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Monday, June 28, 2010

रामनाम सत है!


नेता आख़िरकार नेता ही होता है। उसका सार्वजनिक जीवन, उसकी निज़ी ज़िंदगी, दोनों पर राजनीति का मुलम्मा चढ़ा होता है। अब तो लगता है कि बीवी- बच्चों के साथ भी उसके भीतर का नेता हमेशा सतर्क रहता होगा। राजनीति के साथ नेता जीते हैं, राजनीति के साथ ही मरते हैं। राजनीति चल रही है तो नेता को ज़िंदा मानिये, राजनीति ख़त्म तो नेता भी ख़त्म। लेकिन पिछले दिनों एक अच्छे नेता वाक़ई दुनिया छोड़ गए... हालांकि उनकी राजनीति अभी बहुत पड़ी थी। राजनीति ख़त्म नहीं हुई थी, दिग्विजय सिंह की ज़िंदगी ख़त्म हो गई।
दिग्विजय सिंह इसबार बांका संसदीय सीट से निर्दलीय चुनाव लड़कर जीते थे। उन्होंने नीतीश कुमार की अगुवाई में जेडीयू का यह मुग़ालता तोड़कर रख दिया था कि उन्हें चुनावी जीत के लिए जेडीयू की ज़रूरत है। जिस पार्टी को सींचकर बड़ा किया था, नीतीश कुमार की हनक में उसी पार्टी से उनका पत्ता साफ कर दिया गया था।
निर्दलीय चुनावी जीत के बाद भी नीतीश कुमार एंड कंपनी ने अपनी भूल को करेक्ट करने की कोई कोशिश नहीं की। जिस तरह से जॉर्ज फर्नांडीज़ का टिकट काटकर पार्टी ने दोबारा उन्हें राज्यसभा में भेज दिया, वह कलेजा नीतीश कुमार, दिग्विजय सिंह के मामले में नहीं दिखा पाए। ख़ैर, यह तो दिग्विजय सिंह के जीते- जी की राजनीति थी। उनके निधन की ख़बर पर नीतीश कुमार मीडिया के सामने आए। उन्होने विश्वास यात्रा पर निकलने से पहले पत्रकारों से बात की। इसबार दिग्विजय सिंह के बारे में नीतीश कुमार के पास कहने को ख़ास नहीं था। फिर भी कहा कि `उनके निधन पर गहरा दुख है। वह एक लोकप्रिय नेता थे और उनके समर्थकों- दोस्तों का दायरा बहुत बड़ा था।‘
कुछ घंटे के भीतर नीतीश कुमार जहानाबाद पहुंच गए, जहां उनकी विश्वास यात्रा का कार्यक्रम था। कुछ घंटे पहले तक मातमी हावभाव में दिख रहे नीतीश कुमार जनसभा को संबोधित करते हुए पूरी रौ में थे। वह अपनी सरकार की उपलब्धियां गिना रहे थे। विरोधियों पर हुंकार भर रहे थे। जनता- जनार्दन तालियां बजा रही थी।
यह तो बिहार की राजनीति थी। दिल्ली में भी दिग्विजय सिंह के आवास पर कुछ ऐसा ही मंज़र देखने को मिला। जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव ने ग़मगीन मुद्रा में बीजेपी के यशवंत सिन्हा को गले लगाया। ...चलते- चलते वहां खड़े कुछ बड़े पत्रकारों की खैरियत पूछी... जया जेटली की आंखों से भी आंसू निकले। एक बड़े कांग्रेसी नेता अफसोस के साथ बता रहे थे कि दिग्विजय सिंह को कांग्रेस में शामिल किये जाने की पूरी पटकथा उन्होंने तैयार कर दी थी... लेकिन उससे पहले ही वह दुनिया छोड़ गए।
दूसरे दिन दिग्विजय सिंह का पार्थिव शरीर ट्रेन के जरिये उनके पैतृक गांव जा रहा था। अपने कैबिनेट में मंत्री रहीं सुधा श्रीवास्तव के अंतिम संस्कार के लिए समय नहीं निकाल पाए नीतीश कुमार पटना स्टेशन पर दिग्विजय सिंह को अंतिम विदाई देने पहुंचे। नीतीश कुमार ने दिग्विजय सिंह को याद किया। यहां लालू प्रसाद यादव भी पहुंचे। उन्होंने दिग्विजय सिंह को याद करते हुए उन्हें महान नेता बताया। यह बताना नहीं भूले कि पटना के गांधी मैदान में दिग्विजय सिंह की अगुवाई में राज्य सरकार के ख़िलाफ़ महापंचायत हुई थी। लालू की शिकायत थी कि मरने के बाद भी राज्य सरकार दिग्विजय सिंह को उचित सम्मान नहीं दे पाई। दिग्विजय सिंह के पैतृक गांव नयागांव में उनकी अंतिम यात्रा निकाली गई... कई नेता भीड़ में शामिल थे। छोटे- बड़े सभी। अंतिम यात्रा में शामिल लोग ग़मगीन मुद्रा में बोल रहे थे- रामनाम सत है।

Sunday, June 27, 2010

वर चाहिये तो इधर आइए

दोस्तो, अभी- अभी - तहलका- से होकर आया हूं... इस बार तहलका ने कहानी विशेषांक प्रकाशित किया है जिसमें ख़्यातिलब्ध कथाकार काशीनाथ सिंह की कहानी छपी है। पढ़कर मिजाज एकदम्मे से तर हो गया। बहुत दिनों बाद किसी समाचार पत्रिका ने कहानी विशेषांक प्रकाशित किया और उम्दा कहानियां प्रकाशित की हैं। इस कहानी को आप यहां पढ़िये या फिर सीधे तहलका पर पढ़िये... लेकिन पढ़िये ज़रूर, बेहद मजा आएगा। टीवी के धारावाहिकों की प्रपंचों भरी कहानी, लकदक कपड़ों में सजे -संवरे, सुविधाओं से अघाए किस्म के किरदार और साजिशों से भरी हरक़तों के बीच इस तरह की कहानियां किसी ताज़ादम झोंके की तरह हैः संजीव



खरवांस उतर गया है और आज भोर से ही जीयनपुर के बगीचे में कोयल कूंकने लगी है.
ऐ दुनियावालों ! अगर तुम्हारे घर कोई कन्या है, कुंवारी है और सयानी हो चुकी है, हाई स्कूल पास या फेल है, चिट्ठी पत्री लिखना सीख गई है (भले प्राणनाथ प्राड़नाथ लिखते हुए उनकी कुसलता चाहती हो), अपनी सहेली के घर ज्यादा आने-जाने लगी है और उसके भाई के साथ एक-आध बार पकड़ी गई है और आपको अपनी नाक की चिंता होने लगी है तो घबड़ाइए नहीं, इधर आइए. बाबू जोखन सिंह तीन साल से आप जैसे ही देखुआर का इंतजार कर रहे हैं पर शर्त यह है कि वह सास-ससुर की इज्जत करना जानती हो, हलवा मोहन भोग बना लेती हो सिलाई-तंगाई में माहिर हो, पति लाख लुच्चई करे मगर वह सती हो, सावित्री हो.
जोखू ने अपने बड़े लड़के को शहर भेज कर पांच किलो आदमचीनी चावल मंगा लिया है, अरहर तो अपने यहां भी चार-पांच पसेरी हो जाती है लेकिन ठीक से पकती नहीं, इसलिए दो किलो अरहर की दाल भी आ गई है, कोआपरेटिव से आधा मन चीनी, मिट्टी का तेल, डेढ़ावल बाजार से दो बट्टी लाइफबाय, ब्राह्मी आंवला की शीशी, भुर्रा चाय, आधा किलो बताशे, शीशा-कंघी गरज कि आप के आवभगत का पूरा-पूरा इंतजाम है.
जाड़े में विकट अनुभव हुए थे जोखू को. उन्होंने माधो के साथ मिलकर पिछली गर्मी में ही भविष्य को ध्यान रखकर आधे दर्जन प्याले और तश्तरियां मंगवाई थीं और संयोग देखिए कि एक ही दिन दोनों जने के यहां देखुआर आ गए. जब जोखू ने अपने लड़के को दौड़ाया तो माधो नट गए. इनकी कितनी बेइज्जती हुई होगी इसकी कल्पना की जा सकती है. इसी खार पर उन्होंने शहर की देखा देखी स्टील के मग मंगवा लिए हैं. न टूटने का डर, न फूटने का! माधो से बोलचाल जरूर बंद है लेकिन अब निश्चिंत हैं वे.
ऐसे ही परसाल जो देखुआर आए थे, उनमें कुछ सूट-बूट वाले लौंडे भी थे. खटिया पर बैठते ही नहीं बनता था उनसे और उनमें से एक जो बदमाश और फंटूश जैसा लगता था, खाने के वक्त चम्मच मांग बैठा. परसनेवाले अनसुनी कर रहे हैं लेकिन बात वह समझ नहीं रहा है या समझ कर भी जोखू की इज्जत उतारने पर उतारू था और वह कोई और भी नहीं था, लड़की का भाई था- खास भाई. जोखन सिंह ने इससे सबक सीखा. उन्होंने जाड़े में एक पेड़ कटवाया, उससे दो बेंचे और दो कुर्सियां बनवाईं और इनके साथ कचहरी से लौटते वक्त आधा दर्जन चम्मच भी ले लिए. अब कोई चाय में ऊपर से चीनी भी मांगे तो कोई बात नहीं.
एक और काम किया है इस खरवांस में उन्होंने. जब पप्पू दर्जा नौ में पहुंचा था और पहली बार देखुआर आए थे तब नातजुर्बेकारी में एक गड़बड़ी हो गई थी उनसे. चीनी तो थी लेकिन उसमें डालने के लिए कुछ न था- न दूध न दही. ये थे जरूर मगर सीते के घर और उनसे मुकदमेबाजी थी. एक की इज्जत पूरे गांव भर की इज्जत हुआ करती है. इज्जत के लिए ये झुके लेकिन सीता की मेहर ने सारा दोष बिल्ली के सिर मढ़ दिया. तब से जोखू हर खरवांस में जरूरते नागहानी माधो की देखा देखी अपने यहां भी 'रूह आफ़ज़ा' की बोतल रखते हैं.
माधो ने कच्चे मकान के रहते पक्का बनवाने के लिए ईंटो का भट्टा लगवाया तो उनके पोते की कीमत दुगनी तिगुनी हो गई. जोखू ने इसके बाद ही अपने दुआर के आगे दो ट्रक बालू गिरवा लिए और पांच ट्रक ईंटे. हालांकि मकान तो तभी बनेगा, जब सौहर होगा लेकिन इसके फायदे सामने आने लगे हैं. अब कोई यह नहीं पूछता कि आप जो इतना मांग रहे हैं, ठीक है देंगे लेकिन बताइए यह कि लड़की आएगी तो कहां रहेगी? इस खोबार में? अब तो खुद जोखू ही उलट के सवाल पूछते हैं कि लड़की आएगी तो रहेगी कहां? ईंट और बालू से क्या होगा? सीमेंट, लोहे-लक्कड़, हेन तेन सारा कुछ तो पड़ा है करने को. और किसी तरह से ढांचा खड़ा भी हो गया तो सोफासेट, बाजा, मोटरसैकिल के बेगार कैसा लगेगा?
जोखू, माधो की तरह लनतरानियां नहीं हांकते- सिवान दिखाकर देखुआरों से यह नहीं कहते कि 'यह सब आप ही का है!' खुद तो घास करें या गोबर फेंके और जब मेहमान आएं तो नहलाने के लिए कहार बुलवा लें, भट्टी पर से खोया मंगवा लें, बीड़ी के लालच में दो-चार बैठकबाजों को बुलवा लें, कोयर-कांटा और झाड़ू-बुहारू के लिए एक दो लौंडो को लगा दें... जोखू यह सब नहीं करते. किराए पर ट्रैक्टर मंगवाते हैं और जुताई-बुआई-दंवाई-ओसाई करवा के मस्त रहते हैं. वे इसलिए भी नहीं करते कि उन्हें अपने पप्पू पर- उसके रंग, रूप और गुण पर भरोसा है.
आप या जो भी वरदेखुआ सादी ब्याह के लिए जाएगा, वह जमीन-जायदाद से तो ब्याह करेगा नहीं, करेगा लड़के से और अगर वही खोटा है तो दुनिया भर का टीमटाम किस काम का? इसमें शक नहीं कि जगह-जमीन के कारण देखुआर माधो के यहां अधिक जाते हैं लेकिन जोखू के लिए तकलीफ नहीं खुशी का कारण है- कि एक दिन ससुर इसी तरह खिलाते-खिलाते उजड़ जाएंगे और तब मिलेगा क्या? घंटा !
तो इस मसले को लेकर माधो और जोखू में जितनी ही लाग-डांट है, पप्पू और मुन्ना में उतनी ही छनती है. पप्पू- जिनका रजिस्टर का नाम गणपत सिंह है- अपने टोले के मेधावी विद्यार्थी हैं. मेधावी इसलिए कि उन्होंने अपने लंगोटिया यार मुन्नाजी को पीछे छोड़ दिया और खुद इंटर में आ गए. ये दोनों मित्र तीन साल से हाई स्कूल में थे और हर साल परीक्षा के समय इनके लिए गांव और संगी साथी दो महीने पहले से युद्धस्तर पर तैयारी करते थे. जामवंत यादव- जो अहिरान के थे और फौज से रिटायर कर गए थे- बंदूक के साथ विद्यालय के बगीचे में बिठाए जाते, कुछ दूसरे नौजवान छूरे-तमंचों के साथ बस स्टेशन के पास रहते जहां से गार्डी करने वाले अध्यापक चलते और मुन्ना का कोई एक दोस्त- जिसके पास मोटर साइकिल थी- अपने तीनों चेलों के साथ विद्यालय के पिछवाड़े खड़ा रहता. उनमें से एक पर्चा लाता, दूसरा किताबों और कुंजियों से उत्तर फाड़ता और तीसरे की जिम्मेदारी होती- झरोखे या गार्ड या पानी पिलाने वाले या पहरे पर तैनात सिपाही के हाथों कागज उन तक पहुंचाना.
इस रणनीति में कहीं कोई चूक नहीं हुई लेकिन किस्मत का खेल कि मुन्ना रह गए और तीसरे प्रयत्न में पप्पू सप्लीमेंटरी के रास्ते धूमधाम से उत्तीर्ण हो गए. इसका नतीजा यह निकला कि पप्पू का भाव वरदेखुओं के बाजार में मुन्ना के टक्कर में आ गया- हल-बैल न होने के बावजूद!
माधो ने तय किया है कि वे मुन्ना को तब तक पढ़ाएंगे जब तक उसका ब्याह नहीं हो जाता. अगर लड़का घर बैठ गया तो कौन झांकेगा? इधर जोखू बोलते थे दो लाख और एक फटफटिया, उधर माधो बोलते थे तीन लाख और एक मारुति. पप्पू के हाई स्कूल पास करने के बाद जोखू ने कहा- चार लाख तो बसंत पंचमी के दिन दुआर की नींव खुदवा कर माधो ने किया - पांच लाख. इन मांगों में गहने और खिचड़ी वाले वे सामान नहीं शामिल हैं जो अपने दुआर की इज्जत के मुताबिक आप लजाते-लजाते भी देंगे (यानी एक सुनने वाला बाजा, एक देखने वाला बायस्कोप, सोफा, पलंग आदि आदि), लेकिन कार के बिना दोनों में से किसी का काम न चलेगा. लोगों ने पूछा कि कार का करोगे क्या? तो दोनों का कहना था कि और कुछ नहीं तो धानापुर से मुगलसराय तक मुन्ना-पप्पू सवारी ढोएंगे. बिजनेस...
जोखू जानते हैं कि माधो और ब्याहों की तरह इसमें भी धोखा करेगा और चढ़ावे का गहना सोनार से भाड़े पर ले आएगा. और माधो की पॉलिटिक्स यह है कि लड़के का बाजार भाव इतना चढ़ा दिया जाय कि होड़ में जोखू का माल धरा का धरा रह जाय. तो दुनियावालों, इस वक्त इन कश्यपगोत्रियों, दोनों सूर्यवंशी क्षत्रिय कुमारों की कीमत सात लाख और एक नैनो लगाई गई है. अगर आपकी लड़की बिचारी को किसी योग्य वर की जरूरत हो तो आइए, अपनी किस्मत आजमाइए.
गांव घर का मामला है, किसी एक की ओर से बोलना दूसरे से झगड़ा मोल लेना है. यों लड़के आप-आप को दोनों ही लाखों में एक हैं. दोनो इस समय सहर बनारस में कोचिंग कर रहे हैं. काहे की? यह मत पूछिए. जब उन्हें ही नहीं पता तो हम क्या बताएं? बस आ जाइए ! दूसरे आएं इससे पहले. बाजार के हिसाब से ये चीपो के चीपो और बेस्टो के बेस्टो पड़ेंगे आप के लिए.।

Thursday, June 24, 2010

नीतीश के रूठने के मायने


बिहार में सत्ताधारी बीजेपी- जेडीयू गठबंधन पर गंभीर संकट है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई में इस गठबंधन ने राज्य में साढ़े चार वर्षों तक शासन किया है। इसी गठबंधन की सरकार ने बिहार में लालू `राज' को पीछे छोड़ते हुए विकास की नई संभावनाएं तलाशी। सामूहिक नरसंहार और पिछड़ेपन के लिये बदनाम रहा बिहार, पहली बार राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फलक पर विकास के लिए पहचाना गया। यह इसी गठबंधन का शासन था, जिसकी प्रशंसा अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने की और न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी इसे सराहा। यह जेडीयू- बीजेपी गठबंधन की ही सरकार थी जिसमें माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स ने कोसी इलाके में खुद जाकर वहां स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाने की पेशकश की।
चुनावी वेला में `सुशासन' के इस गठबंधन वाली सरकार में दरारें साफ दिख रही हैं। अबतक अपने काम के भरोसे चुनावों में उतरने का दावा करने वाले इस गठबंधन के दोनों दल अपने -अपने हित की चिंता ज्यादा करने लगे। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी तस्वीर वाले विज्ञापन से बिफरे नीतीश कुमार बौखलाहट छिपा नहीं पाए। 12 जून को पटना में बीजेपी कार्यकारिणी के दौरान बीजेपी नेताओं को दिया जाने भोज उन्होंने रद्द कर दिया। उससे भी दो कदम आगे बढ़कर उन्होंने पांच करोड़ की सहायता राशि गुजरात सरकार को वापस कर दी। नीतीश कुमार की विश्वास यात्रा में उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने जाने से मना किया तो नीतीश कुमार ने उस इलाके का अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया, जो इलाका बीजेपी नेता और स्वास्थ्य मंत्री नंदकिशोर यादव का था। हालत यहां तक पहुंची कि कैबिनेट की बैठक में बीजेपी मंत्री अपने- अपने कारणों से शामिल नहीं हुए।
विपदा के समय एक राज्य की दूसरे राज्य को दी गई मदद वापस किये जाने की नई परंपरा बिहार से शुरू हुई है। गुजरात की जनता ने कोसी बाढ़ के दौरान मुख्यमंत्री राहत कोष में पांच करोड़ की राशि दी थी, जिसे गुजरात सरकार ने बिहार सरकार को दी थी। बिहार सरकार ने गुजरात सरकार की सहायता राशि वापस किये जाने का फ़ैसला किया और उसे वापस भी कर दिया। ख़ास बात यह है कि सहायता राशि लौटाने का फ़ैसला बिहार सरकार का नहीं बल्कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित उनके दल के मंत्रियों का था। इस अहम फै़सले पर चर्चा के लिए उन्होंने न तो अपने सहयोगी बीजेपी को विश्वास में लिया और न ही उनसे राय मांगी गई। यानी, सरकार के स्तर पर लिया जाने वाला फ़ैसला एकतरफ़ा दलगत स्तर पर लिया गया।
गुजरात सरकार को जो सहायता राशि वापस की गई है, उसे लेकर भी नीतीश कुमार की सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कोसी बाढ़ पीड़ितों के लिये विशेष पैकेज़ नहीं दिये जाने का हवाला देकर केंद्र की यूपीए सरकार की आलोचना करते रहे हैं। लेकिन जब गुजरात की पांच करोड़ की मदद उन्होंने वापस कर दी है, तो सवाल ये है कि आख़िरकार मदद की इस राशि का अबतक उपयोग क्यों नहीं हुआ था ? कोसी की बाढ़ से तबाह हुई एक बड़ी आबादी आज भी मदद की राह देख रही है।
मदद की राशि वापस किये जाने को नीतीश कुमार का चुनावी पैंतरा माना जा रहा है तो इसके पर्याप्त कारण हैं। साढ़े चार साल तक सरकार चलाने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने सहयोगी बीजेपी में सांप्रदायिक चेहरा देख रहे हैं। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी को बिहार नहीं आने देने के लिए दबाव बनाने वाले नीतीश कुमार, चुनाव के तत्काल बाद लुधियाना रैली में नरेंद्र मोदी से सार्वजनिक तौर पर हाथ मिलाते देखे गए। गुजरात के सांप्रदायिक दंगों की वजह से नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी से परहेज है। लेकिन गुजरात दंगे के ख़िलाफ़ न तो नीतीश कुमार और न ही जेडीयू, उस समय की वाजपेयी सरकार से बाहर आने की हिम्मत जुटा पाए।
अब जबकि नीतीश कुमार ठीक विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए की बांह झटकने की ताक़त जुटा पाए हैं तो उनके सामने कई विकल्प हैं। कांग्रेस पहले ही इस गठबंधन के टूटने पर नज़रें गड़ाए बैठा है। या फिर, नीतीश कुमार भी उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की राह पर चलते दिख रहे हैं जिन्होंने उड़ीसा विधानसभा चुनाव से ठीक पहले झटके से बीजेपी का साथ छोड़कर राज्य की सत्ता में दोबारा अकेले दम पर आए। ऐसी परिस्थिति में नीतीश कुमार ने एक नहीं बल्कि कई मौके पर अपनी मंशा जाहिर कर दी है, अब बीजेपी को तय करना है कि जेडीयू के साथ अपने रिश्तों को किस तरह से देखती है।
दरअसल, बीजेपी के सामने जेडीयू के मान- मनौव्वल की मजबूरी भी है। बीजेपी के पास न तो गठबंधन को तोड़ने की ताक़त है और न ही उसके सामने बिहार में जेडीयू जैसे साथी दल का दूसरा विकल्प। आख़िरकार बीजेपी किस क्षेत्रीय ताक़त के भरोसे इस गठबंधन को तोड़ने की हिम्मत जुटाए, उसके सामने सवाल यही है। एनडीए के रूप में पहले ही उसके ज्यादातर साथी दल गच्चा दे चुके हैं। एनडीए के नाम पर बीजेपी के साथ सिर्फ शिवसेना, अकाली दल और जेडीयू ही बड़ी ताकत बचे हैं। नीतीश कुमार को बीजेपी की इस कमजोरी का अहसास है। इसलिये ऐन चुनावी वक़्त पर वह बीजेपी को लगातार झटके दे रहे हैं और उस बैसाखी पर भी आंखें तरेर रहे हैं जिसके भरोसे अबतक सरकार चलाई। उन्हें पता है कि आने वाले समय में उनकी ताक़त बढ़ेगी और उनके सामने संभावनाएं कई हैं। इसलिये बहुत संभव है कि बीजेपी आलाकमान जेडीयू की तमाम शर्तों को मान जाए।

Wednesday, June 9, 2010

नीतीश कुमार दोबारा सत्ता में आएंगे?


बिहार की नीतीश कुमार की सरकार क्या दोबारा सत्ता में आ पाएगी ? यह एक दिलचस्प सवाल है। नीतीश कुमार एंड कंपनी, बिहार विधानसभा चुनाव में अपने काम के भरोसे दोबारा सत्ता में आने का मंसूबा देख रही है। नीतीश कुमार बिहार के अलग- अलग हिस्सों में चल रही विश्वास यात्रा में अपने सुशासन का दावा कर रहे हैं। नीतीश कुमार ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि बिहार में कानून के राज की स्थापना, एक बड़ी चुनौती थी जिसे उन्होंने कर दिखाया है।
विश्वास यात्रा में नीतीश कुमार बड़े ही दिलचस्प तरीके से बताते हैं कि उनकी सरकार से पहले हाल ये था कि बाहुबली लंबी- लंबी गाड़ियों में चलते थे और गाड़ी का शीशा उतारकर राइफल की नली बाहर निकाल देते थे। अपनी सरकार में शुरू किये गए बालिका साइकिल योजना के बारे में भी नीतीश कुमार दिलचस्प अंदाज में बताते हैं। वे कहते हैं कि लड़कियों को साइकिल दी तो लड़के कुछ कुम्हला गए इसलिये सरकार ने सभी बालक- बालिका को साइकिल देने का फ़ैसला किया। इस यात्रा में वह केंद्र की नाइंसाफी का पुराना राग भी अलाप रहे हैं। ख़ास तौर पर केंद्र की सड़क पर बिहार सरकार की तरफ से लगाए गए पैसे का उल्लेख करते हुए वह विपक्षियों से सवाल पूछते हैं कि कौन सा केंद्र का पैसा?
आप कह सकते हैं कि बिहार में तक़रीबन साढ़े चार साल के राज से मिले तजुर्बे और लालू यादव जैसे विपक्षियों के हमलों को झेलते- झेलते, नीतीश कुमार तुर्की- ब- तुर्की जवाब देना भी अच्छी तरह से सीख गए हैं। ख़ामोशी से काम करने वाली उनकी छवि बदल रही है। वह और नेताओं की तरह ही बताते हैं कि दुनिया भर में उनके काम की तारीफ़ हो रही है। अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने उनकी सरकार को सराहा। बिल गेट्स बिहार दौरे पर आए और वॉशिंगटन पोस्ट में उनकी सरकार की तारीफ़ छपी। नीतीश कहते हैं कि जब लोग उनसे इस कायाकल्प का राज पूछते हैं तो मैं कहता हूं कि मैने कुछ नहीं किया बल्कि बिहार के लोगों के संकल्प की वजह से ऐसा संभव हो पाया।
नीतीश कुमार जब भी ऐसा कहते हैं तो मुझे लालू प्रसाद यादव का रेल मंत्री रहते अक्सर दिया जाने वाला बयान याद आता है। आत्ममुग्ध लालू कहा करते थे कि जब लोग रेलवे को घाटे से उबारने का रहस्य पूछते हैं तो मैं कहता हूं कि अभी तो किया है जादू और बाकी है टोना। लालू यादव के रेल मंत्री रहते आईआईएएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में रेल के घाटे से उबरने की गाथा शोध का विषय रही। बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए लालू यादव की वह मुहिम भी याद आ रही है जब उनकी सरकार ने चरवाहा विद्यालय खोले थे। ग़रीब -गुरबों की बस्तियों में जाकर लालू यादव ने गंदगी में सने बच्चों को नहलाने- बाल कटवाने और उन्हें साक्षर करने का कार्यक्रम शुरू किया था। उस वक्त नामीगिरामी पत्र- पत्रिकाओं ने लालू की इस मुहिम को काफी सराहा था। ऐसे ही कुछेक अच्छे कामों के बूते बिहार में लंबे अरसे तक लालू यादव का राज रहा।
फिर आते हैं नीतीश कुमार पर। विश्वास यात्रा के दौरान नीतीश कुमार लोगों को बिहार की तरक्की की जो सूरत दिखाते हैं, वह विपक्षी दलों के साथ –साथ किसी को भी अविश्वसनीय लग सकता है। वह बिहार में जितने भयमुक्त समाज की तस्वीर पेश करते हैं, उसमें बड़ी शंकाएं हैं। नीतीश कुमार का बिहार अगर वास्तव में इतना ही चमक रहा है, तो आख़िरकार निवेशक अबतक बिहार से कतराते क्यों रहे हैं। सड़क जैसे मसले पर निश्चय ही उनकी सरकार ने बेहतर किया है लेकिन जिन- जिन मोर्चों पर सरकार फेल हुई है, उसके लिये नीतीश कुमार केंद्र सरकार के असहयोग का पुराना राग अलापते देर नहीं लगाते। बानगी के तौर पर नीतीश कहते हैं कि राज्य में बिजली इसलिये नहीं है क्योंकि कोयला पर केंद्र का अधिकार है और केंद्र सरकार इसके लिए मंजूरी नहीं दे रही है। कोसी प्रभावित लोगों के लिए सरकार इसलिये मदद नहीं कर पाई क्योंकि केंद्र सरकार ने दूसरे राज्यों को तो सहायता दी लेकिन बिहार को विशेष पैकेज नहीं दिया। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने से पहले नक्सली बिहार के जिन सीमित जिलों तक सिमटे हुए थे, उनके राज के दौरान नक्सलियों की सक्रियता का विस्तार हुआ। नक्सलवाद की समस्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झूलती रही है। जाहिर है कि बिहार में भी नीतीश कुमार की सरकार ने और राज्यों की तरह केंद्र सरकार पर ही इसका ठीकरा फोड़ा।
अपनी सत्ता के शुरुआती दिनों में एक ख़ामोश नेता के तौर पर राज्य की कमान संभालने वाले नीतीश कुमार की अगुवाई में उनका खुद का संगठन कमजोर होता गया। जेडीयू कमजोर हुआ और जाने- अनजाने नीतीश कुमार का इसमें अहम किरदार देखा जा सकता है। बिहार की चुनावी बेला में अगर देखें तो जेडीयू के सामने कई संकट हैं। अलग- अलग नेताओं के साथ जेडीयू से जुड़े जातीय गुट बहुत कुछ छिटक रहे हैं। दिग्विजय सिंह, प्रभुनाथ सिंह, ललन सिंह, नागमणि, एजाज अली सहित कई बड़े नेता या तो बागी हो चुके हैं या निकाले जा चुके हैं। अब पार्टी में नीतीश की कद- काठी का कोई दूसरा नेता उनके दल में नहीं है। ऊपर से अगड़े वर्ग के मतदाता बंटाईदारी कानून को लेकर नीतीश कुमार पर शंकाएं कर रहे हैं, जिसका ख़ामियाजा चुनाव में जेडीयू की उठाना पड़ सकता है। ख़ास बात ये है कि ये सभी नेता नीतीश विरोधियों के साथ एकजुट हो रहे हैं। इस गुट ने अगर थोड़ा ही सही चुनावों में नीतीश एंड कंपनी को नुकसान पहुंचाया तो यह काफी भारी पड़ सकता है।

Tuesday, June 1, 2010

तीरथ के तारणहार

तीर्थ पुरोहितों या पंडों के बारे में -तहलका- की यह रिपोर्ट पढ़िये, मजा आ जाएगा- संजीव
पंडों का नाम भले ही कड़वे अनुभवों का पर्याय बन चुका हो मगर बदरी-केदार के पंडे अपनी विशेषताओं के कारण आज भी अपने यजमानों के दिलों में बसे हैं. मनोज रावत की रिपोर्ट
बात उन दिनों की है जब केंद्रीय पर्यटन मंत्री जगमोहन हुआ करते थे. एक बार वे पर्यटन और रोजगार को प्रोत्साहित करने के लिए बनी चार धाम सर्किट योजना की समीक्षा करने बदरीनाथ पहुंचे. वहां उन्हें बताया गया कि कुछ पंडे उनसे मिलना चाहते हैं. ये पंडे जानना चाहते थे कि जगमोहन का पैतृक स्थान कहां है. मगर जगमोहन ने उनमें खास दिलचस्पी नहीं दिखाई और कह दिया कि उनका घर दिल्ली है. मगर पंडों ने आग्रह किया कि वे पाकिस्तान स्थित अपने मूल क्षेत्र का नाम बताएं. झिझकते हुए जब जगमोहन ने प्रांत और जिले का नाम बताया तो पंडों की भीड़ छंट गई. सिर्फ एक दुबला-पतला युवक ही वहां खड़ा रहा जिसका कहना था कि उस जिले का पंडा वह है. बाद में जब उस युवा पंडे ने जगमोहन को उनके पैतृक गांव के लोगों के बारे में भी बताना शुरू किया तो वे हैरान रह गए. इसके बाद उन्होंने भी खुद पंडे की बही में अपनी बदरीनाथ यात्रा का विवरण दर्ज किया.
यह एक छोटा-सा उदाहरण है जो बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे महत्वपूर्ण तीर्थों की यात्रा में यहां के तीर्थपुरोहितों यानी पंडों की भूमिका और उनके योगदान के बारे में बताता है. मीडिया और तकनीक के इस युग में आज हर तरह की जानकारी और सुविधा सुलभ है. लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब स्थितियां इसके उलट थीं. जानकारी और सुविधाएं नहीं के बराबर थीं और बदरी-केदार की यात्रा इतनी दुष्कर और खतरों से भरी हुआ करती थी कि जाने वाले अक्सर कहते थे कि क्या पता अब मिलना हो न हो. इतने कठिन समय में भी अगर लोग इस यात्रा पर जाने का साहस जुटा लेते थे तो इसमें उनकी श्रद्धा के साथ बदरी-केदार के तीर्थ-पुरोहितों यानी पंडों का भी अहम योगदान था. आज भी ऐसे यात्रियों की संख्या बहुत है जिन्हें दूसरी किसी भी व्यवस्था की तुलना में अपने पंडों पर ज्यादा भरोसा है.
बदरी-केदार के कपाट छह महीने ही यात्रा के लिए खुलते हैं. सर्दियों में विकट भौगोलिक परिस्थितियों और पौराणिक मान्यताओं के कारण इन्हें बंद रखा जाता है. सड़क मार्ग न होने के कारण मोक्ष धाम बदरीनाथ (ऊंचाई 3,133 मीटर) और द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ (3,680 मीटर) तक पहुंचना पहले बहुत टेढ़ी खीर हुआ करता था. चीन के हमले के बाद, वर्ष 1965 में बदरीनाथ तक सड़क मार्ग पहुंचाना सरकार की मजबूरी हो गई. हालांकि केदारनाथ मंदिर तक पहुंचने के लिए आज भी गौरीकुंड से 14 किलोमीटर पैदल चढ़ाई चढ़कर जाना पड़ता है. यात्रा की मुश्किलों और सुविधाओं के अभाव के कारण उन दिनों यात्री भी कम संख्या में आते थे. प्रसिद्ध घुम्मकड़ राहुल सांकृत्यायन 17 मई 1951 को बदरीनाथ पहुंचे थे. यहां उन्होंने तीन दिन प्रवास किया. अपने यात्रा विवरण में वे लिखते हैं, ‘मंदिर के आसपास के कुछ मकानों को छोड़कर बदरीपुरी में कच्चे मकान ही हैं. इन्हीं झोपड़ियों में छह महीने के यात्रा काल में आने वाले कुछ हजार यात्री ठहरते हैं.’
श्री बदरीनाथ पंडा पंचायत के अध्यक्ष मुकेश भट्ट ‘प्रयागवाल’ बताते हैं, ‘सौ साल पहले तो परिस्थितियां और भी दुष्कर थीं. ऋषिकेश से आगे कहीं भी सड़क मार्ग नहीं थे.’ जानकार बताते हैं कि उस समय पैदल यात्रा चट्टी व्यवस्था के भरोसे चलती थी. चट्टी यानी वह जगह जहां पर आस-पास के गांवों के लोग यात्रियों को राशन और चौका-बर्तन उपलब्ध कराते थे. हर 5 मील पर कम से कम एक चट्टी होती थी. ऋषिकेश से लेकर बदरीनाथ तक की यात्रा में 46 चट्टियां पड़ती थीं. तब यात्रा पर भी ज्यादातर बुजुर्ग लोग ही आते थे. प्रयागवाल बताते हैं, ‘उस कठिन समय में भी तीर्थ-पुरोहितों ने हिमालय के इन दुर्गम तीर्थों की यात्रा करने के लिए श्रद्धालुओं को तैयार किया.’
श्री केदार पंडा पंचायत के तीर्थपुरोहित श्रीनिवास पोस्ती तथा प्रयागवाल का दावा है कि उत्तराखंड में तीर्थपुरोहित परंपरा आदिगुरु शंकराचार्य की बदरी-केदार यात्रा के समय से ही शुरू हो गई थी. पोस्ती बताते हैं कि केदारखंड में भी बदरीकाश्रम निवासी धर्मदत्त नामक ब्राह्मण के अवंति नगर जाकर चंद्रगुप्त नामक वैश्य को यात्रा पर आने के लिए प्रेरित करने का वर्णन है. बदरी-केदार के पंडों की बहियों में लगभग दो सौ साल पुराने यजमानों के यात्रा विवरण उपलब्ध हैं. पोस्ती कहते हैं, ‘पहले यात्री बदरीनाथ तथा केदारनाथ की यात्रा पर बहुत कम संख्या में आते थे इसलिए उनकी जानकारी मौखिक रुप से ही रहती थी. बाद में जब संख्या बढ़ने लगी और शिक्षा का प्रसार होने लगा तो यात्रियों के नाम बहियों में दर्ज किए जाने लगे.’ आज यहां आने वाले लोग जब अपने पुरखों द्वारा अंकित साक्ष्यों को देखते हैं तो उन्हें हैरानी के साथ-साथ गौरव का भी अनुभव होता है. इस तरह यहां आने वाला व्यक्ति स्वयं ही इस परंपरा से जुड़ जाता है.
बदरीनाथ पंडा पंचायत के महासचिव रहे मुकेश अल्खानियां अपने यजमान रायबहादूर कस्तूर चंद समीर चंद डागर के अभिलेखों को दिखाते हुए कहते हैं, ‘दो सौ साल पहले इसी परिवार ने बदरीनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था तथा तप्त कुंड से लेकर मंदिर तक की सीढियां भी बनवाई थीं.’ बदरी-केदार के पंडों के पास राजा-महाराजाओं की दी सनदें और ताम्र पत्र भी मिलते हैं.
बदरी-केदार के कपाट बंद होने के बाद भी पंडों का यजमानों से संपर्क नहीं टूटता. श्रीनिवास पोस्ती बताते हैं, ‘सर्दियों में ये तीर्थपुरोहित देश भर में अपनी-अपनी यजमानी के क्षेत्रों में जाते हैं. भौगोलिक रूप से दुष्कर तीर्थों में हुई सेवा-सत्कार से कृतज्ञ यजमान अपने घरों में इन तीर्थपुरोहितों का दिल खोलकर स्वागत करते हैं. तीर्थपुरोहितों के अपने यजमानों के साथ आत्मीय पारिवारिक संबंध होते हैं इसलिए तीर्थपुरोहित अपने रिश्तेदारों से अधिक अपने यजमानों के सुख-दुख में सम्मिलित होते हैं. शीतकाल की इन यात्राओं सेे पंडों और यजमानों के पुराने संबंधों में एक नया पहलू तो जुड़ता ही है उस क्षेत्र के अन्य श्रद्धालुओं को भी बदरी-केदार यात्रा पर आने का संबल और प्रेरणा मिलती है. तीर्थपुरोहितों का मानना है कि सदियों से अनवरत चली आ रही इस परंपरा का ही परिणाम है कि पहले संैकड़ों की संख्या में आने वाले यात्रियों की संख्या समय बीतने के साथ लाखों में पहुंच गई है.
तिब्बत सीमा के पास चमोली जिले में स्थित बदरीनाथ धाम में उत्तराखंड और नेपाल के पंडे चमोली जिले के डिमरी जाति के हैं. बाकी सारे भारत के तीर्थपुरोहित बदरीनाथ से लगभग 250 किमी नीचे देवप्रयाग कस्बे के आसपास स्थित टिहरी और पौड़ी जिले के 20-25 गांवों के निवासी हैं. केदारनाथ (रुद्रप्रयाग जिला) के पंडे जाड़ों में मंदिर के कपाट बंद होने पर वहां से 60-70 किमी नीचे आकर ऊखीमठ और गुप्तकाशी के पास के गांवों में रहते हैं. बदरी तथा केदार दोनों तीर्थों के पुरोहितों के तीर्थ कृत्य भी अलग-अलग हैं. बदरीनाथ के पंडे तप्त कुंड व पंच शिला पूजन कराकर जाते समय यात्रियों को सुफल आशीर्वाद देते हैं तो केदारनाथ के तीर्थपुरोहित यात्रियों के पूर्वजों के पिंड भरते हैं मंदिर के भीतर संकल्प पूजा कराते हैं और सावन के महीने यात्रियों द्वारा संकल्पित ब्रह्म कमल के पुष्पों को केदारनाथ मंदिर के शिवलिंग पर चढ़ाते हैं. पिछले साल राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल बदरीनाथ यात्रा पर आई थीं. उनके तीर्थ पुरोहित प प्रकाश नारायण बाबुलकर ‘शास्त्री’ बताते हैं, ‘महामहिम ने सभी धार्मिक कार्य श्रद्धापूर्वक संपन्न कराए.’
प्रतिष्ठित यात्रियों का आना भले ही सम्मानजनक हो परंतु बदरी-केदार के ये तीर्थ पुरोहित अपने सभी यजमानों को समभाव से देखते हैं. पोस्ती बताते हैं, 'होटल और धर्मशालाओं का किराया देने में असमर्थ गरीब यात्रियों को तीर्थपुरोहित अपने घरों में ठहराते हैं. यात्रियों को वापस जाते समय सुफल(यात्रा आर्शीवाद) देते हुए उनसे यह भी पूछा जाता है कि उनके पास वापस जाने के लिए धन है या नहीं. यात्रियों के पास धनाभाव होने पर पंडे उन्हें वापस जाने कर खर्चा भी देते हैं. बाद में जब इन गरीब किसानों के घरों में धन-धान्य होता है तो ये श्रद्धालु तीर्थपुरोहितों से लिए गए इस धन को वापस कर देते हैं. पोस्ती बताते हैं कि यात्री को पहचाने बिना भी सारा लेन-देन पीढ़ियों से चले आ रहे आपसी विश्वास पर चलता है.'
इस बारे में एक घटना उल्लेखनीय है. बदरीनाथ के पास 7 साल पहले एक बस दुर्घटना हुई थी. बस में सवार यात्री पूर्वी उत्तर प्रदेश के थे जिनकी आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं थी. इन गरीब यात्रियों को सबसे पहले मिलने उनका पंडा ही आया. पंडे को देखते ही यात्रियों में जान आ गई. हालांकि पंडे की भी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी इसलिए उसने उधार लेकर 30,000 रुपए का बंदोबस्त किया और पहले बदरीनाथ अस्पताल में भर्ती घायलों को रजाइयां भेजीं. इसके बाद वह बदरीनाथ से सबसे नजदीक स्थित कस्बे जोशीमठ पहुंचा जहां कुछ और घायल भर्ती थे. फिर वह पंडा एक और कस्बे गोपेश्वर पहुंचा जहां गंभीर रूप से घायल यात्री भर्ती थे और जहां दुर्घटना में मरे यात्रियों का पोस्टमार्टम भी होना था. यात्रियों के परिजनों के आने तक पंडा अन्तिम संस्कार की तैयारी भी कर चुका था. बदरीनाथ के तत्कालीन थाना प्रभारी दिनेश बौंठियाल इस घटना की पुष्टि करते हैं.
दुर्गम हिमालय की यात्रा में अपनेपन का अहसास, तन -मन-धन से सेवा और धार्मिक कार्यों को संपन्न कराने का काम कोई भी ट्रैवल एजेंसी नहीं कर सकती इसीलिए किसी भी माध्यम से बदरी-केदार आने वाला यात्री यहां आकर अपने पंडे से जरूर मिलता है. श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी जगत सिंह बिष्ट कहते हैं, 'यात्रा को बढ़ावा देने में तीर्थपुरोहितों का सबसे बड़ा योगदान है. परंपरा से बने विश्वास के कारण यात्री बेहिचक अपने तीर्थपुरोहितों की बात पर विश्वास कर नि:संकोच यात्रा करने आते हैं.'
तीर्थपुरोहितों के उपनाम भी उनके यजमानी के क्षेत्रों के नाम से हो जाते हैं. जैसे इलाहाबाद के आस-पास के क्षेत्र के पंडे प्रयागवाल, कंुमायूं के पंडे कूर्मांचली, नेपाल राजपरिवार के पंडे लालमुह्रया और मेरठ के पंडे मेरठवाल के नाम से जाने जाते हैं. देश भर में घूमने वाले पंडे अपने यजमानों के क्षेत्र की भाषा, संस्कृति, खान-पान और रीति-रिवाजों को उस क्षेत्र के निवासियों से अधिक जानते हैं. देवप्रयाग संस्कृत महाविद्यालय के आचार्य शैलेंद्र कोटियाल ‘शास्त्री’ बताते हैं, 'तीर्थपुरोहितों के गांवों में मिनी भारत बसता है. इन गांवों में भारत की सभी भाषाओं के जानकार मिल जाते हैं.'
शास्त्री आगे बताते हैं कि तीर्थपुरोहित उत्तराखंड जैसे दुर्गम क्षेत्र में पूरे भारत की संस्कृति लाए और सदियों के इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान से पहाड़ के दुर्गम इलाकों मंे आर्थिकी का संचार होने के साथ-साथ शिक्षा का प्रसार भी हुआ. वे कहते हैं, '100 साल पहले देवप्रयाग मे मुकुंद दैवज्ञ के निर्देशन में संस्कृत व ज्योतिष के संैकड़ों स्तरीय ग्रंथ प्रकाशित हुए. बाद में उनकी परंपरा को उनके शिष्य आचार्य चक्रधर जोशी ने आगे बढ़ाते हुए न केवल प्रकाशन कार्य जारी रखा बल्कि ज्योतिष की तथ्यपरक व वैज्ञानिक जानकारियों के लिए देवप्रयाग में एक वेद्यशाला भी खोली.' पोस्ती बताते हैं कि केदार के तीर्थपुरोहितों ने भी 200 साल पहले गुप्तकाशी के पास शोणितपुर में संस्कृत पाठशाला खोली जो आज भी शिक्षा के प्रसार में लगी है. देश के अन्य तीर्थों में भले ही तीर्थ पुरोहितों के साथ यात्रियों को कड़वे अनुभव होते हों मगर बदरी-केदार के तीर्थ पुरोहित अपनी कुछ विशिष्टताओं के कारण आज भी अपने यजमानों के दिलों में बसे हैं.