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Wednesday, February 17, 2010

सांप- नेताः किसको किससे ख़तरा



बीजेपी का इंदौर में राष्ट्रीय अधिवेशन हो रहा है। अधिवेशन स्थल पर नाना प्रकार के सांप पाए जाने की ख़बर से नेता परेशान हैं। नेताओं पर सांपों का ख़तरा है। नेता बेचारे वातानुकूलित तंबुओं में सांपों के साए में किसी तरह रात बिता रहे हैं। लेकिन सांपों से नेता क्यों डरते हैं ? सांप तो पब्लिक को डराते हैं। पब्लिक को ही सांप काटते हैं। सांपों से जनता डरती और मरती है। नेता भला क्यों डरने लगे? आप याद करके बताइए कि कभी किसी सांप ने छोटे या बड़े किसी भी नेता को काटा है ? सांप कभी नेताओं को नहीं डसते। वे तो ख़ुद नेताओं की नस्ल से परहेज करते हैं। तय तो ये होना है कि कौन किसको काटता है। किसको किससे ख़तरा है। बेचारे सांप तो राह में किसी नेता की गंध पाते ही राह बदल देते हैं। नेताओं के सामने बड़े-से-बड़ा विषधर सांप भी विषहीन, दंतहीन गरल बन जाते हैं। इसलिये सांप अपनी नस्ल में किसी को नेता नहीं बनाते। लेकिन नेता डरे हुए हैं। बड़ी संख्या में सपेरों को लगाया गया है। जो रात भर सुरक्षा जांच अधिकारी की तरह डंडे से बने यंत्र को घुमाते हुए सांप तलाश रहे हैं। नेताओं और सांपों के बीच में सपेरे और उनका यही यंत्र है।
बीजेपी के अलावा भी आजकल सियासत में सांपों की बड़ी चर्चा है। अमर सिंह जी के लिए उनके नेताजी अब हरे सांप की तरह हैं। घास में बैठ जाएं तो घास जैसा, फसल में छुप जाएं तो फसल जैसा। आजम भाई के साथ हों तो उन जैसा, हिंदू शिरोमणि कल्याण जी के बगलगीर हों तो उन जैसा। पकड़ पाना जाना मुश्किल है। ये अलग बात है कि इसी हरे सांप को गले में डालकर ठाकुर साहब घूमते रहे।
मौजूदा दौर को आप राजनीति का सांप काल कह सकते हैं। अमर सिंह के लिए नेताजी और पासवान जी के लिए सुशासन बाबू के साथ लालूजी भी कुछ वैसे ही हैं। पासवान जी कहते हैं कि सुशासन बाबू काटने वाले और लालू जी `नहीं' काटने वाले सांप हैं। पासवान जी के लिए सांप दोनों हैं। इसलिये पासवान जी ज्यादा सुरक्षित लालूजी के साथ हैं।
मुझे याद आ रहा है कि कांशीराम जी ने कांग्रेस और बीजेपी को सांपनाथ और नागनाथ का नाम दिया था। उनके लिए कांग्रेस और बीजेपी सांप थे। इसलिये राजनीति के इस सांप काल में सांपों पर नारे गढ़े जा रहे हैं। सांपों का नाम लेकर सियासी शिगूफ़े छोड़े जा रहे हैं। बेचारे सांप फिर भी कुछ नहीं कहते। फुंफकारना तो दूर, नेताओं के सामने उनकी बोलती बंद हो जाती है। क्योंकि सांपों पर नेताओं का ख़तरा है।

6 comments:

paninazar said...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

डस ले तो साँप,
नही तो केंचुआ!

अमृत उपाध्याय said...

इंदौर के सांप जो आजकल बीजेपी नेताओं से खौफ खा रहे हैं अपने बाप दादा की नस्ल के हैं...गेहुअन 1947 में भी गेहुअन था और डोर आज भी पानी में सरसराता है...इन सांपों ने सुन रखा होगा कि जनाब एक धामिन नेता जी केंचुल में से निकलते हैं तो आइने में खुद को पानी वाला डोंर देखते हैं और कैमरे के आगे अजगर...और वैसे भी असल सांप तो शिवजी के गले की शोभा बनते हैं लेकिन इंदौर में जुटे सांपों की गिरफ्त में तो राम का गला है...कभी दबाते हैं कभी सहलाते हैं..

mediapachisi said...

Saanp aur neta mein farq mahaj itna hai, saanp bilon mein aur neta aasteen mein palte hain. Jahan tak rahi baat indor ki to netaon ke adhivation ki jagah ka selection accha hai, saanp ki basti mein saanp ko darr kaisa.

राकेश पाठक said...

जनता के लिए...

जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग
चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग

दर्पण साह 'दर्शन' said...

The newly-hatched snake and the newly-born rabbit came face to face.
Both were so young their eyes had not yet opened. Neither knew what
the other was, so they decided to feel each other and make a guess.

First the snake slithered over the rabbit and then concluded: "You
have warm fur, whiskers and long ears. You must be a bunny."

Then the rabbit ran its paws over the snake. "You are slippery and
have no balls. You must be a politician."