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Wednesday, February 10, 2010

उत्तमा जी ! मैं आपसे बिल्कुल असहमत हूं

डॉ. उत्तमा के ब्लॉग कलाजगत (http://www.kalajagat.blogspot.com/) पर रुचिका मामले के मुख्य अभियुक्त राठौर पर हमले को लेकर लिखी गई पोस्ट पढ़ने के बाद ख़्याल आया कि उनके ब्लॉग पर जाकर टिप्पणी करूं। इस वज़ह से ख़्याल को ख़ारिज कर दिया कि ब्लॉग की टिप्पणियां अमूमन चंद बरदाई रचनावली सरीखी होती है। यानी, सहमतियों से लबरेज, इरशाद- इरशाद करने वाली मुद्रा में की गई राजदबारी किस्म की छोटी- छोटी टिप्पणियां। कुछेक पोस्ट में असहमितयां होती हैं तो वे अक्सर बेवज़ह की गई टिप्णियां होती हैं, जिसे दिल पर लेने की जरूरत नहीं। इसलिये ब्लॉग की इस परिपाटी को बनाए रखते हुए मैने अपने ब्लॉग पर टिप्पणी लिखना ज्यादा मुफ़ीद समझा। -संजीव
राठौर पर हमला करने वाले उत्सव...या जो कुछ भी उसका नाम है, उसपर डॉ. उत्तमा की पोस्ट से मेरी सख़्त असहमति है। उत्तमा ने अपनी पोस्ट के जरिये उत्सव के हमले को अलग- अलग नज़रिये से देखने की कोशिश की लेकिन यह बताने में विफल रही कि आख़िरकार वह कौन –सी मनोदशा थी, जिसमें उत्सव ने राठौर पर हमला किया। इसके लिए उन्होंने उत्सव के पिता के उस बयान का सहारा लिया जिसमें वे कह रहे हैं कि `पढ़ने- लिखने में होशियार उत्सव कुछ दिनों से न्याय- अन्याय की बात करने लगा था।‘ उन्होंने रुचिका प्रकरण को लेकर चंडीगढ़ (जहां राठौर की पेशी हुई) के माहौल में राठौर को लेकर फिजाओं में घुली नफ़रत का ज़िक्र करते हुए कहा है कि उत्सव को इन ख़बरों ने भी उकसाया होगा। मेरा सवाल है कि इस मामले को छोड़कर कोई भी दूसरी ऐसी घटना बता दे (फिल्मों को छोड़कर) जिसमें किसी खबर ने किसी आदमी में इतनी नफ़रत भर दी हो कि वह उसी तरह हमलावर हो जाए जिस तरह उत्सव ने राठौर पर किया। उसमें भी, तब जबकि हमलावर न तो पीड़ित को जानता हो और न ही आरोपी से उसका परिचय हो।
उत्तमा जी ने दूसरी वजह बताते हुए लिखा है कि `कलाकार ज्यादा संवेदनशील होते हैं और उत्सव भी एक कलाकार है।’ आगे उन्होंने एक संस्था की सर्वे रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया है कि कलाकार चूंकि ज्यादा संवेदनशील होते हैं इसलिए उनमें डिप्रेशन के मामले ज्यादा होते हैं।
उत्सव के हमले के कारणों को हजम भी कर जाएं या इसे जांच- पड़ताल के जिम्मे छोड़ दें, तो भी क्या इसे माना जा सकता है कि उत्सव का हमला रुचिका प्रकरण पर सभी भारतीयों की भावनाओं का प्रतीक है ? वे लिखती कि `उत्सव उन भावनाओं का प्रतीक है जो रुचिका प्रकरण को लेकर हर भारतीय के दिल में घुमड़ रहा है। उत्सव के साथ शायद कानून नहीं होगा लेकिन उसके साथ तमाम भारत के लोगों की भीड़ है।’ डॉ.उत्तमा ने आपके पास दो ही विकल्प छोड़े हैं- पहला, या तो आप इस सच्ची भारतीयता की जमात में ख़ुद को शामिल कर नायक –उत्सव- के परिवर्तनकामी कारनामे की पालकी ढोयें या फिर सच्चे भारतीयों की लिस्ट से आपका नाम ख़ारिज़ कर दिया जाएगा।
दरअसल, कमाल की भारतीयता रह- रहकर देखने को मिलती है। आपको याद होगा कि जिस तरह उत्सव के हमले को आक्रोश का विस्फोट बताया जा रहा है, कुछ इसी तरह संघ परिवार भी बाबरी ढांचे की शहादत को वर्षों से दबे जन आक्रोश का नतीजा बता रहा था। गुजरात दंगों को भी कुछ इसी अंदाज में स्वस्फूर्त बताने की कोशिश की गई थी। या फिर मुंबई आतंकी हमले के आरोपी कसाब को लेकर कई बार उसकी सुरक्षा में खर्च हो रही भारी- भरकम राशि का ब्यौरा देते हुए अफसोस किया जाता है कि इतना कुछ जरूरी नहीं था।
जाहिर है कि इस तरह का नज़रिया कुछ लोगों या एक समूह या हिस्से का हो सकता है लेकिन पूरे भारत का नहीं। ठीक उसी तरह उत्सव के हमले को कुछ लोग भले ही जायज ठहरा रहे हैं लेकिन यह भारत का प्रतिनिधि स्वर नहीं है। फ़र्ज़ करें कि भीड़ अगर इसी तरह इंसाफ़ करने लगे, उसके इंसाफ़ पर लोग तालियां बजाएं तो किस तरह का समाज तैयार होगा ? ...इसलिये उत्तमा जी, उत्सव के माता- पिता के साथ पूरी हमदर्दी रखते उत्सव के हमले की आप भी पुरजोर निंदा करें तो शायद बेहतर हो।

9 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

उत्सव के कृत्य को मूर्खता या अधिक से अधिक विक्षिप्तता कहा जा सकता है। अपराधी को सजा देने की जिम्मेदारी राज्य की है। लेकिन आज भारतीय राज्य इस काम में असफल हो रहा है और उस की दर बढ़ रही है। यदि कोई मार्ग है तो राज्य के विरुद्ध जनता का (राजनैतिक दलों का नहीं) आंदोलन है। उस के लिए जनजागरण के काम में जुटना सही मार्ग है।

Arvind Mishra said...

बढ़िया बात है ठाकुर सुहाती आपको नहीं सुहाती ....मगर पोस्ट के नीचे टिप्पणी आप्शन विमर्श /परिचर्चा के लिए ही होता है -वहां कई लोगों के विचार पहले से ही आ चुके हैं जो आपसे थोडा ही कम बौद्धिक हैं -एक इस नाचीज की भी टिप्पणी वहीं है ,बहरहाल दिनेश जी की बहुत संतुलित टिप्पणी यहाँ पर है !
आप गलत स्टैंड ले बैठे हैं मान्यवर !

HARI SHARMA said...

आपके इसी नजरिये के चलते भारत २०० साल अन्ग्रेजो का और सदियो तक बहरी आक्रमणकारी ताकतो का गुलाम रहा है. एक सही सोच का आदमी जो कुछ उत्सव ने किया उसकी खुलकर सराहना नहे करेगा लेकिन तकतवर लोग चाहे वो अधिकारी हो य राजनेता हो या अदालत हो उनके द्वारा किये जाने बाले खुले अन्याय करे तो ऐसी घटनाये गैरकानूनी भले ही हो लेकिन अस्वाभाविक नही है.

RAJNISH PARIHAR said...

आपने कहा ऐसी भी क्या खबर जो किसी में इतनी नफरत भर दे,तो जनाब आपको याद होगा कुछ समय पहले राहुल नाम का नौजवान ऐसी ही ख़बरों से तंग आकर राज ठाकरे को मारने मुम्बई आ पहुंचा था!वो न तो विक्षिप्त था और ना ही अनपढ़!आज जिस तरह मिडिया एक ही खबर पर पूरे दिन हल्ला मचाता है उससे कोई भी प्रभावित हो सकता है!रुचिका मामला इतने सालो से चल रहा था,पर हव्वा मचने के बाद राठोर को हर कोई नफरत करने लगा..ऐसे में उस पर हमला होना साज़िश तो कतई नहीं हो सकती!सही गलत जो भी हो..ज्यादा एक्सपोज़ करने से ही ये हुआ..

chhoti said...

आप जैसे लोगों की वजह से ही हम गुलामी सहते हैं और बोल भी नहीं पाते। उत्सव ने जो किया, वह ठीक किया या गलत लेकिन एक दिन तो यह बड़े पैमाने पर होगा। युवाओं में प्रतिक्रिया बढ़ रही है, हताशा के साथ आक्रोश भी है। यह आक्रोश बढ़ा तो आप जैसे लोग भी नहीं बचेंगे।

GARGI said...

आपसे शत-प्रतिशत असहमति है मेरी संजीव जी और उत्सव का समर्थन।

Anonymous said...

aap ki umr dhal gayi hai, sach bhi boodhi hai varna aap ek yuva mun ki baat samajhte. aakrosh sach mein jyada hai system ke khilaaf sanjeev ji.

dhurvirodhi said...

अपने पिछले लेखों में आप नक्सलवाद को "सशस्त्र क्रांति के जरिये भूमिहीनों और किसानों को उसका हक़ दिलाने के बड़े उद्देश्यों के साथ शुरू हुआ आंदोलन" बताते हैं. बिनायक सेन द्वारा नक्सली हिंसा को "माओवादियों और सरकार के बीच जारी सैन्य संघर्ष" या राज्य द्वारा संगठनात्मक हिंसा पर सवाल उठाने की जरूरत" कहना या आपको एक अनुभव से गुजार देता है वहीं "राठौर पर हमला करने वाले उत्सव...या जो कुछ भी उसका नाम है" द्वारा न्याय एवं व्यवस्था के संगठित बेईमान गिरोहों द्वारा की गई हत्या एवं नाइंसाफी के खिलाफ छोटे से चाकू का प्रतीकात्मक वार आपको निंदा करने लायक लगता है. ये कौन सा पैमाना है भाई?

किसी उत्सव शर्मा को क्या पड़ी थी कि अन्याय के विरुद्द सोचे, हम सभी तो गांधी जी के बन्दर हैं, बुराई देखकर अपनी आंखें मीच लेते हैं, कान कसकर बन्द कर लेते हैं, अपनी जुबान तो कभी भी किसी बुराई के खिलाफ खोलते ही नहीं. अब चाहे राठोरों की जमात जैसे चाहे कानून की बंदरिया को नचाये, चाहे राजनेताओं की जीहजूरी करके प्रमोशन पर प्रमोशन पाता रहे. क्या आप हम अंधे गूंगे बहरे बंदरो के समाज को आदर्श समाज मानेंगे?

जब हक नहीं मिलता तो गिरेबान पकड़ कर झटका देना कतई गलत नहीं है. न्याय है क्या? यदि न्याय के लिये जिम्मेदार लोग अपने कर्तव्य पूरा न करें तो क्या लोग सिर्फ सहते रहें? जब इंसाफ करने वाले इंसाफ न करें तो फिर किस तरह का समाज तैयार होगा?

राठौर के चेहरे पर ये छोटे से चाकू के चार छोटे से वार गैरजिम्मेदार न्याय एवं व्यवस्था के खिलाफ पत्थर उछालने के बराबर हैं और गैरजिम्मेदार न्याय एवं व्यवस्था इस आक्रोश को जल्दी महसूस करले तो इन्ही गैरजिम्मेदारों का भला होगा.

उत्सव शर्मा ने जो किया है बहुमत से यही भारत का प्रतिनिधि स्वर है

रोहित said...

main aap se sahmat nhi sanjeev ji...
mere anusar samaj me galat logo ke khilaaf pratikriyatmak virodh nindaniya nhi.
aap meri visesh tippani mere blog par bhi 'UTSAV KE BEHANE' shirshak se padh sakte hain.
blog url-
http://shabdgunjan.blogspot.com