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Monday, June 28, 2010

रामनाम सत है!


नेता आख़िरकार नेता ही होता है। उसका सार्वजनिक जीवन, उसकी निज़ी ज़िंदगी, दोनों पर राजनीति का मुलम्मा चढ़ा होता है। अब तो लगता है कि बीवी- बच्चों के साथ भी उसके भीतर का नेता हमेशा सतर्क रहता होगा। राजनीति के साथ नेता जीते हैं, राजनीति के साथ ही मरते हैं। राजनीति चल रही है तो नेता को ज़िंदा मानिये, राजनीति ख़त्म तो नेता भी ख़त्म। लेकिन पिछले दिनों एक अच्छे नेता वाक़ई दुनिया छोड़ गए... हालांकि उनकी राजनीति अभी बहुत पड़ी थी। राजनीति ख़त्म नहीं हुई थी, दिग्विजय सिंह की ज़िंदगी ख़त्म हो गई।
दिग्विजय सिंह इसबार बांका संसदीय सीट से निर्दलीय चुनाव लड़कर जीते थे। उन्होंने नीतीश कुमार की अगुवाई में जेडीयू का यह मुग़ालता तोड़कर रख दिया था कि उन्हें चुनावी जीत के लिए जेडीयू की ज़रूरत है। जिस पार्टी को सींचकर बड़ा किया था, नीतीश कुमार की हनक में उसी पार्टी से उनका पत्ता साफ कर दिया गया था।
निर्दलीय चुनावी जीत के बाद भी नीतीश कुमार एंड कंपनी ने अपनी भूल को करेक्ट करने की कोई कोशिश नहीं की। जिस तरह से जॉर्ज फर्नांडीज़ का टिकट काटकर पार्टी ने दोबारा उन्हें राज्यसभा में भेज दिया, वह कलेजा नीतीश कुमार, दिग्विजय सिंह के मामले में नहीं दिखा पाए। ख़ैर, यह तो दिग्विजय सिंह के जीते- जी की राजनीति थी। उनके निधन की ख़बर पर नीतीश कुमार मीडिया के सामने आए। उन्होने विश्वास यात्रा पर निकलने से पहले पत्रकारों से बात की। इसबार दिग्विजय सिंह के बारे में नीतीश कुमार के पास कहने को ख़ास नहीं था। फिर भी कहा कि `उनके निधन पर गहरा दुख है। वह एक लोकप्रिय नेता थे और उनके समर्थकों- दोस्तों का दायरा बहुत बड़ा था।‘
कुछ घंटे के भीतर नीतीश कुमार जहानाबाद पहुंच गए, जहां उनकी विश्वास यात्रा का कार्यक्रम था। कुछ घंटे पहले तक मातमी हावभाव में दिख रहे नीतीश कुमार जनसभा को संबोधित करते हुए पूरी रौ में थे। वह अपनी सरकार की उपलब्धियां गिना रहे थे। विरोधियों पर हुंकार भर रहे थे। जनता- जनार्दन तालियां बजा रही थी।
यह तो बिहार की राजनीति थी। दिल्ली में भी दिग्विजय सिंह के आवास पर कुछ ऐसा ही मंज़र देखने को मिला। जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव ने ग़मगीन मुद्रा में बीजेपी के यशवंत सिन्हा को गले लगाया। ...चलते- चलते वहां खड़े कुछ बड़े पत्रकारों की खैरियत पूछी... जया जेटली की आंखों से भी आंसू निकले। एक बड़े कांग्रेसी नेता अफसोस के साथ बता रहे थे कि दिग्विजय सिंह को कांग्रेस में शामिल किये जाने की पूरी पटकथा उन्होंने तैयार कर दी थी... लेकिन उससे पहले ही वह दुनिया छोड़ गए।
दूसरे दिन दिग्विजय सिंह का पार्थिव शरीर ट्रेन के जरिये उनके पैतृक गांव जा रहा था। अपने कैबिनेट में मंत्री रहीं सुधा श्रीवास्तव के अंतिम संस्कार के लिए समय नहीं निकाल पाए नीतीश कुमार पटना स्टेशन पर दिग्विजय सिंह को अंतिम विदाई देने पहुंचे। नीतीश कुमार ने दिग्विजय सिंह को याद किया। यहां लालू प्रसाद यादव भी पहुंचे। उन्होंने दिग्विजय सिंह को याद करते हुए उन्हें महान नेता बताया। यह बताना नहीं भूले कि पटना के गांधी मैदान में दिग्विजय सिंह की अगुवाई में राज्य सरकार के ख़िलाफ़ महापंचायत हुई थी। लालू की शिकायत थी कि मरने के बाद भी राज्य सरकार दिग्विजय सिंह को उचित सम्मान नहीं दे पाई। दिग्विजय सिंह के पैतृक गांव नयागांव में उनकी अंतिम यात्रा निकाली गई... कई नेता भीड़ में शामिल थे। छोटे- बड़े सभी। अंतिम यात्रा में शामिल लोग ग़मगीन मुद्रा में बोल रहे थे- रामनाम सत है।

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सत्य वचन!

Udan Tashtari said...

दिग्विजय सिंह जी को श्रृद्धांजलि!