Pages

Saturday, January 2, 2010

नक़ाब पोशियां भायी जिन्हें वो बुत तो नहीं

नक़ाबपोशी को लेकर जानी -मानी पत्रिका तहलका में एक नये नज़रिये पर नज़र पड़ी। आप भी पढ़ें, शायद आपको भी पसंद आए- संजीव

अक्सर मध्यकालीन बर्बरता के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है हिजाब। पर निशा सूजन को अचरज है कि लोग उनसे भी क्यों नहीं पूछते जिन्होंने खुद ही इसे अपनाने का फैसला किया है
हिजाब पहनने वाली लड़कियों की खोज के आखिर में मेरी मुलाकात एक बेहद दिलचस्प लड़की से हुई. उमस भरा दिन था और पुरानी दिल्ली की एक चाय की दुकान में मैं तबस्सुम से बातें कर रही थी. 26 साल की तबस्सुम एक एनजीओ में काम करती हैं. काम के सिलसिले में उन्हें अक्सर यात्राएं करनी पड़ती हैं. हिजाब के बारे में पूछने पर बातों में माहिर तबस्सुम बताती हैं कि उन्होंने हिजाब पहनना इसलिए शुरू किया क्योंकि उनके चेहरे पर मुंहासे थे.
‘अब मुझे ये डर नहीं लगता कि हर वक्त कोई न कोई मुझे घूर रहा है. लड़के मुझे अब एक ऐसी लड़की के तौर पर देखते हैं जिसे अपने फैसलों का अच्छा-बुरा पता है’
कभी-कभी बहुत करीबी दोस्त भी पूछ बैठते हैं कि क्या मुझ पर कोई दबाव है. मैं उनसे कहती हूं, सोचो कि जब तुम अपनी मां से अपने माथे पर टीका लगाने के लिए कहते हो तो तुम्हारे मन में उस समय कितनी खुशी होती है. तुम्हें पता होना चाहिए कि मेरे पास भी दिमाग है.तबस्सुम खुद को एक बहुरूपिया कहती हैं. शायद इसलिए क्योंकि वो तो दूसरों के लिए अनजान होती हैं मगर दूसरों की पहचान उनके लिए खुली होती है. दुनिया को देखने-बरतने के उनके तरीके पर हिजाब पहनने से कोई फर्क नहीं पड़ता. वो चुपचाप चल सकती हैं, जोर से हंस सकती हैं, लड़कों से मिल सकती हैं और साइबर कैफे में अजनबियों के साथ चैट करते हुए घंटों भी बिता सकती हैं. लेकिन उन्हें इस बात का भी अहसास है कि उनका हिजाब लोगों के मन में कई सवाल खड़े करता है.
हालांकि तबस्सुम के पास इन सवालों के आसान जवाब नहीं हैं. वो और उनके जैसी नई पीढ़ी की मुस्लिम महिलाएं हिजाब के उस रूढ़िवादी विचार के लिए चुनौती हैं जिसके मुताबिक ये पुरुषसत्तामक समाज में महिलाओं के दमन का हथियार है. इन महिलाओं के लिए ये बिल्कुल निजी और अपनी इच्छा से लिया गया फैसला है. इसके बावजूद उनकी राय पूछने की बजाय पूरी दुनिया ने खुद ही उनकी तरफ से हिजाब के विरोध का बिगुल बजा रखा है. फ्रांस में उदारवादियों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया है तो मंगलोर के बेकाबू कट्टरपंथी इस पर प्रतिबंध लगा देना चाहते हैं.
यहां पर दो बातें बड़ी दिलचस्प लगती हैं. भारत जैसे देश में, जहां परंपरावादी महिलाओं में बढ़ते जा रहे खुलेपन पर शोर मचाते ही रहते हैं, ये सोचना स्वाभाविक कहा जा सकता है कि हिजाब की तरफदारी होगी. इसकी बजाय इसका हर तरफ विरोध हो रहा है. उधर पश्चिमी आधुनिकता के पैरोकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता को इसका अहम तत्व बताते हैं मगर हिजाब को अपनी मर्जी से पहनने वालों को लेकर उनका विरोध उनके अपने ही सिद्धांतों के उलट जाता दिखता है. उधर, तमाम मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब पहनना या न पहनना एक ऐसा मुद्दा है जिसके कई जटिल पहलू हैं.
तबस्सुम को ही लें जिन्हें दिल्ली के बाहर हिजाब की जरूरत महसूस नहीं होती. मगर दिल्ली में अपनी मां के बार-बार ये कहने के बावजूद कि- तुम इतनी खूबसूरत हो फिर अपनी खूबसूरती छिपाती क्यों हो- वो हिजाब उतारने से मना कर देती हैं. उम्र में बड़े उनके कई पुरुष रिश्तेदार कई साल तक उन पर हिजाब पहनने का दबाव डालते रहे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया. और जब सबने कहना छोड़ दिया तो उन्होंने ये पहनना शुरू कर दिया. तबस्सुम के कई ऐसे रिश्तेदार ऐसे भी हैं जो अपने इलाकों के बाहर अपनी पत्नियों के हिजाब पहनने के खिलाफ हैं क्योंकि इससे लोग उन्हें महिलाओं के शोषक के रूप में देखते हैं. तबस्सुम इन दोनों तरह के लोगों पर हंसती हैं. वो अकेली नहीं हैं. हैदराबाद की 24 वर्षीय डेंटल विभाग की छात्रा महरीन अहमद जो कि डॉक्टर-इंजीनियर मां-बाप की संतान हैं ने बड़ी मुश्किल से अपने भाई को ये विश्वास दिलाया कि हिजाब पहनने की वजह से उनके ऊपर कोई खतरा नहीं है. वक्त के साथ सोच के तरीकों में भी कितना बदलाव आ गया है ये तबस्सुम और उनकी मां को देखकर समझा जा सकता है. मामला बिल्कुल उल्टा हो गया है. पहले मां बेटी से हिजाब पहनने को कहती थी और बेटी इसके लिए ना-नुकर करती थी. मगर अब मां इसे न पहनने को कह रही है और बेटी ने इसे पहनने की जिद ठान रखी है.
अगर कम कपड़े पहनने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता है तो इसके मायने अपनी पसंद के कपड़े पहनने से भी हैं. इस मामले में देखा जाए तो ज्यादा कपड़े पहनने से. सवाल ये है कि क्या उन्हें इससे रोकना ठीक है?मगर ऐसा नहीं है कि हिजाब सबके लिए चुनने या न चुनने की आजादी वाला विकल्प बन गया हो. नाम न छापने की शर्त पर हैदराबाद स्थित एक उर्दू मीडियम महिला कॉलेज के प्रोफेसर अपने कॉलेज में आ रहे बदलावों पर बात करते हैं. वो बताते हैं कि 1980 के दशक में हिजाब पहनने वाली लड़कियां ज्यादातर इसे मजबूरी में पहनती थीं. मसलन गरीब तबके की लड़कियां जिनके लिए हिजाब कपड़ों की कमी को छिपाने का जरिया होता था. मगर अब इसे पहनना एक सख्त परिपाटी बन गई है, ऐसी ही जैसे कॉलेज खत्म होने पर भाई का गेट पर इंतजार करना. तबस्सुम की तरह ही ये लड़कियां भी महंगे डिजाइनर हिजाब पहन सकती हैं, सिनेमा जा सकती हैं, ब्वॉयफ्रेंड बना सकती हैं. मगर हिजाब उन्होंने अपनी मर्जी से नहीं पहना है ये कॉलेज में एक भाषण प्रतियोगिता के दौरान तब साफ हो गया जब उनसे पूछा गया कि अगर वे पुरुष होतीं तो क्या करतीं. सभी प्रतिभागियों ने जवाब दिया, ‘हम हिजाब पहनना छोड़ देते.’
इस तरह के किस्से हिजाब पर प्रतिबंध की मांग कर रहे कट्टरपंथी हिंदू संगठनों के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं की आजादी की वकालत करते प्रगतिवादियों के तरकश के लिए अच्छे तीर हो सकते हैं. पर हिजाब को अपनी मर्जी से पहनने वाली आधुनिक महिलाओं का क्या? तबस्सुम सोच में आ रहे उस खामोश और क्रांतिकारी बदलाव की एक झलक भर हैं जिसके तहत मुस्लिम महिलाएं अपनी मर्जी से हिजाब पहनने का विकल्प चुन रही हैं. उनके लिए हिजाब उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है. वे शहरी हैं, पढ़ी-लिखी हैं, अच्छे परिवारों से ताल्लुक रखती हैं और कई तो ऐसी हैं जिनकी कई पीढ़ियों में भी किसी ने हिजाब नहीं पहना होगा. अगर सशक्तिकरण और आधुनिकता के मायने फैसले की आजादी से लगाए जाते हैं तो ये महिलाएं इस विचार के लिए बड़ी अजीब सी चुनौती पेश करती हैं. सवाल उठता है कि उदार और मुक्त समाज बनाने के उत्साह में हम उन लोगों के लिए कितनी जगह छोड़ रहे हैं जो परंपरावादी रहना चाहते हैं?
हिजाब को अपनाने का फैसला इन महिलाओं ने अपनी इच्छा से किया है और वो भी लंबे समय तक आत्ममंथन और काफी कुछ पढ़ने-जानने के बाद वे समझती हैं कि अगर कम कपड़े पहनने का अधिकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता है तो इसके मायने अपनी पसंद के कपड़े पहनने से भी हैं. इस मामले में देखा जाए तो ज्यादा कपड़े पहनने से. सवाल ये है कि क्या उन्हें इससे रोकना ठीक है?
हालांकि ऐसा भी नहीं है कि हिजाब पहनने वाली इस नई पीढ़ी के सभी बातें सहज ही लगती हों. एक हिजाबी महिला कहती हैं, ‘कुरान आपको मर्यादित रहने की सीख देता है. परदा करने की नहीं’ दूसरी महिला कहती हैं, ‘ये आपको बाल और कान ढकने और नजरे नीची रखने का हुक्म देता है.’ एक तीसरी महिला के मुताबिक हिजाब बलात्कार से बचाता है. ये सभी महिलाएं सवाल करती हैं कि हिजाब को लेकर इतनी आपत्ति क्यों है?
‘अब लोग मेरे बारे में राय इस चीज से नहीं बनाते कि मैंने कल कौन सी ज्यूलरी पहनी थी और आज कौन सी पहनी हुई है.’ 9/11 के बाद जब भारत सहित सारी दुनिया में मुस्लिम समुदाय के प्रति शक और नाराजगी की भावना बढ़ी तो कई महिलाओं ने ये जानने के लिए कुरान की शरण ली कि क्या इसकी वजह वास्तव में उनके धर्म में छिपी है. क्या इस्लाम 17 साल के किसी लड़के को ये संदेश देता है कि वह अपने शरीर पर बम बांधकर खुद सहित कई बेगुनाह जिंदगियों को खत्म कर दे? इन महिलाओं में डॉक्टर भी थीं और कलाकार व लेखिकाएं भीं. अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि इस्लाम जीने की एक सुव्यवस्थित और करुणामय शैली है और यही समझने के बाद उन्होंने हिजाब पहनने का फैसला किया.
ऐसी जिन भी महिलाओं से हमने बात की उनमें से सभी ने एक बात तो मानी और ये कि उनके इस फैसले से उनका काफी सशक्तिकरण हुआ है. मसलन बस या रेल के डिब्बे में उनके साथ होने वाली छेड़छाड़ रुक गई है. जैसा कि 27 साल की सबा हाजी कहती हैं, ‘अब मुझे ये डर नहीं लगता कि हर वक्त कोई न कोई मुझे घूर रहा है. लड़के मुझे अब एक ऐसी लड़की के तौर पर देखते हैं जिसे अपने फैसलों का अच्छा-बुरा पता है,’ सबा ने बैंगलोर में पढ़ाई के दौरान हिजाब पहनने का फैसला किया. वो अब जम्मू में रहती हैं और अपने परिवार का एक एजुकेशनल ट्रस्ट चलाती हैं.
हिजाब पहनने के फैसले ने आधुनिकता से उपजे उपभोक्तावाद के लिए भी चुनौती खड़ी कर दी है. ऐसा इसलिए क्योंकि उपभोक्तावाद ने जिस शरीर को प्रदर्शन की चीज बना दिया है हिजाब उसे ढक देता है. आम धारणा के तहत भले ही हिजाब को किसी कैद की तरह देखा जाता हो मगर इसे पहनने वाली नई पीढ़ी का मानना है कि कैद दरअसल देहदर्शन की वो संस्कृति है जिसे उपभोक्तावाद पैदा कर रहा है और हिजाब उन्हें इस कैद से आजादी देता है. एनआरआई मां-बाप की संतान 24 वर्षीय फराह सलीम कहती हैं, ‘अब लोग मेरे बारे में राय इस चीज से नहीं बनाते कि मैंने कल कौन सी ज्यूलरी पहनी थी और आज कौन सी पहनी हुई है.’ उपभोग और दिखावे को बढ़ावा देते बाजार के इस दौर में ये ऐसी बातें ये सोचने के लिए बाध्य करती हैं कि क्या हमें आजादी की अपनी परिभाषा को थोड़ा और समावेशी बनाने की जरूरत नहीं?
हिजाब को बाकी दुनिया हमेशा मुस्लिम महिलाओं की गुलामी से जोड़कर देखती रही है इसलिए नई सोच के साथ इसे पहनने वाली महिलाओं के बारे में आप कितने भी आंकड़े दे दें किसी को आसानी से इस पर यकीन नहीं होता. इस बारे में बात करने पर तबस्सुम कहती हैं, ‘कभी-कभी बहुत करीबी दोस्त भी पूछ बैठते हैं कि क्या मुझ पर कोई दबाव है. मैं उनसे कहती हूं, सोचो कि जब तुम अपनी मां से अपने माथे पर टीका लगाने के लिए कहते हो तो तुम्हारे मन में उस समय कितनी खुशी होती है. तुम्हें पता होना चाहिए कि मेरे पास भी दिमाग है.’तो कुल मिलाकर बात यही है कि हिजाब बस कपड़े का एक टुकड़ा है और इसके भीतर मौजूद महिला को इसमें फैसले की आजादी का अहसास होता है या सुरक्षा के बंधन का, ये उसके नजरिए पर निर्भर करता है.

2 comments:

Suman said...

nice

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अगर "नाइस" लिखूँ
तो यह सबसे छोटी टिप्पणी होगी।
सभी कुछ तो निहित है इसमें।