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Thursday, June 24, 2010

नीतीश के रूठने के मायने


बिहार में सत्ताधारी बीजेपी- जेडीयू गठबंधन पर गंभीर संकट है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई में इस गठबंधन ने राज्य में साढ़े चार वर्षों तक शासन किया है। इसी गठबंधन की सरकार ने बिहार में लालू `राज' को पीछे छोड़ते हुए विकास की नई संभावनाएं तलाशी। सामूहिक नरसंहार और पिछड़ेपन के लिये बदनाम रहा बिहार, पहली बार राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फलक पर विकास के लिए पहचाना गया। यह इसी गठबंधन का शासन था, जिसकी प्रशंसा अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने की और न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी इसे सराहा। यह जेडीयू- बीजेपी गठबंधन की ही सरकार थी जिसमें माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स ने कोसी इलाके में खुद जाकर वहां स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाने की पेशकश की।
चुनावी वेला में `सुशासन' के इस गठबंधन वाली सरकार में दरारें साफ दिख रही हैं। अबतक अपने काम के भरोसे चुनावों में उतरने का दावा करने वाले इस गठबंधन के दोनों दल अपने -अपने हित की चिंता ज्यादा करने लगे। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी तस्वीर वाले विज्ञापन से बिफरे नीतीश कुमार बौखलाहट छिपा नहीं पाए। 12 जून को पटना में बीजेपी कार्यकारिणी के दौरान बीजेपी नेताओं को दिया जाने भोज उन्होंने रद्द कर दिया। उससे भी दो कदम आगे बढ़कर उन्होंने पांच करोड़ की सहायता राशि गुजरात सरकार को वापस कर दी। नीतीश कुमार की विश्वास यात्रा में उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने जाने से मना किया तो नीतीश कुमार ने उस इलाके का अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया, जो इलाका बीजेपी नेता और स्वास्थ्य मंत्री नंदकिशोर यादव का था। हालत यहां तक पहुंची कि कैबिनेट की बैठक में बीजेपी मंत्री अपने- अपने कारणों से शामिल नहीं हुए।
विपदा के समय एक राज्य की दूसरे राज्य को दी गई मदद वापस किये जाने की नई परंपरा बिहार से शुरू हुई है। गुजरात की जनता ने कोसी बाढ़ के दौरान मुख्यमंत्री राहत कोष में पांच करोड़ की राशि दी थी, जिसे गुजरात सरकार ने बिहार सरकार को दी थी। बिहार सरकार ने गुजरात सरकार की सहायता राशि वापस किये जाने का फ़ैसला किया और उसे वापस भी कर दिया। ख़ास बात यह है कि सहायता राशि लौटाने का फ़ैसला बिहार सरकार का नहीं बल्कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित उनके दल के मंत्रियों का था। इस अहम फै़सले पर चर्चा के लिए उन्होंने न तो अपने सहयोगी बीजेपी को विश्वास में लिया और न ही उनसे राय मांगी गई। यानी, सरकार के स्तर पर लिया जाने वाला फ़ैसला एकतरफ़ा दलगत स्तर पर लिया गया।
गुजरात सरकार को जो सहायता राशि वापस की गई है, उसे लेकर भी नीतीश कुमार की सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कोसी बाढ़ पीड़ितों के लिये विशेष पैकेज़ नहीं दिये जाने का हवाला देकर केंद्र की यूपीए सरकार की आलोचना करते रहे हैं। लेकिन जब गुजरात की पांच करोड़ की मदद उन्होंने वापस कर दी है, तो सवाल ये है कि आख़िरकार मदद की इस राशि का अबतक उपयोग क्यों नहीं हुआ था ? कोसी की बाढ़ से तबाह हुई एक बड़ी आबादी आज भी मदद की राह देख रही है।
मदद की राशि वापस किये जाने को नीतीश कुमार का चुनावी पैंतरा माना जा रहा है तो इसके पर्याप्त कारण हैं। साढ़े चार साल तक सरकार चलाने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने सहयोगी बीजेपी में सांप्रदायिक चेहरा देख रहे हैं। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी को बिहार नहीं आने देने के लिए दबाव बनाने वाले नीतीश कुमार, चुनाव के तत्काल बाद लुधियाना रैली में नरेंद्र मोदी से सार्वजनिक तौर पर हाथ मिलाते देखे गए। गुजरात के सांप्रदायिक दंगों की वजह से नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी से परहेज है। लेकिन गुजरात दंगे के ख़िलाफ़ न तो नीतीश कुमार और न ही जेडीयू, उस समय की वाजपेयी सरकार से बाहर आने की हिम्मत जुटा पाए।
अब जबकि नीतीश कुमार ठीक विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए की बांह झटकने की ताक़त जुटा पाए हैं तो उनके सामने कई विकल्प हैं। कांग्रेस पहले ही इस गठबंधन के टूटने पर नज़रें गड़ाए बैठा है। या फिर, नीतीश कुमार भी उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की राह पर चलते दिख रहे हैं जिन्होंने उड़ीसा विधानसभा चुनाव से ठीक पहले झटके से बीजेपी का साथ छोड़कर राज्य की सत्ता में दोबारा अकेले दम पर आए। ऐसी परिस्थिति में नीतीश कुमार ने एक नहीं बल्कि कई मौके पर अपनी मंशा जाहिर कर दी है, अब बीजेपी को तय करना है कि जेडीयू के साथ अपने रिश्तों को किस तरह से देखती है।
दरअसल, बीजेपी के सामने जेडीयू के मान- मनौव्वल की मजबूरी भी है। बीजेपी के पास न तो गठबंधन को तोड़ने की ताक़त है और न ही उसके सामने बिहार में जेडीयू जैसे साथी दल का दूसरा विकल्प। आख़िरकार बीजेपी किस क्षेत्रीय ताक़त के भरोसे इस गठबंधन को तोड़ने की हिम्मत जुटाए, उसके सामने सवाल यही है। एनडीए के रूप में पहले ही उसके ज्यादातर साथी दल गच्चा दे चुके हैं। एनडीए के नाम पर बीजेपी के साथ सिर्फ शिवसेना, अकाली दल और जेडीयू ही बड़ी ताकत बचे हैं। नीतीश कुमार को बीजेपी की इस कमजोरी का अहसास है। इसलिये ऐन चुनावी वक़्त पर वह बीजेपी को लगातार झटके दे रहे हैं और उस बैसाखी पर भी आंखें तरेर रहे हैं जिसके भरोसे अबतक सरकार चलाई। उन्हें पता है कि आने वाले समय में उनकी ताक़त बढ़ेगी और उनके सामने संभावनाएं कई हैं। इसलिये बहुत संभव है कि बीजेपी आलाकमान जेडीयू की तमाम शर्तों को मान जाए।

2 comments:

माधव said...

this is all politics

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

जंग और सियासत में सब कुछ सम्भव है!