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Monday, February 8, 2010

घर में ही पराजित होती हिंदी


हिंदी को राष्ट्रभाषा मानने वालों का मुगालता पिछले दिनों टूट गया। गुजरात हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान हिंदी की संवैधानिक स्थिति भी स्पष्ट की। चीफ जस्टिस एस.जे. मुखोपाध्याय की बेंच ने डिब्बाबंद सामान पर हिंदी में ब्यौरा लिखे जाने को लेकर दायर पीआईएल पर फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि ` भारत में अधिकांश लोगों ने हिंदी को राष्ट्र भाषा के तौर पर स्वीकार कर लिया है। बहुत से लोग हिंदी बोलते हैं और देवनागरी लिपि में लिखते भी हैं लेकिन यह भी एक तथ्य है कि हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा है ही नहीं।‘
सुरेश कचाड़िया ने गुजरात हाईकोर्ट में पीआईएल दायर करते हुए मांग की थी कि सामान से संबंधित ब्यौरा हिंदी में लिखा होना चाहिये। तर्क ये दिया गया था कि चूंकि हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा है और देश के अधिकांश लोगों द्वारा समझी जाती है इसलिये सामान से संबंधित जानकारियां अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं की बजाय हिंदी में छपी होनी चाहिये। अपने फ़ैसले में गुजरात हाईकोर्ट ने यह तो माना कि हिंदी, देश के अधिकांश लोगों द्वारा समझी जाती है लेकिन संवैधानिक तौर पर हिंदी को राष्ट्रभाषा की हैसियत हासिल नहीं है इसलिये कोर्ट ने इस मामले में दो टूक फैसला दिया।
हिंदी बोलने, समझने और पढ़ने वालों की संख्या में काफी इज़ाफ़ा हुआ है। आकड़े इसकी तस्दीक करते हैं कि उसके समकक्ष खड़ी दूसरी क्षेत्रीय भाषाएं पहले भी हिंदी के मुकाबले काफी पीछे खड़ी थी। हालिया वर्षों में लोकप्रियता की होड़ में हिंदी ने देश की दूसरी भाषाओं को काफी पीछे छोड़ दिया। हिंदी का इतना फैलाव हो गया कि क्षेत्रीय भाषाएं उसके लिए कोई चुनौती नहीं रह गई। छिटपुट सियासी दुराव को छोड़ दें तो हिंदी की स्वीकार्यता काफी बढ़ी है। हिंदी बोलने- पढ़ने और समझने वालों की संख्या का कोई प्रमाणिक ब्यौरा तो नहीं है लेकिन अगर केवल देश के हिंदी भाषी राज्यों में ही आबादी का आकड़ा देखें तो हिंदी बोलने वालों की एक बड़ी संख्या सामने आती है। एक अनुमान के मुताबिक देश- विदेश में हिंदी बोलने वालों की संख्या 70 करोड़ से ज्यादा है। हिंदी की इसी व्यापकता से इसके राष्ट्रभाषा होने का भ्रम हुआ। यह भ्रम इतना गहरा था कि जब गुजरात हाईकोर्ट ने पीआईएल पर फैसला सुनाते हुए हिंदी की संवैधानिक स्थिति का ज़िक्र किया तो कई लोगों को हैरानी हुई। अख़बारों ने इस ख़बर को प्रमुखता दी और न्यूज़ पोर्टलों पर यह ख़बर सबसे ज्यादा पढ़ी गई ख़बरों की श्रेणी में दर्ज हुई। यह हिंदी की संवैधानिक स्थिति को लेकर हम सबकी जानकारियों पर भी किसी सवाल की तरह है। हैरानी की बात ये नहीं है कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा नहीं है, चौंकाने की बात ये ज्यादा है कि इसके बारे में बहुत सारे हिंदी भाषियों को इसकी जानकारी नहीं है। हिंदी की संवैधानिक स्थिति का अंदाजा सबको होता तो फिर न तो ये चौंकाने वाली ख़बर थी और न ही इस ख़बर सबसे ज्यादा पढ़ी गई ख़बर में शामिल होती।
तथ्य यही है कि हिंदी हमारे देश की राष्ट्रभाषा नहीं है। बल्कि यह कहना ज्यादा उचित है कि भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। हिंदी केवल राजभाषा है। केवल सरकारी कामकाज की भाषा। राजभाषा का ओहदा हासिल करने के लिए भी हिंदी को कड़ा संघर्ष करना पड़ा। हिंदी को राष्ट्रभाषा का अपना दर्जा अंग्रेजी के साथ सह- भाषा के रूप में साझा करना पड़ा। संविधान बनने के समय भाषा संबंधी प्रावधान में राष्ट्रभाषा को लेकर कोई एक राय तो दूर, राजभाषा बनाने को लेकर भी बड़ा विवाद था। संविधान सभा के सामने संकट ये था कि किसी एक भारतीय भाषा पर एक राय नहीं थी। दूसरी तरफ मुश्किल ये थी कि अगर हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता तो इस बहुभाषी देश में प्रशासन के कामकाज के लिए अलग- अलग भाषाएं अलग तरह की कठिनाइयां पेश करती। ऐसी स्थिति में प्रशासन की कोई एक जुबान नहीं होती। काफी मशक्कत के बाद यह तय हुआ कि हिंदी राजभाषा होगी और लिपि, देवनागरी होगी। यहां भी हिंदी की राह में मुश्किलें खड़ी थी। राजभाषा को लेकर प्रावधान बनाते समय हिंदी के साथ- साथ अंग्रेजी को लेकर भी व्यवस्था की गई। अंग्रेजी को पंद्रह या उससे अधिक वर्षों तक सह भाषा के रूप में स्वीकार किये जाने का प्रावधान बनाया गया। पंद्रह वर्षों की ये अवधि 1964 में ख़त्म हो गई लेकिन हिंदी के साथ अंग्रेजी सह- भाषा के रूप में अब भी बनी हुई है। यानी, कहें तो राष्ट्रभाषा की होड़ में पिछड़ने वाली हिंदी की राजभाषा के रूप में भी स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। व्यावहारिक तौर पर राजकाज की भाषा हिंदी की बजाय अंग्रेजी ही है। राजभाषा के समय हिंदी के सामने जिस तरह से क्षेत्रीय भाषाओं ने चुनौती पेश की, आगे चलकर अंग्रेजी इस भूमिका में आ गया।
ऐसा नहीं है इन वर्षों में हिंदी में इतनी सामर्थ्य नहीं थी या फिर इतनी स्वीकार्यता नहीं बन पाई कि वह सह- भाषा के ओहदे से अंग्रेजी को ख़ारिज कर दिखाए। सच तो ये है कि बदले हुए वैश्विक परिदृश्य में अंग्रेजी की बड़ी चुनौतियों, हिंदी को लेकर राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी और विरोधी हालात के बावजूद हिंदी का फैलाव हुआ। हिंदी के विस्तार को लेकर कोई शायद ही कोई मुगालता किसी को हो। हिंदी का अपना बड़ा बाजार तैयार हो गया है। हिंदी को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा के रूप में देखा जा रहा है। चीनी और अंग्रेजी के मुकाबले हिंदी भी विश्व की भाषाओं के सामने खड़ी है। यहां तक कि हिंदी के लिए काम कर रहे लोग इसे संयुक्त राष्ट्र संघ में भी दूसरी भाषाओं की तरह हिंदी को जगह दिये जाने की मांग कर रहे हैं।
ऐसी स्थिति में यह सवाल एकबार फिर पुरजोर ढंग से उठाने की जरूरत है कि क्या भारत जैसे राष्ट्र की अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं होनी चाहिये ? क्योंकि कई ऐसे देश हैं, जो भारत के सामने किसी नज़ीर की तरह बार- बार सामने आते हैं, जिनके पास अपनी राष्ट्रभाषा है। संविधान ने हिंदी के साथ अंग्रेजी को सह- भाषा के रूप में बनाए रखने की व्यवस्था दी, जबतक कि इसकी जरूरत है। अब जबकि हिंदी ने अपनी ताक़त और अपनी जरूरतों को साबित कर दिया तो क्या वह समय नहीं आ गया है जब हिंदी को राजभाषा का ओहदा अंग्रेजी के साथ साझा करने की जरूरत नहीं रह गई है ?

5 comments:

Satyajeetprakash said...

http://www.rajbhasha.nic.in/khs-reorganisation2009.pdf
इस लिंक को पढ़ लीजिए पता चल जाएगा कि क्यों नहीं हारेगी हिंदी.
केंद्रीय हिंदी समिति में वे सब लोग हैं जिन्हें हिंदी बोलने, सोचने और समझने में शर्म आती है.
जो इंग्लैंड में जाकर कहते हैं(कोई और नहीं हमारे प्रधानमंत्री), कि अंग्रेजी हमारे देश की राजभाषा है. ये प्रधानमंत्री हिंदी समिति से अध्यक्ष हैं
गृहमंत्री जिन्हें हिंदी के दो शब्द भी नहीं आते हैं वो उपाध्यक्ष हैं,
क्यों नहीं हो हिंदी का सत्यानाश

संजीव said...

वाह भाई। आपने कमाल की जानकारी दी है। वाक़ई आपने जो लिंक देखने की सलाह दी, मेरे लिये हैरानी का सबब है। इसके बावजूद मेरा अपना ख़्याल है कि इससे कोई बहुत फर्क नहीं पड़ता कि भाषा विशेषज्ञ ही इस समिति में हों और समिति के उन अ- हिंदी सदस्यों पर उनके हिंदी विरोधी होने की तोहमत नहीं लगा सकते। जिस तरह स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए किसी डॉक्टर, रेल मंत्रालय के लिए किसी इंजीनियर, रक्षा मंत्रालय संभालने के लिए किसी सैन्य अधिकारी की जरूरत नहीं होती, ठीक उसी तरह हम ये नहीं कह रहे कि हिंदी समिति के लिए भाषा विशेषज्ञों की जरूरत नहीं है। क्योंकि यह किसी मंत्रालय को संभालने की बात नहीं है बल्कि हिंदी का भाग्य तय करने का एक सरकारी ढांचा है। लेकिन हिंदी समिति में अहिंदी भाषियों को शामिल करना मेरे ख़याल से एक हिंदी भाषी होने के नाते आपको या खुद मुझे आहत कर सकता है लेकिन लोकतांत्रिक ढांचे का शायद यही तक़ाजा भी है। -संजीव

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अंग्रेजी की तो बात छोड़िए!
हम हिन्दुस्तानियों की तो हिन्दी भी अच्छी नही है!

Anonymous said...

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RAMESH KUMAR VATAN said...

wah! Dear, Hindi had no own a word ( copy from Purwanchali, Bihari each a every word).
also Hindi had no own script. How can
say a tung a Languages. court is right Hindi a KHARI BOLI not a language.