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Sunday, February 28, 2010

मित्रों, मदद करें! मेरी सांस एक घंटे से नहीं चल रही

दोस्तों, सबसे पहले आप सभी को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं। होली की ख़बर बनाते समय कल मथुरा से आए विजुअल्स देख रहा था। मथुरा के यमुना घाट पर चतुर्वेदी समाज के लोग अभी भी होली के दिन भांग घोंटते हैं। उनके बीच मान्यता है कि श्रीकृष्ण और बलराम ने यमुना घाट पर भांग घोंटने के बाद ही कंस का वध किया था। इसलिये चौबे समाज के लोग आज भी भांग छानते हैं और राधे- राधे का जयघोष करते हैं। बच्चे, बूढ़े और नौजवान...सब इसमें शामिल होते हैं। धार्मिक मान्यता चाहे जो भी हो, मैं इस वक़्त आपको सिर्फ भांग और उसके नशे के बारे में बताना चाहूंगा।- संजीव
भांग का नशा, किसी भी दूसरे नशे से बिल्कुल जुदा है। कहते हैं कि शराब का नशा आक्रमक बनाता है तो भांग का नशा डरपोक। भांग के नशे में एक तरंग -सी होती है जो लंबे समय तक रहती है। मुझे याद है जब मुंगेर में पढ़ाई करते समय मैं अकेले रहा करता था। मेरे घर के सामने मेरे दूर के एक मामा भी रहते थे जो उम्र में मुझसे तीन- चार साल ही बड़े थे इसलिये उनसे दोस्ताना संबंध थे। हम सब उन्हें मनोज मामा कहते थे और रोजाना उनकी साइकिल पर सवार होकर हम सब्जी मंडी जाते। मेरा खाना उनके यहां ही बनता था। उनके साथ सुबह -शाम का साथ था। मनोज मामा बहुत कम उम्र में ही टिकिया नुमा गोली -मोदक- खाने के आदी थे। बिहार में पान की दुकानों पर मोदक की टिकिया भी मिल जाया करती है। सब्जी ख़रीदने के बाद रोजाना मनोज मामा, एक ख़ास पान की दुकान पर रुकते। पानवाला उन्हें मोदक की टिकिया देता, जिसे वे मुंह में डालते और बगल में रखी स्टील की बाल्टी में रखा पानी लोटे में लेकर गटक जाया करते थे। उसके बाद हम दोनों पान खाकर वापस घर लौट आते। घर लौटते- लौटते मनोज मामा पर भांग का सुरूर चढ़ने लगता। लेकिन कभी घर में भी उन्होंने जाहिर नहीं होने दिया। तक़रीबन यही दिनचर्या थी हमारी।
होली की एक शाम को हम बाजार गए, बेमक़सद। उस दिन न तो सब्जी ख़रीदनी थी और न ही सब्जी मंडी खुली हुई थी। फिर भी मनोज मामा, अपनी खुराक के मकसद से भले निकले हों, मैं वैसे ही उनके साथ साइकिल पर बैठ गया। पान की दुकान खुली हुई थी। उस दिन मैं भी मोदक खाने की ज़िद पर अड़ गया। उन्होंने लाख समझाया मगर मैं माना नहीं। एक छोटा -सा टुकड़ा खाने के बाद पाचक जैसा स्वाद मिला। मैने कहा, थोड़ी और दे दो। तीन -चार दफे मांगने के बाद उन्होंने एक मोदक की टिकिया मेरे लिये भी ख़रीद दी। मैं पूरी टिकिया खा गया।
वापस घर आया... तबतक मैं होशमंद बना रहा और मनोज मामा से बहादुरी के अंदाज में बातें करता रहा। इसी बीच ज्योति मौसी हम दोनों के लिए एक कटोरी में रबड़ी लेकर आई और पानी से भरा गिलास रखकर चली गईं। हम दोनों बातचीत करते- करते पूरी रबड़ी खा ली और गिलास लेकर मैं पानी गटकने लगा...पानी ख़तम लेकर मेरे कंठ की आवाज आ रही थी गट- गट। मनोज मामा ने कहा कि शायद तुम्हें चढ़ गई है।...रबड़ी ने सारा सत्यानाश कर दिया था।
खाना खाते समय मनोज मामा सतर्क थे... मैं और भी पूड़ियां मांग रहा था, मनोज मामा मना करते- कराते मुझे मेरे यहां लेकर आ गए। मुझे सोने का मशविरा देकर वापस जाने लगे तो मैने उन्हें रोकते हुए कहा कि, मामा एक बात बताऊं... मैं सुबह तक शायद नहीं रहूं। आप मुझे एक कागज और पेन दो, जिसपर मैं लिखकर दे दूंगा कि मैने अपनी मर्जी से भांग खा लिया और मेरी मौत का जिम्मेदार सिर्फ मैं हूं... न कि मनोज मामा।
वे हंसने लगे। कहा कि कैसे समझे कि सुबह तक नहीं रहोगे?... मैने कहा कि ...असल में पिछले आधे घंटे से मेरी सांस ही नहीं चल रही है। उनकी हथेली अपनी नाक की तरफ खींचकर जोर-जोर से सांस बाहर फेंकने की कोशिश की...। फिर कहा कि देखा, सांस नहीं चल रही है। उन्होंने लाख समझाया कि हवा बराबर आ रही है, लेकिन मैं समझने को राज़ी नहीं। उन्होंने दलील देने के अंदाज में कहा कि तुम साइंस के स्टूडेंट हो लेकिन कह रहे हो कि आधे घंटे से सांस नहीं चल रही तो ज़िंदा कैसे हो भाई?... मैने तुरंत जवाब दिया कि भले साइंस का स्टूडेंट हूं लेकिन साइंस पर मेरा कतई विश्वास नहीं... अपने साथ होने वाली होनी- अनहोनी पर ही मेरा ज्यादा विश्वास है।
मेरा ध्यान बंटाने की मंशा से उन्होंने कहा कि कौन -सी हीरोईन तुम्हें पसंद है?... मैने कहा कि कई पसंद हैं। उन्होंने कहा कि किसी एक का नाम बताओ। मैं बेसाख्ता बोल कहा, डिंपल कपाड़िया। उन्होंने कहा कि डिंपल का क्या अच्छा लगता है?... मैने कहा, आप सीरियसली मेरी बात को नहीं ले रहे हैं... महाराज, मेरी सांस अब तो एक घंटे से नहीं चल रही है।
मित्रों, मनोज मामा तो जैसे- तैसे मुझसे पीछा छुड़ाकर ढाई -तीन बजे रात में चले गए लेकिन मुझे यह समझा पाने में विफल रहे कि कई घंटे तक सांस न चले तो भी आदमी कैसे ज़िंदा रह सकता है। मैं अब भी इस बात पर कायम हूं कि साइंस, चाहे कुछ भी इजाद कर ले लेकिन सांस नहीं चलने के बावजूद आदमी को ज़िंदा रखने की एक ही सूरत है- उसपर मेरी तरह भांग का सुरूर चढ़ जाए।

4 comments:

Udan Tashtari said...

सटीक!


ये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें
प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें.
पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें,
खुशी की हो बौछार,चलो हम होली खेलें.


आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.

-समीर लाल ’समीर’

महेन्द्र मिश्र said...

भांग का सुरूर उतारने का सबसे अच्छा तरीका यह की दो चार गोले और गटके जाए ...हा हा हा
होली पर्व पर शुभकामनाये और बधाई .

Vivek Rastogi said...

बिल्कुल सही

होली की शुभकामनाएँ ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

भगवान आपका भला करें!
होली मुबारक.