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Thursday, July 22, 2010

गोलकीपरों की नियति

फुटबॉल को लेकर आप क्या राय रखते हैं ?...आपको किस पोजीशन में खेलने वाला खिलाड़ी पसंद है ? ज़ाहिर है कि सेंटर फॉरवर्ड से खेलने वाले खिलाड़ी को ही आप पसंद करेंगे। जो गोल दागता है। विरोधियों को पछाड़ाता, उनकी सांसें उखाड़ता, किसी सनसनी की तरह चक्रव्यूह को तोड़ता, उनके दुर्ग यानी डी एरिया तक पहुंच जाता है। आख़िर में गोल दागकर खुशियां मनाता, अपने खेमे की तरफ लौटता है या फिर गोल नहीं कर पाने का अफसोस लिये।
फुटबॉल भी अजब खेल है। इस खेल में अलग- अलग पोजीशन से खेलने वाले ख़िलाड़ियों के साथ न्याय नहीं होता है। अगली पंक्ति के ख़िलाड़ियों को आप शायद ही खेल प्रेमियों के बीच `खलनायक' के तौर पर पाते हैं। कभी- कभी, गोल करने का आसान -सा मौक़ा चूक जाने पर आप उस खिलाड़ी को कोसते हैं लेकिन उसे मैच के ख़लनायक के तौर पर शायद नहीं देखते।
अगली पंक्ति के यही खिलाड़ी जब गोल- दर- गोल दागते हैं तो प्रशंसकों पर उनका करिश्मा सिर चढ़कर बोलता है। फुटबॉल के ज्यादातर स्टार खिलाड़ी, इसी अगली पंक्ति से खेलने वाले हुए। पेले हों या फिर मेराडोना। बेकहम हों या फिर रोनाल्डो। अगली पंक्ति में खेलने वाले स्टार खिलाड़ियों के नामों की फेहरिस्त लंबी है।
अगली पंक्ति के इन खिलाड़ियों के साथ कुछ सुविधाएं भी हैं। ये खिलाड़ी अगर अपनी टीम के लिए गोल करते रहें तो मैच हारने के बाद भी उनके पास स्टार बने रहने के अवसर हैं। उनके साथ प्रशंसकों की यह सहानुभूति हमेशा बनी रहती है कि उस खिलाड़ी ने अपना काम बख़ूबी किया।
इसके बरअक़्स कभी गोलकीपर की स्थिति पर ग़ौर करें तो आप हैरान रह जाएंगे। गोलकीपर मैदान में खड़ा अकेला खिलाड़ी होता है, जिसके पास गोल दागने की कोई गुंजाइश नहीं होती। उसके पास गोल दागने के बाद अपनी जर्सी को मैदान में उतारकर खुशियां मनाने का अवसर कभी नहीं होता।
आप कह सकते हैं कि गोलकीपर हथियार नहीं ढाल हैं। एक गोलकीपर के तौर पर वह सिर्फ विरोधियों के आक्रमण को विफल भर कर सकता है। गोल रोकने की उसकी हर तरतीब, हर बाज़ीगरी और कोशिश, ड्यूटी के तौर पर ली जाती है। कभी- कभार ही उसे दर्शकों की तालियां नसीब होती हैं।
गोलकीपरों के लिए दर्शकों के बीच स्टार का दर्ज़ा हासिल कर पाना बेहद मुश्किल होता है। गोलकीपर अगर टीम का कप्तान हो, तो उसका भाग्य जरूर संवर सकता है। मसलन, हाल की विश्वकप विजेता स्पेन की टीम के कैप्टन केसिलास का उदाहरण सामने है। लेकिन यहां भी केसिलास की गोलकीपर के तौर पर हासिल की गई उपलब्धियां बहुत चर्चा में नहीं हैं, बल्कि विश्वकप विजेता टीम के कप्तान की हैसियत से उनकी चर्चा है। जबकि इसी विश्वकप में कैसिलास, सर्वश्रेष्ठ कप्तान के साथ- साथ सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर भी चुने गए।
गोलकीपरों की हैसियत, क्रिकेट के विकेटकीपर से भी बहुत कम होती है। क्रिकेट में विकेटकीपर, बैट्समैन को स्टम्प कर आउट कर सकता है या फिर विकेट के पीछे शानदार कैच कर किसी भी छोटे- बड़े बैट्समैन को पवेलियन के लिये भेज सकता है। लेकिन गोलकीपरों के पास क्या गोल कर पाने का कोई अवसर है ? वे गोल खा सकते हैं, गोल कर नहीं सकते।
विकेटकीपर के मुकाबले गोलकीपरों को देखें तो एक और चीज़ सामने आती है। विकेटकीपर जितनी बार बल्लेबाज को स्टम्प करता है, यह उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों में दर्ज़ भी होता है। फुटबॉल में खिलाड़ी जितनी भी गोल करता है, यह भी उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों में दर्ज़ होता है। लेकिन गोलकीपर की तक़दीर देखिये, उन्होंने कितने गोल रोके, कितनी दफ़ा गोल रोकने के उसके तजुर्बे ने टीम को निश्चित हार से बचा लिया, यह उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों में कहीं दर्ज़ नहीं होता। एक गोलकीपर जब अपना खेल करियर ख़त्म करता है तो उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों में आख़िरकार क्या होता है ? महज़ शून्य या फिर फक़त गोल।
गोलकीपरों की मायूसियों का सबब इतना भर नहीं है। प्रशंसकों में भी गोलकीपर की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। ज्यादातर नज़दीकी मुक़ाबलों में गोलकीपर अगर हारी हुई टीम का सदस्य है, तो उसके ख़ाते में सिर्फ आलोचना आती है। टीम की हार का ज्यादातर ठीकरा सबसे पीछे खड़े उस अकेले खिलाड़ी पर फूटता है, जिसके पास कोई करिश्मा कर दिखाने का मौक़ा नहीं होता।
अभी फुटबॉल विश्वकप के दौरान हुए इंग्लैंड और अमेरिका के बीच हुए ग्रुप सी के पहले मुक़ाबले को ही याद करें। माना गया कि शुरुआती बढ़त के बावज़ूद इंग्लैंड के गोलकीपर रॉबर्ट ग्रीन की भयंकर भूल की वज़ह से यह मैच ड्रॉ हो गया। फुटबॉल के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जब मैच के खलनायकों के तौर पर गोलकीपरों को चिह्नित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई।
जबकि टीम अगर जीतती है तो कभी गोलकीपरों की वज़ह से नहीं बल्कि अगली पंक्ति के खिलाड़ियों के कारण जीतती है। अगली पंक्ति के खिलाड़ी ही विपक्षी खेमे पर गोल दागकर टीम को जीत तक ले जाते हैं, जिसमें गोलकीपरों की कोई भूमिका नहीं होती है। इसलिये गोलकीपरों को टीम की हरेक जीत में ही अपनी खुशी भी ढूंढ़नी होती है और टीम की हरेक हार की जिम्मेदारी स्वीकारने का उसे जैसे अभिशाप होता है। थोड़े ख़ुशनसीब वे गोलकीपर हैं जो अपनी टीम के कप्तान हैं और क़ामयाब कप्तान के तौर पर वे शोहरत बटोरते हैं। यानी, फुटबॉल की इसबार की विश्वविजेता टीम स्पेन के कैप्टन केसिलास की तरह दूसरे गोलकीपरों का भाग्य इतना बुलंद नहीं है।

2 comments:

माधव said...

nice

अमृत उपाध्याय said...

काश कि ये आर्टिकल आपने ब्लॉग पर वर्ल्ड कप के पहले या फिर उस दौरान जारी कर दिया होता, तो सिर्फ मैच देखने से कहीं ज्यादा रोमांच का अनुभव कर पाता मैं...