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Friday, January 8, 2010

...रात ठाकरे सपने में आए, हिंदी बोल गए फरा-रा-रा-रा



क्या बताऊं। पिछली रात ख़्वाब में राज ठाकरे आए। जैसा कि किसी पुरानी सीन को दिखलाना हो तो ब्लैक एंड व्हाइट ज्यादा प्रभावी दिखती है...उसी तरह नफ़रत की आग उगलते राज ठाकरे...। फिर बाला साहब ठाकरे का सिंहनाद- कांग्रेस में अकेली मर्द हैं शीला दीक्षित, जिन्होंने दिल्ली को बचाने के लिए पूरबियों और बिहारियों की मौजूदगी को गंभीरता से लिया। (उनके मुंह से बाक़ायदा दहकते हुए शोले दिखे)
सीन- 1
लेकिन सपने का सीन तत्काल बदला। फिर नई दिल्ली में चल रहे प्रवासी सम्मेलन के शॉट्स आने लगे। धनी- मानी और दुनिया भर में हिंदुस्तान का लोहा मनवाने वालों की जमात। तहज़ीब और तमीज के साथ बैठे लोग। ...उनकी शान में कसीदे पढ़ते मंत्री...उन्हें रिझाने की मुद्रा में विकास दर का ख़ाका पेश करते नेता। फिर पता नहीं सपने में ही बाइट चलने लगी। गंगा किनारे वाला कोई छोरा... नहीं- नहीं...अधेड़ आदमी था जो सात समुंदर पार एक बड़ा उद्यमी था। उसकी तीन पीढ़ियां वहीं थीं...। बाइट हिंदी में थी...(राज ठाकरे साहब माफ़ करें)...टूटी- फूटी हिंदी ही सही, उन्होंने अंग्रेजी से परहेज किया...कहीं- कहीं अंग्रेजी के शब्द चिप्पी की तरह जरूर आ रहे थे। बोल रहे थे कि हिंदुस्तान की संस्कृति... यहां के लिटरेचर और हिंदू धर्म से उनका और उनके परिवार का गहरा लगाव है। पवित्र -गीता- उनके घर में है और सीता मैया की पूजा उनकी दिनचर्या। रामनवमी का आयोजन वहां के हिंदू समुदाय के बीच हर साल होता है जिसके आयोजन में उनकी पूरी सक्रियता रहती है।...माघ मेला की यादें अबतक बनी हुई हैं। ....मुझे किसी विदेशी शहर की आकाश चूमती इमारत की चोटी पर हिंदू धर्म का पताका लहराता दिखा।
सीन- 2
बंधुओं, सपने पर मेरा जोर नहीं था... और न ही मनचाहे सपने देखने की छूट। इसलिये एम्बियंस के साथ फिर से सीन बदल गया।..आपके हिसाब से ख़बर ...लेकिन मैं स्वप्न दृष्टा था, इसलिये कहूंगा कि मेरे लिए सपना था... सामने टीवी स्क्रीन था, जिसपर बताया जा रहा था कि राज ठाकरे दिल्ली आएंगे। समाचार वाचिका ऐसे बोल रही थी जैसे किसी एलियंस के बारे में बताने जा रही हो। उसका कहना था कि राज ठाकरे दिल्ली आएंगे...अदालती मुश्किलों में फंसे राज ठाकरे के मामलों की सुनवाई दिल्ली में होगी। ...मैं मुस्कुराया...(सपने में भाई !)...राज ठाकरे अगर दिल्ली में पेश हुए तो वे किस भाषा में बोलेंगे... मराठी, अंग्रेजी या हिंदी...।
सीन- 3
फिर सीन बदल गया। इसबार मेरी नज़रों के सामने कई अख़बार थे... अख़बारों के नाम पढ़ने की कोशिश की, वही सब अख़बार थे, सुबह- सुबह जिसका रट्टा लगाता हूं। सबमें ऑस्ट्रेलिया में हिंदुस्तानी युवकों पर हमले की खबरें सुर्खियों में थीं। ...कुछेक में विदेश मंत्री का बयान भी छपा था कि ...ख़्वामख़ाह के कोर्सेज करने के लिए लड़के विदेश जाते ही क्यों हैं?... वे यह जानकर हैरान थे कि बाल संवारने का तरीका बताने वाले ...या फिर सूरत संवारने वाले कोर्स पर रीझकर हिंदुस्तानी लड़के ऑस्ट्रेलिया तक पहुंच जाते हैं...जबकि यही कोर्सेज हिंदुस्तान के कई बड़े शहरों में भी पढ़ाए जाते हैं। (मेरे मुंह से निकला- कतई नालायक़ नस्ल पैदा हुई है)
सीन- 4
अख़बारों के पन्ने पलटते हुए अंदर के पेज देखे तो एक ही पेज पर कई ख़बरें थीं... या कहिये कि ख़बरों का कोलाज था- महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के ख़िलाफ़ मुहिम, दिल्ली की हुक्मरान ने कहा- सबसे बड़ी समस्या हैं बाहरी, मध्यप्रदेश की हुकूमत का फ़रमान- बिहारी और बाहरियों को नहीं देंगे नौकरी, पंजाब में बिहारी मजदूरों पर बरसा डंडा, असम में हिंदी भाषियों पर हमला....बस- बस- बस....भाई बस।...नींद टूट गई... मेरा नौ साल का बेटा हैरानी से मेरी ओर देखते हुए झकझोर रहा था। ...टीवी पर वाक़ई कुछ ख़बरें आ रही थी।

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