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Wednesday, August 4, 2010

...जब मैं मॉल देखने गया

दोस्तो, कई चीजों पर आपसे अपना अनुभव बांटना चाहता हूं। सो, इसकी पहली किस्त आपके सामने है। (इसे गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं, बस यूं ही चकल्लसबाजी भर है )- संजीव।
ठाकरे साब के मच्छर वाले बयान की क़सम। बहन जी के गले में डाली गई नोटों की माला की क़सम। क़सम राहुल महाजन के छिछोरेपन की। कसम कलमाडी के कॉमनवेल्थ की। ...मैं ऐसी कसमें किसके लिए खा रहा हूं ? क्यों आंय- बांय की कसमें खाकर पाठकों को पकाए जा रहा हूं?
इतना किरिया- कसम खाने के बाद भगवान झूठ न बुलवाए। यह 21वीं सदी का उत्तरार्ध था। जगह- जगह मॉल खुल रहे थे। अंग्रेज़ी के MALL को हम अज्ञानी, मूर्ख और जाहिल जन, सहज भाव से - माल- मानकर पढ़ते और यही सोचते। मित्रो! जानता हूं कि आप भी यहां माल का मतलब माल- आसबाब से नहीं लेंगे लेकिन आपको स्वतंत्रता है कि बौद्धिक दिखने के लिए ऐसा कर लें। जैसा कि जानते हैं कि हम जैसे छिछोरों के लिए माल का मतलब एक ही है। तो ऐसा ही मैं समझता था।
ख़ैर। मूर्ख था, सो मूर्ख़ों से ही दोस्ती थी। यही दोस्त मजा लेते- बेट्टा, अंदर ढुककर (घुसकर) देखो...एक-से-एक माल है ! अंधरिया रात में मौक़ा देखकर एकदिन मॉल के बहाने माल देखने चला। चेहरे की भौतिक दशा ऐसी थी, मानो मॉर्निंग शो में अंग्रेज़ी की एडल्ट फिल्म देखने जा रहे हों।
दोस्तो, भगवान झूठ न बुलवाए। किशोरावस्था के इस शग़ल के कारण कई बार जूते पड़े लेकिन एडल्ट फिल्म देखने का कर्म पूरी तरह से निभाया। चपंडुक दोस्त, जो एडल्ट फिल्म देखने के माहिर, तज़ुर्बेकार और अनुभवी थे (कच्ची कली, जवानी की आग जैसी फिल्में दूध का दांत टूटने से पहले ही देख चुके थे) उनके आगे घुन्ना बन जाता। देख तो मैं भी चुका था लेकिन इन दोस्तों के सामने इंप्रेशन देता कि ये बातें मेरे लिये वाहियात हैं। या मेरी इन सब चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं। दोस्तो, मैं न तो बौद्धिक था न ही मुझमें बौद्धिकता के लेश मात्र भी लक्षण थे लेकिन जीवंत और सहज ढोंग में पारंगत मैं तब से लेकर अबतक बौद्धिक समझा जाता रहा हूं।
तो मॉल के दर्शन के समय ऐसा ही भाव था। या फिर ऐसा, जैसे पहली बार घर से भागकर पटना के अशोक सिनेमा हॉल में -शोले- फिल्म देखी थी। चार दिनों की रेकी (हेडली भाई साहब की मुंबई आतंकी हमलों के दौरान की गई रेकी की ख़बर पढ़ने के बाद समझ पाया कि इसे रेकी कहते हैं) के बाद पांचवें दिन टिकट खिड़की में डर के मारे कंपकपाते हाथ घुसेड़ दिये। डर लग रहा था कि टिकट वाला पूछ देगा- कहां घुस रहा है रे ? टिकट वाले ने पूछा कि किस क्लास का टिकट चाहिये ?...घिग्घी बंध गई। कहीं यह तो नहीं पूछ रहा कि किस क्लास में पढ़ते हो ?...घबराते हुए ऐसे कहा जैसे सब्जी बाजार में आलू ख़रीदते हुए अक्सर कहता था- जितना का आ जाए, दे दीजिये। झल्लाकर उसने सबसे आगे का टिकट थमा दिया। एकबार फिर मैं बाहर जाकर इत्मीनान हो आया कि कहीं बाहर तो कोई जान- पहचान वाला नहीं है। टिकट वाले मुच्छड़ को भी मैंने यह झांसा देने की कोशिश की कि मैंने ख़ुद के लिए यह टिकट नहीं खरीदा है बल्कि किसी सक्षम और वैध सज्जन के लिए मैने टिकट खरीदने में उल्लेखनीय योगदान भर दिया है।
ख़ैर। फिल्म शुरू होने के आधे घंटे बाद अंधेरे में टऊआते हुए सीट पर बैठे। आगे की सीट के कारण विशालकाय पर्दा। ट्रेन पर चल फाइटिंग सीन। ढिशुंग- ढिशुंग। एक- एक कर डकैतों को ट्रेन से फेंक रहे थे जय और वीरू। इंटरवल में बत्ती जलने पर असहज हो गया। मूंगफली वाले। पापड़ वाले। ठंडा बेचने वाले। घुरियाकर चले गए मगर मैं एकदम से मुंह सुखाए सीट से हिटा नहीं। कुछ देर बाद पर्दे पर स्टिल की सूरत में प्रचार आने लगा- आनंद साड़ी...गृहणियों की एकमात्र पसंद। हमारे शोरूम में आएं और घर की ख़ुशियां ख़रीदकर ले जाएं। कुछ ऐसे ही विज्ञापन आने के बाद लास्ट में आया- पिक्चर हॉल में बीड़ी, सिगरेट पीना मना है- आज्ञा से, सिनेमाहॉल प्रबंधक। दोबारा लाइट बुझी तो दिल को करार आया। मगर घर पर लातियाये जाने के डर से बेचैनी इतनी बढ़ी कि इंटरवल के पंद्रह मिनट बाद ही फिल्म छोड़कर निकल दिये। घर पर किसी को शक नहीं। वाह, आगे का रास्ता खुल गया! बस, कसक रह गई कि ठाकुर की बेवा पुत्रवधु को लालटेन जलाते- बुझाते छोड़ आया था।
तो ऐसा ही सुंदर, मनोरम और अतुलनीय भाव लिये मॉल देखने गया था। पहले भी एकाधा बार बाहर से झांक- झूंककर वापस चले गए थे। इसबार इरादा पक्का था और मंजिल सामने थी। सिक्योरिटी वाले चेक कर रहे थे। डर लगा। सोचा टिकट पूछेगा। कोई देख लेगा। चंडूखाने के वही मित्र कहेंगे- बेटा अकेले -अकेले माल देखने आया है? चौकन्नी नज़रों से इधर- उधर देखा। टिकट खिड़की कहां थी, जहां माल देखने का टिकट मिलता ? इसी अवस्था में सिक्योरिटी गार्ड ने अचानक क्रांतिकारी कदम उठाया और ठोंक दिया सलाम। बौराए अंदाज़ में सलाम का जवाब उसी अंदाज़ में सलाम ठोंककर दिया। क्रमश: दांत निपोर कर उसके आगे खड़े हो गए। (जारी)

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बानगी तो बहुत ही बढ़िया रही!

Bhuwan said...

दिलचस्प अनुभव... दिमागी कबाड़खाने की अगली पोस्ट का इंतज़ार रहेगा.