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Friday, February 26, 2010

इस मक़बूलियत पर भारत नहीं है फ़िदा

अंग्रेजी अख़बार `द हिंदू' के पहले पेज पर जब पढ़ा कि कतर के शाही परिवार ने मक़बूल फिदा हुसैन को वहां की नागरिकता देने की पेशकश की है, तो लगा कि मकबूल इस पेशकश को नहीं मानेंगे। लेकिन मैं या फिर इस तरह की उम्मीद करने वाले तमाम हिंदुस्तानियों को मक़बूल ने निराश किया। उनके बेटे ने शुक्रवार को साफ कर दिया कि मकबूल अब हिंदुस्तानी नहीं रह गए हैं। मक़बूल ने कतर की नागरिकता हासिल कर ली है। यानी, हिंदुस्तान के हुसैन पर कतर फिदा हो गया। या फिर हिंदुस्तान और कतर ने अपने- अपने हिस्से के मकबूल फिदा हुसैन को बांट लिया। कौन कहां पैदा हो, इसपर जिस तरह किसी का वश नहीं है उसी तरह एमएफ हुसैन भी उस हिंदुस्तान में पैदा हुए, जिसपर अगर उनका वश चलता तो यहां पैदा होने से इनकार कर देते। लेकिन कतर की नागरिकता की पेशकश को स्वीकार कर लेना ख़ुद उनकी इच्छा थी। ख़ुद उनके बेटे ने ओवैश ने स्वीकार किया कि कतर के शाही परिवार की पेशकश को स्वीकारने का फ़ैसला हुसैन साहब की अपनी इच्छा है।
जिस तरह राजाओं के जमाने में एक राज से दूसरे राज को संदेश देने ख़लीता लेकर घोड़े पर सवार संदेशवाहक जाया करते थे। कुछ उसी अंदाज में मक़बूल फिदा हुसैन की छाप वाला घोड़ा, इस संदेश को लेकर आया। फिदा ने अपनी कूचियों से एक घोड़ा बनाया और उसपर लिखा- आई, द इंडियन ओरिजिन पेंटर, एमएफ हुसैन एट 95, हैव बीन ऑनर्ड बाय कतर नेशनलिटी। अख़बार को ख़ुद हुसैन साहब की तरफ से ये संदेश दिया गया था। इस ख़बर के साथ उन्होंने यह भी सफाई दी कि कतर के शाही परिवार की तरफ से उन्हें यह पेशकश दी गई है। इसके लिए उन्होंने अपनी तरफ से कोई आवेदन नहीं किया था।
जाहिर है कि हुसैन के इस संदेश के बाद भारत सरकार के लिए कुछ असहज स्थिति पैदा हो गई। सत्ता पक्ष ने भरोसा दिलाया कि हुसैन साहब, देश के सम्मानित नागरिक हैं और वे अगर वतन वापस लौटते हैं तो उन्हें पूरी सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी। जबकि विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार, हुसैन को सुरक्षा देने में विफल रही इसलिये ये नौबत आई। इसी बीच जब हुसैन ने कतर की नागरिकता स्वीकार कर ली तो उनके वापस लौटने का सवाल ही ख़त्म हो गया। अब इसे भारत के मान- अपमान से जोड़कर देखा जा रहा है।
हिंदूवादी कट्टरपंथियों का इल्जाम है कि हुसैन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में गुनाह को अंजाम दे रहे थे। हुसैन ने 1970 में हिंदु धर्म की देवियों को लेकर पेंटिंग बनाई थी लेकिन उस वक़्त इसपर कोई विरोध नहीं हुआ। `विचार मिमांसा' नाम की पत्रिका ने जब 1996 में हुसैन की इसी पेंटिंग पर अपनी कवर स्टोरी बनाकर उसे प्रकाशित किया तो जैसे विरोध का सैलाब उमड़ पड़ा। हिंदु धार्मिक भावनाओं को हुसैन की इस पेंटिंग ने भड़का दिया और उनके ख़िलाफ़ देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए। धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने को लेकर हुसैन के ख़िलाफ़ कानूनी मुकदमों का सिलसिला -सा चल निकला। दिलचस्प बात ये है कि हुसैन की जिस पेंटिंग पर विवाद हुआ वह 1970 में बनाई गई थी। ठीक उसके एक साल पहले 1969 में हुसैन ने समाजवादी नेता डॉ.राममनोहर लोहिया के कहने पर रामायण पर तक़रीबन 160 पेंटिंग्स बनाई थी। हुसैन ने अपनी आत्मकथा में इसका ज़िक्र भी किया है। हुसैन से जुड़े किस्सों की फेहरिस्त में रामायण पर बनाई गई उनकी बेमिसाल पेंटिंग्स का कभी ज़िक्र हालांकि नहीं आया।
देश से हुसैन की इस तरह की विदाई भारत के सामाजिक ताने- बाने पर एक सवाल है। देश के धर्मनिरपेक्ष चेहरे पर हुसैन किसी बदनुमा घाव की तरह उभरे हैं। जहां कट्टरपंथी ताकतों के सामने सरकार और समाज, दोनों घुटने टेकने के लिए मजबूर हैं। हाल के दिनों में इस तरह के उदाहरण बार- बार सामने आते हैं। अपनी सफाई में हम यह कह नहीं बच सकते है कि हुसैन स्व निर्वासित जीवन जी रहे थे। बाक़ायदा देश से बेदखल किये जाने का आदेश देना या स्वनिर्वासन के फैसले जैसे हालात पैदा कर देना, बहुत अंतर नहीं है। देश में कट्टरपंथियों की आगे के आगे हुसैन ने स्व निर्वासन का फैसला किया था। सरकार उन बजरंगियों से हुसैन को बचा पाने में तक़रीबन विफल रही, जो बार- बार हुसैन को निशाना बना रहे थे। पिछले चार या उससे अधिक वर्षों से हुसैन, दुनिया के अलग- अलग मुल्कों में स्व निर्वासन का जीवन जी रहे थे।
इस पूरे प्रकरण में दूसरे दलों की तरह वामदलों के नेताओं का बयान भी किसी चुटकुले की तरह सामने आया। वामदल के एक नेता यह कहते सुने गए कि भारत के लिए यह बड़ा झटका है कि कट्टरपंथी ताकतों की वजह हुसैन जैसे कलाकार को अपना देश छोड़ना पड़ता है। शायद उनके जेहन से तस्लीमा नसरीन का चेहरा उतर गया हो। कट्टरपंथियों से जान बचाने के लिए तस्लीमा पश्चिम बंगाल में पनाह देने की गुहार लगाती रहीं, लेकिन बंगाल की वाममोर्चे की सरकार इस मसले पर जैसे बजरंगियों के मार्क्सवादी संस्करण में बदल गई। तस्लीमा को रातोंरात दूसरे राज्यों में भेज दिया गया। आख़िरकार `जनता की भारी मांग पर' तमाम सरकारों ने तस्लीमा को पनाह देने से इनकार कर दिया। अब जबकि तस्लीमा, हुसैन जैसे तमाम नाम भारत की फेहरिस्त से ख़ारिज कर दिये गए हैं तो इस `रामराज' में निश्चय ही बजरंगियों के लिए ख़ुश होने का मौका है।

3 comments:

अनुनाद सिंह said...

हुसैन का यह आचरन अपने-आप में उच्च कोटि की घटिया साम्प्रदायिकता का उदाहरण है। उसने सिद्ध कर दिया कि वह कम्युनिस्ट नहीं, मुसलमान था।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सिरफिरों को कोई इलाज नही है!
होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

दर्पण साह 'दर्शन' said...

पूरी clipping भर, घोड़े का और घोड़े में चित्र मुझे समझ में नहीं आया...


वैसे हस्ताक्षर मस्त थे...