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Friday, January 29, 2010

देश को भी मुसर्रतों की जरूरत











अभी टेक्सास से मुसर्रत भाई का जवाबी ईमेल आया। आप नहीं जानते मुसर्रत भाई को... मैं भी नहीं जानता था। लेकिन पिछले दिनों जान गया कि जिन अंधेरी गलियों से सूरज भी कुछ परहेज के साथ कन्नी काट लेता है, वहां भी कई बार मेधा की रौशनी जरूर निकलकर आती है। मुसर्रत अली झांसी के रहने वाले हैं। नाम डॉक्टर मुसर्रत अली है। कैंसर की बीमारी पर रिसर्च करने अमेरिका गए। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की डेमोक्रेटिक पार्टी ने उन्हें अपना टिकट थमाया है। टेक्सास हाउस डिस्ट्रिक्ट 122 से चुनाव लड़ रहे हैं। www.alifortexas.com - पर क्लिक करें तो चुनाव में खड़े होने का उनका मकसद देख सकते हैं। जिसमें उन्होंने तालीम, स्वास्थ्य सहित दूसरी चीजों की तरफ अपने वोटरों का ध्यान दिलाया है।
डॉ.मुसर्रत अली चुनाव के सिर्फ उम्मीदवार भर नहीं हैं। मुसर्रत होने के दूसरे मायने भी हैं। मुसर्रत अली, मेधा की उसी रौशनी का नाम है जो झांसी की बेहद तंग गलियों से निकलकर आया है। आप विश्वास करेंगे कि डॉ.मुसर्रत अली के पिताजी दर्ज़ी का काम करते थे। नौ भाई- बहनों वाले परिवार में मुसर्रत, अपने पिता की पहली संतान हैं। मुफ़लिसी से दो- दो हाथ करते हुए मुसर्रत अली ने झांसी के मदरसे में शुरुआती तालीम ली। उसके बाद झांसी के जीआईसी से हाईस्कूल और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बायोकेमेस्ट्री में एमएससी की। पिता चाहते थे कि मुसर्रत डॉक्टर बनें लेकिन उनका इरादा कुछ और था। मुसर्रत के लिए ये तालीमी सफ़र आसान नहीं था। ग़रीबी से पैदा होने वाली चुनौतियों ने उनका कड़ा इम्तहान लिया। लेकिन मुसर्रत ने छात्रवृत्ति के सहारे उन कठिनाइयों से पार पा लिया। कैंसर पर रिसर्च के लिए पेरिस सहित दूसरी जगहों पर रहे। कामयाबी के बाद झांसी में रह रहे उनके परिवार की हालत भी सुधरी। बुजुर्ग पिता, दर्जी का काम छोड़कर अब कपड़ों का व्यवसाय कर रहे हैं। भाई और भतीजे के लिए भी उनकी कामयाबी खुशियां लेकर आई।
इन सबसे अलग मुसर्रत अली ने अब राजनीति में उतरने का फ़ैसला किया। मेरे लिये यह जानकारी एक सवाल की तरह बार- बार आती है। हमारे देश का सियासी ढांचा बदलने के लिए पढ़े- लिखे और जमीन से उठकर आए लोगों को कब टिकट मिलेगा ?... क्या ये अपने देश की राजनीतिक पार्टियों के लिए संदेश नहीं है, जो अबतक जाति, धर्म और पैसों की ताकत देखकर अपने उम्मीदवारों को चुनावी अखाड़े में उतारते हैं? (आसपास लगी तस्वीरों को देखिये। उसमें डॉ.मुसर्रत अली के पिता, भाई- भतीजे और उस मदरसे की तस्वीर है, जहां उन्होंने पढ़ाई की थी। दरअसल, कैप्सन लगाने का तरीका मैं अबतक नहीं जान पाया हूं इसलिये असुविधा के लिए खेद है)

Saturday, January 23, 2010

हो- हो- हो




कार्टूनिस्ट पवन ने पिछले दिनों टीवी शो -राज पिछले जन्म का- और नये साल के मौक़े पर कुछ कार्टून बनाए थे। देखिये और मजा लीजिये। हां, कार्टून पर क्लिक करके उसे बड़ा कर लें, जिससे कि आपको पढ़ने और देखने में सुविधा होः संजीव

Saturday, January 16, 2010

मैं फलां जी हूं...तू कौन है?



मेरे साथ एक नये सहयोगी आए हैं। नाम है विंध्यवासिनी। मेरा परिचय इस रूप में नहीं हुआ कि ये फलां साहब हैं... या इन साहब का नाम ही विंध्यवासिनी है। सो, मैं इस भ्रम में था कि कोई नई लड़की आई है जिसका नाम विंध्यवासिनी है। भगवती दुर्गा का एक नाम विंध्यवासिनी भी है...। दो- चार दिनों के बाद पता चला कि यही तो हैं विंध्यवासिनी। हट्ठा-कट्ठा नौजवान। न्यूज़ रूम में थोड़ी हंसी भी हुई। लेकिन रात में सोते समय जब सोचा तो इस तरह के कई नाम जेहन में आए जिसे सुनकर लगता है कि बच्चों के नाम रखते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिये। अब सुनिये कि जो विध्यवासिनी के नाम पर हंस रहे थे ...उनमें एक साथी हमारे और थे- विद्युत प्रकाश। उनके भाई का नाम है तड़ित प्रकाश। आप कह सकते हैं कि नाम बड़ा साइंटिफिक टाइप का है लेकिन लोगबाग उनके पीठ पीछे इसपर भी ठिठोली करते हैं।
हमारे एक और सहयोगी हैं। उनका नाम वैसे गोपाल है...लेकिन न तो वे सिर्फ गोपाल लिखना पसंद करते हैं और न कहलाना। आप उनसे उनका नाम पूछें तो बताएंगे कि -गोपाल जी। पहले लगा कि जी का कोई गूढ़ मतलब होगा। लेकिन पता चला कि गोपाल जी बेवजह ही इस छोटे -से जी को ताउम्र ढोते रहे हैं। एक और साथी थे हमारे। ठाकुर साहब। ढलती हुई ठकुराई उनके अंदाज में रच- बस गई थी। ग़लती से अगर उनके पास कोई फोन कॉल आ जाए तो वे झल्लाने की मुद्रा में कहते थे कि मैं फलां जी बोल रहा हूं... तुम कौन बोल रहे हो ?....एक सज्जन और थे, जो अपने नाम के साथ श्री लगा बैठते थे। जैसे कोई नाम पूछे तो कहते थे- श्री फलां। ऐसा नहीं है कि उनके नाम के साथ श्री लगा हुआ था- जैसे, श्रीनिवास, श्रीचंद, श्रीवत्स, श्रीश, श्रीसंत या फिर इसी तरह के कुछ और नाम। वे सज्जन जब अपने नाम के साथ श्री लगाते थे तो ऐसा लगता जैसे कौवे का श्रृंगार कर दिया गया हो। वे जिस उत्साह के साथ अपने नाम के साथ श्री लगाते थे, उससे कई बार टोकने का मन करते हुए भी मैं दबा देता था।
मुझे अपने गांव के नामों की भी याद आ गई। पहले किस- किस तरह से नामोत्सपत्ति होती थी। ग़ज़ब कारण होता था किसी के नाम रखने का। मेरे गांव की एक महिला कहीं रेल से जाने वाली थी, लेकिन स्टेशन पहुंचते- पहुंचते उसे बेटा पैदा हो गया। नाम पड़ गया -टिसनिया। गांव -जवार में स्थानीय बोली में स्टेशन को टेसन कहने का रिवाज है इसलिए बच्चा टेसन पर पैदा हुआ तो नाम रख दिया टिसनिया। एक महिला थी...उसका नाम कुछ और था। लेकिन उसे तेज आवाज में बोलने की आदत थी...सो, उसका नाम हल्ला गरी - रख दिया गया था। हमारी बोली में गाड़ी को गरी बोलने का रिवाज़ है।
हमारे यहां नाम को बिगाड़ कर बोलने की आदत होती है। नाम का पहला शब्द अक्सर इस नाराज़गी का शिकार होता है। जैसे नाम हो प्रकाश आनंद- तो बोलेंगे प्रकसबा...। अगर एक शब्द का नाम हो तो सारी नाराज़गी उसी पर टूटती है। मसलन, अजितबा (अजित), दिलपा(दिलीप), रकेसबा (राकेश)- ऐसे ही तमाम नामों के साथ। आप चाहे अपने नाम के साथ श्री भी लगा लें या जी लगा लें- लेकिन आप बच नहीं सकते। जैसे श्रीनिवास जी आप नाम रख लें। लेकिन इसे बिगाड़कर बोलेंगे श्रीनिवास जीवा। मुझे याद है कि मेरठ में एक किराये के मकान में था...और मकान मालिक एक बुजुर्ग थे, जिन्हें हम अंकलजी कहते थे। लेकिन अपनी बोली में बतियाते हुए स्वभाविक रूप से बोलते थे- अंकल जीवा। यानी, अंकल भी इससे नहीं बचे। ये किसी मंशा या शरारत से नहीं करते, बल्कि ज़ुबान का ढंग- ढर्रा जल्दी बदलता नहीं है।

Thursday, January 14, 2010

आजा हंस लें...


बिहार में मकर संक्रांति पर दही- चूरा (धान से तैयार हुआ) खाने की परंपरा है। उसी पर पवन ने कुछ हास्य के क्षण खोजे हैं। उनके कार्टून प्रकाशित करने वाले ब्लॉग नश्तर से इसे लिया गया है। चाहें तो यहां देखें या वहां... हंसी जरूर छूटेगी। हां, कार्टून देखने के लिए वहां क्लिक करें तो ये बड़े रूप में सामने आ जाएगा -संजीव

Friday, January 8, 2010

...रात ठाकरे सपने में आए, हिंदी बोल गए फरा-रा-रा-रा



क्या बताऊं। पिछली रात ख़्वाब में राज ठाकरे आए। जैसा कि किसी पुरानी सीन को दिखलाना हो तो ब्लैक एंड व्हाइट ज्यादा प्रभावी दिखती है...उसी तरह नफ़रत की आग उगलते राज ठाकरे...। फिर बाला साहब ठाकरे का सिंहनाद- कांग्रेस में अकेली मर्द हैं शीला दीक्षित, जिन्होंने दिल्ली को बचाने के लिए पूरबियों और बिहारियों की मौजूदगी को गंभीरता से लिया। (उनके मुंह से बाक़ायदा दहकते हुए शोले दिखे)
सीन- 1
लेकिन सपने का सीन तत्काल बदला। फिर नई दिल्ली में चल रहे प्रवासी सम्मेलन के शॉट्स आने लगे। धनी- मानी और दुनिया भर में हिंदुस्तान का लोहा मनवाने वालों की जमात। तहज़ीब और तमीज के साथ बैठे लोग। ...उनकी शान में कसीदे पढ़ते मंत्री...उन्हें रिझाने की मुद्रा में विकास दर का ख़ाका पेश करते नेता। फिर पता नहीं सपने में ही बाइट चलने लगी। गंगा किनारे वाला कोई छोरा... नहीं- नहीं...अधेड़ आदमी था जो सात समुंदर पार एक बड़ा उद्यमी था। उसकी तीन पीढ़ियां वहीं थीं...। बाइट हिंदी में थी...(राज ठाकरे साहब माफ़ करें)...टूटी- फूटी हिंदी ही सही, उन्होंने अंग्रेजी से परहेज किया...कहीं- कहीं अंग्रेजी के शब्द चिप्पी की तरह जरूर आ रहे थे। बोल रहे थे कि हिंदुस्तान की संस्कृति... यहां के लिटरेचर और हिंदू धर्म से उनका और उनके परिवार का गहरा लगाव है। पवित्र -गीता- उनके घर में है और सीता मैया की पूजा उनकी दिनचर्या। रामनवमी का आयोजन वहां के हिंदू समुदाय के बीच हर साल होता है जिसके आयोजन में उनकी पूरी सक्रियता रहती है।...माघ मेला की यादें अबतक बनी हुई हैं। ....मुझे किसी विदेशी शहर की आकाश चूमती इमारत की चोटी पर हिंदू धर्म का पताका लहराता दिखा।
सीन- 2
बंधुओं, सपने पर मेरा जोर नहीं था... और न ही मनचाहे सपने देखने की छूट। इसलिये एम्बियंस के साथ फिर से सीन बदल गया।..आपके हिसाब से ख़बर ...लेकिन मैं स्वप्न दृष्टा था, इसलिये कहूंगा कि मेरे लिए सपना था... सामने टीवी स्क्रीन था, जिसपर बताया जा रहा था कि राज ठाकरे दिल्ली आएंगे। समाचार वाचिका ऐसे बोल रही थी जैसे किसी एलियंस के बारे में बताने जा रही हो। उसका कहना था कि राज ठाकरे दिल्ली आएंगे...अदालती मुश्किलों में फंसे राज ठाकरे के मामलों की सुनवाई दिल्ली में होगी। ...मैं मुस्कुराया...(सपने में भाई !)...राज ठाकरे अगर दिल्ली में पेश हुए तो वे किस भाषा में बोलेंगे... मराठी, अंग्रेजी या हिंदी...।
सीन- 3
फिर सीन बदल गया। इसबार मेरी नज़रों के सामने कई अख़बार थे... अख़बारों के नाम पढ़ने की कोशिश की, वही सब अख़बार थे, सुबह- सुबह जिसका रट्टा लगाता हूं। सबमें ऑस्ट्रेलिया में हिंदुस्तानी युवकों पर हमले की खबरें सुर्खियों में थीं। ...कुछेक में विदेश मंत्री का बयान भी छपा था कि ...ख़्वामख़ाह के कोर्सेज करने के लिए लड़के विदेश जाते ही क्यों हैं?... वे यह जानकर हैरान थे कि बाल संवारने का तरीका बताने वाले ...या फिर सूरत संवारने वाले कोर्स पर रीझकर हिंदुस्तानी लड़के ऑस्ट्रेलिया तक पहुंच जाते हैं...जबकि यही कोर्सेज हिंदुस्तान के कई बड़े शहरों में भी पढ़ाए जाते हैं। (मेरे मुंह से निकला- कतई नालायक़ नस्ल पैदा हुई है)
सीन- 4
अख़बारों के पन्ने पलटते हुए अंदर के पेज देखे तो एक ही पेज पर कई ख़बरें थीं... या कहिये कि ख़बरों का कोलाज था- महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के ख़िलाफ़ मुहिम, दिल्ली की हुक्मरान ने कहा- सबसे बड़ी समस्या हैं बाहरी, मध्यप्रदेश की हुकूमत का फ़रमान- बिहारी और बाहरियों को नहीं देंगे नौकरी, पंजाब में बिहारी मजदूरों पर बरसा डंडा, असम में हिंदी भाषियों पर हमला....बस- बस- बस....भाई बस।...नींद टूट गई... मेरा नौ साल का बेटा हैरानी से मेरी ओर देखते हुए झकझोर रहा था। ...टीवी पर वाक़ई कुछ ख़बरें आ रही थी।

Wednesday, January 6, 2010

९० पार के नौजवान



अगर आप आंध्र प्रदेश के पूर्व राज्यपाल और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के बारे में जानकर सनाके में हैं तो जानी- मानी पत्रिका तहलका में एक बुजुर्गवार लेखक खुशवंत सिंह के नज़रिये के बारे में भी पढ़ें। कुछ पहले का है, लेकिन दिलचस्प है। -संजीव



‘मुझे अच्छे सेक्स की कमी महसूस होती है. जब आप सेक्स के लायक नहीं रह जाते तो समझ लीजिए कि दुनिया छोड़ने का वक्त आ गया है. लेकिन हां, मैं आज भी रूमानी कल्पनाएं करता हूं’
खुशवंत सिंह उम्र: 94 ‘मैं टिके रहना चाहता हूं लेकिन मुझे पता है कि अब मेरा वक्त करीब है,’ चार साल पहले मनमौजी सरदार खुशवंत सिंह ने मौत के जिक्र पर ये बात कही थी. उस दुर्लभ मौके पर उन्होंने घंटे भर से ज्यादा मौत के दर्शन पर बातचीत की थी. खिड़की के बाहर देखते हुए उन्होंने कहा था, ‘मैं अक्सर उस पेड़ को देख कर सोचा करता हूं कि मैं इसे कब तक देख पाऊंगा. मैंने इसे अपने साथ ही बढ़ते हुए देखा है. मैं मानसिक तौर पर फिट हूं मगर मेरी शक्ति खत्म हो रही है. मैंने अपनी पत्नी को मानसिक तौर पर असंतुलित होते हुए देखा और बाद में उसकी बहुत दुर्दशा हुई. मुझे भी उस स्थिति के लिए तैयार रहना होगा.’
शायद भारत के सबसे चर्चित लेखक. उनका स्तंभ न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर आज भी पाठकों के बीच लोकप्रिय है इन दिनों वे एक और किताब लिख रहे हैं, इसका विषय क्या है, ये जानने का एक ही तरीका है और वह है इंतजारहालांकि सेक्स के कलेवर में लिपटी हुई मजेदार फंतासियों का ये किस्सागो और 30 से ज्यादा किताबों का ये लेखक जीवन के प्रति आज भी पूरी तरह से केंद्रित है. उनके बेटे राहुल सिंह से पूछने पर कि आखिर क्या चीज उनके पिता को अभी भी चलायमान रखे हुए है, तुरंत ही उत्तर मिलता है, ‘हर शाम व्हिस्की के दो पेग और उनकी तमाम महिला मित्र जो अपनी रूमानी जिंदगी को और मजेदार बनाने के लिए हर दिन उनसे सलाह लेने के लिए इकट्ठा होती हैं.’ हर शाम, बेनागा, 7 से 8 बजे के बीच इलस्ट्रेटेड वीकली का ये पूर्व संपादक अपने लिविंग रूम में बैठक जमाता है जिसमें गिने-चुने लोग ही शामिल होते हैं. उनके मुख्य दरवाजे पर हमेशा एक बोर्ड टंगा होता है- ‘अगर आप आमंत्रित नहीं है तो घंटी न बजाएं’.
इस एक घंटे का भरपूर लुत्फ उठाने के लिए खुशवंत सिंह बेहद अनुशासित दिनचर्या का पालन करते हैं. वे तड़के चार बजे ही उठ जाते हैं और रोज सभी अखबारों के क्रॉसवर्ड्स हल करते हैं. इसके बाद उनकी दिनचर्या में शामिल होता है, कॉलम लिखना, दोपहर में दो घंटे झपकी लेना, शाम के सात से आठ बजे का इंतजार और 8.30 बजे डिनर करके 9 बजे तक सो जाना. अगले दिन वे फिर से 4 बजे उठ जाते हैं. उन्हें चलने-फिरने के लिए दीवार का सहारा लेना पड़ता है, अक्सर वे फोन सिर्फ ये कहने के लिए उठाते हैं, ‘मैं बहरा हूं. मैं आपकी आवाज सुन नहीं सकता, मुझे पत्र लिख कर भेजें.’ खुशवंत सिंह के मानसिक स्वास्थ्य का राज सिर्फ उनकी महिला मित्र ही नहीं बल्कि शायरी और हंसी-मजाक भी है जिसकी खुराक वे आज भी रोजाना लेते हैं.
चार साल पहले तहलका के साथ साक्षात्कार में ये पूछे जाने पर कि वे सबसे ज्यादा किस चीज की कमी महसूस करते हैं, उनका जवाब था, ‘बढ़िया सेक्स. मैं काफी समय से बढ़िया सेक्स का आनंद नहीं ले पा रहा हूं. कोई आदमी जिस दिन बढ़िया सेक्स न कर पाए समझ लीजिए उसके जाने का वक्त हो गया है. लेकिन हां, मैं रूमानी कल्पनाएं करता हूं.’
व्यंग्य और कटाक्ष उनके जीवन का हिस्सा रहा है, यहां तक कि उम्र के बीसवें दशक के दौरान ही उन्होंने खुद की श्रद्धांजलि लिख डाली थी. उनका साप्ताहिक स्तंभ ‘न काहू से दोस्ती न काहू से बैर’ इस बात का सबूत है कि उन्हें जिंदगी से अब भी उतना ही प्रेम है. उन्होंने सब कुछ दान कर दिया है. वे कहते हैं, ‘मेरे पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं है.’ बावजूद इसके उनके पास देने के लिए बहुत कुछ है जिसे वे हफ्ता दर हफ्ता अपने पाठकों तक पहुंचाते रहते हैं.
हरिंदर बवेजा

Saturday, January 2, 2010

नक़ाब पोशियां भायी जिन्हें वो बुत तो नहीं

नक़ाबपोशी को लेकर जानी -मानी पत्रिका तहलका में एक नये नज़रिये पर नज़र पड़ी। आप भी पढ़ें, शायद आपको भी पसंद आए- संजीव

अक्सर मध्यकालीन बर्बरता के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है हिजाब। पर निशा सूजन को अचरज है कि लोग उनसे भी क्यों नहीं पूछते जिन्होंने खुद ही इसे अपनाने का फैसला किया है
हिजाब पहनने वाली लड़कियों की खोज के आखिर में मेरी मुलाकात एक बेहद दिलचस्प लड़की से हुई. उमस भरा दिन था और पुरानी दिल्ली की एक चाय की दुकान में मैं तबस्सुम से बातें कर रही थी. 26 साल की तबस्सुम एक एनजीओ में काम करती हैं. काम के सिलसिले में उन्हें अक्सर यात्राएं करनी पड़ती हैं. हिजाब के बारे में पूछने पर बातों में माहिर तबस्सुम बताती हैं कि उन्होंने हिजाब पहनना इसलिए शुरू किया क्योंकि उनके चेहरे पर मुंहासे थे.
‘अब मुझे ये डर नहीं लगता कि हर वक्त कोई न कोई मुझे घूर रहा है. लड़के मुझे अब एक ऐसी लड़की के तौर पर देखते हैं जिसे अपने फैसलों का अच्छा-बुरा पता है’
कभी-कभी बहुत करीबी दोस्त भी पूछ बैठते हैं कि क्या मुझ पर कोई दबाव है. मैं उनसे कहती हूं, सोचो कि जब तुम अपनी मां से अपने माथे पर टीका लगाने के लिए कहते हो तो तुम्हारे मन में उस समय कितनी खुशी होती है. तुम्हें पता होना चाहिए कि मेरे पास भी दिमाग है.तबस्सुम खुद को एक बहुरूपिया कहती हैं. शायद इसलिए क्योंकि वो तो दूसरों के लिए अनजान होती हैं मगर दूसरों की पहचान उनके लिए खुली होती है. दुनिया को देखने-बरतने के उनके तरीके पर हिजाब पहनने से कोई फर्क नहीं पड़ता. वो चुपचाप चल सकती हैं, जोर से हंस सकती हैं, लड़कों से मिल सकती हैं और साइबर कैफे में अजनबियों के साथ चैट करते हुए घंटों भी बिता सकती हैं. लेकिन उन्हें इस बात का भी अहसास है कि उनका हिजाब लोगों के मन में कई सवाल खड़े करता है.
हालांकि तबस्सुम के पास इन सवालों के आसान जवाब नहीं हैं. वो और उनके जैसी नई पीढ़ी की मुस्लिम महिलाएं हिजाब के उस रूढ़िवादी विचार के लिए चुनौती हैं जिसके मुताबिक ये पुरुषसत्तामक समाज में महिलाओं के दमन का हथियार है. इन महिलाओं के लिए ये बिल्कुल निजी और अपनी इच्छा से लिया गया फैसला है. इसके बावजूद उनकी राय पूछने की बजाय पूरी दुनिया ने खुद ही उनकी तरफ से हिजाब के विरोध का बिगुल बजा रखा है. फ्रांस में उदारवादियों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया है तो मंगलोर के बेकाबू कट्टरपंथी इस पर प्रतिबंध लगा देना चाहते हैं.
यहां पर दो बातें बड़ी दिलचस्प लगती हैं. भारत जैसे देश में, जहां परंपरावादी महिलाओं में बढ़ते जा रहे खुलेपन पर शोर मचाते ही रहते हैं, ये सोचना स्वाभाविक कहा जा सकता है कि हिजाब की तरफदारी होगी. इसकी बजाय इसका हर तरफ विरोध हो रहा है. उधर पश्चिमी आधुनिकता के पैरोकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता को इसका अहम तत्व बताते हैं मगर हिजाब को अपनी मर्जी से पहनने वालों को लेकर उनका विरोध उनके अपने ही सिद्धांतों के उलट जाता दिखता है. उधर, तमाम मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब पहनना या न पहनना एक ऐसा मुद्दा है जिसके कई जटिल पहलू हैं.
तबस्सुम को ही लें जिन्हें दिल्ली के बाहर हिजाब की जरूरत महसूस नहीं होती. मगर दिल्ली में अपनी मां के बार-बार ये कहने के बावजूद कि- तुम इतनी खूबसूरत हो फिर अपनी खूबसूरती छिपाती क्यों हो- वो हिजाब उतारने से मना कर देती हैं. उम्र में बड़े उनके कई पुरुष रिश्तेदार कई साल तक उन पर हिजाब पहनने का दबाव डालते रहे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया. और जब सबने कहना छोड़ दिया तो उन्होंने ये पहनना शुरू कर दिया. तबस्सुम के कई ऐसे रिश्तेदार ऐसे भी हैं जो अपने इलाकों के बाहर अपनी पत्नियों के हिजाब पहनने के खिलाफ हैं क्योंकि इससे लोग उन्हें महिलाओं के शोषक के रूप में देखते हैं. तबस्सुम इन दोनों तरह के लोगों पर हंसती हैं. वो अकेली नहीं हैं. हैदराबाद की 24 वर्षीय डेंटल विभाग की छात्रा महरीन अहमद जो कि डॉक्टर-इंजीनियर मां-बाप की संतान हैं ने बड़ी मुश्किल से अपने भाई को ये विश्वास दिलाया कि हिजाब पहनने की वजह से उनके ऊपर कोई खतरा नहीं है. वक्त के साथ सोच के तरीकों में भी कितना बदलाव आ गया है ये तबस्सुम और उनकी मां को देखकर समझा जा सकता है. मामला बिल्कुल उल्टा हो गया है. पहले मां बेटी से हिजाब पहनने को कहती थी और बेटी इसके लिए ना-नुकर करती थी. मगर अब मां इसे न पहनने को कह रही है और बेटी ने इसे पहनने की जिद ठान रखी है.
अगर कम कपड़े पहनने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता है तो इसके मायने अपनी पसंद के कपड़े पहनने से भी हैं. इस मामले में देखा जाए तो ज्यादा कपड़े पहनने से. सवाल ये है कि क्या उन्हें इससे रोकना ठीक है?मगर ऐसा नहीं है कि हिजाब सबके लिए चुनने या न चुनने की आजादी वाला विकल्प बन गया हो. नाम न छापने की शर्त पर हैदराबाद स्थित एक उर्दू मीडियम महिला कॉलेज के प्रोफेसर अपने कॉलेज में आ रहे बदलावों पर बात करते हैं. वो बताते हैं कि 1980 के दशक में हिजाब पहनने वाली लड़कियां ज्यादातर इसे मजबूरी में पहनती थीं. मसलन गरीब तबके की लड़कियां जिनके लिए हिजाब कपड़ों की कमी को छिपाने का जरिया होता था. मगर अब इसे पहनना एक सख्त परिपाटी बन गई है, ऐसी ही जैसे कॉलेज खत्म होने पर भाई का गेट पर इंतजार करना. तबस्सुम की तरह ही ये लड़कियां भी महंगे डिजाइनर हिजाब पहन सकती हैं, सिनेमा जा सकती हैं, ब्वॉयफ्रेंड बना सकती हैं. मगर हिजाब उन्होंने अपनी मर्जी से नहीं पहना है ये कॉलेज में एक भाषण प्रतियोगिता के दौरान तब साफ हो गया जब उनसे पूछा गया कि अगर वे पुरुष होतीं तो क्या करतीं. सभी प्रतिभागियों ने जवाब दिया, ‘हम हिजाब पहनना छोड़ देते.’
इस तरह के किस्से हिजाब पर प्रतिबंध की मांग कर रहे कट्टरपंथी हिंदू संगठनों के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं की आजादी की वकालत करते प्रगतिवादियों के तरकश के लिए अच्छे तीर हो सकते हैं. पर हिजाब को अपनी मर्जी से पहनने वाली आधुनिक महिलाओं का क्या? तबस्सुम सोच में आ रहे उस खामोश और क्रांतिकारी बदलाव की एक झलक भर हैं जिसके तहत मुस्लिम महिलाएं अपनी मर्जी से हिजाब पहनने का विकल्प चुन रही हैं. उनके लिए हिजाब उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है. वे शहरी हैं, पढ़ी-लिखी हैं, अच्छे परिवारों से ताल्लुक रखती हैं और कई तो ऐसी हैं जिनकी कई पीढ़ियों में भी किसी ने हिजाब नहीं पहना होगा. अगर सशक्तिकरण और आधुनिकता के मायने फैसले की आजादी से लगाए जाते हैं तो ये महिलाएं इस विचार के लिए बड़ी अजीब सी चुनौती पेश करती हैं. सवाल उठता है कि उदार और मुक्त समाज बनाने के उत्साह में हम उन लोगों के लिए कितनी जगह छोड़ रहे हैं जो परंपरावादी रहना चाहते हैं?
हिजाब को अपनाने का फैसला इन महिलाओं ने अपनी इच्छा से किया है और वो भी लंबे समय तक आत्ममंथन और काफी कुछ पढ़ने-जानने के बाद वे समझती हैं कि अगर कम कपड़े पहनने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता है तो इसके मायने अपनी पसंद के कपड़े पहनने से भी हैं. इस मामले में देखा जाए तो ज्यादा कपड़े पहनने से. सवाल ये है कि क्या उन्हें इससे रोकना ठीक है?
हालांकि ऐसा भी नहीं है कि हिजाब पहनने वाली इस नई पीढ़ी के सभी बातें सहज ही लगती हों. एक हिजाबी महिला कहती हैं, ‘कुरान आपको मर्यादित रहने की सीख देता है. परदा करने की नहीं’ दूसरी महिला कहती हैं, ‘ये आपको बाल और कान ढकने और नजरे नीची रखने का हुक्म देता है.’ एक तीसरी महिला के मुताबिक हिजाब बलात्कार से बचाता है. ये सभी महिलाएं सवाल करती हैं कि हिजाब को लेकर इतनी आपत्ति क्यों है?
‘अब लोग मेरे बारे में राय इस चीज से नहीं बनाते कि मैंने कल कौन सी ज्यूलरी पहनी थी और आज कौन सी पहनी हुई है.’ 9/11 के बाद जब भारत सहित सारी दुनिया में मुस्लिम समुदाय के प्रति शक और नाराजगी की भावना बढ़ी तो कई महिलाओं ने ये जानने के लिए कुरान की शरण ली कि क्या इसकी वजह वास्तव में उनके धर्म में छिपी है. क्या इस्लाम 17 साल के किसी लड़के को ये संदेश देता है कि वह अपने शरीर पर बम बांधकर खुद सहित कई बेगुनाह जिंदगियों को खत्म कर दे? इन महिलाओं में डॉक्टर भी थीं और कलाकार व लेखिकाएं भीं. अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि इस्लाम जीने की एक सुव्यवस्थित और करुणामय शैली है और यही समझने के बाद उन्होंने हिजाब पहनने का फैसला किया.
ऐसी जिन भी महिलाओं से हमने बात की उनमें से सभी ने एक बात तो मानी और ये कि उनके इस फैसले से उनका काफी सशक्तिकरण हुआ है. मसलन बस या रेल के डिब्बे में उनके साथ होने वाली छेड़छाड़ रुक गई है. जैसा कि 27 साल की सबा हाजी कहती हैं, ‘अब मुझे ये डर नहीं लगता कि हर वक्त कोई न कोई मुझे घूर रहा है. लड़के मुझे अब एक ऐसी लड़की के तौर पर देखते हैं जिसे अपने फैसलों का अच्छा-बुरा पता है,’ सबा ने बैंगलोर में पढ़ाई के दौरान हिजाब पहनने का फैसला किया. वो अब जम्मू में रहती हैं और अपने परिवार का एक एजुकेशनल ट्रस्ट चलाती हैं.
हिजाब पहनने के फैसले ने आधुनिकता से उपजे उपभोक्तावाद के लिए भी चुनौती खड़ी कर दी है. ऐसा इसलिए क्योंकि उपभोक्तावाद ने जिस शरीर को प्रदर्शन की चीज बना दिया है हिजाब उसे ढक देता है. आम धारणा के तहत भले ही हिजाब को किसी कैद की तरह देखा जाता हो मगर इसे पहनने वाली नई पीढ़ी का मानना है कि कैद दरअसल देहदर्शन की वो संस्कृति है जिसे उपभोक्तावाद पैदा कर रहा है और हिजाब उन्हें इस कैद से आजादी देता है. एनआरआई मां-बाप की संतान 24 वर्षीय फराह सलीम कहती हैं, ‘अब लोग मेरे बारे में राय इस चीज से नहीं बनाते कि मैंने कल कौन सी ज्यूलरी पहनी थी और आज कौन सी पहनी हुई है.’ उपभोग और दिखावे को बढ़ावा देते बाजार के इस दौर में ये ऐसी बातें ये सोचने के लिए बाध्य करती हैं कि क्या हमें आजादी की अपनी परिभाषा को थोड़ा और समावेशी बनाने की जरूरत नहीं?
हिजाब को बाकी दुनिया हमेशा मुस्लिम महिलाओं की गुलामी से जोड़कर देखती रही है इसलिए नई सोच के साथ इसे पहनने वाली महिलाओं के बारे में आप कितने भी आंकड़े दे दें किसी को आसानी से इस पर यकीन नहीं होता. इस बारे में बात करने पर तबस्सुम कहती हैं, ‘कभी-कभी बहुत करीबी दोस्त भी पूछ बैठते हैं कि क्या मुझ पर कोई दबाव है. मैं उनसे कहती हूं, सोचो कि जब तुम अपनी मां से अपने माथे पर टीका लगाने के लिए कहते हो तो तुम्हारे मन में उस समय कितनी खुशी होती है. तुम्हें पता होना चाहिए कि मेरे पास भी दिमाग है.’तो कुल मिलाकर बात यही है कि हिजाब बस कपड़े का एक टुकड़ा है और इसके भीतर मौजूद महिला को इसमें फैसले की आजादी का अहसास होता है या सुरक्षा के बंधन का, ये उसके नजरिए पर निर्भर करता है.