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Sunday, February 28, 2010

मित्रों, मदद करें! मेरी सांस एक घंटे से नहीं चल रही

दोस्तों, सबसे पहले आप सभी को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं। होली की ख़बर बनाते समय कल मथुरा से आए विजुअल्स देख रहा था। मथुरा के यमुना घाट पर चतुर्वेदी समाज के लोग अभी भी होली के दिन भांग घोंटते हैं। उनके बीच मान्यता है कि श्रीकृष्ण और बलराम ने यमुना घाट पर भांग घोंटने के बाद ही कंस का वध किया था। इसलिये चौबे समाज के लोग आज भी भांग छानते हैं और राधे- राधे का जयघोष करते हैं। बच्चे, बूढ़े और नौजवान...सब इसमें शामिल होते हैं। धार्मिक मान्यता चाहे जो भी हो, मैं इस वक़्त आपको सिर्फ भांग और उसके नशे के बारे में बताना चाहूंगा।- संजीव
भांग का नशा, किसी भी दूसरे नशे से बिल्कुल जुदा है। कहते हैं कि शराब का नशा आक्रमक बनाता है तो भांग का नशा डरपोक। भांग के नशे में एक तरंग -सी होती है जो लंबे समय तक रहती है। मुझे याद है जब मुंगेर में पढ़ाई करते समय मैं अकेले रहा करता था। मेरे घर के सामने मेरे दूर के एक मामा भी रहते थे जो उम्र में मुझसे तीन- चार साल ही बड़े थे इसलिये उनसे दोस्ताना संबंध थे। हम सब उन्हें मनोज मामा कहते थे और रोजाना उनकी साइकिल पर सवार होकर हम सब्जी मंडी जाते। मेरा खाना उनके यहां ही बनता था। उनके साथ सुबह -शाम का साथ था। मनोज मामा बहुत कम उम्र में ही टिकिया नुमा गोली -मोदक- खाने के आदी थे। बिहार में पान की दुकानों पर मोदक की टिकिया भी मिल जाया करती है। सब्जी ख़रीदने के बाद रोजाना मनोज मामा, एक ख़ास पान की दुकान पर रुकते। पानवाला उन्हें मोदक की टिकिया देता, जिसे वे मुंह में डालते और बगल में रखी स्टील की बाल्टी में रखा पानी लोटे में लेकर गटक जाया करते थे। उसके बाद हम दोनों पान खाकर वापस घर लौट आते। घर लौटते- लौटते मनोज मामा पर भांग का सुरूर चढ़ने लगता। लेकिन कभी घर में भी उन्होंने जाहिर नहीं होने दिया। तक़रीबन यही दिनचर्या थी हमारी।
होली की एक शाम को हम बाजार गए, बेमक़सद। उस दिन न तो सब्जी ख़रीदनी थी और न ही सब्जी मंडी खुली हुई थी। फिर भी मनोज मामा, अपनी खुराक के मकसद से भले निकले हों, मैं वैसे ही उनके साथ साइकिल पर बैठ गया। पान की दुकान खुली हुई थी। उस दिन मैं भी मोदक खाने की ज़िद पर अड़ गया। उन्होंने लाख समझाया मगर मैं माना नहीं। एक छोटा -सा टुकड़ा खाने के बाद पाचक जैसा स्वाद मिला। मैने कहा, थोड़ी और दे दो। तीन -चार दफे मांगने के बाद उन्होंने एक मोदक की टिकिया मेरे लिये भी ख़रीद दी। मैं पूरी टिकिया खा गया।
वापस घर आया... तबतक मैं होशमंद बना रहा और मनोज मामा से बहादुरी के अंदाज में बातें करता रहा। इसी बीच ज्योति मौसी हम दोनों के लिए एक कटोरी में रबड़ी लेकर आई और पानी से भरा गिलास रखकर चली गईं। हम दोनों बातचीत करते- करते पूरी रबड़ी खा ली और गिलास लेकर मैं पानी गटकने लगा...पानी ख़तम लेकर मेरे कंठ की आवाज आ रही थी गट- गट। मनोज मामा ने कहा कि शायद तुम्हें चढ़ गई है।...रबड़ी ने सारा सत्यानाश कर दिया था।
खाना खाते समय मनोज मामा सतर्क थे... मैं और भी पूड़ियां मांग रहा था, मनोज मामा मना करते- कराते मुझे मेरे यहां लेकर आ गए। मुझे सोने का मशविरा देकर वापस जाने लगे तो मैने उन्हें रोकते हुए कहा कि, मामा एक बात बताऊं... मैं सुबह तक शायद नहीं रहूं। आप मुझे एक कागज और पेन दो, जिसपर मैं लिखकर दे दूंगा कि मैने अपनी मर्जी से भांग खा लिया और मेरी मौत का जिम्मेदार सिर्फ मैं हूं... न कि मनोज मामा।
वे हंसने लगे। कहा कि कैसे समझे कि सुबह तक नहीं रहोगे?... मैने कहा कि ...असल में पिछले आधे घंटे से मेरी सांस ही नहीं चल रही है। उनकी हथेली अपनी नाक की तरफ खींचकर जोर-जोर से सांस बाहर फेंकने की कोशिश की...। फिर कहा कि देखा, सांस नहीं चल रही है। उन्होंने लाख समझाया कि हवा बराबर आ रही है, लेकिन मैं समझने को राज़ी नहीं। उन्होंने दलील देने के अंदाज में कहा कि तुम साइंस के स्टूडेंट हो लेकिन कह रहे हो कि आधे घंटे से सांस नहीं चल रही तो ज़िंदा कैसे हो भाई?... मैने तुरंत जवाब दिया कि भले साइंस का स्टूडेंट हूं लेकिन साइंस पर मेरा कतई विश्वास नहीं... अपने साथ होने वाली होनी- अनहोनी पर ही मेरा ज्यादा विश्वास है।
मेरा ध्यान बंटाने की मंशा से उन्होंने कहा कि कौन -सी हीरोईन तुम्हें पसंद है?... मैने कहा कि कई पसंद हैं। उन्होंने कहा कि किसी एक का नाम बताओ। मैं बेसाख्ता बोल कहा, डिंपल कपाड़िया। उन्होंने कहा कि डिंपल का क्या अच्छा लगता है?... मैने कहा, आप सीरियसली मेरी बात को नहीं ले रहे हैं... महाराज, मेरी सांस अब तो एक घंटे से नहीं चल रही है।
मित्रों, मनोज मामा तो जैसे- तैसे मुझसे पीछा छुड़ाकर ढाई -तीन बजे रात में चले गए लेकिन मुझे यह समझा पाने में विफल रहे कि कई घंटे तक सांस न चले तो भी आदमी कैसे ज़िंदा रह सकता है। मैं अब भी इस बात पर कायम हूं कि साइंस, चाहे कुछ भी इजाद कर ले लेकिन सांस नहीं चलने के बावजूद आदमी को ज़िंदा रखने की एक ही सूरत है- उसपर मेरी तरह भांग का सुरूर चढ़ जाए।

Friday, February 26, 2010

इस मक़बूलियत पर भारत नहीं है फ़िदा

अंग्रेजी अख़बार `द हिंदू' के पहले पेज पर जब पढ़ा कि कतर के शाही परिवार ने मक़बूल फिदा हुसैन को वहां की नागरिकता देने की पेशकश की है, तो लगा कि मकबूल इस पेशकश को नहीं मानेंगे। लेकिन मैं या फिर इस तरह की उम्मीद करने वाले तमाम हिंदुस्तानियों को मक़बूल ने निराश किया। उनके बेटे ने शुक्रवार को साफ कर दिया कि मकबूल अब हिंदुस्तानी नहीं रह गए हैं। मक़बूल ने कतर की नागरिकता हासिल कर ली है। यानी, हिंदुस्तान के हुसैन पर कतर फिदा हो गया। या फिर हिंदुस्तान और कतर ने अपने- अपने हिस्से के मकबूल फिदा हुसैन को बांट लिया। कौन कहां पैदा हो, इसपर जिस तरह किसी का वश नहीं है उसी तरह एमएफ हुसैन भी उस हिंदुस्तान में पैदा हुए, जिसपर अगर उनका वश चलता तो यहां पैदा होने से इनकार कर देते। लेकिन कतर की नागरिकता की पेशकश को स्वीकार कर लेना ख़ुद उनकी इच्छा थी। ख़ुद उनके बेटे ने ओवैश ने स्वीकार किया कि कतर के शाही परिवार की पेशकश को स्वीकारने का फ़ैसला हुसैन साहब की अपनी इच्छा है।
जिस तरह राजाओं के जमाने में एक राज से दूसरे राज को संदेश देने ख़लीता लेकर घोड़े पर सवार संदेशवाहक जाया करते थे। कुछ उसी अंदाज में मक़बूल फिदा हुसैन की छाप वाला घोड़ा, इस संदेश को लेकर आया। फिदा ने अपनी कूचियों से एक घोड़ा बनाया और उसपर लिखा- आई, द इंडियन ओरिजिन पेंटर, एमएफ हुसैन एट 95, हैव बीन ऑनर्ड बाय कतर नेशनलिटी। अख़बार को ख़ुद हुसैन साहब की तरफ से ये संदेश दिया गया था। इस ख़बर के साथ उन्होंने यह भी सफाई दी कि कतर के शाही परिवार की तरफ से उन्हें यह पेशकश दी गई है। इसके लिए उन्होंने अपनी तरफ से कोई आवेदन नहीं किया था।
जाहिर है कि हुसैन के इस संदेश के बाद भारत सरकार के लिए कुछ असहज स्थिति पैदा हो गई। सत्ता पक्ष ने भरोसा दिलाया कि हुसैन साहब, देश के सम्मानित नागरिक हैं और वे अगर वतन वापस लौटते हैं तो उन्हें पूरी सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी। जबकि विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार, हुसैन को सुरक्षा देने में विफल रही इसलिये ये नौबत आई। इसी बीच जब हुसैन ने कतर की नागरिकता स्वीकार कर ली तो उनके वापस लौटने का सवाल ही ख़त्म हो गया। अब इसे भारत के मान- अपमान से जोड़कर देखा जा रहा है।
हिंदूवादी कट्टरपंथियों का इल्जाम है कि हुसैन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में गुनाह को अंजाम दे रहे थे। हुसैन ने 1970 में हिंदु धर्म की देवियों को लेकर पेंटिंग बनाई थी लेकिन उस वक़्त इसपर कोई विरोध नहीं हुआ। `विचार मिमांसा' नाम की पत्रिका ने जब 1996 में हुसैन की इसी पेंटिंग पर अपनी कवर स्टोरी बनाकर उसे प्रकाशित किया तो जैसे विरोध का सैलाब उमड़ पड़ा। हिंदु धार्मिक भावनाओं को हुसैन की इस पेंटिंग ने भड़का दिया और उनके ख़िलाफ़ देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए। धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने को लेकर हुसैन के ख़िलाफ़ कानूनी मुकदमों का सिलसिला -सा चल निकला। दिलचस्प बात ये है कि हुसैन की जिस पेंटिंग पर विवाद हुआ वह 1970 में बनाई गई थी। ठीक उसके एक साल पहले 1969 में हुसैन ने समाजवादी नेता डॉ.राममनोहर लोहिया के कहने पर रामायण पर तक़रीबन 160 पेंटिंग्स बनाई थी। हुसैन ने अपनी आत्मकथा में इसका ज़िक्र भी किया है। हुसैन से जुड़े किस्सों की फेहरिस्त में रामायण पर बनाई गई उनकी बेमिसाल पेंटिंग्स का कभी ज़िक्र हालांकि नहीं आया।
देश से हुसैन की इस तरह की विदाई भारत के सामाजिक ताने- बाने पर एक सवाल है। देश के धर्मनिरपेक्ष चेहरे पर हुसैन किसी बदनुमा घाव की तरह उभरे हैं। जहां कट्टरपंथी ताकतों के सामने सरकार और समाज, दोनों घुटने टेकने के लिए मजबूर हैं। हाल के दिनों में इस तरह के उदाहरण बार- बार सामने आते हैं। अपनी सफाई में हम यह कह नहीं बच सकते है कि हुसैन स्व निर्वासित जीवन जी रहे थे। बाक़ायदा देश से बेदखल किये जाने का आदेश देना या स्वनिर्वासन के फैसले जैसे हालात पैदा कर देना, बहुत अंतर नहीं है। देश में कट्टरपंथियों की आगे के आगे हुसैन ने स्व निर्वासन का फैसला किया था। सरकार उन बजरंगियों से हुसैन को बचा पाने में तक़रीबन विफल रही, जो बार- बार हुसैन को निशाना बना रहे थे। पिछले चार या उससे अधिक वर्षों से हुसैन, दुनिया के अलग- अलग मुल्कों में स्व निर्वासन का जीवन जी रहे थे।
इस पूरे प्रकरण में दूसरे दलों की तरह वामदलों के नेताओं का बयान भी किसी चुटकुले की तरह सामने आया। वामदल के एक नेता यह कहते सुने गए कि भारत के लिए यह बड़ा झटका है कि कट्टरपंथी ताकतों की वजह हुसैन जैसे कलाकार को अपना देश छोड़ना पड़ता है। शायद उनके जेहन से तस्लीमा नसरीन का चेहरा उतर गया हो। कट्टरपंथियों से जान बचाने के लिए तस्लीमा पश्चिम बंगाल में पनाह देने की गुहार लगाती रहीं, लेकिन बंगाल की वाममोर्चे की सरकार इस मसले पर जैसे बजरंगियों के मार्क्सवादी संस्करण में बदल गई। तस्लीमा को रातोंरात दूसरे राज्यों में भेज दिया गया। आख़िरकार `जनता की भारी मांग पर' तमाम सरकारों ने तस्लीमा को पनाह देने से इनकार कर दिया। अब जबकि तस्लीमा, हुसैन जैसे तमाम नाम भारत की फेहरिस्त से ख़ारिज कर दिये गए हैं तो इस `रामराज' में निश्चय ही बजरंगियों के लिए ख़ुश होने का मौका है।

Wednesday, February 17, 2010

सांप- नेताः किसको किससे ख़तरा



बीजेपी का इंदौर में राष्ट्रीय अधिवेशन हो रहा है। अधिवेशन स्थल पर नाना प्रकार के सांप पाए जाने की ख़बर से नेता परेशान हैं। नेताओं पर सांपों का ख़तरा है। नेता बेचारे वातानुकूलित तंबुओं में सांपों के साए में किसी तरह रात बिता रहे हैं। लेकिन सांपों से नेता क्यों डरते हैं ? सांप तो पब्लिक को डराते हैं। पब्लिक को ही सांप काटते हैं। सांपों से जनता डरती और मरती है। नेता भला क्यों डरने लगे? आप याद करके बताइए कि कभी किसी सांप ने छोटे या बड़े किसी भी नेता को काटा है ? सांप कभी नेताओं को नहीं डसते। वे तो ख़ुद नेताओं की नस्ल से परहेज करते हैं। तय तो ये होना है कि कौन किसको काटता है। किसको किससे ख़तरा है। बेचारे सांप तो राह में किसी नेता की गंध पाते ही राह बदल देते हैं। नेताओं के सामने बड़े-से-बड़ा विषधर सांप भी विषहीन, दंतहीन गरल बन जाते हैं। इसलिये सांप अपनी नस्ल में किसी को नेता नहीं बनाते। लेकिन नेता डरे हुए हैं। बड़ी संख्या में सपेरों को लगाया गया है। जो रात भर सुरक्षा जांच अधिकारी की तरह डंडे से बने यंत्र को घुमाते हुए सांप तलाश रहे हैं। नेताओं और सांपों के बीच में सपेरे और उनका यही यंत्र है।
बीजेपी के अलावा भी आजकल सियासत में सांपों की बड़ी चर्चा है। अमर सिंह जी के लिए उनके नेताजी अब हरे सांप की तरह हैं। घास में बैठ जाएं तो घास जैसा, फसल में छुप जाएं तो फसल जैसा। आजम भाई के साथ हों तो उन जैसा, हिंदू शिरोमणि कल्याण जी के बगलगीर हों तो उन जैसा। पकड़ पाना जाना मुश्किल है। ये अलग बात है कि इसी हरे सांप को गले में डालकर ठाकुर साहब घूमते रहे।
मौजूदा दौर को आप राजनीति का सांप काल कह सकते हैं। अमर सिंह के लिए नेताजी और पासवान जी के लिए सुशासन बाबू के साथ लालूजी भी कुछ वैसे ही हैं। पासवान जी कहते हैं कि सुशासन बाबू काटने वाले और लालू जी `नहीं' काटने वाले सांप हैं। पासवान जी के लिए सांप दोनों हैं। इसलिये पासवान जी ज्यादा सुरक्षित लालूजी के साथ हैं।
मुझे याद आ रहा है कि कांशीराम जी ने कांग्रेस और बीजेपी को सांपनाथ और नागनाथ का नाम दिया था। उनके लिए कांग्रेस और बीजेपी सांप थे। इसलिये राजनीति के इस सांप काल में सांपों पर नारे गढ़े जा रहे हैं। सांपों का नाम लेकर सियासी शिगूफ़े छोड़े जा रहे हैं। बेचारे सांप फिर भी कुछ नहीं कहते। फुंफकारना तो दूर, नेताओं के सामने उनकी बोलती बंद हो जाती है। क्योंकि सांपों पर नेताओं का ख़तरा है।

Friday, February 12, 2010

राहुल कथायाम् प्रथमोध्याय:

राकेश पाठक, न्यूज़ चैनल में एंकर हैं। उन्होंने राहुल गांधी पर जो कुछ लिखा है, आप भी पढ़ें, दिलचस्प है। उनके ब्लॉग- ...इस मोड़ पर- से साभार लिया गया है -संजीव
राहुल गांधी…कौन राहुल गांधी? अरे इस देश में एक ही तो राहुल गांधी है। युवा राहुल गांधी। कांग्रेस का राहुल गांधी। सोनिया का लाल राहुल गांधी। चचा नेहरू का नाती राहुल गांधी। इंदिरा गांधी का पोता राहुल गांधी। राजीव गांधी का बेटा राहुल गांधी। और भी कुछ बताना पड़ेगा क्या। राहुल गांधी अब ‘बबुआ’ नहीं रहा बड़ा हो गया है समझदार हो गया है। राजनीति समझने लगा है। अब वो प्रेस को देखकर भकुआता नहीं है। बल्कि गुर्राता है भकाभक अपनी बात कहता है। ये अलग बात है कि उसकी बात भले ऐसी लगे कि किसी बच्चे को “लघुसिद्धांत कौमुदी” के कठिन सूत्र रटा दिए गए हों। कांग्रेस के नेता अभिभूतो हो रहे हैं। गदगद हो रहे हैं उनकी डूबती नइया को पार लगाने के लिए फिर से गांधी परिवार का एक युवा धरती पर आ चुका है। दुकानदारी बंद नहीं होगी। सभी नेता घर के इस बबुआ की बालक्रीड़ा को देखकर छहा रहे हैं। आ हा हा...बबुआ कितना समझदार हो गया है...देखो तो...अले ले ले...वाह वा वा....बबुआ भारत के चक्कर लगा रहा है। वोटबैंक साध रहा है। दलित बस्ती में जाकर रात गुज़ार रहा है हमें इत्मीनान से सोने दे रहा है। लोगों को बता रहा है भारत एक है। कितना समझदार है। अभी तक किसी ने कही थी ये बात वाह वा...वाह वा...अरे बबुआ तो हीरो भी है चॉकलेटी फेस देखकर लड़कियां फिसल रही हैं। हां भई कितना खूबसूरत चेहरा है बाबा का। राहुल बाबा....प्यारे राहुल बाबा....सभी अभिभूत हैं। देखो तो कितना गज़ब का भाषण देता है। अरे थोड़े ही देता है ये तो अलग ही शैली है वो ज्ञान देने में .यकीन थोड़े ही करता है वो तो ‘इंटरएक्ट’ करता है। लोगों से सवाल पूछता है जवाब मांगता है। अले ले ले कितना प्यारा लगता है। जब बांह चढ़ाकर बड़ों जैसे बातें करता है। कहता है कि अब युवाओं को राजनीति में आना चाहिए। कहता है कि परिवारवाद नहीं चलेगा। कहता है बस बहुत हुआ। वाह वा...वाह वा...वाह वा।दिग्विजय सिंह अभिभूत हैं...महासचिव अभिभूत हैं...रीता बहुगुणा तो ऐसा लगता है बालक्रीड़ा को देखकर सम्मोहित होती जाती हैं। राहुल बाबा ने हैलकॉप्टर उतारा...ज़ीरो विज़िविलिटी थी। पर अपने लोगों से मिलने के लिए जान की परवाह नहीं की। पायलट ने मना किया नहीं माने बोले उतारुंगा...न न न मैं तो यहीं उतारूंगा। और उतार दिया हेलीकॉप्टर ज़ीरो विज़िबिलटी में। अद्भुत...चमत्कार हो गया...प्रभू ये सक्षात आप हैं....भगवन ‘कलकी’ अवतार तो नहीं हो गया...वाह वा वाह वाह वा। मनमोहन का तो मन मोह लिया है राहुल बाबा ने मनमोहन ने तो सोच भी लिया है कि उनका वारिस बस और बस राहुल बाबा ही होंगे। देखो तो कितनी समझ है राजनीति की सब जल रहे हैं हमारे हीरे को देखकर सच में लड़का हीरा है...हीरा....वाह वा...वाह वा....वाह वा। सभी बालक्रीड़ा देखकर अघा रहे हैं। जैसे नंद के बेटे ‘लल्ला’ ‘कान्हा’ की बालक्रीड़ा देखकर अघा रहे थे। अरे देखो तो लल्ला को। अरे वाह कितना सुंदर है...कितना समझदार है...लल्ला भाग रहा है यहां से वहां लोग चिल्ला रहे हैं कान्हा कान्हा कान्हा। पर मुझे एक बात नहीं समझ आ रही। कांग्रेसी गोपी बने सो ठीक। कान्हा प्रेम में अधर में अटके सो ठीक लेकिन मीडिया को क्या हो गया है। कभी-कभी लगता है कि ये कलयुग में कृष्णवतार कैसे हो गया। क्या कांग्रेसी देश की आगे की राजनीति कृष्ण की राजनीति से साधने की कोशिश कर रहे हैं। बीजेपी तो राम का नाम लेकर राजनीतिक ज़मीन साधती रही अब क्या परोक्ष रूप से कृष्ण लीला की बारी है। बीजेपी ने रामरथ को चलाया कन्याकुमारी से अयोध्या तक। बहुत कुछ हासिल हुआ, ये अलग बात है कि पार्टी एक भी राम को पैदा नहीं कर सकी, हां पार्टी को डुबोने वाले रावण कई पैदा हो गए। आज पार्टी किनारे लग चुकी है। तो क्या कांग्रेसी राहुल बाबा को कृष्ण की छवि पढ़ाकर मैदान में उन्हे उतार चुके हैं। आखिर ये फील गुड क्यों कराया जा रहा है। मीडिया एकदम से राग राहुल क्यो गाने में जुट गया है। कहीं ये एक भारी सेटिंग तो नहीं है। ये अचानक क्या हो गया है। कोई आलोचना नहीं कोई क्रॉस इक्ज़ामिनेशन नहीं ‘न खाता न बही, राहुल कहें सो सही’ मीडिया क्या अपने मकसद से भटक गया है या भटकना चाहता है जानबूझकर। और भटका रहा है हमें भी। राहुल गांधी बिहार जाते हैं कहते हैं कि मुंबई सबकी है। एनएसए के कमांडो जो 26/11 में आतंकियों से लड़े वो बिहारी थे...उत्तर प्रदेश के थे। क्यों कहने की ज़रूरत है ये बिहार में खड़े हो कर इस वक्त? तो ज़रूरत है क्योंकि बेवकूफ बनाना है वोट साधना है चुनाव में डूबती लुटिया बचानी है। ये वही राहुल गांधी है जो उस वक्त मुंबई में अपने किसी दोस्त की पार्टी में शिरकत कर रहे थे जिसवक्त मनसे के कार्यकर्ता मुंबई पहुंचे उत्तर भारतीय छात्रों पर हमले कर रहे थे। उस वक्त क्यों राहुल बाबा को इस पूरी घटना पर टिप्पणी करने की ज़रूरत नज़र नहीं आई। अभी हाल की बात लीजिए महाराष्ट्र सरकार ने टैक्सी ड्राइवरों के मसले पर एक कानून बनाया कि पंद्रह साल का ‘डोमेसाइल’ टैक्सी ड्राइवरों के पास होने पर ही उन्हे परमिट दिया जाएगा। तब क्यों नहीं कुछ बोला गया। कहा गया आलोचना की गई। राहुल बाबा तब क्यों शांत रहे। आज़मगढ़ के संजरपुर में जाकर दिग्विजय सिंह (जिन्होंने मध्यप्रदेश में सत्ता से बुरी तरह से बेदखल होने के बाद बड़े रौबीले अंदाज़ में ये शपथ ली थी कि वो दस साल तक मध्यप्रदेश की राजनीति का रूख नहीं करेंगे और कांग्रेस के आम कार्यकर्ता के रूप में काम करेंगे) ने जो बटला हाउस इनकाउंटर पर बकबक की क्यों उसपर हमारे-आपके राहुल बाबा का कोई बयान नहीं आया। दिग्विजय तो बकबकाने के बाद होश में आ गए। दरअसल वोट साधे जा रहे हैं। हर दिशा में हर दिशा से। वोट साधने में कार्य मायने नहीं रखता कांग्रेसी समझ चुके हैं। अगर काम मायने रखता तो मंहगाई से त्राहि-त्राहि कर रही जनता दोबारा कांग्रेस को सत्ता तक नहीं पहुंचाती। मुंबई की लोकल में बैठकर राहुल बाबा बिहार के और यूपी के वोट एक साथ साध रहे हैं। राहुल को ये बात समझ में आ रही है या समझाई जा रही है कि यूपी-बिहार में वोट मुंबई से सधेंगे। राहुल बाबा ने नाग-नथैया कर दी है। यमुना रूपी मुंबई में निवास करने वाले विषधर के सिर पर चढ़कर उसके जबड़ों को सिलकर ये जतला दिया है कि उनकी निगाह दरअसल कहीं और हैं। महाराष्ट्र तो पहले ही सधा हुआ है। लेकिन राहुल की नज़र हैं कहां इसका इंटरप्रटेशन कहीं नहीं है। किसी मीडिया में नहीं न प्रिंट में न ही दुकानदारी चला रहे न्यूज़ चैनलों पर। मुनाफा शायद यहां ज्यादा नज़र आ रहा है। मीडिया आंखे फाड़े मुंह फाड़े चिल्लाता रहा वाह वा वाह वा...वाह वा क्या बात है मुंबई की लोकल में सफर...राहुल का जवाब....अचानक चले गए लोकल में....लेकिन दूसरे दिन सब साफ हो गया मुंबई पुलिस के ही सबसे बड़े अधिकारी ने कहा सब प्लान हमें मालूम था हमने पूरी तैयारी कर रखी थी। मीडिया चिल्ला रहा था एसपीजी को भी खबर नहीं थी....वाह वा वाह वा...वाह वा। ‘सो मुंदौ आंख कतो कछु नाहीं’ की राह पर सब चल रहे हैं। मीडिया तो ‘चारण’ की भूमिका में आ गया है। युवराज की जय हो....जय हो प्रभू की आवाज़ें आ रहीं हैं। नेशनल चैनल गदगद हैं युवराज की हर बात पर वाह वा...वाह वा..वाह वा...करते हुए। पर ये वाह वही अगर वास्तव में देश के लिए कोई मुक्कमल रोशन भविष्य देता हो तो मैं भी कहूं वाह वा। लेकिन भईया ऐसा कहीं होने नहीं जा रहा। लोग अगर राहुल बाबा की साफगोई पर मरे मिटे जा रहे हैं तो ज़रा इस सम्मोहन से जागिए। ये समय सोने का नहीं जागने का है। निश्चय करने का है कि हमें आखिर क्या चुनना है खूबसूरत फोटोजेनिक फेस....या फिर सधे रास्ते पर निखरता और निखरता भविष्य। पर क्या करें विकल्प भी तो नहीं हैं हमारे पास। राहुल ने आजकल एक राग छेड़ा है वहीं राग ‘नब्ज़’ है। राग युवा। युवाओं को उठना होगा। पर राहुल की सरपरस्ती में नहीं खुद की टीम खड़ी करनी होगी। राहुल गांधी अपनी टीम खड़ी कर रहे हैं युवाओं की टीम....पर युवा नेता नहीं होंगे कार्यकर्ता होंगे। नेता वहीं होंगे। जतिन प्रसाद, सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सरीखे युवा.....जिनकी जीन में राजनीति है। इस जीन की बुरी बात ये है कि किसी को भी बर्दाश्त नहीं करती। कांग्रेस की राजनीति में एक म्यूचुअल अंडरस्टैडिंग है। गांधी परिवार प्रधानमंत्री या प्रधानमंत्री जैसी ताकत और रुतबा और बाकि मंत्री पुत्र उसके नीचे। बस। इसके आगे खड़ी पाई है यानि पूर्ण विराम। खैर....ये बात मीडिया न समझे ऐसा नहीं है....पर क्या करे सेटिंग से परेशान है। खबरों की सारी सेटिंग ही राहुल पर है। सभी चैनल चिल्ला रहे हैं...बड़े ब्रांड्स को वशीभूत कर लिया गया है लगता है। अब बस इंतज़ार उस दिन का है जब ये ब्रांडेड चैनल चलाएंगे राहुल की खबर पर एक स्टिंग.....‘यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजांम्यहम्’

Wednesday, February 10, 2010

उत्तमा जी ! मैं आपसे बिल्कुल असहमत हूं

डॉ. उत्तमा के ब्लॉग कलाजगत (http://www.kalajagat.blogspot.com/) पर रुचिका मामले के मुख्य अभियुक्त राठौर पर हमले को लेकर लिखी गई पोस्ट पढ़ने के बाद ख़्याल आया कि उनके ब्लॉग पर जाकर टिप्पणी करूं। इस वज़ह से ख़्याल को ख़ारिज कर दिया कि ब्लॉग की टिप्पणियां अमूमन चंद बरदाई रचनावली सरीखी होती है। यानी, सहमतियों से लबरेज, इरशाद- इरशाद करने वाली मुद्रा में की गई राजदबारी किस्म की छोटी- छोटी टिप्पणियां। कुछेक पोस्ट में असहमितयां होती हैं तो वे अक्सर बेवज़ह की गई टिप्णियां होती हैं, जिसे दिल पर लेने की जरूरत नहीं। इसलिये ब्लॉग की इस परिपाटी को बनाए रखते हुए मैने अपने ब्लॉग पर टिप्पणी लिखना ज्यादा मुफ़ीद समझा। -संजीव
राठौर पर हमला करने वाले उत्सव...या जो कुछ भी उसका नाम है, उसपर डॉ. उत्तमा की पोस्ट से मेरी सख़्त असहमति है। उत्तमा ने अपनी पोस्ट के जरिये उत्सव के हमले को अलग- अलग नज़रिये से देखने की कोशिश की लेकिन यह बताने में विफल रही कि आख़िरकार वह कौन –सी मनोदशा थी, जिसमें उत्सव ने राठौर पर हमला किया। इसके लिए उन्होंने उत्सव के पिता के उस बयान का सहारा लिया जिसमें वे कह रहे हैं कि `पढ़ने- लिखने में होशियार उत्सव कुछ दिनों से न्याय- अन्याय की बात करने लगा था।‘ उन्होंने रुचिका प्रकरण को लेकर चंडीगढ़ (जहां राठौर की पेशी हुई) के माहौल में राठौर को लेकर फिजाओं में घुली नफ़रत का ज़िक्र करते हुए कहा है कि उत्सव को इन ख़बरों ने भी उकसाया होगा। मेरा सवाल है कि इस मामले को छोड़कर कोई भी दूसरी ऐसी घटना बता दे (फिल्मों को छोड़कर) जिसमें किसी खबर ने किसी आदमी में इतनी नफ़रत भर दी हो कि वह उसी तरह हमलावर हो जाए जिस तरह उत्सव ने राठौर पर किया। उसमें भी, तब जबकि हमलावर न तो पीड़ित को जानता हो और न ही आरोपी से उसका परिचय हो।
उत्तमा जी ने दूसरी वजह बताते हुए लिखा है कि `कलाकार ज्यादा संवेदनशील होते हैं और उत्सव भी एक कलाकार है।’ आगे उन्होंने एक संस्था की सर्वे रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया है कि कलाकार चूंकि ज्यादा संवेदनशील होते हैं इसलिए उनमें डिप्रेशन के मामले ज्यादा होते हैं।
उत्सव के हमले के कारणों को हजम भी कर जाएं या इसे जांच- पड़ताल के जिम्मे छोड़ दें, तो भी क्या इसे माना जा सकता है कि उत्सव का हमला रुचिका प्रकरण पर सभी भारतीयों की भावनाओं का प्रतीक है ? वे लिखती कि `उत्सव उन भावनाओं का प्रतीक है जो रुचिका प्रकरण को लेकर हर भारतीय के दिल में घुमड़ रहा है। उत्सव के साथ शायद कानून नहीं होगा लेकिन उसके साथ तमाम भारत के लोगों की भीड़ है।’ डॉ.उत्तमा ने आपके पास दो ही विकल्प छोड़े हैं- पहला, या तो आप इस सच्ची भारतीयता की जमात में ख़ुद को शामिल कर नायक –उत्सव- के परिवर्तनकामी कारनामे की पालकी ढोयें या फिर सच्चे भारतीयों की लिस्ट से आपका नाम ख़ारिज़ कर दिया जाएगा।
दरअसल, कमाल की भारतीयता रह- रहकर देखने को मिलती है। आपको याद होगा कि जिस तरह उत्सव के हमले को आक्रोश का विस्फोट बताया जा रहा है, कुछ इसी तरह संघ परिवार भी बाबरी ढांचे की शहादत को वर्षों से दबे जन आक्रोश का नतीजा बता रहा था। गुजरात दंगों को भी कुछ इसी अंदाज में स्वस्फूर्त बताने की कोशिश की गई थी। या फिर मुंबई आतंकी हमले के आरोपी कसाब को लेकर कई बार उसकी सुरक्षा में खर्च हो रही भारी- भरकम राशि का ब्यौरा देते हुए अफसोस किया जाता है कि इतना कुछ जरूरी नहीं था।
जाहिर है कि इस तरह का नज़रिया कुछ लोगों या एक समूह या हिस्से का हो सकता है लेकिन पूरे भारत का नहीं। ठीक उसी तरह उत्सव के हमले को कुछ लोग भले ही जायज ठहरा रहे हैं लेकिन यह भारत का प्रतिनिधि स्वर नहीं है। फ़र्ज़ करें कि भीड़ अगर इसी तरह इंसाफ़ करने लगे, उसके इंसाफ़ पर लोग तालियां बजाएं तो किस तरह का समाज तैयार होगा ? ...इसलिये उत्तमा जी, उत्सव के माता- पिता के साथ पूरी हमदर्दी रखते उत्सव के हमले की आप भी पुरजोर निंदा करें तो शायद बेहतर हो।

Tuesday, February 9, 2010

पब्लिक तो बच्चा है जी!

आप उत्तर भारतीय हैं तो फ़क़त इसबात पर ख़ुश हो सकते हैं कि कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी उनकी हिमायत में आ गए हैं। मराठी बनाम उत्तर भारतीयों के खूनी खेल में अबतक तमाशबीन बनी कांग्रेस ने चुप्पी तब टूटी जब शिवसेना के कागजी शेरों ने गांधी परिवार पर व्यक्तिगत हमला बोल दिया। राहुल गांधी ने हाल ही में पटना में कहा कि `मुंबई पर सबका हक़ है। मुंबई आतंकी हमले के दौरान बचाव के लिए गई एनएसजी की टीम में बिहार, उत्तर प्रदेश के भी कई जवान थे। उस समय मराठी राजनीति करने वाले नेता कहां थे ?'
राहुल गांधी के इस ताजा रुख़ के कई निहितार्थ हैं। उनके इस बयान ने कांग्रेस और केंद्र सरकार की कई मुश्किलें कुछ आसान कर दी हैं। राहुल गांधी के बयान के मर्म को समझने के लिए दो चीजें बहुत अहम हैं। अव्वल, राहुल गांधी का यह बयान किस वक़्त आया है? साथ ही यह भी समझने की भी जरूरत है कि राहुल गांधी ने किस जगह पर ये बयान दिया ? राहुल गांधी ने मराठी बनाम उत्तर भारतीयों के मसले पर तब जुबान खोली जब महंगाई के मसले पर कृषि मंत्री शरद पवार, अपनी ही यूपीए सरकार की खासी किरकिरी करा रहे थे। शरद पवार, महंगाई पर अपनी भविष्यवाणियों से कांग्रेस को रह- रहकर डरा रहे थे। आम जन के साथ कांग्रेस के हाथ का दावा, छलावा साबित हो रहा था।
दरअसल, यूपीए सरकार और कृषि मंत्री शरद पवार के अलग- अलग सुरों के पीछे भी बारीक राजनीति है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और एनसीपी, दोनों ही सत्ता में आ गई। जाहिर है कि महाराष्ट्र की राजनीति तक सिमटे शरद पवार सुविधाजनक स्थिति में आ गए लेकिन महंगाई पर अपनी भविष्यवाणियों से कांग्रेस की राह उन्होंने जरूर पेचीदा बना दी। महंगाई रोकने के लिए यूपीए सरकार के दावों को शरद पवार यह कहकर रोज-ब-रोज आईना दिखाते रहे कि आने वाले दिन और भी मुश्किलों भरे हैं। काफी फजीहत के बाद सरकार की तरफ से शरद पवार ने देश को भरोसा दिलाया कि पंद्रह दिनों के भीतर जरूरी खाद्य पदार्थों की कीमतें कम होंगी।
इस समय सीमा में खाद्य पदार्थों की कीमतें तो क्या कम होतीं लेकिन महंगाई ने कांग्रेस को सतर्क जरूर कर दिया। इसी वर्ष बिहार विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और चुनावी वर्ष में कमरतोड़ महंगाई का सवाल कांग्रेस के मंसूबों पर पानी फेर सकता है। दूसरे, मुंबई में उत्तर भारतीयों पर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना और शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने भले ही कहर बरपाया हो लेकिन राज्य में कांग्रेस- एनसीपी के गठबंधन वाली सरकार इस तमाशे के दौरान ख़ामोश बनी रही। मुंबई की सड़कों पर उत्तर भारतीय टैक्सी ड्राइवरों को निशाना बनाया गया या फिर बिहार के एक उन्मादी युवक को किसी आतंकवादी की तरह सड़क पर मार गिराया गया, कांग्रेस के नेताओं ने तब भी अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी। उस वक़्त कांग्रेस के सामने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की मजबूरी थी। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अप्रत्याशित रूप से इसका फायदा भी मिला। शिवसेना और एमएनएस की बंदरबांट में कांग्रेस नफा उठा गई।
केंद्र और राज्य में सत्ता में आने के बाद मराठा क्षत्रप शरद पवार ने कांग्रेस की राह में कांटे बोने शुरू कर दिये। इसकी काट में कांग्रेस के मराठा नेता और राज्य के मुख्यमंत्री अशोक चाह्वाण ने मराठी टैक्सी ड्राइवरों को ही परमिट का शिगूफा छोड़कर कांग्रेस की मुश्किलें कुछ आसान कर दीं। आपको चाह्वाण के बयान की बाजीगरी को समझने में ज्यादा दिक्कत इसलिये नहीं होगी कि फ़ौरन बाद उन्होंने यू-टर्न ले लिया। लेकिन तबतक कांग्रेस को इस मुद्दे पर जितनी तपिश की जरूरत थी, उतनी मिल गई। पटना के दौरे पर गए कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के बयान ने इसी विवाद को और भी हवा दे दी। राहुल गांधी के बयान से उपजे विवाद ने महंगाई के बड़े सवाल को भी बौना साबित कर दिया है। महंगाई के सवाल पर अबतक निरुत्तर हो जाने वाले सरकार के नुमाइंदों से इसबारे में कोई पूछने वाला नहीं है। राहुल के बयान ने दाल- रोटी की छटपटाहट में उठते सवालों को इलाकाई झगड़े के शोर में तब्दील कर दिया। आप केवल अंदाजा लगाएं कि अगर ताजा विवाद न होता तो सरकार के पास क्या महंगाई को लेकर उठते सवालों का कोई जवाब होता ?

Monday, February 8, 2010

घर में ही पराजित होती हिंदी


हिंदी को राष्ट्रभाषा मानने वालों का मुगालता पिछले दिनों टूट गया। गुजरात हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान हिंदी की संवैधानिक स्थिति भी स्पष्ट की। चीफ जस्टिस एस.जे. मुखोपाध्याय की बेंच ने डिब्बाबंद सामान पर हिंदी में ब्यौरा लिखे जाने को लेकर दायर पीआईएल पर फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि ` भारत में अधिकांश लोगों ने हिंदी को राष्ट्र भाषा के तौर पर स्वीकार कर लिया है। बहुत से लोग हिंदी बोलते हैं और देवनागरी लिपि में लिखते भी हैं लेकिन यह भी एक तथ्य है कि हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा है ही नहीं।‘
सुरेश कचाड़िया ने गुजरात हाईकोर्ट में पीआईएल दायर करते हुए मांग की थी कि सामान से संबंधित ब्यौरा हिंदी में लिखा होना चाहिये। तर्क ये दिया गया था कि चूंकि हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा है और देश के अधिकांश लोगों द्वारा समझी जाती है इसलिये सामान से संबंधित जानकारियां अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं की बजाय हिंदी में छपी होनी चाहिये। अपने फ़ैसले में गुजरात हाईकोर्ट ने यह तो माना कि हिंदी, देश के अधिकांश लोगों द्वारा समझी जाती है लेकिन संवैधानिक तौर पर हिंदी को राष्ट्रभाषा की हैसियत हासिल नहीं है इसलिये कोर्ट ने इस मामले में दो टूक फैसला दिया।
हिंदी बोलने, समझने और पढ़ने वालों की संख्या में काफी इज़ाफ़ा हुआ है। आकड़े इसकी तस्दीक करते हैं कि उसके समकक्ष खड़ी दूसरी क्षेत्रीय भाषाएं पहले भी हिंदी के मुकाबले काफी पीछे खड़ी थी। हालिया वर्षों में लोकप्रियता की होड़ में हिंदी ने देश की दूसरी भाषाओं को काफी पीछे छोड़ दिया। हिंदी का इतना फैलाव हो गया कि क्षेत्रीय भाषाएं उसके लिए कोई चुनौती नहीं रह गई। छिटपुट सियासी दुराव को छोड़ दें तो हिंदी की स्वीकार्यता काफी बढ़ी है। हिंदी बोलने- पढ़ने और समझने वालों की संख्या का कोई प्रमाणिक ब्यौरा तो नहीं है लेकिन अगर केवल देश के हिंदी भाषी राज्यों में ही आबादी का आकड़ा देखें तो हिंदी बोलने वालों की एक बड़ी संख्या सामने आती है। एक अनुमान के मुताबिक देश- विदेश में हिंदी बोलने वालों की संख्या 70 करोड़ से ज्यादा है। हिंदी की इसी व्यापकता से इसके राष्ट्रभाषा होने का भ्रम हुआ। यह भ्रम इतना गहरा था कि जब गुजरात हाईकोर्ट ने पीआईएल पर फैसला सुनाते हुए हिंदी की संवैधानिक स्थिति का ज़िक्र किया तो कई लोगों को हैरानी हुई। अख़बारों ने इस ख़बर को प्रमुखता दी और न्यूज़ पोर्टलों पर यह ख़बर सबसे ज्यादा पढ़ी गई ख़बरों की श्रेणी में दर्ज हुई। यह हिंदी की संवैधानिक स्थिति को लेकर हम सबकी जानकारियों पर भी किसी सवाल की तरह है। हैरानी की बात ये नहीं है कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा नहीं है, चौंकाने की बात ये ज्यादा है कि इसके बारे में बहुत सारे हिंदी भाषियों को इसकी जानकारी नहीं है। हिंदी की संवैधानिक स्थिति का अंदाजा सबको होता तो फिर न तो ये चौंकाने वाली ख़बर थी और न ही इस ख़बर सबसे ज्यादा पढ़ी गई ख़बर में शामिल होती।
तथ्य यही है कि हिंदी हमारे देश की राष्ट्रभाषा नहीं है। बल्कि यह कहना ज्यादा उचित है कि भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। हिंदी केवल राजभाषा है। केवल सरकारी कामकाज की भाषा। राजभाषा का ओहदा हासिल करने के लिए भी हिंदी को कड़ा संघर्ष करना पड़ा। हिंदी को राष्ट्रभाषा का अपना दर्जा अंग्रेजी के साथ सह- भाषा के रूप में साझा करना पड़ा। संविधान बनने के समय भाषा संबंधी प्रावधान में राष्ट्रभाषा को लेकर कोई एक राय तो दूर, राजभाषा बनाने को लेकर भी बड़ा विवाद था। संविधान सभा के सामने संकट ये था कि किसी एक भारतीय भाषा पर एक राय नहीं थी। दूसरी तरफ मुश्किल ये थी कि अगर हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता तो इस बहुभाषी देश में प्रशासन के कामकाज के लिए अलग- अलग भाषाएं अलग तरह की कठिनाइयां पेश करती। ऐसी स्थिति में प्रशासन की कोई एक जुबान नहीं होती। काफी मशक्कत के बाद यह तय हुआ कि हिंदी राजभाषा होगी और लिपि, देवनागरी होगी। यहां भी हिंदी की राह में मुश्किलें खड़ी थी। राजभाषा को लेकर प्रावधान बनाते समय हिंदी के साथ- साथ अंग्रेजी को लेकर भी व्यवस्था की गई। अंग्रेजी को पंद्रह या उससे अधिक वर्षों तक सह भाषा के रूप में स्वीकार किये जाने का प्रावधान बनाया गया। पंद्रह वर्षों की ये अवधि 1964 में ख़त्म हो गई लेकिन हिंदी के साथ अंग्रेजी सह- भाषा के रूप में अब भी बनी हुई है। यानी, कहें तो राष्ट्रभाषा की होड़ में पिछड़ने वाली हिंदी की राजभाषा के रूप में भी स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। व्यावहारिक तौर पर राजकाज की भाषा हिंदी की बजाय अंग्रेजी ही है। राजभाषा के समय हिंदी के सामने जिस तरह से क्षेत्रीय भाषाओं ने चुनौती पेश की, आगे चलकर अंग्रेजी इस भूमिका में आ गया।
ऐसा नहीं है इन वर्षों में हिंदी में इतनी सामर्थ्य नहीं थी या फिर इतनी स्वीकार्यता नहीं बन पाई कि वह सह- भाषा के ओहदे से अंग्रेजी को ख़ारिज कर दिखाए। सच तो ये है कि बदले हुए वैश्विक परिदृश्य में अंग्रेजी की बड़ी चुनौतियों, हिंदी को लेकर राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी और विरोधी हालात के बावजूद हिंदी का फैलाव हुआ। हिंदी के विस्तार को लेकर कोई शायद ही कोई मुगालता किसी को हो। हिंदी का अपना बड़ा बाजार तैयार हो गया है। हिंदी को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा के रूप में देखा जा रहा है। चीनी और अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी भी विश्व की भाषाओं के सामने खड़ी है। यहां तक कि हिंदी के लिए काम कर रहे लोग इसे संयुक्त राष्ट्र संघ में भी दूसरी भाषाओं की तरह हिंदी को जगह दिये जाने की मांग कर रहे हैं।
ऐसी स्थिति में यह सवाल एकबार फिर पुरजोर ढंग से उठाने की जरूरत है कि क्या भारत जैसे राष्ट्र की अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं होनी चाहिये ? क्योंकि कई ऐसे देश हैं, जो भारत के सामने किसी नज़ीर की तरह बार- बार सामने आते हैं, जिनके पास अपनी राष्ट्रभाषा है। संविधान ने हिंदी के साथ अंग्रेजी को सह- भाषा के रूप में बनाए रखने की व्यवस्था दी, जबतक कि इसकी जरूरत है। अब जबकि हिंदी ने अपनी ताक़त और अपनी जरूरतों को साबित कर दिया तो क्या वह समय नहीं आ गया है जब हिंदी को राजभाषा का ओहदा अंग्रेजी के साथ साझा करने की जरूरत नहीं रह गई है ?

Saturday, February 6, 2010

चप्पल से निकला चुर्र-र



मैं जब भागते- भगाते देर शाम अपने मित्र शर्माजी के घर पहुंचा तो सांसें धौंकनी की तरह चल रही थी। देखा, शर्मा की धर्मपत्नी खलबला रही थीं और अपने ड्राइंग रूम में बैठे शर्माजी भिन-भिना रहे थे। उनके टीवी सेट पर एंकर्स चिचिया रहे थे। मंत्री ने राहुल भैय्या की चप्पल क्या ढोयी, जमाना इस चप्पल वाद के पीछे पड़ा था। छोटे- बड़े, समझदार- नासमझ, स्त्रीलिंग- पुल्लिंग सब...(रामविलास पासवान के शब्द उधार लें तो) जो है सो, हुक्का- पानी लेकर चढ़े हुए थे। शर्मा जी दो- चार पैग लगाए बैठे थे इसलिये कह रहे थे कि ऐसे लोगों ने राजनीति को गंदा करने का `काम' किया है। मैं होश में था इसलिए कह रहा था कि ये राजनीति का सौंदर्य पक्ष है। शर्मा जी मदहोशी के आलम में बेशक बेतुकी बात कर रहे थे लेकिन मैं किसी होशमंद की तरह चप्पलवाद पर बोल रहा था।
चप्पलवाद न केवल वाद है बल्कि निर्विवाद है। मदहोश शर्मा जी भले न मानें लेकिन मुझे उम्मीद है कि मेरी तरह, चप्पलवाद के करोड़ो मानने वाले और आपकी तरह होशमंद लोग भी इसे मानेंगे कि इसका बड़ा पुरातन इतिहास है। चप्पलवाद न हुआ होता तो मानव सभ्यता पर जलवायु परिवर्तन से भी बड़ा असर पड़ता। चप्पल को अगर खड़ाऊं के रूप में देखें तो भरत भाई ने इसी तरह का खड़ाऊं सहेजे (दिल चाहे तो आप इसे ढोना भी कहने के लिए स्वतंत्र हैं) रखा था। भरत भाई इस मामले में खुशकिस्मत थे कि उस वक्त संजय जैसे कमेंट्रेटर तो अस्तित्व में आ भी गए होंगे लेकिन तब लाइव प्रसारण की सुविधा नहीं थी। नहीं तो महाराष्ट्र के उस मंत्री की तरह ही न्यूज़ चैनल वाले भरत भाई को भी ऐसा उड़ाते कि नीचे उतरने भी नहीं देते।
चप्पलवाद का अपना सौंदर्यशास्त्र है। विश्वास न हो तो इस सवाल का जवाब दीजिये कि मोनालिसा (अगर) हंस रही थी तो क्यों?...ऐसा नहीं कि लियो नार्दो द विंची, उसकी तस्वीर बना रहे थे इसलिये वह इतरा रही थी। मोनालिसा की मुस्कान की वाज़िब वजह शर्मा जी ने ही एकदिन होश में रहते समझाई कि मोनालिसा जैसी मोहतरमा की चप्पल ढोने वाले चूंकि ख़ामख्वाह भी कई लोग होते हैं इसलिये उनके चेहरे से बरसता नूर, स्थायी भाव की तरह होता है।
वैसे, हसीनाओं के चप्पल ढोना और हसीनाओं के चक्कर में चप्पल खाना, एक ही कला की दो अलग- अलग विधाएं हैं। उसमें भी, हसीनाओं के चप्पल ढोना उन लोगों के लिए क्षुद्रता या बेशर्मी है, जिन्हें इसका मौक़ा नहीं मिलता। हसीनाओं के चक्कर में चप्पल ख़ाना (वो भी टूटी) बेशक उनके लिए वीर रस है जो इस अहसास को भोग कर देखते हैं लेकिन दूसरों के लिए ये हास्य रस की तरह है। हां, बीवी से चप्पल खाना और बात है। बीवी से चप्पल खाने के बाद अक्सर लोग `लवगुरु' हो जाया करते हैं। ये हसीन मौक़ा उन्हीं लोगों को जीवन में मिलता है जिन्हें प्रातः स्मरणीय मटुक बाबा की तरह कोई जूली मिल जाया करती है। जनाब, मैं तो इतना बदनसीब हूं कि चला था लवगुरू बनने, लेकिन कोई जूली मिली नहीं और बीवी के चप्पल अबतक बेभाव पड़ रहे हैं।
मेरी दास्तान को अपना दर्द मानकर अगर आप जार- जार आंसू बहा रहें हों, तो मेरी पूरी सहानुभूति `जो है सो' आपके साथ है। लेकिन चप्पल जो है सो (रामविलास पासवान जी दोबारा सॉरी) संघर्ष का भी प्रतीक है। तभी तो गली -मोहल्ले के तमाम नेता चप्पल ही पहनकर संघर्ष करने का `काम' करते आए हैं। इसे ही घिस- घिसकर इस लायक हो पाते हैं कि वे किसी की चप्पल ढो सकें। इसलिये चप्पल घिसना उतना जरूरी नहीं है, जितना जरूरी ये है कि आपको भी कोई राहुल या संजय गांधी मिल जाए। बेवज़ह का ये चिचियाना बंद करिये कि किसी की चप्पल ढोना, मक्खनबाजी...चमचागिरी...चिरकुटगिरी है। राजनीति न सही, जिस भी क्षेत्र में आप काम कर रहे हों...किसी राहुल, किसी संजय को ढूंढ़िये। जन- जन में चप्पलवाद की इस विधा को पोलियो अभियान से ज्यादा बड़े पैमाने पर चलाया जाना चाहिये। इस मुहिम की कैच लाइन होगी- सब चलें, सब बढ़ें। इस मुहिम का ब्रांड एम्बेस्डर बनाने की बात हो तो जैसे कि कहते हैं न जस्सी जैसी कोई नहीं, तो इस मुहिम के लिए भी महाराष्ट्र के उस मंत्री जैसा कोई नहीं।