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Tuesday, July 27, 2010

बाज़ार में बनारस

हमारे मित्र पत्रकार राकेश पाठक ने अपने शहर बनारस को दिलचस्प अंदाज़ में याद किया है। आप भी पढ़ें, मजा आएगा। उनके ब्लॉग - इस मोड़ पर- से उड़ाया गया हैः संजीव
मेरा शहर है बनारस, जब आप कभी यहां आएंगे तो हो सकता है कि इसकी गुनगुनी तासीर में एक एक लम्स मेरा भी मिल जाए। खैर... बचपन में जब आप पिता जी की अंगुलियों को पकड़कर किसी शहर को बस और बस खुद के नज़रिए से देखने के लिए निकलते हैं तो कितना नया लगता है सब वैसा ही मुझे भी लगता था। कबीर चौरा चौराहे पर सोमनाथ चचा की पान की दुकान। जिसपर ब्रास की चद्दर चढ़ी चौकी पर लाल रंग के कपड़े में भीगे हुए पान लिपटे रखे रहते थे। शाम के वक्त बाबूजी के साथ उस दुकान तक पहुंचना मेरे लिए लंबा सफर था जो पहले पैदल फिर उनकी गोद में बैठकर पूरा होता था और रोचक होता था। अब ये सफ़र बहुत छोटा है बमुश्किल पांच से सात मिनट का पैदल...उबाऊ नहीं कहुंगा क्योंकि इतने कम वक्त में आप ऊब भी नहीं सकते। उनकी दुकान पर पहुंच कर मैं उस दुकान के पूरे कैरेक्टर को खामोश निगाहों से खोजता...सोमनाथ तो मिलते ही...उनके भाई मदन और उनकी मां...जिन्हे मैं देखता डरने के लिए था। मुझे सोमनाथ चचा कतई पसंद नहीं थे...अक्सर अकड़ में रहते हां पहुंचने पर ये उसी भावभंगिमा के साथ ये ज़रूर बोलते 'गुरूजी पालगी' और खिस्स से हंस देते वो और वहां खड़े सभी। मेरी मुट्ठियां बाबूजी के उंगली के इर्द-गिर्द और भिंच जाती। क्योंकि मुझे सबका अटेंशन पाने से परेशानी होती।एक छोटा मीठे पान का बीड़ा मेरे लिए भी होता था कभी-कभी। जिसे सोमनाथ चचा चुपचाप मेरे तक बढ़ा देते और मैं बाबूजी की तरफ सर उठाकर देखता और फिर सहमति मिलते ही उसी स्टाइल से दबा भी लेता। मेरी कोशिश ये होती थी कि जल्द से जल्द यहां से निकला जाए कहीं सोमनाथ चचा की मां न आ जाएं...पर किस्मत अक्सर खराब ही होती थी। वो कभी दुकान के अंदर से या फिर बाहर से चिल्लाते हुए आ ही जाती थीं। सफेद मटमैली धोती...वैसे ही बाल और चेहरे पर दुनिया भर से चिढ़े हुए भाव...और मुंह में गालियां। वो मुझे किसी कहानी की बुढ़िया जादूगरनी लगती थीं। गुस्सा हांलाकि उनके नाक पर होता था लेकिन मुझसे स्नेह था...सोमनाथ चचा से पूछतीं कि बच्चा के पान खिउवले...?कबीर चौरा दरअसल बनारस का क्लासिकल इलाका है। बनारस का 'दर्शन' अगर घाटों पर है तो 'शास्त्रीय बनारस' कबीर चौरा पर। शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना, कबीर चउरा से नागरी नाटक मंडली के बीच सड़क उस पार बसा है। पं कंठे महराज, उसके बाद गुदई महाराज, किशन महाराज, राजन-साजन मिश्र, बिरजू महाराज सब एक ज़माने में कबीर चौरा चौराहे से लेकर पिपलानी कटरा तक झूलते थे। गोपी की दुकान पर कचौड़ी सरियाते और भईया लाल की दुकान पर चाय के साथ गप-सड़ाका लगाते थे। मेरे बचपन में कबीर चौरा चौराहा और पिपलानी कटरा के बीच (जो एक किमी से भी कम क्षेत्र है) कम से कम चार किताबों की दुकानें थीं। यहां कोर्स की किताबों के अलावा स्टेशनरी मिला करती थी। इसके अलावा एक पत्र-पत्रिकाओं की दुकान हुआ करती थी। आज इस इलाके में एक भी किताबों की दुकान नहीं। इसका मतलब ये कतई नहीं कि दुकानें नहीं रहीं दुकाने तो पहले से ज्यादा हैं लेकिन कुछ में इंटरनेट कैफे है...और कहीं तो ठंडी बियर की दुकान तक खुल गई है। कांबिनेशन देखिए एक मंदिर है हनुमान जी का और उसके बगल में है ठंडी बियर की दुकान। बनारस एक समय में मोक्ष की नगरी थी। पर माफ किजिएगा अब नहीं है। पहले यहां की फिज़ां में भांग की मस्ती होती थी। अब दारू की दुर्गंध है। सड़क के मकान दुकानों में तब्दील हो गए हैं। गली के मकान कटरों में। मंदिरों के चारदिवारियों को भी दुकानों में बदल दिया गया है। और मंदिर तो दुकान हैं ही। एक अजीब सा घालमेल चल रहा है। ये उन्ही लोगों की साज़िश है जो बनारस के हैं और बनारस को ज़िंदा नहीं रखना चाहते। विकास बाज़ार का हो रहा है, बनारस का नहीं। ये बाज़ार बनारस में किसी कैंसर की तरह पनप रहे हैं। बनारस की धमनियों रक्त रूक-रूक के दौड़ता है आजकल। यही वजह है कि जब आप बनारस आते हैं तो घुटते शहर को देखकर आपको भी अफनाहट हो सकती है। सड़के जाम है, गलियां की बजबजाती रहती हैं भीड़ से, दुकानों से और ओवर फ्लो होते सीवर से। जानेमाने लेखक और समीक्षक काशी नाथ सिंह जी ने 'काशी की अस्सी' में जिस काशी का ज़िक्र किया है जिन कैरेक्टर्स को खींचा है उनमें से आज एक भी बनारस में ज़िंदा नहीं। पहले वो कैरेक्टर बनारस की हर चाय की दुकान, पान की दुकान पर या फिर गलियों में नज़र आते थे। अब लोग भांग का कर बौराते नहीं है दारू पीकर नालियों में लुढ़कते हैं और मक्खियों से लिपटे पाए जाते हैं। होश आने पर नज़रें शर्म से झुकती नहीं बल्कि उजड्डों की तरह घूरती निकल जाती हैं। उजड्ड लफंगों की टोली बनारसी मस्ती के नाम पर नंगा नाच करती है हाथों में दारू की बोतल और मुंह में चिकन की टुकड़ा दबाए। ये टोली हर त्योहार में पाशविक हो उठती है। बनारस को बेचती ऐसी कई टोलियां आपको जाने पहचाने इलाकों में मिलेंगी...ये नए बनारस के 'बाज़ार संस्कृति' की संकर औलादें हैं जो बनारस को बुझाने और इसकी तासीर बर्बाद करने का षडयंत्र रच रही हैं। इन्हे देखकर लगता है कि वो दिन दूर नहीं जब बनारस किसी बाज़ार में बिकता नज़र आएगा...या फिर तेज़ी से बनते बाज़ार के ब्लैक होल में समा जाएगा।

Thursday, July 22, 2010

गोलकीपरों की नियति

फुटबॉल को लेकर आप क्या राय रखते हैं ?...आपको किस पोजीशन में खेलने वाला खिलाड़ी पसंद है ? ज़ाहिर है कि सेंटर फॉरवर्ड से खेलने वाले खिलाड़ी को ही आप पसंद करेंगे। जो गोल दागता है। विरोधियों को पछाड़ाता, उनकी सांसें उखाड़ता, किसी सनसनी की तरह चक्रव्यूह को तोड़ता, उनके दुर्ग यानी डी एरिया तक पहुंच जाता है। आख़िर में गोल दागकर खुशियां मनाता, अपने खेमे की तरफ लौटता है या फिर गोल नहीं कर पाने का अफसोस लिये।
फुटबॉल भी अजब खेल है। इस खेल में अलग- अलग पोजीशन से खेलने वाले ख़िलाड़ियों के साथ न्याय नहीं होता है। अगली पंक्ति के ख़िलाड़ियों को आप शायद ही खेल प्रेमियों के बीच `खलनायक' के तौर पर पाते हैं। कभी- कभी, गोल करने का आसान -सा मौक़ा चूक जाने पर आप उस खिलाड़ी को कोसते हैं लेकिन उसे मैच के ख़लनायक के तौर पर शायद नहीं देखते।
अगली पंक्ति के यही खिलाड़ी जब गोल- दर- गोल दागते हैं तो प्रशंसकों पर उनका करिश्मा सिर चढ़कर बोलता है। फुटबॉल के ज्यादातर स्टार खिलाड़ी, इसी अगली पंक्ति से खेलने वाले हुए। पेले हों या फिर मेराडोना। बेकहम हों या फिर रोनाल्डो। अगली पंक्ति में खेलने वाले स्टार खिलाड़ियों के नामों की फेहरिस्त लंबी है।
अगली पंक्ति के इन खिलाड़ियों के साथ कुछ सुविधाएं भी हैं। ये खिलाड़ी अगर अपनी टीम के लिए गोल करते रहें तो मैच हारने के बाद भी उनके पास स्टार बने रहने के अवसर हैं। उनके साथ प्रशंसकों की यह सहानुभूति हमेशा बनी रहती है कि उस खिलाड़ी ने अपना काम बख़ूबी किया।
इसके बरअक़्स कभी गोलकीपर की स्थिति पर ग़ौर करें तो आप हैरान रह जाएंगे। गोलकीपर मैदान में खड़ा अकेला खिलाड़ी होता है, जिसके पास गोल दागने की कोई गुंजाइश नहीं होती। उसके पास गोल दागने के बाद अपनी जर्सी को मैदान में उतारकर खुशियां मनाने का अवसर कभी नहीं होता।
आप कह सकते हैं कि गोलकीपर हथियार नहीं ढाल हैं। एक गोलकीपर के तौर पर वह सिर्फ विरोधियों के आक्रमण को विफल भर कर सकता है। गोल रोकने की उसकी हर तरतीब, हर बाज़ीगरी और कोशिश, ड्यूटी के तौर पर ली जाती है। कभी- कभार ही उसे दर्शकों की तालियां नसीब होती हैं।
गोलकीपरों के लिए दर्शकों के बीच स्टार का दर्ज़ा हासिल कर पाना बेहद मुश्किल होता है। गोलकीपर अगर टीम का कप्तान हो, तो उसका भाग्य जरूर संवर सकता है। मसलन, हाल की विश्वकप विजेता स्पेन की टीम के कैप्टन केसिलास का उदाहरण सामने है। लेकिन यहां भी केसिलास की गोलकीपर के तौर पर हासिल की गई उपलब्धियां बहुत चर्चा में नहीं हैं, बल्कि विश्वकप विजेता टीम के कप्तान की हैसियत से उनकी चर्चा है। जबकि इसी विश्वकप में कैसिलास, सर्वश्रेष्ठ कप्तान के साथ- साथ सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर भी चुने गए।
गोलकीपरों की हैसियत, क्रिकेट के विकेटकीपर से भी बहुत कम होती है। क्रिकेट में विकेटकीपर, बैट्समैन को स्टम्प कर आउट कर सकता है या फिर विकेट के पीछे शानदार कैच कर किसी भी छोटे- बड़े बैट्समैन को पवेलियन के लिये भेज सकता है। लेकिन गोलकीपरों के पास क्या गोल कर पाने का कोई अवसर है ? वे गोल खा सकते हैं, गोल कर नहीं सकते।
विकेटकीपर के मुकाबले गोलकीपरों को देखें तो एक और चीज़ सामने आती है। विकेटकीपर जितनी बार बल्लेबाज को स्टम्प करता है, यह उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों में दर्ज़ भी होता है। फुटबॉल में खिलाड़ी जितनी भी गोल करता है, यह भी उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों में दर्ज़ होता है। लेकिन गोलकीपर की तक़दीर देखिये, उन्होंने कितने गोल रोके, कितनी दफ़ा गोल रोकने के उसके तजुर्बे ने टीम को निश्चित हार से बचा लिया, यह उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों में कहीं दर्ज़ नहीं होता। एक गोलकीपर जब अपना खेल करियर ख़त्म करता है तो उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों में आख़िरकार क्या होता है ? महज़ शून्य या फिर फक़त गोल।
गोलकीपरों की मायूसियों का सबब इतना भर नहीं है। प्रशंसकों में भी गोलकीपर की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। ज्यादातर नज़दीकी मुक़ाबलों में गोलकीपर अगर हारी हुई टीम का सदस्य है, तो उसके ख़ाते में सिर्फ आलोचना आती है। टीम की हार का ज्यादातर ठीकरा सबसे पीछे खड़े उस अकेले खिलाड़ी पर फूटता है, जिसके पास कोई करिश्मा कर दिखाने का मौक़ा नहीं होता।
अभी फुटबॉल विश्वकप के दौरान हुए इंग्लैंड और अमेरिका के बीच हुए ग्रुप सी के पहले मुक़ाबले को ही याद करें। माना गया कि शुरुआती बढ़त के बावज़ूद इंग्लैंड के गोलकीपर रॉबर्ट ग्रीन की भयंकर भूल की वज़ह से यह मैच ड्रॉ हो गया। फुटबॉल के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जब मैच के खलनायकों के तौर पर गोलकीपरों को चिह्नित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई।
जबकि टीम अगर जीतती है तो कभी गोलकीपरों की वज़ह से नहीं बल्कि अगली पंक्ति के खिलाड़ियों के कारण जीतती है। अगली पंक्ति के खिलाड़ी ही विपक्षी खेमे पर गोल दागकर टीम को जीत तक ले जाते हैं, जिसमें गोलकीपरों की कोई भूमिका नहीं होती है। इसलिये गोलकीपरों को टीम की हरेक जीत में ही अपनी खुशी भी ढूंढ़नी होती है और टीम की हरेक हार की जिम्मेदारी स्वीकारने का उसे जैसे अभिशाप होता है। थोड़े ख़ुशनसीब वे गोलकीपर हैं जो अपनी टीम के कप्तान हैं और क़ामयाब कप्तान के तौर पर वे शोहरत बटोरते हैं। यानी, फुटबॉल की इसबार की विश्वविजेता टीम स्पेन के कैप्टन केसिलास की तरह दूसरे गोलकीपरों का भाग्य इतना बुलंद नहीं है।

Tuesday, July 13, 2010

हैप्पी बर्थ डे पापा...

पत्रकार अमृत उपाध्याय ने अपने पिता को उनके जन्मदिन पर याद किया हैः संजीव
13 जुलाई,मेरे लिए बेहद ख़ास तारीख़, कथाकार और पत्रकार रामेश्वर उपाध्याय का न्मदिन है आज। रामेश्वर उपाध्याय की पहचान एक सशक्त लेखक, जुझारू पत्रकार और ज़िंदादिल इंसान के तौर पर सबसे ज़्यादा रही। चौहत्तर के आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने के साथ-साथ कलम की बदौलत बदलाव की उनकी कोशिश जारी रही। 'मीसा' के तहत नजरबंदी के दौरान ‘नागतंत्र के बीच’ उपन्यास की रचना, चर्चित कहानी संग्रह ‘दुखवा में बीतल रतिया’ और 'गृहयुद्ध' उपन्यास लिखा उन्होंने। बतौर पत्रकार रामेश्वर उपाध्याय ने 'नवभारत टाइम्स', 'धर्मयुग', 'श्रीवर्षा', 'रविवार' और 'न्यूज ट्रैक' जैसे अख़बारों और पत्रिकाओं में लगातार लिखा।‘भोजपुर न्यूज’ अख़बार का संपादन किया। अख़बार और खुद पर कई मुकदमे हो जाने की वजह से उन्होंने वकालत शुरू की।
ये सारी बातें मैं इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि अब से 13 साल पहले 19 अक्टूबर 1997 को रामेश्वर उपाध्याय की हत्या कर दी गई। हत्या के 13 साल बाद, 13 जुलाई को इन बातों का जिक्र इसलिए करना पड़ा क्योंकि उस दौर से इस दौर के बीच का तार कहीं टूट ना जाए। मुझे फ़क्र है बेहद, कि मैं रामेश्वर उपाध्याय का बेटा हूं, और अफसोस, कि उनके जैसे बनने की बचपन से चल रही कोशिश में मैं 99 फीसदी पीछे रह गया। रामेश्वर उपाध्याय से जुड़ी कुछ तस्वीरें और अहमियत वाली कुछ चीज़ें ब्लॉग पर जारी कर रहा हूं। दरअसल मैंने कुछ और लिखा है उनकी याद में, लेकिन यादों को सिलसिलेवार काग़ज़ पर उतारते वक्त काफी लंबा लिख दिया मैंने। अब संकोचवश इसे नहीं जारी कर रहा हूं फिलहाल।(ऊपर:मीसा के तहत नजरबंदी के बाद की तस्वीर)
(कमलेश्वर के साथ तमाम लेखकों की ये दुर्लभ तस्वीर है शायद, तस्वीर में बीच में कमलेश्वर हैं, उनके बायें हाथ के ठीक पीछे प्रेम कुमार मणि, उनके हाथ से सटे ठीक बायें मधुकर सिंह, और इन दोनों के बीच में पीछे रामेश्वर उपाध्याय...तस्वीर में दाहिने से दूसरे नंबर पर, जिनका हाथ एक बच्चे के कंधे पर है, वो हैं हृषिकेश सुलभ , सारे लेखकों को मैं दरअसल नहीं पहचान सका हूं अबतक)

Tuesday, July 6, 2010

मीडिया, माही और महंगाई

मेरे एक मित्र ने भारत बंद को लेकर एक दिलचस्प सवाल पूछ दिया। उनका कहना था कि रविवार की बजाय सोमवार को भारत बंद के दौरान अगर महेंद्र सिंह धोनी शादी करते तो मीडिया में भारत बंद की हवा निकल जाती। हालांकि मेरा कहना था कि मीडिया में धोनी की शादी का बैंड बज जाता।
रविवार को धोनी की शादी और सोमवार को भारत बंद गुजर जाने के बाद मुझे अपनी ग़लती का अहसास हो गया है। धोनी की शादी चाहे भारत बंद के दौरान होती या फिर मुल्क पर आई किसी हाहाकारी कुदरती आपदा के वक़्त, टीवी स्क्रीन पर धोनी की शेरवानी, घोड़ा और शादी पर पकवान बनाने वाले हलवाई ही नज़र आते।
शादी के दूसरे दिन सोमवार को जब धोनी देहरादून से दिल्ली के लिये रवाना हो चुके थे, कई चैनलों पर उस रिसॉर्ट की तस्वीरें दिखाई जा रही थी। चारों तरफ़ बिखरे बासी फूल और ऊंघते- अनमनाते माहौल में पसरे हुए फर्नीचरों के सिवा वहां आख़िरकार क्या होता?.. वही थे। प्राइम टाइम में कई चैनलों ने इसे दिखाया।
शादी में मीडिया के लिए दरवाजे बाक़ायदा बंद थे। बावजूद इसके खबरचियों ने जान पर खेलकर `ख़ास आपके लिये' शादी की कुछ तस्वीरें हासिल कर ली थी। उन तस्वीरों को कुछ इस अंदाज़ में दर्शकों/ पाठकों के सामने परोसा गया, जैसे ये तस्वीरें न होती तो मीडिया की नाक कट गई होती।
कुछ चैनल धोनी की शादी से उनके क्रिकेट करियर पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में बता रहे थे। क्रिकेट विशेषज्ञ बता रहे थे कि कुछ पत्नियां इतनी लकी होती हैं कि मर्द की तक़दीर खुल जाती है। धोनी की पत्नी साक्षी भी उनके लिये लकी होंगी और माही इसबार क्रिकेट वर्ल्ड कप लेकर आएंगे। कुछ चैनल अतीत में क्रिकेटरों के मोहब्बत की दास्तां और शादी के रूप में उसकी परिणति के बारे में बता रहे थे।
मीडिया की मनोदशा पर समाजवादी नेता शरद यादव बिफ़र गए। दिल्ली में सोमवार को भारत बंद के बाद हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने खूब खरी -खोटी सुनाई। उनका कहना था `देश की करोड़ों जनता के सवाल को दरकिनार कर मीडिया, धोनी के ब्याह की ख़बरें दिखाता रहा। महंगाई के ख़िलाफ़ भारत बंद की ख़बरें चैनलों पर बहुत नहीं थी।'
क्या मीडिया को लेकर शरद यादव की शिक़ायत वाज़िब है? मीडिया की जरूरत ड्रामा है। सनसनी है। ग्लैमर है। शरद जी को ध्यान हो न हो, पॉलिटिकल ड्रामे के वक़्त मीडिया में नेता ही तो छाये रहते हैं। अभी हाल में नरेंद्र मोदी को लेकर बीजेपी- जेडीयू की वर्षों पुरानी मुहब्बत में आई तक़रार की ख़बरें क्या कम थीं?
पॉलिटिक्स में अगर ग्लैमर का तड़का हो तो वह भी तो खूब दिखाया जाता है। याद न हो तो अपने शशि थुरूर साहब प्रकरण को ही देख लीजिये।...तो शरद जी, ख़्वामख़ाह मायूस न हों। आपका भी ड्रामे का मंच है। आप भी अपने रंगकर्मियों को तैयार कीजिये। वे जब जलवा अफ़रोज़ होंगे तो टीवी स्क्रीन पर छा जाएंगे। मीडिया हर प्रकार के ड्रामे को महंगाई की मार से हलकान देश की जनता की थाली में परोसने को तैयार है।

Friday, July 2, 2010

Vinod Dua sings Ude Jab Jab Jhulfen Teri with wife Chinni.flv

वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ और उनकी धर्मपत्नी, शादी के एक समारोह में अपनी जुगलबंदी से मजा बांध दिया। youtube पर भी उपलब्ध है। सुनिये और आप भी गुनगुनाइयेः संजीव