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Thursday, March 11, 2010

बंदूक की नई फ़सल

टीवी पत्रकार अमृत उपाध्याय की ये कविता उनके ब्लॉग - कशमकश- से साभार ली गई हैः संजीव

घर के पिछुआड़े,
बोई थी कुछ बन्दूकें
कुछ दाने और कारतूस,
इस बार घर गया तो खोजा, बन्दूक की फसल बर्बाद हो गई शायद,
पता नहीं क्यों,
नहीं ऊगे बंदूक
और ना दाने कारतूस बन पाए
क्यों न रोता,
फफक कर रोया,
अपनी जहरीली हंसी को भूल,
वही जिसने झुलसा दिया शायद
बंदूक की फसल...

Tuesday, March 9, 2010

...मुसीबतों के सात दिन

मुआफ करें। पिछले दिनों मैं एक संस्मरणनुमा –मौत- के नाम से लिखना शुरू किया था। तीन किस्तें लिखने के बाद कुछ ख़ास वजह से उसे जारी नहीं रख पाया। आपने पुराना पढ़ा या नहीं, लेकिन इन सबको संक्षेप में लिखते हुए एक ही किस्त में पूरा कर रहा हूंः संजीव

नाम चाहे कुछ भी रख लें। उम्र, यही कोई 58 साल (जैसा कि अस्पताल में दाखिल कराते समय लिखाया गया था)। बड़ी बेटी, उड़ीसा में बीटेक फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रही है। छोटी, आठवीं क्लास की स्टूडेंट है। पत्नी घरेलू किस्म की महिला हैं, बाहर निकलने पर बार- बार अपना पल्लू सिर पर डालने की उनकी वर्षों पुरानी आदत है। वे ख़ुद बिहार के दलसिंहसराय में उद्यान विभाग के सामान्य किस्म के मुलाजिम थे।
काम पर जाते समय एकदिन वे अपनी पुरानी साइकिल से गिर पड़े। स्थानीय डॉक्टर को दिखाया गया। एक्सरे में पता चला कि कूल्हे की हड्डी टूट गई है। मुजफ्फरपुर के एक `बड़े' अस्पताल में ऑपरेशन हुआ लेकिन सात दिन अस्पताल में रहने के बाद मामला और बिगड़ गया तो उन्हें पटना रेफर कर दिया गया। हालांकि तबतक डेढ़ लाख रुपये से ज्यादा ख़र्च हो चुके थे।
पटना के पीएमसीएच में उस वक़्त डॉक्टरों की हड़ताल थी इसलिये उन्हें नालंदा मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिला। यहां तक़रीबन आठ दिन रहने के बाद डॉक्टरों ने बताया कि मुजफ्फरपुर में लगातार पेन किलर दिये जाने की वजह से उनकी किडनी पर असर पड़ा है इसलिये उनका बेहतर इलाज चंडीगढ़ पीजीआई में हो सकता है। यहां भी लगभग एक लाख रुपये ख़र्च हो चुके थे और उनकी पत्नी ने गहने गिरवी रखकर आगे के इलाज के लिए शायद डेढ़ लाख रुपये का इंतज़ाम किया।
मरीज़ मेरी ससुराल के दूर के रिश्तेदार थे। मेरे कुछ पत्रकार साथी चंडीगढ़ में हैं, इसलिये मैने भी हामी भर दी। उन्हें राजधानी एक्सप्रेस से दिल्ली लाया गया, जहां मैं स्ट्रेचर की व्यवस्था कर प्लेटफॉर्म पर था। एम्बुलेंस में उन्हें लेकर निकलते समय पार्किंग वाले ने सामान्य वाहनों से ज्यादा लिया। यानी, पंद्रह की जगह पैंतीस रुपये।
चंडीगढ़ जाते समय एम्बुलेंस में उनकी तबियत कई बार बिगड़ी। उनकी पत्नी लगातार अपने पति का चेहरा देखकर ललाट को बार- बार सहला रही थीं। लगभग छह घंटे बाद पीजीआई पहुंचे तो उन पत्रकारों को फोन किया, जिनसे मैं पहले ही इसके लिए बात कर चुका था। उन सभी ने अपनी व्यस्तता का हवाला देते हुए अपने अख़बार के मेडिकल रिपोर्टर को भेजने की बात कही।
जबतक रिपोर्टर आशीष आता, हम फ़कत एक स्ट्रेचर के लिये जूझते रहे। एक स्ट्रेचर पर मरीज था और उसे एम्बुलेंस में लादा जाना था, मैं इंतज़ार कर रहा था कि स्ट्रेचर खाली हो तो उसे लें। लेकिन वहां खड़े मेरे एक रिश्तेदार ने इशारा किया कि उस स्ट्रेचर को नहीं लेना है क्योंकि उसपर लाश पड़ी है।...ख़ैर, लगभग एक घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद एक स्ट्रेचर मिला। हम उन्हें एम्बुलेंस से उतारकर अस्पताल में दाखिल हुए। उनके साथ दो तीमारदारों से ज्यादा अंदर नहीं जाने दिया गया।
रिपोर्टर आशीष आया तो उसने अस्पताल के पीआरओ से मेरा परिचय कराते हुए कहा कि ये आपकी तमाम समस्याओं का हल कर देंगे। ये अलग बात है कि पीआरओ ने मेरी तरफ नज़र उठाने की जहमत नहीं उठाई। हाथ मिलाने के लिए बढ़ा मेरा हाथ बड़ी देर तक हवा में रहने के बाद दोबारा जेब में आ गया।
ख़ैर उन्हें भर्ती तो कर लिया गया लेकिन और मरीजों की तरह ही मेरे मरीज़ को बेड नहीं मिल पाया। एक बड़े हॉल में साठ से ज्यादा गंभीर किस्म के मरीज़ स्ट्रेचर पर ही थे। तीमारदारों के बैठने की कोई व्यवस्था नहीं थी। मेरे मरीज़ की पत्नी अपने साथ ले गई एक बैग पर जागती आंखों से सात दिन काट दिये। मैं और साथ गए दो और लोग अस्पताल के गलियारे में फर्श पर चादर बिछाकर सोए, जिन्हें सुबह चार बजे सफाईकर्मी पानी की बौछार के साथ जगाते। कोई नर्स नहीं थी। मरीजों की टट्टी से लेकर तमाम दूसरी चीजें ख़ुद ही करनी पड़ी। तीसरे दिन मैं वापस दिल्ली आ गया।
जिस फोन का इंतज़ार था, सातवें दिन आ गया। उनका निधन हो गया। मौत के वक़्त उनकी पत्नी के सिवा कोई नहीं था। मैं और उनके कुछ दूसरे रिश्तेदार डेड बॉडी के साथ दिल्ली होकर बिहार के बेगूसराय के लिए एक गाड़ी से रवाना हुए। उनकी पत्नी पूरे रास्ते टुकुर- टुकुर अपने पति का चेहरा देखती रहीं। रह- रहकर संताप के स्वर ख़ामोशी को तोड़ जाती थी। रास्ते में कहीं खाने- पीने का सवाल नहीं था। उनकी पत्नी से पूछने की हिम्मत नहीं हुई। सिमरिया घाट में उनका अंतिम संस्कार हो गया। सब अपने -अपने जगह पर वापस लौट गए। लेकिन एक सवाल अब भी मुझे कचोटता है कि क्या मैं उनके इलाज की और बेहतर व्यवस्था नहीं कर सकता था? परिवार में सबलोग इसे `होनी' के कांधे पर टांगकर भूलने की कोशिश में हैं।

Thursday, March 4, 2010

...आपके लिये


टीवी पत्रकार राकेश पाठक ने आपके लिए दो कविताएं लिखी हैं। जिसे उनके ब्लॉग -इस मोड़ पर- से लिया गया हैः संजीव

1.
चिंगारियां पानी से नहीं बुझतीं
न कभी थकती हैं...
चिंगारियां मन में दबी हों...
तो मन भी नहीं थकता
चिंगारियां गुंजाइश रखती हैं

हर दौर में खुद के आजमाइश की
चिंगारियां जंगल की आग बुझा सकती हैं...
और सांस ले लें तो पूरा शहर जला सकती हैं...
तो चिंगारी को सहेजेंगे क्या खुद में चिंगारी बोएंगे क्या...
शर्त है ज़मीन उपजाऊ होनी चाहिए...
आग के भड़कने की भी गुंजाइश होनी चाहिए...
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2
अगर लगता है कि...
नई शुरूआत के लिए...
ज़रूरी है आग लगाना
तो जला दो न सब॥
अगर लगता है कि तंत्र खंडहर बन गया है...
तो, ढहा दो न सब...