Pages

Saturday, January 16, 2010

मैं फलां जी हूं...तू कौन है?



मेरे साथ एक नये सहयोगी आए हैं। नाम है विंध्यवासिनी। मेरा परिचय इस रूप में नहीं हुआ कि ये फलां साहब हैं... या इन साहब का नाम ही विंध्यवासिनी है। सो, मैं इस भ्रम में था कि कोई नई लड़की आई है जिसका नाम विंध्यवासिनी है। भगवती दुर्गा का एक नाम विंध्यवासिनी भी है...। दो- चार दिनों के बाद पता चला कि यही तो हैं विंध्यवासिनी। हट्ठा-कट्ठा नौजवान। न्यूज़ रूम में थोड़ी हंसी भी हुई। लेकिन रात में सोते समय जब सोचा तो इस तरह के कई नाम जेहन में आए जिसे सुनकर लगता है कि बच्चों के नाम रखते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिये। अब सुनिये कि जो विध्यवासिनी के नाम पर हंस रहे थे ...उनमें एक साथी हमारे और थे- विद्युत प्रकाश। उनके भाई का नाम है तड़ित प्रकाश। आप कह सकते हैं कि नाम बड़ा साइंटिफिक टाइप का है लेकिन लोगबाग उनके पीठ पीछे इसपर भी ठिठोली करते हैं।
हमारे एक और सहयोगी हैं। उनका नाम वैसे गोपाल है...लेकिन न तो वे सिर्फ गोपाल लिखना पसंद करते हैं और न कहलाना। आप उनसे उनका नाम पूछें तो बताएंगे कि -गोपाल जी। पहले लगा कि जी का कोई गूढ़ मतलब होगा। लेकिन पता चला कि गोपाल जी बेवजह ही इस छोटे -से जी को ताउम्र ढोते रहे हैं। एक और साथी थे हमारे। ठाकुर साहब। ढलती हुई ठकुराई उनके अंदाज में रच- बस गई थी। ग़लती से अगर उनके पास कोई फोन कॉल आ जाए तो वे झल्लाने की मुद्रा में कहते थे कि मैं फलां जी बोल रहा हूं... तुम कौन बोल रहे हो ?....एक सज्जन और थे, जो अपने नाम के साथ श्री लगा बैठते थे। जैसे कोई नाम पूछे तो कहते थे- श्री फलां। ऐसा नहीं है कि उनके नाम के साथ श्री लगा हुआ था- जैसे, श्रीनिवास, श्रीचंद, श्रीवत्स, श्रीश, श्रीसंत या फिर इसी तरह के कुछ और नाम। वे सज्जन जब अपने नाम के साथ श्री लगाते थे तो ऐसा लगता जैसे कौवे का श्रृंगार कर दिया गया हो। वे जिस उत्साह के साथ अपने नाम के साथ श्री लगाते थे, उससे कई बार टोकने का मन करते हुए भी मैं दबा देता था।
मुझे अपने गांव के नामों की भी याद आ गई। पहले किस- किस तरह से नामोत्सपत्ति होती थी। ग़ज़ब कारण होता था किसी के नाम रखने का। मेरे गांव की एक महिला कहीं रेल से जाने वाली थी, लेकिन स्टेशन पहुंचते- पहुंचते उसे बेटा पैदा हो गया। नाम पड़ गया -टिसनिया। गांव -जवार में स्थानीय बोली में स्टेशन को टेसन कहने का रिवाज है इसलिए बच्चा टेसन पर पैदा हुआ तो नाम रख दिया टिसनिया। एक महिला थी...उसका नाम कुछ और था। लेकिन उसे तेज आवाज में बोलने की आदत थी...सो, उसका नाम हल्ला गरी - रख दिया गया था। हमारी बोली में गाड़ी को गरी बोलने का रिवाज़ है।
हमारे यहां नाम को बिगाड़ कर बोलने की आदत होती है। नाम का पहला शब्द अक्सर इस नाराज़गी का शिकार होता है। जैसे नाम हो प्रकाश आनंद- तो बोलेंगे प्रकसबा...। अगर एक शब्द का नाम हो तो सारी नाराज़गी उसी पर टूटती है। मसलन, अजितबा (अजित), दिलपा(दिलीप), रकेसबा (राकेश)- ऐसे ही तमाम नामों के साथ। आप चाहे अपने नाम के साथ श्री भी लगा लें या जी लगा लें- लेकिन आप बच नहीं सकते। जैसे श्रीनिवास जी आप नाम रख लें। लेकिन इसे बिगाड़कर बोलेंगे श्रीनिवास जीवा। मुझे याद है कि मेरठ में एक किराये के मकान में था...और मकान मालिक एक बुजुर्ग थे, जिन्हें हम अंकलजी कहते थे। लेकिन अपनी बोली में बतियाते हुए स्वभाविक रूप से बोलते थे- अंकल जीवा। यानी, अंकल भी इससे नहीं बचे। ये किसी मंशा या शरारत से नहीं करते, बल्कि ज़ुबान का ढंग- ढर्रा जल्दी बदलता नहीं है।

1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

कमाल है लोगों को नाम रखने में भी
पुर्लिंग और स्त्रीलिंग का बोध नही होता!