर किया। उसमें भी, तब जबकि हमलावर न तो पीड़ित को जानता हो और न ही आरोपी से उसका परिचय हो।
उत्तमा जी ने दूसरी वजह बताते हुए लिखा है कि `कलाकार ज्यादा संवेदनशील होते हैं और उत्सव भी एक कलाकार है।’ आगे उन्होंने एक संस्था की सर्वे रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया है कि कलाकार चूंकि ज्यादा संवेदनशील होते हैं इसलिए उनमें डिप्रेशन के मामले ज्यादा होते हैं।
उत्सव के हमले के कारणों को हजम भी कर जाएं या इसे जांच- पड़ताल के जिम्मे छोड़ दें, तो भी क्या इसे माना जा सकता है कि उत्सव का हमला रुचिका प्रकरण पर सभी भारतीयों की भावनाओं का प्रतीक है ? वे लिखती कि `उत्सव उन भावनाओं का प्रतीक है जो रुचिका प्रकरण को लेकर हर भारतीय के दिल में घुमड़ रहा है। उत्सव के साथ शायद कानून नहीं होगा लेकिन उसके साथ तमाम भारत के लोगों की भीड़ है।’ डॉ.उत्तमा ने आपके पास दो ही विकल्प छोड़े हैं- पहला, या तो आप इस सच्ची भारतीयता की जमात में ख़ुद को शामिल कर नायक –उत्सव- के परिवर्तनकामी कारनामे की पालकी ढोयें या फिर सच्चे भारतीयों की लिस्ट से आपका नाम ख़ारिज़ कर दिया जाएगा।
दरअसल, कमाल की भारतीयता रह- रहकर देखने को मिलती है। आपको याद होगा कि जिस तरह उत्सव के हमले को आक्रोश का विस्फोट बताया जा रहा है, कुछ इसी तरह संघ परिवार भी बाबरी ढांचे की शहादत को वर्षों से दबे जन आक्रोश का नतीजा बता रहा था। गुजरात दंगों को भी कुछ इसी अंदाज में स्वस्फूर्त बताने की कोशिश की गई थी। या फिर मुंबई आतंकी हमले के आरोपी कसाब को लेकर कई बार उसकी सुरक्षा में खर्च हो रही भारी- भरकम राशि का ब्यौरा देते हुए अफसोस किया जाता है कि इतना कुछ जरूरी नहीं था।
जाहिर है कि इस तरह का नज़रिया कुछ लोगों या एक समूह या हिस्से का हो सकता है लेकिन पूरे भारत का नहीं। ठीक उसी तरह उत्सव के हमले को कुछ लोग भले ही जायज ठहरा रहे हैं लेकिन यह भारत का प्रतिनिधि स्वर नहीं है। फ़र्ज़ करें कि भीड़ अगर इसी तरह इंसाफ़ करने लगे, उसके इंसाफ़ पर लोग तालियां बजाएं तो किस तरह का समाज तैयार होगा ? ...इसलिये उत्तमा जी, उत्सव के माता- पिता के साथ पूरी हमदर्दी रखते उत्सव के हमले की आप भी पुरजोर निंदा करें तो शायद बेहतर हो।

Tuesday, February 9, 2010

पब्लिक तो बच्चा है जी!

आप उत्तर भारतीय हैं तो फ़क़त इसबात पर ख़ुश हो सकते हैं कि कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी उनकी हिमायत में आ गए हैं। मराठी बनाम उत्तर भारतीयों के खूनी खेल में अबतक तमाशबीन बनी कांग्रेस ने चुप्पी तब टूटी जब शिवसेना के कागजी शेरों ने गांधी परिवार पर व्यक्तिगत हमला बोल दिया। राहुल गांधी ने हाल ही में पटना में कहा कि `मुंबई पर सबका हक़ है। मुंबई आतंकी हमले के दौरान बचाव के लिए गई एनएसजी की टीम में बिहार, उत्तर प्रदेश के भी कई जवान थे। उस समय मराठी राजनीति करने वाले नेता कहां थे ?'
राहुल गांधी के इस ताजा रुख़ के कई निहितार्थ हैं। उनके इस बयान ने कांग्रेस और केंद्र सरकार की कई मुश्किलें कुछ आसान कर दी हैं। राहुल गांधी के बयान के मर्म को समझने के लिए दो चीजें बहुत अहम हैं। अव्वल, राहुल गांधी का यह बयान किस वक़्त आया है? साथ ही यह भी समझने की भी जरूरत है कि राहुल गांधी ने किस जगह पर ये बयान दिया ? राहुल गांधी ने मराठी बनाम उत्तर भारतीयों के मसले पर तब जुबान खोली जब महंगाई के मसले पर कृषि मंत्री शरद पवार, अपनी ही यूपीए सरकार की खासी किरकिरी करा रहे थे। शरद पवार, महंगाई पर अपनी भविष्यवाणियों से कांग्रेस को रह- रहकर डरा रहे थे। आम जन के साथ कांग्रेस के हाथ का दावा, छलावा साबित हो रहा था।
दरअसल, यूपीए सरकार और कृषि मंत्री शरद पवार के अलग- अलग सुरों के पीछे भी बारीक राजनीति है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और एनसीपी, दोनों ही सत्ता में आ गई। जाहिर है कि महाराष्ट्र की राजनीति तक सिमटे शरद पवार सुविधाजनक स्थिति में आ गए लेकिन महंगाई पर अपनी भविष्यवाणियों से कांग्रेस की राह उन्होंने जरूर पेचीदा बना दी। महंगाई रोकने के लिए यूपीए सरकार के दावों को शरद पवार यह कहकर रोज-ब-रोज आईना दिखाते रहे कि आने वाले दिन और भी मुश्किलों भरे हैं। काफी फजीहत के बाद सरकार की तरफ से शरद पवार ने देश को भरोसा दिलाया कि पंद्रह दिनों के भीतर जरूरी खाद्य पदार्थों की कीमतें कम होंगी।
इस समय सीमा में खाद्य पदार्थों की कीमतें तो क्या कम होतीं लेकिन महंगाई ने कांग्रेस को सतर्क जरूर कर दिया। इसी वर्ष बिहार विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और चुनावी वर्ष में कमरतोड़ महंगाई का सवाल कांग्रेस के मंसूबों पर पानी फेर सकता है। दूसरे, मुंबई में उत्तर भारतीयों पर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना और शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने भले ही कहर बरपाया हो लेकिन राज्य में कांग्रेस- एनसीपी के गठबंधन वाली सरकार इस तमाशे के दौरान ख़ामोश बनी रही। मुंबई की सड़कों पर उत्तर भारतीय टैक्सी ड्राइवरों को निशाना बनाया गया या फिर बिहार के एक उन्मादी युवक को किसी आतंकवादी की तरह सड़क पर मार गिराया गया, कांग्रेस के नेताओं ने तब भी अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी। उस वक़्त कांग्रेस के सामने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की मजबूरी थी। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अप्रत्याशित रूप से इसका फायदा भी मिला। शिवसेना और एमएनएस की बंदरबांट में कांग्रेस नफा उठा गई।
केंद्र और राज्य में सत्ता में आने के बाद मराठा क्षत्रप शरद पवार ने कांग्रेस की राह में कांटे बोने शुरू कर दिये। इसकी काट में कांग्रेस के मराठा नेता और राज्य के मुख्यमंत्री अशोक चाह्वाण ने मराठी टैक्सी ड्राइवरों को ही परमिट का शिगूफा छोड़कर कांग्रेस की मुश्किलें कुछ आसान कर दीं। आपको चाह्वाण के बयान की बाजीगरी को समझने में ज्यादा दिक्कत इसलिये नहीं होगी कि फ़ौरन बाद उन्होंने यू-टर्न ले लिया। लेकिन तबतक कांग्रेस को इस मुद्दे पर जितनी तपिश की जरूरत थी, उतनी मिल गई। पटना के दौरे पर गए कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के बयान ने इसी विवाद को और भी हवा दे दी। राहुल गांधी के बयान से उपजे विवाद ने महंगाई के बड़े सवाल को भी बौना साबित कर दिया है। महंगाई के सवाल पर अबतक निरुत्तर हो जाने वाले सरकार के नुमाइंदों से इसबारे में कोई पूछने वाला नहीं है। राहुल के बयान ने दाल- रोटी की छटपटाहट में उठते सवालों को इलाकाई झगड़े के शोर में तब्दील कर दिया। आप केवल अंदाजा लगाएं कि अगर ताजा विवाद न होता तो सरकार के पास क्या महंगाई को लेकर उठते सवालों का कोई जवाब होता ?