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Sunday, May 16, 2010

...टीवी की ख़बरों ने मुझे बीमार बनाया

आजकल मैं दहशत में हूं। मैं पिछले कई दिनों से पूरे मन के साथ भोजन नहीं कर पा रहा हूं। घी मुझे बेहद पसं थी...ख़ासतौर पर घी में बने परांठे भला किसे पसंद नहीं? लेकिन अब घी सामने रखते ही उबकाई -सी आने लगती है। आईसक्रीम इतना पसंद था कि सप्ताह में तीन- चार दिन जरूर खा लेता था। जूस तो दिन में जितनी बार मौका लगे या फिर जेब इजाजत दे, उतनी बार पीने में भी परहेज नहीं था। मावे की बनी मिठाइयां तो दो- तीन साल पहले ही खाना छोड़ दिया। जबकि मिठाइयां मैं किसी भी वक़्त खा सकता था। अब तो चीनी खाने से भी डर लगने लगा है। दूध का गिलास मुंह के पास ले जाते ही अजीब -सी गंध नाक में पहुंचती है।
फलों की बात हो तो सेव का स्वाद जी से उतर गया है। तक़रीबन हरेक सब्जी मैं पसंद से खाता था। जब भी मंडी जाने का मौका लगा, ढेर सारी सब्जियां लेकर आता था। जरूरत नहीं होने के बावजूद हरी सब्जियों को देखकर दिल जैसे मचलने लगता था। लेकिन अब तो अपनी पसंद की सब्जियां भी छूने की इच्छा नहीं होती। वह चाहे लौकी हो या बैंगन। चूल्हे पर भगोने से सब्जियों के साथ भुनते मसालों की खुशबू उठती थी तो बार- बार किचन की तरफ जाने को जी करता था। लेकिन मसालों की यह गंध, मुझे विश्वसनीय नहीं लगती।
दोस्तों, पिछले कुछ समय लगातार ख़बरों को देखने का यह नतीजा है। ख़बरों ने मुझे इतना बाख़बर कर दिया कि खाने-पीने की सामग्रियों की गुणवत्ता को लेकर मेरा भरोसा ही उठ गया। एक न्यूज़ चैनल अगर चर्बी वाली घी की ख़बर दिखाता है तो दूसरा नकली मावे और नाले के पानी में बनने वाली आईसक्रीम की ख़बर दिखा रहा है। एक दिखाता है कि मुर्दे के लिए इस्तेमाल होने वाली क्रीम से सेव चमकाए जा रहे हैं तो दूसरा दिखाता है कि लाश को ले जाये जाने के लिए इस्तेमाल होने वाली बर्फ, जूस में डाली जा रही है। जो चैनल ख़ामोश हैं वह दिखाने लगते हैं कि ऐसी चीनी तैयार की जा रही है जो अंतरियों को चीरकर रख दे। या फिर लौकी -बैंगन में दवा के इंजेक्शन घुसेड़े जा रहे हैं। यह देखकर जी मितलाने लगा कि मिलावट खोर मसालों में गधे की लीद डाल रहे हैं। नकली मावे और उससे बनी मिठाइयां या फिर सिंथेटिक दूध का मामला तो जरा पुराना हो चुका है। इसलिये उनके इस्तेमाल के ख़तरे उठाने के लिए अगर आप तैयार हैं तो बेशक़ इस्तेमाल कर सकते हैं।
मुझे लगता है कि मिलावट का यह धंधा नया नहीं है। पहले सोने में मिलावट होती थी और अब नोटों की असली गड्डियों में फर्जी नोटों की मिलावट हो रही है। पंद्रह साल पहले पटना के मीठापुर में गलियों में घूमने वाले दूधिये अपनी गायों को इंजेक्शन लगाकर दूध निकालते थे। उम्र कम थी इसलिये दूध और इंजेक्शन का कनेक्शन नहीं समझता था। लगता था कि गाय के शरीर में इंजेक्शन दिया गया और गाय अपने शरीर के अवयवों से दूध को छान- छूनकर उसे हमें दे देती है। अब इसी तरह के इंजेक्शन लौकियों में घुसेड़े जा रहे हैं। मसालों और ताजे सब्जियों में रंग मिलाकर ग्राहकों को धोखा दिया जाता था तो अब मसालों में गधे की लीद मिलाई जा रही है।
मगर मेरी दिक्क़त दूसरी है। खाने- पीने की सामग्रियों से मेरा मन उचाट हो गया है। मुझे शक़ है कि यह कोई बीमारी न हो। मुझे लगता है कि न्यूज़ चैनल में दिखाए जाने वाली मिलावट की ख़बरों ने मुझे इस मानसिक स्थिति के आसपास पहुंचाया है। पत्नी से ज़िक्र किया तो उसने सरल समाधान बताया कि मिलावट संबंधी ख़बरें देखना बंद कर दीजिये... ये ऐसे ही दिखाते हैं। लेकिन न्यूज़ चैनल में काम करते हुए खुद इन ख़बरों के विजुअल्स देखना, उसे तैयार करना मजबूरी है। सबसे बड़ी तो यह कि न्यूज़ चैनलों की इन ख़बरों पर भरोसा करने की मजबूरी है।... इन ख़बरों पर आपका विश्वास बना रहे, इसके लिए जरूरी है कि हम जैसों को ख़ुद इनपर विश्वास करना होगा। ...अंत में, भगवान न करे लेकिन आप भी मेरी तरह की मनःस्थिति में हैं तो बताइएगा जरूर।..लगेगा कि मैं अकेला बीमार नहीं हूं।

Wednesday, May 12, 2010

हिंदुस्तानी ईस्ट इंडिया कंपनी


हिंदुस्तान में ईस्ट इंडिया कंपनी का स्याह इतिहास हर किसी को मालूम है। अब यह कंपनी नया इतिहास लिखने जा रही है। पढ़िये `तहलका' के ताजा अंक में।

कभी देश पर राज करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी अब एक भारतीय की होकर भारतीय बन चुकी है, बता रहे हैं अतुल चौरसिया
लम्हों की खता उस वक्त सदियों की सजा बन गई जब 1615 में मुगल बादशाह जहांगीर ने सर थॉमस रो के साथ एक व्यावसायिक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. थॉमस रो उस कंपनी के तेज-तर्रार अधिकारी थे जिसने आने वाले साढ़े तीन सौ सालों तक भारत के इतिहास का एक ऐसा अजीबोगरीब अध्याय लिखा जिसमें शोषण और अत्याचार के साथ आधुनिकता और औद्योगीकरण, सभ्यता और शिष्टाचार के साथ वहशत और बर्बरता की इबारतें यहां-वहां छिटकी नज़र आती हैं. वह ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में पहला कदम था. अतिथि को भगवान मानने वाले देश ने इस नई नस्ल का भी दिल खोलकर स्वागत किया. किंतु यहां की नायाब विरासत और अकूत दौलत ने इस अपेक्षाकृत छोटे-से व्यापारिक समझौते को जल्द ही साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा की सुरसा मे तब्दील कर दिया. बाद में कंपनी के हाथ से भारत का शासन ब्रिटिश सरकार के हाथों में चला गया.
'भावनात्मक स्तर पर मेरे लिए यह अभिभूत कर देने वाला पल है. यह सोचना ही जोश से भर देता है कि आज मैं उस कंपनी का मालिक हूं जिसका कभी मेरे पूरे देश पर राज था'
ज्यादातर लोगों के लिए यह कहानी 1947 में देश की आजादी के साथ ही खत्म हो गई लेकिन साढ़े तीन सौ साल तक चले भलाई-बुराई, लूट-खसोट, मनमानी-तानाशाही के खेल का अंतिम अध्याय लिखा जाना अभी बाकी था. और बीते फरवरी महीने की एक शाम मुंबई के एक व्यवसायी संजीव मेहता ने अपने वतन से दूर लंदन में बिल्कुल खामोशी से यह अंतिम अध्याय लिख दिया. इस दिन वे अपने वतन पर सैकड़ों साल तक राज करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी के मालिक बन गए.आश्चर्य की बात है कि जिस हिंदुस्तान में इस बात की सबसे अधिक चर्चा होनी चाहिए थी वहां इसकी जानकारी भी बमुश्किल थोड़े ही लोगों को होगी.
इतिहास के इस अंतिम अध्याय को लिखने की अहमियत का अंदाजा संजीव को भी अच्छी तरह से हैः एक कंपनी जिसे दुनिया की पहली बहुराष्ट्रीय कंपनी होने का गौरव हासिल है, जिसके झंडे तले एक समय दुनिया के कुल मानव श्रम का एक-तिहाई हिस्सा काम करता था, ऐसी कंपनी जिसके अतीत में जितने उजले पन्ने हैं उससे कहीं ज्यादा स्याह पक्ष हैं.
ईस्ट इंडिया कंपनी में संजीव ने लगभग 250 करोड़ रुपए का निवेश किया है. इसके भविष्य के लिए संजीव की योजनाएं बेहद विस्तृत हैं लेकिन कंपनी की पुरानी साम्राज्यवादी सोच का इनमें कोई स्थान नहीं है. मार्च में ही लंदन के विशिष्ट इलाके मेफेयर में कंपनी ने अपना पहला ईस्ट इंडिया कंपनी स्टोर खोला है और आने वाले कुछेक सालों में कंपनी एक बार फिर से भारत में अपने कदम रखने वाली है. लेकिन इस बार स्थितियां और भूमिकाएं अलग रहेंगी. चाय, कॉफी और मसालों की जगह रियल एस्टेट, सुपर स्टोर्स, हॉस्पिटैलिटी ले लेगी.सन 1600 के आस-पास ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने लंदन के 30-40 व्यापारियों को 'द कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन ट्रेडिंग इन टू ईस्ट इंडिया' के नाम से लाइसेंस दिया था जिससे उन्हें ब्रिटिश शासन के तहत पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने की इजाजत मिल गई थी. पीढ़ी दर पीढ़ी इन्हीं 30-40 परिवारों के पास इस कंपनी के अधिकार चले आ रहे थे. 2005 से ही संजीव कंपनी को खरीदने की हिमालयी मुहिम में लगे हुए थे. इतने सारे मालिकाना हक रखने वालों को किसी एक मुद्दे पर एकमत करना टेढ़ी खीर था इसलिए पांच साल बाद 2010 में जाकर संजीव को अपने लक्ष्य में कामयाबी मिल सकी.ज्यादातर लोगों के लिए कहानी एक बार फिर से खत्म हो चुकी है लेकिन कुछ लोगों के लिए यह एक नई कहानी की शुरुआत है. ईस्ट इंडिया कंपनी अब जाकर केवल नाम की नहीं बल्कि हकीकत में भारतीय कंपनी बन गई है.