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Wednesday, June 9, 2010

नीतीश कुमार दोबारा सत्ता में आएंगे?


बिहार की नीतीश कुमार की सरकार क्या दोबारा सत्ता में आ पाएगी ? यह एक दिलचस्प सवाल है। नीतीश कुमार एंड कंपनी, बिहार विधानसभा चुनाव में अपने काम के भरोसे दोबारा सत्ता में आने का मंसूबा देख रही है। नीतीश कुमार बिहार के अलग- अलग हिस्सों में चल रही विश्वास यात्रा में अपने सुशासन का दावा कर रहे हैं। नीतीश कुमार ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि बिहार में कानून के राज की स्थापना, एक बड़ी चुनौती थी जिसे उन्होंने कर दिखाया है।
विश्वास यात्रा में नीतीश कुमार बड़े ही दिलचस्प तरीके से बताते हैं कि उनकी सरकार से पहले हाल ये था कि बाहुबली लंबी- लंबी गाड़ियों में चलते थे और गाड़ी का शीशा उतारकर राइफल की नली बाहर निकाल देते थे। अपनी सरकार में शुरू किये गए बालिका साइकिल योजना के बारे में भी नीतीश कुमार दिलचस्प अंदाज में बताते हैं। वे कहते हैं कि लड़कियों को साइकिल दी तो लड़के कुछ कुम्हला गए इसलिये सरकार ने सभी बालक- बालिका को साइकिल देने का फ़ैसला किया। इस यात्रा में वह केंद्र की नाइंसाफी का पुराना राग भी अलाप रहे हैं। ख़ास तौर पर केंद्र की सड़क पर बिहार सरकार की तरफ से लगाए गए पैसे का उल्लेख करते हुए वह विपक्षियों से सवाल पूछते हैं कि कौन सा केंद्र का पैसा?
आप कह सकते हैं कि बिहार में तक़रीबन साढ़े चार साल के राज से मिले तजुर्बे और लालू यादव जैसे विपक्षियों के हमलों को झेलते- झेलते, नीतीश कुमार तुर्की- ब- तुर्की जवाब देना भी अच्छी तरह से सीख गए हैं। ख़ामोशी से काम करने वाली उनकी छवि बदल रही है। वह और नेताओं की तरह ही बताते हैं कि दुनिया भर में उनके काम की तारीफ़ हो रही है। अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने उनकी सरकार को सराहा। बिल गेट्स बिहार दौरे पर आए और वॉशिंगटन पोस्ट में उनकी सरकार की तारीफ़ छपी। नीतीश कहते हैं कि जब लोग उनसे इस कायाकल्प का राज पूछते हैं तो मैं कहता हूं कि मैने कुछ नहीं किया बल्कि बिहार के लोगों के संकल्प की वजह से ऐसा संभव हो पाया।
नीतीश कुमार जब भी ऐसा कहते हैं तो मुझे लालू प्रसाद यादव का रेल मंत्री रहते अक्सर दिया जाने वाला बयान याद आता है। आत्ममुग्ध लालू कहा करते थे कि जब लोग रेलवे को घाटे से उबारने का रहस्य पूछते हैं तो मैं कहता हूं कि अभी तो किया है जादू और बाकी है टोना। लालू यादव के रेल मंत्री रहते आईआईएएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में रेल के घाटे से उबरने की गाथा शोध का विषय रही। बिहार के मुख्यमंत्री रहते हुए लालू यादव की वह मुहिम भी याद आ रही है जब उनकी सरकार ने चरवाहा विद्यालय खोले थे। ग़रीब -गुरबों की बस्तियों में जाकर लालू यादव ने गंदगी में सने बच्चों को नहलाने- बाल कटवाने और उन्हें साक्षर करने का कार्यक्रम शुरू किया था। उस वक्त नामीगिरामी पत्र- पत्रिकाओं ने लालू की इस मुहिम को काफी सराहा था। ऐसे ही कुछेक अच्छे कामों के बूते बिहार में लंबे अरसे तक लालू यादव का राज रहा।
फिर आते हैं नीतीश कुमार पर। विश्वास यात्रा के दौरान नीतीश कुमार लोगों को बिहार की तरक्की की जो सूरत दिखाते हैं, वह विपक्षी दलों के साथ –साथ किसी को भी अविश्वसनीय लग सकता है। वह बिहार में जितने भयमुक्त समाज की तस्वीर पेश करते हैं, उसमें बड़ी शंकाएं हैं। नीतीश कुमार का बिहार अगर वास्तव में इतना ही चमक रहा है, तो आख़िरकार निवेशक अबतक बिहार से कतराते क्यों रहे हैं। सड़क जैसे मसले पर निश्चय ही उनकी सरकार ने बेहतर किया है लेकिन जिन- जिन मोर्चों पर सरकार फेल हुई है, उसके लिये नीतीश कुमार केंद्र सरकार के असहयोग का पुराना राग अलापते देर नहीं लगाते। बानगी के तौर पर नीतीश कहते हैं कि राज्य में बिजली इसलिये नहीं है क्योंकि कोयला पर केंद्र का अधिकार है और केंद्र सरकार इसके लिए मंजूरी नहीं दे रही है। कोसी प्रभावित लोगों के लिए सरकार इसलिये मदद नहीं कर पाई क्योंकि केंद्र सरकार ने दूसरे राज्यों को तो सहायता दी लेकिन बिहार को विशेष पैकेज नहीं दिया। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने से पहले नक्सली बिहार के जिन सीमित जिलों तक सिमटे हुए थे, उनके राज के दौरान नक्सलियों की सक्रियता का विस्तार हुआ। नक्सलवाद की समस्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झूलती रही है। जाहिर है कि बिहार में भी नीतीश कुमार की सरकार ने और राज्यों की तरह केंद्र सरकार पर ही इसका ठीकरा फोड़ा।
अपनी सत्ता के शुरुआती दिनों में एक ख़ामोश नेता के तौर पर राज्य की कमान संभालने वाले नीतीश कुमार की अगुवाई में उनका खुद का संगठन कमजोर होता गया। जेडीयू कमजोर हुआ और जाने- अनजाने नीतीश कुमार का इसमें अहम किरदार देखा जा सकता है। बिहार की चुनावी बेला में अगर देखें तो जेडीयू के सामने कई संकट हैं। अलग- अलग नेताओं के साथ जेडीयू से जुड़े जातीय गुट बहुत कुछ छिटक रहे हैं। दिग्विजय सिंह, प्रभुनाथ सिंह, ललन सिंह, नागमणि, एजाज अली सहित कई बड़े नेता या तो बागी हो चुके हैं या निकाले जा चुके हैं। अब पार्टी में नीतीश की कद- काठी का कोई दूसरा नेता उनके दल में नहीं है। ऊपर से अगड़े वर्ग के मतदाता बंटाईदारी कानून को लेकर नीतीश कुमार पर शंकाएं कर रहे हैं, जिसका ख़ामियाजा चुनाव में जेडीयू की उठाना पड़ सकता है। ख़ास बात ये है कि ये सभी नेता नीतीश विरोधियों के साथ एकजुट हो रहे हैं। इस गुट ने अगर थोड़ा ही सही चुनावों में नीतीश एंड कंपनी को नुकसान पहुंचाया तो यह काफी भारी पड़ सकता है।

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