
मैं जब भागते- भगाते देर शाम अपने मित्र शर्माजी के घर पहुंचा तो सांसें धौंकनी की तरह चल रही थी। देखा, शर्मा की धर्मपत्नी खलबला रही थीं और अपने ड्राइंग रूम में बैठे शर्माजी भिन-भिना रहे थे। उनके टीवी सेट पर एंकर्स चिचिया रहे थे। मंत्री ने राहुल भैय्या की चप्पल क्या ढोयी, जमाना इस चप्पल वाद के पीछे पड़ा था। छोटे- बड़े, समझदार- नासमझ, स्त्रीलिंग- पुल्लिंग सब...(रामविलास पासवान के शब्द उधार लें तो) जो है सो, हुक्का- पानी लेकर चढ़े हुए थे। शर्मा जी दो- चार पैग लगाए बैठे थे इसलिये कह रहे थे कि ऐसे लोगों ने राजनीति को गंदा करने का `काम' किया है। मैं होश में था इसलिए कह रहा था कि ये राजनीति का सौंदर्य पक्ष है। शर्मा जी मदहोशी के आलम में बेशक बेतुकी बात कर रहे थे लेकिन मैं किसी होशमंद की तरह चप्पलवाद पर बोल रहा था।
चप्पलवाद न केवल वाद है बल्कि निर्विवाद है। मदहोश शर्मा जी भले न मानें लेकिन मुझे उम्मीद है कि मेरी तरह, चप्पलवाद के करोड़ो मानने वाले और आपकी तरह होशमंद लोग भी इसे मानेंगे कि इसका बड़ा पुरातन इतिहास है। चप्पलवाद न हुआ होता तो मानव सभ्यता पर जलवायु परिवर्तन से भी बड़ा असर पड़ता। चप्पल को अगर खड़ाऊं के रूप में देखें तो भरत भाई ने इसी तरह का खड़ाऊं सहेजे (दिल चाहे तो आप इसे ढोना भी कहने के लिए स्वतंत्र हैं) रखा था। भरत भाई इस मामले में खुशकिस्मत थे कि उस वक्त संजय जैसे कमेंट्रेटर तो अस्तित्व में आ भी गए होंगे लेकिन तब लाइव प्रसारण की सुविधा नहीं थी। नहीं तो महाराष्ट्र के उस मंत्री की तरह ही न्यूज़ चैनल वाले भरत भाई को भी ऐसा उड़ाते कि नीचे उतरने भी नहीं देते।
चप्पलवाद का अपना सौंदर्यशास्त्र है। विश्वास न हो तो इस सवाल का जवाब दीजिये कि मोनालिसा (अगर) हंस रही थी तो क्यों?...ऐसा नहीं कि लियो नार्दो द विंची, उसकी तस्वीर बना रहे थे इसलिये वह इतरा रही थी। मोनालिसा की मुस्कान की वाज़िब वजह शर्मा जी ने ही एकदिन होश में रहते समझाई कि मोनालिसा जैसी मोहतरमा की चप्पल ढोने वाले चूंकि ख़ामख्वाह भी कई लोग होते हैं इसलिये उनके चेहरे से बरसता नूर, स्थायी भाव की तरह होता है।
वैसे, हसीनाओं के चप्पल ढोना और हसीनाओं के चक्कर में चप्पल खाना, एक ही कला की दो अलग- अलग विधाएं हैं। उसमें भी, हसीनाओं के चप्पल ढोना उन लोगों के लिए क्षुद्रता या बेशर्मी है, जिन्हें इसका मौक़ा नहीं मिलता। हसीनाओं के चक्कर में चप्पल ख़ाना (वो भी टूटी) बेशक उनके लिए वीर रस है जो इस अहसास को भोग कर देखते हैं लेकिन दूसरों के लिए ये हास्य रस की तरह है। हां, बीवी से चप्पल खाना और बात है। बीवी से चप्पल खाने के बाद अक्सर लोग `लवगुरु' हो जाया करते हैं। ये हसीन मौक़ा उन्हीं लोगों को जीवन में मिलता है जिन्हें प्रातः स्मरणीय मटुक बाबा की तरह कोई जूली मिल जाया करती है। जनाब, मैं तो इतना बदनसीब हूं कि चला था लवगुरू बनने, लेकिन कोई जूली मिली नहीं और बीवी के चप्पल अबतक बेभाव पड़ रहे हैं।
मेरी दास्तान को अपना दर्द मानकर अगर आप जार- जार आंसू बहा रहें हों, तो मेरी पूरी सहानुभूति `जो है सो' आपके साथ है। लेकिन चप्पल जो है सो (रामविलास पासवान जी दोबारा सॉरी) संघर्ष का भी प्रतीक है। तभी तो गली -मोहल्ले के तमाम नेता चप्पल ही पहनकर संघर्ष करने का `काम' करते आए हैं। इसे ही घिस- घिसकर इस लायक हो पाते हैं कि वे किसी की चप्पल ढो सकें। इसलिये चप्पल घिसना उतना जरूरी नहीं है, जितना जरूरी ये है कि आपको भी कोई राहुल या संजय गांधी मिल जाए। बेवज़ह का ये चिचियाना बंद करिये कि किसी की चप्पल ढोना, मक्खनबाजी...चमचागिरी...चिरकुटगिरी है। राजनीति न सही, जिस भी क्षेत्र में आप काम कर रहे हों...किसी राहुल, किसी संजय को ढूंढ़िये। जन- जन में चप्पलवाद की इस विधा को पोलियो अभियान से ज्यादा बड़े पैमाने पर चलाया जाना चाहिये। इस मुहिम की कैच लाइन होगी- सब चलें, सब बढ़ें। इस मुहिम का ब्रांड एम्बेस्डर बनाने की बात हो तो जैसे कि कहते हैं न जस्सी जैसी कोई नहीं, तो इस मुहिम के लिए भी महाराष्ट्र के उस मंत्री जैसा कोई नहीं।
2 कुछ तो लिखिए जनाब:
हा हा हा, जबरदस्त चप्पल चलाया है. धन्यवाद.
आपकी पोस्ट बहुत सुन्दर है!
यह चर्चा मंच में भी चर्चित है!
http://charchamanch.blogspot.com/2010/02/blog-post_5547.html
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