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Wednesday, January 6, 2010

९० पार के नौजवान



अगर आप आंध्र प्रदेश के पूर्व राज्यपाल और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के बारे में जानकर सनाके में हैं तो जानी- मानी पत्रिका तहलका में एक बुजुर्गवार लेखक खुशवंत सिंह के नज़रिये के बारे में भी पढ़ें। कुछ पहले का है, लेकिन दिलचस्प है। -संजीव



‘मुझे अच्छे सेक्स की कमी महसूस होती है. जब आप सेक्स के लायक नहीं रह जाते तो समझ लीजिए कि दुनिया छोड़ने का वक्त आ गया है. लेकिन हां, मैं आज भी रूमानी कल्पनाएं करता हूं’
खुशवंत सिंह उम्र: 94 ‘मैं टिके रहना चाहता हूं लेकिन मुझे पता है कि अब मेरा वक्त करीब है,’ चार साल पहले मनमौजी सरदार खुशवंत सिंह ने मौत के जिक्र पर ये बात कही थी. उस दुर्लभ मौके पर उन्होंने घंटे भर से ज्यादा मौत के दर्शन पर बातचीत की थी. खिड़की के बाहर देखते हुए उन्होंने कहा था, ‘मैं अक्सर उस पेड़ को देख कर सोचा करता हूं कि मैं इसे कब तक देख पाऊंगा. मैंने इसे अपने साथ ही बढ़ते हुए देखा है. मैं मानसिक तौर पर फिट हूं मगर मेरी शक्ति खत्म हो रही है. मैंने अपनी पत्नी को मानसिक तौर पर असंतुलित होते हुए देखा और बाद में उसकी बहुत दुर्दशा हुई. मुझे भी उस स्थिति के लिए तैयार रहना होगा.’
शायद भारत के सबसे चर्चित लेखक. उनका स्तंभ न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर आज भी पाठकों के बीच लोकप्रिय है इन दिनों वे एक और किताब लिख रहे हैं, इसका विषय क्या है, ये जानने का एक ही तरीका है और वह है इंतजारहालांकि सेक्स के कलेवर में लिपटी हुई मजेदार फंतासियों का ये किस्सागो और 30 से ज्यादा किताबों का ये लेखक जीवन के प्रति आज भी पूरी तरह से केंद्रित है. उनके बेटे राहुल सिंह से पूछने पर कि आखिर क्या चीज उनके पिता को अभी भी चलायमान रखे हुए है, तुरंत ही उत्तर मिलता है, ‘हर शाम व्हिस्की के दो पेग और उनकी तमाम महिला मित्र जो अपनी रूमानी जिंदगी को और मजेदार बनाने के लिए हर दिन उनसे सलाह लेने के लिए इकट्ठा होती हैं.’ हर शाम, बेनागा, 7 से 8 बजे के बीच इलस्ट्रेटेड वीकली का ये पूर्व संपादक अपने लिविंग रूम में बैठक जमाता है जिसमें गिने-चुने लोग ही शामिल होते हैं. उनके मुख्य दरवाजे पर हमेशा एक बोर्ड टंगा होता है- ‘अगर आप आमंत्रित नहीं है तो घंटी न बजाएं’.
इस एक घंटे का भरपूर लुत्फ उठाने के लिए खुशवंत सिंह बेहद अनुशासित दिनचर्या का पालन करते हैं. वे तड़के चार बजे ही उठ जाते हैं और रोज सभी अखबारों के क्रॉसवर्ड्स हल करते हैं. इसके बाद उनकी दिनचर्या में शामिल होता है, कॉलम लिखना, दोपहर में दो घंटे झपकी लेना, शाम के सात से आठ बजे का इंतजार और 8.30 बजे डिनर करके 9 बजे तक सो जाना. अगले दिन वे फिर से 4 बजे उठ जाते हैं. उन्हें चलने-फिरने के लिए दीवार का सहारा लेना पड़ता है, अक्सर वे फोन सिर्फ ये कहने के लिए उठाते हैं, ‘मैं बहरा हूं. मैं आपकी आवाज सुन नहीं सकता, मुझे पत्र लिख कर भेजें.’ खुशवंत सिंह के मानसिक स्वास्थ्य का राज सिर्फ उनकी महिला मित्र ही नहीं बल्कि शायरी और हंसी-मजाक भी है जिसकी खुराक वे आज भी रोजाना लेते हैं.
चार साल पहले तहलका के साथ साक्षात्कार में ये पूछे जाने पर कि वे सबसे ज्यादा किस चीज की कमी महसूस करते हैं, उनका जवाब था, ‘बढ़िया सेक्स. मैं काफी समय से बढ़िया सेक्स का आनंद नहीं ले पा रहा हूं. कोई आदमी जिस दिन बढ़िया सेक्स न कर पाए समझ लीजिए उसके जाने का वक्त हो गया है. लेकिन हां, मैं रूमानी कल्पनाएं करता हूं.’
व्यंग्य और कटाक्ष उनके जीवन का हिस्सा रहा है, यहां तक कि उम्र के बीसवें दशक के दौरान ही उन्होंने खुद की श्रद्धांजलि लिख डाली थी. उनका साप्ताहिक स्तंभ ‘न काहू से दोस्ती न काहू से बैर’ इस बात का सबूत है कि उन्हें जिंदगी से अब भी उतना ही प्रेम है. उन्होंने सब कुछ दान कर दिया है. वे कहते हैं, ‘मेरे पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं है.’ बावजूद इसके उनके पास देने के लिए बहुत कुछ है जिसे वे हफ्ता दर हफ्ता अपने पाठकों तक पहुंचाते रहते हैं.
हरिंदर बवेजा

2 comments:

Udan Tashtari said...

खुशवंत सिंह की हर बात निराली और हर अदा निराली.

परमजीत बाली said...

खुशवंत सिंह का अपना एक जीने का अलग नजरिया है....आदमी को वैसे ही जीना चाहिए जिस से उसे खुशी मिलती है....और वे वैसे ही जी रहे हैं....